मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 27 July 2016

आधार, डीबीटी और योजनाएं

                                                                                    यूपीए-२ सरकार द्वारा देश में नागरिकों की सही पहचान करने और उन्हें अपने को साबित करने के लिए शुरू किये गए आधार कार्यक्रम ने कम समय में ही बहुत बड़ी सफलता प्राप्त कर ली है इसके साथ ही पात्रों को किसी भी तरह की सब्सिडी का भुगतान भी सीधे उनके खातों में करने के लिए डीबीटी योजना को भी शुरू किया गया था. इस सबमें एलपीजी सब्सिडी को प्रारम्भ में प्रायोगिक तौर पर देश के कुछ जिलों में शुरू किया गया था पर जिस उद्देश्य से इस योजना को शुरु किया गया था उस समय देश का सम्पूर्ण बैंकिंग और एलपीजी तंत्र पूरी तरह से अपने उपभोक्ताओं से जुड़ा हुआ नहीं था और कुछ नए काम के होने के चलते भी इसके अनुपालन में कमियां सामने आयीं जिन्हें दूर करने के लिए तत्कालीन सरकार ने निर्देश जारी किये और योजना की रफ़्तार को धीमा कर दिया. देखा जाये तो सरकारी योजनाओं में इस तरह की संभावनाएं टटोलने का मुख्य उद्देश्य ही भ्रष्टाचार को रोकना और सही लोगों तक आर्थिक सहायता को पहुँचाना ही था जिसका लाभ आज इसके नए स्वरुप में दिखाई भी देने लगा है और सरकार को सब्सिडी के क्षेत्र में काफी बचत भी हो रही है.
                            निश्चित तौर पर यह केंद्र सरकार की बड़ी उपलब्धि ही कही जा सकती है कि जनता के पैसा का सदुपयोग हो रहा है और जो धन बच रहा है उसके माध्यम से अब नयी योजनाओं और विकास पर ध्यान केंद्रित किये जाने कि बातें भी होने लगी हैं. बॉयोमेट्रिक सिस्टम को पीडीएस में लागू करने के बाद जिस तरह से हर पांचवे व्यक्ति के भौतिक सत्यापन में सफलता नहीं मिल पा रही है उसके बाद एक बार फिर से इस समस्या पर विचार किये जाने कि आवश्यकता है क्योंकि जब तक पात्रों को इस सुविधा का लाभ नहीं मिल पायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में सरकार की मंशा पूरी नहीं हो सकती है. जिन लोगों के बॉयोमेट्रिक सत्यापन में समस्या आती है उन्हें उनके पंजीकृत मोबाइल पर आवश्यक रूप से सन्देश भेजे जाने के लिए भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए क्योंकि गांवों में रहने वाले बुजुर्गों के लिए इस सिस्टम के काम न करने पर बहुत बड़ी समस्या भी उत्पन्न हो जाती है. आज देश में निचले स्तर तक भ्रष्टाचार का जो स्वरुप हो चुका है उस पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि पंचायती राज के सबसे निचले पायदान ग्राम सभाओं में मनरेगा को लेकर ही भ्रष्टाचार चरम पर फैला हुआ है.
                         इस तरह से घरेलू गैस से बचने वाले धन को लेकर सरकार की तरफ से जो आंकड़े पेश किये जा रहे हैं कैग ने उस पर भी भारी संदेह जारी किया है और यहाँ तक कह दिया है कि सरकार १२००० करोड़ रुपयों की बचत होने कि बात कर रही है जबकि वास्तव में यह केवल २००० करोड़ रूपये ही है और इसमें जो बचत दिखाई जा रही है वह तेल मूल्यों में कमी के कारण है न कि यह बचत डीबीटी के कारण हो रही है. अब कैग या सरकार में से कोई एक ही सही कह रहा है पर कैग को किसी आंकड़े को गलत पेश करने से कुछ भी नहीं हासिल होने वाला है जबकि सरकार इन जादुई और भ्रामक आंकड़ों के माध्यम से अपनी वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ घोषित कर सकती है तथा यही आंकड़े उसके लिए चुनावों में एक बड़े मुद्दे के रूप में भी काम कर सकते हैं. राजनीति में विरोधियों को घेरने के लिए बहुत सारे मुद्दे सदैव ही उपलब्ध रहते हैं इसलिए सरकार को एक बार फिर से डीबीटी और आधार के संयोजन में होनी वाली समस्याओं पर गंभीरता से विचार करते हुए इनके निराकरण के बारे में भी सोचना चाहिए जिससे आम गरीबों को सही तरह से बिना परेशानी के ही सम्पूर्ण लाभ दिया जा सके.
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