मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 26 July 2016

असुरक्षित स्कूल वैन

                                                    देश के हर हिस्से से ही समय समय पर जिस तरह से स्कूली बच्चों के वाहनों के दुर्घटनाग्रस्त होने और बच्चों के काल के गाल में समाने की ख़बरें आती रहती हैं उन पर किसी बड़ी घटना के बाद तो समाज का हर वर्ग और प्रशासनिक अमला भी पूरी तरह से चिंतित नज़र आने लगता है पर कुछ समय बाद हम यह सब भूलकर फिर से किसी नए हादसे के होने तक सुरक्षा के नियमों और मानकों की बातें करना भी पसंद नहीं करते हैं. देश की भौगोलिक परिस्थिति और विस्तार को देखते हुए रेलवे के लिए एकदम से सभी मानव रहित क्रासिंग्स को सुरक्षित कर पाना आसान भी नहीं है फिर भी रेलवे एक अभियान के अंतर्गत २०२० तक सभी मानवरहित क्रासिंग्स पर समुचित व्यवस्था करने के एक प्लान पर काम कर रही है. ऐसे हर उस स्थान के आसपास रहने वाले लोगों को इन क्रासिंग्स से पर होने के सारे नियम पता ही हैं फिर भी इनमें लापरवाही होने से बड़ी दुर्घटनाएं भी होती ही रहती हैं जैसी यूपी के भदोही में स्कूल जा रहे बच्चों की वैन ट्रेन से टकरा गयी और बच्चे मौत की नींद में सो गए. इन सबसे निपटने के लिए हमें हर स्तर पर प्रयास करने होंगें तथा खुद भी जागरूक होना होगा.
        अपने बच्चों को सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए लगभग हर माँ बाप अपनी तरफ से अच्छा प्रयास ही करते हैं तथा हर मामले में कड़ी जाँच करके ही वे आगे की बात करते और सोचते हैं पर जब उनके स्कूल आने जाने की बात होती है तो ग्रामीण क्षेत्रों की बात तो छोड़ ही दी जाये हज़ारों रूपये फीस देने वाले लोग भी सस्ते वाहन से अपने बच्चों को स्कूल भेजने के जुगाड़ करने में लगे हुए दिखाई देते हैं. जबकि यह ऐसा मामला होता है जिसमें सबसे अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता होती है क्योंकि बच्चे सबसे अधिक खतरे में तब ही होते हैं जब वे स्कूल आ जा रहे होते हैं और उन्हें हर तरह के यातायात के बीच से होकर ही जाना पड़ता है. इस समय उनके लिए सुरक्षित आवागमन के बारे में गंभीरता से देखना और निर्णय लेना चाहिए, देश भर में चलने वाली अधिकांश स्कूल वैन सुरक्षा मानकों पर खरी नहीं उतरती हैं और जिसके चलते उनमें आने जाने वाले बच्चे सदैव ही खतरे में ही रहा करते हैं. कुछ रुपयों के लालच में हम अपने बच्चों के आने जाने को इस हद तक असुरक्षित कर देते हैं और सबसे बड़ी बात यह होती है कि हमें यह आभास भी नहीं होता है कि यह भी कोई बड़ा खतरा हो सकता है ? किसी दुर्घटना के हो जाने पर पूरी व्यवस्था को सँभालने वाले तंत्र पर ऊँगली उठाने में हम सबसे आगे खड़े हो जाते हैं जबकि कमी हमारे स्तर से ही होती है.
           अंतिम स्तर पर इसमें प्रशासनिक दखल की भी आवश्यकता होती है क्योंकि जितनी बड़ी संख्या में बच्चे स्कूल आते जाते हैं उस अनुपात में देश में पंजीकृत स्कूल वैन नहीं हैं और इस सारे प्रकरण में मोटी फीस लेने वाले अधिकांश नामचीन स्कूल वैन के मामलों में अपने को अलग ही रखना चाहते हैं जबकि अभिभावकों के साथ मिलकर उनको इस समस्या का समाधान भी खोजने की आवश्यकता पर सोचना चाहिए. प्रशासन के सामने भी यह मजबूरी है कि वह एक झटके में इस समस्या का समाधान भी नहीं कर सकता है पर उसकी तरफ से कोई चरणबद्ध कार्यक्रम भी शुरू नहीं किया जाता है जिससे यह लगे कि कम से कम प्रशासन तो इस मामले में गंभीर है ? आज गांवों से शहरों की तरफ रोज़गार की तलाश में आये युवाओं द्वारा जिस तरह से चालक भी बनने के बारे में सोचा जाता है वह भी बच्चों के लिए एक बड़ा खतरा ही होता है. प्रशासनिक पहल के बाद भी वहां चलते समय मोबाइल फ़ोन के उपयोग को कम करने में कोई सफलता अभी तक नहीं मिल पायी है और भदोही मामले में मोबाइल एक मुख्य कारण सामने आता दिखाई दे रहा है इससे अब इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि वैन चलाने वाले चालक भी इस खतरे के बारे में पूरी तरह से जागरूक भी हों. जब तक इन सारे मुद्दों पर विचार कर नए सिरे से इस पूरी समस्या पर ध्यान नहीं दिया जायेगा तब तक बच्चों को सुरक्षित रूप से स्कूल की यात्रा करवा पाना भी संभव नहीं होने वाला है.       
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