मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 21 August 2015

जन-धन योजना का प्रचार ?

                                                 पिछले वर्ष १५ अगस्त पर लालक़िले से अपने देश के नाम पहले सम्बोधन में जिस जन-धन योजना की घोषणा पीएम मोदी ने की थी आज लगभग १७ करोड़ खाते खुलने के बाद भी यह योजना अपने लक्ष्य से भटकी हुई ही अधिक दिखायी देती है और आज इसकी जो स्थिति वित्त मंत्रालय के सामने आ रही है उससे खुद अधिकारियों की समझ में नहीं आ रहा है कि अब इस योजना को पटरी पर लाने के लिए वे किस तरह से प्रयास शुरू करें. कोई भी योजना जब केवल ऊपरी स्तर से शुरू की जाती है और उसके पूरे नियम कानून का सही तरह से प्रचार नहीं किया जाता है तो वह इसी तरह दुर्व्यवस्था का शिकार हो जाती है क्योंकि जिस तरह से पिछले वर्ष जन-धन योजना का प्रचार किया गया उससे लोगों को यह लगा कि सरकार इसके माध्यम से ५००० रूपये उनके खाते में भेजेगी जिसके चलते उन लोगों ने भी लालच में खाते खुलवाये जिनको इसकी आवश्यकता और सञ्चालन सम्बन्धी समझ ही नहीं थी जिसके चलते आज इनमें से आधे से भी कम खाते ही इस योजना के सभी लाभों को पाने के लिए पात्र बचे हैं और बाकी खाते बैंकों पर एक बोझ के रूप में बड़ा सर दर्द ही साबित होने वाले हैं.
                                           ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह योजना कितनी असुविधाजनक है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी तहसील स्तर के एटीएम बूथों में निकालने के लिए पैसे ही नहीं होते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में तो एटीएम हैं ही नहीं फिर इस योजना को क्या केवल शहरी क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए ही बनाया गया था यह बात आज भी समझ से बाहर है. हर ४५ दिन पर एटीएम के सञ्चालन की बाध्यता होने के चलते कितने खाते इस पूरी योजना का लाभ उठा पायेंगें यह आज कोई भी नहीं बता सकता है. देश के ज़िले स्तर के शहरों में निजी क्षेत्रों के बैंकों द्वारा विभिन्न तरह की सुविधाएँ दी जा रही हैं जिनके चलते ग्राहक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लेन देन कम करने लगे हैं और आने वाले समय में भी यदि सरकार की सोच इसी तरह की रहती है तो क्या यह अपने आप में एक और समस्या नहीं होगी क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में खुली राष्ट्रीयकृत बैंकों की शाखाओं में बैंकिंग कम और सरकारी योजनाओं का अनुपालन ही अधिक होता रहता है जिससे पूरे बैंकिंग तंत्र पर आने वाले समय में और भी बोझ पड़ने की संभावनाएं भी हैं. ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के पास काफी बड़ी संख्या में मनरेगा के खाते थे पर केवल रिकॉर्ड बनाने के लिए जिस तरह से सरकार ने उनके भी नए खाते खुलवाये क्या वे आज सञ्चालन की स्थिति में हो सकते हैं यह भी सोचने का विषय है.
                            केंद्र सरकार को एक बार फिर से इस तरह की योजनाओं को बनाते समय ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे सरकारी दुर्व्यवस्था से निपटने में सहायता मिल सके किसी भी अच्छी योजना का इस तरह से बुरा हश्र न हो और वह भारतीय बैंकों या अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक साबित न हो अब इस पर भी गंभीरता से विचार किये जाने की आवश्यकता है. सरकारें योजनाएं बना सकती हैं पर उनके क्रियान्वयन की पूरी ज़िम्मेदारी सम्बंधित मंत्रालय और अधिकारियों कर्मचारियों की ही होती है. जन-धन योजना में जो भी धरातल पर कमियां रह गयी हैं एक बार वित्त मंत्रालय को उन पर भी विचार करना हो होगा तभी देश की आंतरिक अर्थव्यवस्था से पैसे निकालने में सरकार को आसानी हो सकती है. निश्चित तौर पर सरकार की तरफ से प्रयास अच्छा था पर इसका सही तरह से प्रचार प्रसार नहीं किया गया जिसका नतीजा आज हमांरे सामने है. अब इस योजना के अंतर्गत खुले हुए खातों के लिए बैंकों ने भी ग्राहकों को पत्र भेजने शुरू किये हैं जिनमें खातों को लगातार संचालित करते हुए लाभ उठाने की बात कही जा रही है अब इसके लिए पूरे देश में निष्क्रिय खातों वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर नागरिक जागरूकता अभियान चलाये जाने की आवश्यकता है जिससे यह योजना आने वाले समय में अपने विश्व रिकॉर्ड को धन जमा करने के रूप में भी सबसे आगे रख पाने में सफल हो सके.    

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