मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 20 August 2015

पीएम मोदी की रफ़्तार और सरकार

                                                       पिछले वर्ष सत्ता में आने के बाद से ही लगातार जिस तरह से पीएम के रूप में नरेंद्र मोदी अपने स्तर से हर तरह के प्रयास करने में लगे हुए हैं क्या देश को उस स्तर पर उन प्रयासों का लाभ मिल पा रहा है आज यह प्रश्न देश के समक्ष महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि अभी तक स्वयं पीएम की स्तर पर जिस योजनाओं और महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को शुरू किया गया है अब वे किस दशा में हैं यह देखने की किसी को भी फुर्सत नहीं है. पीएम की यूएई यात्रा के दौरान ही जिस तरह से ईरान ने चाहबहार बंदरगाह परियोजना के निर्माण से भारत को पूरी तरह से बाहर कर दिया उससे क्या संकेत मिलते हैं जबकि खुद पीएम इस मामले को अपने स्तर से देख रहे थे ? दशकों से भारत से अच्छे सम्बन्ध रहने वाले विभिन्न देशों की तरफ से समय समय पर जो विपरीत संकेत मिल रहे हैं और उनके बाद जिस तरह से सरकार उन देशों की मान मनव्वल करके मामलों को सुधारने की कोशिशें करती नज़र आती है उसके लिए निश्चित तौर पर इसके लिए सीधे तौर पर पीएम को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि उनके स्तर से रिश्ते बढ़ाने और उन्हें मज़बूत करने की कोशिशें तो हो रही हैं फिर भी देश के लिए उतने बड़े स्तर पर लाभ होता नहीं दिखाई दे रहा है जिससे यही लगता है कि सरकार के मंत्रालयों को या तो काम करने की पूरी छूट नहीं है या फिर उनकी कमान ऐसे मंत्रियों के हाथों में है जो पीएम की रफ़्तार के साथ सामंजस्य ही नहीं बैठा पा रहे हैं.
                बेशक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पीएम नए देशों के साथ सम्बन्ध बढ़ाने की कोशिशों में लगे हुए हैं पर क्या सरकार की यह ज़िम्मेदारी नहीं है कि अभी तक जिन देशों के साथ भारत के सम्बन्ध अच्छे रहे हैं उनके साथ भी कुछ और प्रयास किये जाएँ ? यूएन के विस्तार पर जिस तरह से रूस ने पहले भारत को लेकर पाने पक्ष से हटने की बात की पर सरकार के सक्रिय होने के बाद उसने फिर से देश की दावेदारी का समर्थन किया उससे यही पता लगता है कि भारत सरकार के स्तर पर सब कुछ उतना अच्छा नहीं चल रहा है जैसा होना चाहिए. ईरान को भारत ने अमेरिका की परवाह न करते हुए भी कच्चे तेल की खरीद में सदैव ही अहमियत दी है और इसके लिए किसी भी दल की सरकार आने से कोई अंतर नहीं पड़ा था पर अब जब ईरान के खिलाफ प्रतिबन्ध ख़त्म होने की तरफ बढ़ रहे हैं तो वह भारत को एकदम से किनारे क्यों करना चाहता है आज यह भी देखने का विषय है ईरान के साथ भारत के हज़ारों साल के सम्बन्ध रहे हैं और इस तरह की नयी समस्याओं से निपटने के लिए अब भारत सरकार को और भी अधिक प्रभावी कदमों के साथ आगे बढ़ना ही होगा क्योंकि आज प्रतिस्पर्धा का युग है और द्विपक्षीय संबंधों में रूस को छोड़कर कोई भी देश भारत को उतना महत्त्व नहीं देता है.
                यह देश के भविष्य के साथ जुड़ा हुआ मसला है और इस तरह के किसी भी मुड़े को सरकार के हर मंत्री को अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए आगे बढ़ने के बारे में सोचना चाहिए. पीएम के रूप में मोदी जो कुछ प्रयास कर रहे हैं यदि उनका सही और प्रचुर लाभ देश को नहीं मिल पाता है तो अंत में इसका उत्तरदायित्व खुद मोदी तक ही पहुँचने वाला है इसलिए अब मोदी को सरकार में उम्र की सीमा पर फिर विचार करते हुए अनुभवी लोगों के विचारों को आगे लाने का काम करना चाहिए जिससे देश को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकें. केवल मोदी आगे बढ़कर प्रयास कर सकते हैं पर सम्बंधित मंत्रियों को अपनी कुशलता दिखाते हुए उन कार्यों और द्विपक्षीय संबंधों और उनको मज़बूत बनाने के बारे में सोचना ही होगा. आज भले ही कितने प्रयास क्यों न कर लिए जाएँ पर अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य ऐसा ही कि चाहते हुए भी देश को वे सारे लाभ नहीं मिल सकते हैं जिनकी आशा लगायी जा रही है तो इस तरह की विषम परिस्थिति में बेहतर प्रयासों के माध्यम से सरकार देश को आगे बढ़ाने के प्रयास तो कर ही सकती है. यदि मंत्रियों की अनुभवहीनता इसी तरह से चलती रही तो मोदी सरकार के लिए उन मानकों को छू पाना मुश्किल ही हो सकता है और पीएम के रूप में मोदी के प्रयासों का भरपूर लाभ भी देश को नहीं मिल पायेगा.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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