मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शुक्रवार, 5 जून 2020

चीन की चालें

                                                   एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया कोरोना से जूझने में लगी हुई है वहीं चीन पूरी दुनिया में अपनी विस्तारवादी नीतियों को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है. भारत के साथ लगती उसकी अरुणाचल प्रदेश से लद्दाख तक की सीमा को वह समय समय पर विवादित बनाने की कोशिशों में सदैव लगा ही रहता है पर १९६२ के बाद से ही भारत की सरकारों और जनता की निगाहों में चीन की स्थति ऐसे पडोसी की हो गयी है जो ज़रा सी नज़र चूकने पर बाहर दाना चुग रही मुर्गी को चुराने से भी बाज़ नहीं आता है. पंचशील के सिद्धांतों को जिस तरह से अनदेखा करते हुए चीन ने भारत की उन सीमाओं पर युद्ध लड़ा जहाँ किसी भी तरह के युद्ध के लिए पहुँचने के लिए भारत के पास उस समय न तो धन था और न ही संसाधन जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों के बड़े भाग पर आज भी कब्ज़ा जमाकर विवाद बताकर चीन इसे मुद्दा बनाने की कोशिशों में लगा रहता है.
                            आज एक बार फिर से वही स्थिति दोहराई जा रही है और चीन भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों तक अपनी पहुँच को मज़बूत करने वाले रास्तों और सुदूरवर्ती गांवों तक संपर्क मार्ग बनाने को लेकर सदैव ही आक्रामक रहा करता है. अब उसने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में भी विवाद शुरू किया हुआ है तो इस परिस्थिति से निपटने के लिए सरकार युद्ध के बजाय कूटनीतिक रास्तों से इसे हल करने का प्रयास करने में लगी हुई है. इस तरह की स्थिति में कोई भी सरकार युद्ध के बारे में नहीं सोचना चाहेगी वह भी तब जब चीन जैसा प्रतिद्वंदी सामने हो. अभी तक चीन केवल अरुणाचल, सिक्किम और लद्दाख में ही अपना विरोध दिखाता था पर जिस तरह से अब वह पूरी सीमा को ही चुनौती देने के मूड में दिखायी देने लगा है वह भारत के लिए चिंता का विषय ही है.
                              चीन से लगते अपने सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुँच को सुगम करने के लिए भारत की कोशिशें लम्बे अरसे से चल रही है और वर्तमान में मोदी सरकार ने इस पर और भी तेज़ी से काम करना शुरू किया है जिससे चीन को यह अच्छा नहीं लग रहा है. भारत के पास इतने सुदूरवर्ती क्षेत्र में कारगिल जैसी एक और लड़ाई लड़ने का विकल्प सीमित ही है क्योंकि कोरोना के चलते अर्थव्यवस्था को झटका लगा है उसे निपटना वैसे ही मुश्किल हो रहा है फिर भी भारत का अपने निर्माण कार्यों को जारी रखते हुए चीन के साथ कूटनीतिक स्तर पर बातचीत को बढ़ावा देने की दिशा में बढ़ना उचित है. चीन को कहीं न कहीं इस बात का अंदेशा भी है कि आज भारत में चीन विरोधी भावनाएं बढ़ रही हैं जिससे आज के माहौल में निपटना किसी भी सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है. वैश्विक बाध्यताओं के चलते भारत सरकार चीन पर सीधे प्रतिबन्ध तो नहीं लगा सकती है पर अपनी जनता से दूसरे माध्यमों से चीनी सामान के बहिष्कार की बात तो कर ही सकती है जो कि किसी भी स्थिति में चीन के लिए सही नहीं होगा। कोरोना से उत्पन्न श्रमिक संकट से निपटने के लिए भारत देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते श्रमिकों की उपलब्धता को देखते हुए विनिर्माण क्षेत्र के लिए नई नीतियों पर काम कर चीन को सीधे तौर पर चुनौती तो दे ही सकता है.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है.... 

रविवार, 31 मई 2020

निगरानी में लापरवाही

                                                           देश में कोरोना से लड़ने के लिए जिस स्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं उनमें कहीं न कहीं किसी स्तर पर शामिल लोगों द्वारा कई बार की जा रही लापरवाहियां देश के लिए चिंता एवं हंसी का विषय बन रही हैं, यह सही है कि सरकार की मंशा को पूरा करने का ज़िम्मा निचले स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों का ही होता है पर महत्वपूर्ण स्थल पर तैनात लोगों द्वारा की गयी लापरवाही से आज नई तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं. बिना पूर्व सूचना के इतनी गर्मी के मौसम में पहले तो निर्धारित मार्ग से नए मार्ग पर श्रमिक स्पेशल गाड़ियों को चलाया गया जिसके बारे में नए मार्ग पर पड़ने वाले स्टेशनों पर इन श्रमिकों के लिए कोई व्यवस्था करने के स्पष्ट आदेश नहीं थे जिससे अनावश्यक रूप से इन लोगों को अपनी यात्रा पूरी करने में अधिक समय लगा और इनको अधिक कष्टों का सामना भी करना पड़ा. यदि इस मामले में थोड़ी से सावधानी बरती जाती तो श्रमिकों की समस्याओं पर पहले से ध्यान दिया जा सकता था.
                                     कल एक खबर ऐसी भी आई जिससे पूरी दुनिया में देश की छवि को धक्का लगा है जिसमें मास्को जा रहे एयर इंडिया के विमान के पायलट के कोरोना पॉजिटिव होने का पता दोबारा की जाने वाली चेकिंग में हुआ तब तक वह दिल्ली से दो घंटे की उड़ान पूरी कर चुका था. यह लापरवाही उस स्तर पर हुई जहाँ छोटी सी चूक भी बहुत बड़ी समस्या का कारण बन सकती है. कहा जा रहा है कि पहले इस पायलट की पॉजिटिव रिपोर्ट को नेगेटिव पढ़ लिया गया जिसके चलते उसे उड़ान पर जाने की अनुमति दे दी गयी पर जब उसकी जाँच दोबारा की गई तो उसके पॉजिटिव होने की खबर भी सामने आयी. इस मामले में निश्चित तौर पर किसी कर्मचारी की लापरवाही ही है पर इससे पूरी दुनिया में देश की साख को बट्टा भी लगता है. इस तरह के मामलों में पूरी सतर्कता बरतने की आवश्यकता है जिससे भविष्य में किसी भी समस्या से बचा जा सके.
                                      इसी तरह कोरोना के सैंपल ले जाने वाले के पास से एक बन्दर सैंपल उठाकर ले गया जो की निश्चित रूप से लापरवाही की श्रेणी में ही आता है पर इससे हमारे द्वारा इकट्ठे किये जा सैम्पल्स को कुछ जगहों पर कितनी लापरवाही से लाया ले जाया जा रहा है यह भी सामने आ गया है. ऐसा नहीं कि ऐसी बहुत सारी घटनाएं हैं पर सैंपल के मामले में बन्दर उसे कहीं भी फ़ेंक सकता है और उसके बाद उस स्थान पर सैंपल के खुलने से संक्रमण फैलने का खतरा भी हो सकता है. देश में निश्चित तौर पर लाखों लोग कोरोना से निपटने में विभिन्न स्तरों पर मज़बूती से जूझ रहे हैं फिर भी इनमें से कुछ कर्मचारियों की लापरवाही से पूरे तंत्र का मज़ाक उड़ाने वालों को मौका मिल जाता है. ऐसी विषम परिस्थिति में ड्यूटी लगाते समय इन कर्मचारियों के पिछले रिकॉर्ड पर भी चाहिए और जो घोषित लापरवाह हैं उनको ७५% वेतन पर घर भेज देना चाहिए जिससे उनको इस बात का एहसास भी हो कि उनकी लापरवाही की कीमत खुद उन्हें चुकानी होगी क्योंकि देश अब उनके झेलने के लिए तैयार नहीं है.
 मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 31 अगस्त 2016

भारत-अमेरिका रक्षा समझौता


                                                     दूसरे विश्वयुद्ध में जापान के विरुद्ध दो बार परमाणु बम का दुरूपयोग करने के बाद जिस तरह से अमेरिका अपने को विश्व में सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए कुछ भी करता रहता है उसकी परिणीति पूरी दुनिया ने एक लंबे शीत युद्ध के रूप में देखी है. उस समय भारत समेत बहुत सारे अन्य देश जो या तो आज़ाद हो रहे थे या उसके बाद आज़ाद हुए हैं उनकी तरफ से भारत के नेतृत्व में गट निरपेक्ष आंदोलन की शुरुवात की गई थी जो कई दशकों तक अपने उद्देश्य को प्रभावी ढंग से निभाने में सफल भी रहा और बहुत बार उसके कारण ही कई देशों पर अमेरिका नाटो या उसके प्रतिद्वंदी रूस और वारसा संधि वाले देशों का दुष्प्रभाव नहीं पड़ सका. आज़ादी के बाद से ही निर्गुट होते हुए भी भारत ने रूस के साथ बहुत मज़बूत आर्थिक, राजनैतिक और रक्षा सम्बन्ध स्थापित किये जो आज भी काफी हद तक दोनों देशों की आवश्यकताएं पूरी करने में लगे हुए हैं. आज एक ध्रुवीय विश्व में जिस तरह से अमेरिका हर तरफ अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों में लगा हुआ है भारत के साथ उसका ताज़ा रक्षा समझौता उसी कड़ी का एक हिस्सा है.
                         वैसे तो अमेरिका ने इस पूरी दुनिया में लगभग १०० देशों से इस तरह के समझौते कर रखे हैं पर भारत को इस तरह के निर्णय के लिए झुकाना उसकी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है क्योंकि चीन के विरुद्ध अब वह भारत के रक्षा प्रतिष्ठानों का बखूबी दुरूपयोग कर सकेगा जबकि भारत को उससे किसी भी तरह का लंबी अवधि का लाभ नहीं मिलने वाला है. अमेरिका विश्व में एक मात्र ऐसा राष्ट्र है जिसको केवल अपने राष्ट्रीय हित ही दिखाई देते हैं और वह समय आने पर किसी भी सहयोगी देश को भी अकेले छोड़ने में चूकता नहीं है. ऐसी परिस्थिति में यह समझौता हमारे देश के लिए किस तरह की चुनौतियाँ लेकर आएगा यह तो समय ही बता सकता है पर इतना निश्चित है कि भारत के हितों की रक्षा करने के लिए अमेरिका कभी भी चीन या पाकिस्तान के विरुद्ध इस समझौते के चलते भारत के साथ नहीं खड़ा होने वाला है. एक समय मनमोहन सरकार ने भी इस समझौते की कोशिश की थी और ड्राफ्ट भी बनाया गया था पर नौसेना और वायु सेना की तरफ से कड़ी आपत्तियां आने के बाद उनकी सरकार ने इस मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया था.
                      कश्मीर घाटी में जिस तरह से पाक ने खुले तौर पर जिहाद के नाम पर प्रॉक्सी वॉर छेड़ा हुआ है अमेरिका आज तक उस पर कठोर बयानबाज़ी भी करने से बचता रहता है क्योंकि उसे पाकिस्तानी सेना का हर स्तर पर समर्थन मिलता ही रहता है भले ही वहां के नेता कुछ भी कहते रहें. अमेरिका सिर्फ इसलिए ही पाकिस्तान में तानशाहों को झेलता है क्योंकि उसे राजनेताओं से डील करने में समस्या होती है. क्या इस समझौते के अन्तर्गत अब अमेरिका भारत के साथ मिलकर पीओके से लगाकर लाहौर और स्वात घाटी तक भारतीय हितों की रक्षा करने के लिए हवाई हमले करने की स्थिति में भारत के साथ देगा ? यदि भारत के लिए सामरिक महत्व के इन मुद्दों पर अमेरिका चुप्पी लगता है तो यह समझौता हमारे किस काम का है ? भारत के महत्वपूर्ण सहयोगी सद्दाम हुसैन पर अमेरिका ने जो आरोप लगाए थे वे आज झूठे साबित हो चुके हैं पर भारत के विश्वसनीय सहयोगी आज उसके साथ नहीं है तालिबान ने जिस तरह से अफगानिस्तान में भारत समर्थक पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्लाह को फांसी पर चढ़ाया था तब अमेरिका ने क्या किया था ? इस समझौते के बाद अब अमेरिका को भारत के रूप में एक सुविधा संपन्न सैन्य सहयोगी तो मिल गया है क्योंकि उसकी दुनिया के हर देश से किसी न किसी मुद्दे पर तकरार होती रहती है तो वह हमारे सैन्य प्रतिष्ठानों का दुरूपयोग करता रहेगा और भारत ने आज तक संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के अतिरिक्त केवल १९७१ में बांग्लादेश और १९८७ में श्रीलंका में अपनी फौजों को भेजा था. ऐसे में यह समझौता हमें अमेरिका के हितों को सँभालने में एक मजबूरी के रूप में ढोना पड़ सकता है अगर पाक को लेकर अमेरिका अपनी आज की स्थिति को नहीं बदलता है तो भारत के लिए इस समझौते में पाने लायक कुछ भी नहीं दिखाई देता है.          मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 6 अगस्त 2016

सार्क की प्रासंगिकता

                                                                       दक्षिण एशिया के सात देशों को अपनी साझा समस्याओं और सुविधाओं को साझा करने के साथ  एक आर्थिक रूप से मजबूत क्षेत्र बनाने के सत्तर के दशक के शुरुवाती वर्षों में शुरू हुए प्रयासों ने ८ दिसंबर १९८५ को मूर्त रूप लिया जिसके बाद सार्क का गठन किया गया. इस समूह के चार्टर में शुरू से ही इस बात का उल्लेख किया गया था कि क्षेत्र के विकास के लिए सदस्य देश अपनी द्विपक्षीय समस्याओं को इन स्थान पर नहीं उठायेंगें क्योंकि इसके दो बड़े सदस्यों भारत-पाक के बीच बंटवारे के समय से ही गंभीर विवाद के रूप में कश्मीर और अंतरराष्ट्रीय सीमा मौजूद थी. आज इसके गठन के ३१ वर्ष होने पर भी पाकिस्तान ने यह बात नहीं समझी है कि इस मंच का सदुपयोग किस तरह से किया जाये क्योंकि उनको आज भी यही लगता है कि यदि भारत को पूरी छूट दे दी गयी तो वह पाकिस्तान के बाज़ार पर कब्ज़ा कर लेगा और उनके आर्थिक हित प्रभावित होने लगेंगें तभी आज भी उसकी तरफ से भारत को मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा नहीं दिया गया है और वह संगठन की मूल भावना के खिलाफ जाकर इस मंच से भी कश्मीर का मामला उठाने की कोशिशें लगातार ही करता रहता है जिसका इस संगठन के काम काज पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है और संगठन के गठन पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है.
                         हाल ही में इस्लामाबाद में सार्क देशों के गृह मंत्रियों की बैठक में पाकिस्तान ने जिस तरह का व्यवहार किया उसके बाद सार्क के होने या न होने के क्या मायने रह जाते हैं क्योंकि पूरी दुनिया जानती है कि आज पाक जेहादियों को अपरोक्ष रूप से हर तरह की मदद करता है और खास तौर पर भारत और अफगानिस्तान के लिए लगातार समस्याएं खडी करने का काम भी करता ही रहता है. इस तरह एक अंतरराष्ट्रीय मंचों से राजनयिक शिष्टाचार की अपेक्षा हर देश से की जाती है भले ही उनके आपस में कितने भी मतभेद क्यों न हों फिर भी जिस तरह से इस्लामाबाद में पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर का राग अलापकर बैठक को ख़राब करने की कोशिश की गयी उसके कोई सकारात्मक परिणाम भी सामने नहीं आने वाले हैं. जब बांग्लादेश भी पाकिस्तान के आतंक समर्थक रवैये के चलते अपने मंत्री को इस बैठक में भेजने से इंकार कर सकता है तो ऐसा करने में भारत को क्या दिक्कत है ? जिस तरह से पाकिस्तान का माहौल ख़राब होने के चलते आज वहां पर कोई भी देश क्रिकेट खेलने को राज़ी नहीं होता है ठीक इसी तरह से अब पाकिस्तान से हर तरह के अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को दूर करवाने की कोशिश अब भारत को भी करनी चाहिए.
                           सार्क के सम्बन्ध में भारत को अन्य देशों के साथ मिलकर अब पाकिस्तान को अलग थलग करने का समय आ गया है क्योंकि इसके चार्टर के अनुसार केवल एक देश ही सारी बातों के लिए ज़िम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है ? पाकिस्तान की तरफ से सार्क के हर कदम को रोकने की हर संभव कोशिशें की जाती हैं क्योंकि उसे लगता है कि देशों में इस स्तर का सहयोग बढ़ने पर भारत को ही इसका सबसे अधिक लाभ मिलेगा और वह कश्मीर जैसे विवादित मुद्दे पर बात कर पूरे माहौल को ख़राब करने की कोशिश करने में ही लगा रहता है. भारत को एक बात और भी स्पष्ट करने की आवश्यकता भी है कि पाकिस्तान के इस तरह एक रवैये के चलते अब उसके साथ सार्क स्तर पर सम्बन्ध रख पाना भी संभव नहीं है जिससे सदस्य देशों की तरफ से पाक पर कुछ दबाव भी बनाया जा सके. आज जब पूरा विश्व एक आर्थिक बाजार के रूप में सामने आ चुका है तो उस परिस्थिति में आखिर सदस्य देश इस तरह कब तक अपने आर्थिक हितों के लिए सार्क की तरफ ताकते रहेंगें ? इस पूरे मसले में भारत का ही सबसे अधिक नुकसान होता है इसलिए अब पहल उसकी तरफ से ही होनी चाहिए और सदस्य देशों की तरफ से सार्क और द्विपक्षीय व्यापारिक, आर्थिक, सामाजिक संबंधों के लिए एक समयबद्ध संरचना पर विचार करना चाहिए वार्ना सार्क अपने उद्देश्य को कभी भी हासिल नहीं कर पायेगा.           
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

भारत-अफ्रीका परंपरा और संबंध

                                                                           देश के निर्माण में अपना किसी भी स्तर पर योगदान करने वाले नेताओं को भले ही सरकार पूरी तरह से भूल गयी हो पर भाजपा की कथित मीडिया टीम के लिए भारत अफ्रीका समिट में नेहरू-इंदिरा का जिक्र कहीं से भी संघ, मोदी और भाजपा को रास नहीं आया होगा। आज़ादी के बाद पूरी दुनिया में भारत को हर तरह से स्वीकार्य बनाये जाने के लिए नेहरू द्वारा किये गए प्रयासों को अनदेखा करते हुए जिस तरह से भाजपा ने पिछले चुनावों में उंनके चरित्र हनन से लेकर लगभग हर हथकंडा अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी उसकी उस मानसिकता को भी अफ्रीका के नेताओं ने पूरी दुनिया के सामने बहुत अच्छी तरह से आइना दिखा दिया है क्योंकि भारत की अभी तक की छवि पूरी तरह से सहिष्णु और सद्भाव बढ़ाने वाले राष्ट्र की ही रही है पर कहीं न कहीं से भाजपा के मातृ संगठन संघ द्वारा आज़ादी के बाद नेहरू के नेतृत्व में देश ने जो कुछ भी हासिल किया था उसे नकारने का काम ही अधिक किया जाता रहा है और उनकी कुछ नाकामियों को इस तरह से प्रदर्शित किया जाता है जैसे उन्होंने देश के लिए कुछ भी नहीं किया हो ?
                      लोकतंत्र में राजनैतिक विरोध होना अवश्यमभावी है क्योंकि विपरीत विचारधाराओं में से ही लोगों को अपने लिए सरकार चुनने की आज़ादी के बारे में अपने अधिकार का उपयोग करना होता है और इसी क्रम में देश ने कई बार शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण भी देखे हैं जो शायद दुनिया के लिए एक अचम्भे से अधिक कुछ भी नहीं हैं क्योंकि पिछली सदी में स्वातंत्र हुए देशों में जिस तरह से समस्याएं बनी रहती हैं भारत ने उससे पूरी तरह मुक्ति ही पा रखी है. संघ का देश में एक अपना ही अलग एजेंडा रहा है और उसी के तहत वह भाजपा से अपने काम करवाने की कोशिशें करता रहता है पर जिस समिट के लिए मोदी सरकार ने पूरा ज़ोर सिर्फ इस बात पर ही लगा दिया था कि यह केवल मोदी और भाजपा का ही सम्मलेन रह जाये तो दक्षिण अफ्रीका और ज़िम्बाब्वे के नेताओं ने अपनी स्पष्टवादिता से उनकी इस मंशा पर पूरी तरह से पानी ही फेर दिया जब उन्होंने मंच से ही भारत के साथ अफ्रीका महाद्वीप के रिश्तों के ज़िक्र में नेहरू और इंदिरा गांधी का ज़िक्र पूरी शिद्दत के साथ किया।
                            दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने जिस तरह से पिछली सदी में अपने देश के साथ संबंधों को बढ़ाने और विकास की बात करने के लिए नेहरू के योगदान की चर्चा की उससे यही लगता है कि भले ही देश की राजनीति में आज प्रभावी भूमिका निभा रहे संघ और मोदी सरकार के लिए नेहरू और इंदिरा की उपेक्षा करना आसान हो पर दुनिया और ख़ास तौर पर अफ्रीका के लोग आज भी उनके योगदान को नहीं भूल पाये हैं. इसी क्रम में जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रोबर्ट मुगाबे ने और भी आगे जाते हुए लम्बे समय तक भारत में राज करने वाली कांग्रेस पार्टी को भी महान बताया उससे केवल यही सीखा जा सकता है कि भले ही आज कोई भी दल या नेता अप्रभावी हो चुका हो पर उसके कार्यकाल में लिए गए फैसलों से प्रभावित होने वाले लोगों के लिए वह सदैव ही महत्वपूर्ण ही रहा करता है. आज यदि अफ्रीका के नेता इतने दिनों बाद भी नेहरू इंदिरा को याद कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर उनके काम तो बहुत ही महत्वपूर्ण रहे होंगे पर आज संघ, भाजपा और मोदी अपने देश की उस विरासत से पीछा छुड़ाना चाह रहे हैं जो अब देश के इतिहास में दर्ज़ हो चुकी है.
            लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुई किसी भी सरकार को देश चलाने की पूरी स्वतंत्रता संविधान में दी गयी है पर अपनी सोच से इतर किसी अन्य को अपनी विरासत विरासत का हिस्सा न मानने वाली इस संघ की परंपरा को आज मोदी सरकार आगे बढ़ाने में लगी हुई है जिससे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उसकी छोटी सोच ही प्रदर्शित होती है क्योंकि यदि विश्व के साथ लम्बे समय तक भारत के संबंधों की रखवाली करने वाले नेताओं को भी इतनी महत्वपूर्ण समिट में भुला दिया जाता है तो जिन्होंने उनके साथ काम किया या उनकी नीतियों के चलते बहुत लाभ उठाया है वे किसी भी तरह से उसे नहीं भूलने देते हैं और इस समिट में संभवतः अफ्रीका के इन शीर्ष नेताओं ने यही बात सार्वजनिक मंच से कहकर एक तरह से मोदी सरकार को सन्देश देने का काम ही किया है. दूसरे नेता इस तरह की बातों रुख अपनाते हैं यह उनकी बात है पर भारत की श्रेष्ठ परंपरा का निर्वहन करते हुए नए युग में प्रवेश करने के बारे में एक स्पष्ट सन्देश इन सीधे साधे अफ़्रीकी नेताओं स्वर तो दे ही दिया गया है.  
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रविवार, 23 अगस्त 2015

पाक का भविष्य और भारत

                                             अपने जन्म के समय से ही जिस तरह से पाक का एकमात्र प्रयास भारत के साथ संबंधों को ख़राब रखते हुए किसी भी समस्या का समाधान न निकालने की तरफ बढ़ना यही दिखाता है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी पाक में ऐसे तत्व हावी हैं जो भारत के साथ मित्रता से अधिक शत्रुता पर अधिक विश्वास किया करते हैं. आज़ादी के समय विभिन्न कारणों और देश की रियासतों को भारत या पाक के साथ जाने का विकल्प देने का अवसर आज भी भारत के लिए कश्मीर के रूप में एक स्थायी सरदर्द बना हुआ है. कश्मीर के महाराजा हरी सिंह के अनिर्णय की स्थिति के चलते आज भी भारत पाक के बीच यह भूभाग विवाद का सबसे बड़ा विषय है जबकि बांग्लादेश के उदय और समर्पण किये गए पाकिस्तानी सैनिकों को छोड़ने को लेकर इंदिरा-भुट्टों के मध्य हुए शिमला समझौते के बाद भी पाक ने किसी भी तरह का कोई सबक नहीं सीखा और आज भी वह अपने कश्मीरी राग को गाने में कोई कसर नहीं छोड़ता है. आज कश्मीर पाक के लिए खुद ही बहुत बड़ी समस्या बन चुका है क्योंकि एक समय था जब खुद पाक सेना सीधे तौर पर अपने सैनिकों को घाटी में भेजा करती थी पर आज यह काम वह इस्लामी आतंकियों के माध्यम से कर रही है और इसके दुष्प्रभावों से बच पाना उसके लिए मुश्किल हो चुका है.
                                         पाक के लिए किसी भी वार्ता का मतलब केवल और केवल वैश्विक समुदाय को यह दिखाना भर होता है कि वह भी भारत के साथ अच्छे संबंधों का हिमायती है जबकि दोनों देशों को यह पता है कि इस तरह की किसी भी बातचीत के लिए पाक में चुनी हुई सरकार नहीं बल्कि सेना ही निर्णय लिया करती है. आज जिस तरह से पाक सेना में भी इस्लामी कटट्रपंथियों का प्रभाव बढ़ रहा है उससे वह एक सम्प्रभु राष्ट्र की नियमित सेना से अधिक जेहादी संगठन ही अधिक नज़र आने लगी है और एक समय भारत और अफगानिस्तान में अलगाववादियों का समर्थन करने वाली पाक सेना को भी खुद अपने इन्हीं आतंकियों के खिलाफ हथियार उठाने के लिए मजबूर होना पड़ रह है जो कि पाकिस्तान के कश्मीरी सपने पर एक बहुत बड़ा ग्रहण ही लगाता है. आतंकियों की तरफ से जिस तरह से कुछ भी कहने और करने से पहले सोचा नहीं जाता है और पाक सेना को उसी समस्या से दो-चार होना पड़ रहा है क्योंकि पाक में बैठे हुए लोगों को यही लगता है कि वे इस तरह की हरकतें करते हुए कभी न कभी कश्मीर को अपने कब्ज़े में करने में सफल हो जायेंगें. भारत जैसे किसी भी मज़बूत और समर्पित सैनिकों वाले देश की सेना से पार पाना कितना मुश्किल काम है यह पाक भारत के साथ हुए प्रत्यक्ष और परोक्ष युद्धों में आसानी से समझ चुका है.
                                        राजीव गांधी के समय में पाक से लगी सीमा पर जिस तरह से कांटेदार तार लगाने की प्रक्रिया की शुरुवात की गयी थी आज उसके अच्छे परिणाम देश के सामने हैं क्योंकि पहले पंजाब और फिर जम्मू-कश्मीर के साथ ही राजस्थान और गुजरात में भी सीमा पार से होने वाली घुसपैठ पर काफी हद तक लगाम लगाने में सफलता मिली है वह भी पाक के लिए किसी झटके से कम नहीं है. पाक भारत से तब तक सार्थक और प्रभावी बातचीत नहीं कर सकता है जब तक वहां बैठे हुए चरमपंथियों की विचारधारा से वह छुटकारा नहीं पाता है और इस बात की निकट भविष्य में कोई सम्भावना भी नहीं दिखाई दे रही है क्योंकि इस्लाम के प्रसार के नाम पर उसे इस्लामी देशों से जो धनराशि मिलती है वह केवल भारत में खर्च करने के नाम पर ही ली जाती है. पाक इस तरह के दलदल से केवल तभी निकल सकता है जब उसके यहाँ कट्टरपंथियों का प्रभाव कम हो जो कि आज की परिस्थिति में असंभव सा ही लगता है पाक में अधिकांश क्षेत्रों में जिस तरह से आज भी बच्चों को अलगाववादी बनाया जा रहा है उस आग को पिछले वर्ष पाक खुद पेशावर में  महसूस कर चुका है और संभवतः उसके बाद ही सेना की समझ में भी यह बात कुछ हद तक आई है कि इन लोगों से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने की आवश्यकता भी है पर आज भी पाक सेना में बैठे हुए चरमपंथी इस पर पूरी लगाम के पक्ष में नहीं दिखाई देते हैं.
                                      पाक में भारत से बात करने का माहौल केवल एक परिस्थिति में ही बन सकता है जब वहां पर सक्रिय आतंकी तत्व खुद पाक के लिए एक बड़ा खतरा बन जाएँ और उसकी सेना को बड़े पैमाने पर खुली चुनौती देने की स्थिति में आ जाएँ. आज जिस तरह से पाक में आईएस के कुछ लोगों के सक्रिय होने ख़बरें सामने आ रही हैं तो यह भी संभव है कि आने वाले समय में आईएस जैसे संगठन का पाक के चरमपंथियों पर पूरा प्रभाव हो जाये और वे अपनी खिलाफत को पाक में भी लाने का प्रयास करें ? वह ऐसी स्थिति होगी जब पाक के सामने करो या मरो की स्थिति आ जाएगी. आज यदि आईएस को सीरिया और इराक के साथ अन्य देशों में भी सफलता मिल रही है तो उसके पीछे केवल इन देशों की सेनाओं में फैला हुआ भ्रम ही है कि वे किस तरफ रहकर सही कर पायेंगें और इस दुविधा में ही सेना की लड़ने की जुझारू शक्ति पर भी बुरा असर पड़ता है जिसका असर पिछले दो दशकों में इराकी सेना की हालत देख कर ही लगाया जा सकता है. क्या कोई यह कह सकता है कि यह वही सेना है जिसमें कुवैत पर कब्ज़ा कर अमेरिका की नाक में दम कर दिया था ? तब इराकी सेना सद्दाम हुसैन जैसे नेता के कब्ज़े में थी और पूरी तरह से सक्षम भी थी. कहीं पाक भी उस तरह की परिस्थिति में फंसकर ही अपने लिए बड़ी समस्या तो नहीं पैदा करने वाला है क्योंकि ऐसी परिस्थिति में आज नहीं तो कल उसकी सेना का मनोबल विभाजित होना ही है जिससे ही पाक के भविष्य के बारे में कुछ कहा जा सकेगा फिलहाल तो वह सेना और आतंकियों के दबाव में काम करते हुए पाक का लोकतान्त्रिक नेतृत्व अपने लिए समस्याओं का अम्बार लगाने में ही लगा हुआ है.       
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गुरुवार, 20 अगस्त 2015

पीएम मोदी की रफ़्तार और सरकार

                                                       पिछले वर्ष सत्ता में आने के बाद से ही लगातार जिस तरह से पीएम के रूप में नरेंद्र मोदी अपने स्तर से हर तरह के प्रयास करने में लगे हुए हैं क्या देश को उस स्तर पर उन प्रयासों का लाभ मिल पा रहा है आज यह प्रश्न देश के समक्ष महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि अभी तक स्वयं पीएम की स्तर पर जिस योजनाओं और महत्वपूर्ण कार्यक्रमों को शुरू किया गया है अब वे किस दशा में हैं यह देखने की किसी को भी फुर्सत नहीं है. पीएम की यूएई यात्रा के दौरान ही जिस तरह से ईरान ने चाहबहार बंदरगाह परियोजना के निर्माण से भारत को पूरी तरह से बाहर कर दिया उससे क्या संकेत मिलते हैं जबकि खुद पीएम इस मामले को अपने स्तर से देख रहे थे ? दशकों से भारत से अच्छे सम्बन्ध रहने वाले विभिन्न देशों की तरफ से समय समय पर जो विपरीत संकेत मिल रहे हैं और उनके बाद जिस तरह से सरकार उन देशों की मान मनव्वल करके मामलों को सुधारने की कोशिशें करती नज़र आती है उसके लिए निश्चित तौर पर इसके लिए सीधे तौर पर पीएम को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि उनके स्तर से रिश्ते बढ़ाने और उन्हें मज़बूत करने की कोशिशें तो हो रही हैं फिर भी देश के लिए उतने बड़े स्तर पर लाभ होता नहीं दिखाई दे रहा है जिससे यही लगता है कि सरकार के मंत्रालयों को या तो काम करने की पूरी छूट नहीं है या फिर उनकी कमान ऐसे मंत्रियों के हाथों में है जो पीएम की रफ़्तार के साथ सामंजस्य ही नहीं बैठा पा रहे हैं.
                बेशक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पीएम नए देशों के साथ सम्बन्ध बढ़ाने की कोशिशों में लगे हुए हैं पर क्या सरकार की यह ज़िम्मेदारी नहीं है कि अभी तक जिन देशों के साथ भारत के सम्बन्ध अच्छे रहे हैं उनके साथ भी कुछ और प्रयास किये जाएँ ? यूएन के विस्तार पर जिस तरह से रूस ने पहले भारत को लेकर पाने पक्ष से हटने की बात की पर सरकार के सक्रिय होने के बाद उसने फिर से देश की दावेदारी का समर्थन किया उससे यही पता लगता है कि भारत सरकार के स्तर पर सब कुछ उतना अच्छा नहीं चल रहा है जैसा होना चाहिए. ईरान को भारत ने अमेरिका की परवाह न करते हुए भी कच्चे तेल की खरीद में सदैव ही अहमियत दी है और इसके लिए किसी भी दल की सरकार आने से कोई अंतर नहीं पड़ा था पर अब जब ईरान के खिलाफ प्रतिबन्ध ख़त्म होने की तरफ बढ़ रहे हैं तो वह भारत को एकदम से किनारे क्यों करना चाहता है आज यह भी देखने का विषय है ईरान के साथ भारत के हज़ारों साल के सम्बन्ध रहे हैं और इस तरह की नयी समस्याओं से निपटने के लिए अब भारत सरकार को और भी अधिक प्रभावी कदमों के साथ आगे बढ़ना ही होगा क्योंकि आज प्रतिस्पर्धा का युग है और द्विपक्षीय संबंधों में रूस को छोड़कर कोई भी देश भारत को उतना महत्त्व नहीं देता है.
                यह देश के भविष्य के साथ जुड़ा हुआ मसला है और इस तरह के किसी भी मुड़े को सरकार के हर मंत्री को अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए आगे बढ़ने के बारे में सोचना चाहिए. पीएम के रूप में मोदी जो कुछ प्रयास कर रहे हैं यदि उनका सही और प्रचुर लाभ देश को नहीं मिल पाता है तो अंत में इसका उत्तरदायित्व खुद मोदी तक ही पहुँचने वाला है इसलिए अब मोदी को सरकार में उम्र की सीमा पर फिर विचार करते हुए अनुभवी लोगों के विचारों को आगे लाने का काम करना चाहिए जिससे देश को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकें. केवल मोदी आगे बढ़कर प्रयास कर सकते हैं पर सम्बंधित मंत्रियों को अपनी कुशलता दिखाते हुए उन कार्यों और द्विपक्षीय संबंधों और उनको मज़बूत बनाने के बारे में सोचना ही होगा. आज भले ही कितने प्रयास क्यों न कर लिए जाएँ पर अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य ऐसा ही कि चाहते हुए भी देश को वे सारे लाभ नहीं मिल सकते हैं जिनकी आशा लगायी जा रही है तो इस तरह की विषम परिस्थिति में बेहतर प्रयासों के माध्यम से सरकार देश को आगे बढ़ाने के प्रयास तो कर ही सकती है. यदि मंत्रियों की अनुभवहीनता इसी तरह से चलती रही तो मोदी सरकार के लिए उन मानकों को छू पाना मुश्किल ही हो सकता है और पीएम के रूप में मोदी के प्रयासों का भरपूर लाभ भी देश को नहीं मिल पायेगा.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 5 अगस्त 2015

२६/११ और पाक

                                                           अपनी गलती मानकर भारत के साथ २६/११ हमले पर सहयोग करने के स्थान पर पाकिस्तान ने आज तक इस मसले से अपने को अलग करने की असफल कोशिशों के चलते पूरी दुनिया में संदेहास्पद और आतंक समर्थक राष्ट्र के रूप में बनी अपनी छवि के अनुरूप ही काम किया है पर जिस तरह से विभिन्न तरह  के खुलासे लगतार होते रहते हैं उनके बाद क्या भारत को पाक के साथ अपने संबंधों पर फिर से विचार करने की आवश्यकता नहीं है ? क्या पडोसी देश से अच्छे सम्बन्ध बनाये रखना भारत की ही ज़िम्मेदारी है और पाक उस ज़िम्मेदारी से पूरी तरह से मुक्त है क्योंकि आज तक जांच और अभियोजन के स्तर पर २६/११ के हमले में पाक ने गंभीर प्रयास कभी भी नहीं किये हैं और वह इस हमले में अपनी संलिप्तता से पूरी तरह से इंकार ही किया करता है. पाक की संघीय जांच एजेंसी एफआईए के पूर्व डायरेक्टर जनरल तारिक खोसा ने जिस तरह से पाक के पूरे तंत्र पर इस मामले में गंभीरता न दिखने का आरोप लगाया है वह भारत की उस बात की पुष्टि ही करता है कि इस पूरे हमले में पाक में बैठे हुए लोग ही शामिल थे और यहाँ तक कि सेना ने भी उनका भरपूर समर्थन किया था.
                                   पाक अपने जन्म से ही एक असफल राष्ट्र के रूप में दक्षिण एशिया समेत आज तक पूरे विश्व के लिए सरदर्द ही बना हुआ है क्योंकि वह पिछले सदी में इस्लाम के नाम पर भारत से अलग काटकर बनाया गया एक राष्ट्र था जो कभी भी इस्लाम के सही उसूलों का अनुपालन नहीं कर पाया और चूंकि उसका जन्म ही धार्मिक आधार पर हुआ था तो प्रारम्भ में उसने अपने को उदार दिखाने की कुछ कोशिशें भी कीं पर उनमें सत्यता न होने के कारण उसे कोई खास सफलता नहीं मिल पायी तो वहां के सैन्य शासकों ने सत्ता का दुरूपयोग करना शुरू कर दिया साथ ही पूरे विश्व में इस बात को फ़ैलाने की कोशिशें भी करनी शुरू कर दीं जिनके माध्यम से वह अपने को इस्लाम कर रखवाला देश साबित कर सके. धर्म के शासकीय मामलों में दुरूपयोग में पाक ने संभवतः पूरी दुनिया को पीछे छोड़ दिया जब उसने जिहाद के नाम पर इस्लामी जगत से पैसा ऐंठना शुरू कर दिया जिससे पाक धीरे धीरे चरमपंथियों का अड्डा बन गया और आज खुद उसकी सेना को उस चरमपंथ से निपटने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है जिसको कभी सेना और सरकार में बैठे हुए लोगों ने भरपूर प्रश्रय दिया था.
                                 इस बड़े खुलासे के बाद अब भारत के पास पाक से सम्बन्ध सुधारने के लिए कितने विकल्प शेष बचते हैं यह जानने की आवश्यकता भी है क्योंकि भारत की तरफ से पहले संप्रग और अब राजग सरकार द्वारा कड़ी कार्यवाही की बातें तो की जाती हैं पास साथ ही उससे अच्छे सम्बन्ध बनाये रखने की प्रतबद्धता भी जताई जाती है. यह भारतीय जन-मानस का स्वभाव है कि वह अपने दुश्मन के साथ भी अच्छे सम्बन्ध बनाये रखने के लिए प्रयासरत रहे और वही सरकारों में बैठे हुए लोगों को भी ऐसा ही करने के लिए प्रेरित करता रहता है. चुनावों से पहले भाजपा और मोदी ने खुद सरकार बनने पर जिस तरह से पाक को सबक सिखाने की बातें की थीं और सरकार के शपथ ग्रहण में अच्छी शुरुवात भी की थी क्या पाक ने उसका सही अर्थों में उत्तर दिया है ? यदि पाक अपने वायदों में पूरी तरफ से विफल रहा है भारत को भी द्विपक्षीय संबंधों के लिए अब पाक के सामने हर बार दोस्ती का हाथ बढ़ाने के स्थान पर अपने हाथ को रोकने के बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि भारत की विनम्रता को पाक उसकी मजबूरी ही समझता है जिससे सकारात्मक बातें सामने नहीं आ पाती हैं. अब समय आ गया है कि देश को हर समय अस्थिर करने की साज़िशों में लगे हुआ पाक के साथ अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी सख्त रवैया अपनाया जाये जिससे उसे भी वास्तविकता को स्वीकारने में मजबूर किया जा सके.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

नगा शांति समझौता

                                           लम्बे समय से चली आ रही नगा विद्रोहियों की समस्या से निपटने के लिए जिस तरह से अजीत डोभाल की पहल पर केंद्र सरकार ने एनएससीएन (आईएम) गुट के साथ एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं उनके चलते आशा की जा सकती है कि आने वाले समय में देश के पूर्वोत्तर भागों में सुरक्षा बलों के लिए चिंताएं कम हो जायेंगीं तथा भटके हुए नगा लोगों को भी राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल किया जा सकेगा. नगा समस्या लम्बे समय से केंद्र और राज्य सरकारों के साथ म्यांमार और बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों पर लगातार प्रभाव डाल रही थी क्योंकि कई बार इसके विद्रोही हमले को अंजाम देने के बाद चुपके से पडोसी देशों में बनाये गए अपने अड्डों पर छिप जाया करते थे या इनके बड़े नेता पडोसी देशों में रहकर ही अपने हितों को साधने के लिए निर्देश दिया करते थे जिससे चाहकर भी भारत सरकार और सुरक्षा बल सही कार्यवाही नहीं कर पाते थे.इस दिशा में नरसिंह राव के समय शुरू किये गए प्रयासों को अटल सरकार के साथ मनमोहन सरकार ने भी जारी रखा आज जिसकी परिणीति के रुप में यह समझौता हो पाया है.
                                      इस समझौते के होने के बाद उन परिस्थितियों पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है जिनके चलते हमारे देश के कुछ लोग देश की व्यवस्था के खिलाफ हथियार उठकर खड़े हो गए थे क्योंकि जब तक समस्या की जड़ पर ध्यान देकर उससे निपटने का विचार नहीं किया जायेगा तब तक इसे किसी एक प्रभावशाली गुट के साथ समझौता करके समाप्त नहीं किया जा सकता है. आज भी नागाओं के अन्य छोटे गुट भी सक्रिय हैं और निश्चित तौर पर सरकार उनको भी इसी दिशा में लाने के प्रयास कर सकती है क्योंकि किसी एक के भी विद्रोही बने रहने से वह विचारधारा समाप्त नहीं हो सकती है जिससे इस स्थानीय उग्रवाद का जन्म हुआ था. अच्छा हो कि इस समझौते के पहलुओं को सार्वजनिक किया जाये और संसद से भी इसकी मंजूरी ली जाये जिससे आने वाले समय में किसी भी सरकार के लिए इसका अनुपालन करना एक दायित्व के रूप में ही लिया जाये. सरकारें बदलने के साथ जिस तरह से देश की प्राथमिकताएं भी बदल जाती हैं इस मामले में उससे गंभीरता से बचने की आावश्यकता भी है क्योंकि वैसी स्थिति में किसी भी मुद्दे पर अचानक से ही कोई फिर विद्रोही तेवर भी अपना सकता है.
                                       दिल्ली में समझौते के होने और धरातल पर उसके क्रियान्वयन में बहुत बड़ा अंतर होता है नगाओं को जिस तरह से अपनी जमीन और जंगलों का अधिकार चाहिए क्या सरकार उसे देने के लिए तैयार हो गयी है क्योंकि मोदी सरकार जिस तरह से उद्योगपतियों को रिझाने के लिए हर काम करने के लिए एक वर्ष से प्रयासरत है क्या वह नगाओं की मंशा के अनुरूप कहा जा सकता है ? आज जिस लैंड बिल को लेकर हंगामा हो रहा है क्या उसका दुष्प्रभाव नगालैंड पर नहीं पड़ेगा या फिर सरकार किस तरह से वहां के लोगों को यह विश्वास दिला पायेगी कि अब उनके साथ भविष्य में कुछ भी गलत नहीं होगा ? देश में पहले भी केंद्र और विद्रोहियों के बीच समझौते हुए हैं पर कई बार अविश्वास ने पूरे माहौल को बिगाड़ कर ही रख दिया है इसलिए उन पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए केवल समझौता होने को ही विजय के रूप में नहीं लेना चाहिए बल्कि नगाओं से जो भी वायदे किये गए हैं उनको देश के सामने लाते हुए पूरा करने की समय सीमा निर्धारित करते हुए आगे बढ़ना चाहिए. इस समझौते को एक अवसर के रूप में लेने की कोशिश करनी चाहिए जिससे पूरे माहौल को सुधारने और इस बेहद सुन्दर क्षेत्र में पर्यटन आदि को बढ़ावा देकर स्थानीय लोगों को भी उससे जोड़ने की कोशिशें शुरू करनी चाहिए.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 28 जून 2015

नीति आयोग और नयी व्यवस्था

                                                           देश में आज़ादी के बाद से ही केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे को लेकर जिस तरह से विवाद बने ही रहते हैं उनसे निपटने के लिए आज तक कोई कारगर व्यवस्था नहीं बनायीं जा सकी है. आज़ादी के बाद जब पूरे देश में आर्थिक संसाधनों की बेहद कमी थी तो केंद्र सरकार ने योजना आयोग का गठन किया और केंद्रीय स्तर पर राज्यों को धन आवंटित करने की योजनाएं बनाना शुरू किया था. जब तक अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकारें रहीं तब तक मज़बूत केंद्रीय नेतृत्व के सामने किसी भी सीएम ने कभी भी कोई शिकायत नहीं की पर जब राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बननी शुरू हुई तभी से उन्होंने केंद्र पर गैर कांग्रेस शासित राज्यों के साथ भेदभाव के आरोप लगाने शुरू कर दिए थे. योजना आयोग की वार्षिक बैठक के बाद जिस तरह से केंद्र में सरकार चला रहे दल से इतर राजनैतिक दल के सीएम जब भी बाहर निकलते तो सदैव ही योजना आयोग पर कम धनराशि आवंटन का आरोप लगाते हुए ही निकलते थे और जब मोदी सरकार द्वारा संघीय प्रणाली को मज़बूत करने के उद्देश्य से नीति आयोग बनाया गया है तब भी स्थिति बदलती नहीं दिखाई दे रही है क्योंकि राज्यों को आज भी बिना किसी ज़िम्मेदारी के उसे खर्च करने की अनुमति के साथ और अधिक धन खर्च करने के लिए चाहिए.
                          नीति आयोग के उप-समूह की बैठक के बाद जिस तरह से कल यह विचार सामने आया कि आने वाले समय में केंद्रीय योजनाओं की संख्या को घटाया जाये उससे बेशक राज्यों को अपनी सुविधा और अाश्यकता के अनुसार काम करने की छूट मिल जाएगी पर इसके चलते सबसे बड़ा नुकसान यह भी संभावित है कि चुनावी वर्ष में राज्य के सीएम किसी एक योजना में आये हुए धन का दुरूपयोग अपने राजनैतिक लाभ साधने के लिए भी कर सकते हैं. अभी तक केंद्रीय योजनाओं में राज्यों का हिस्सा कम होने के चलते उनके लिए उसे किसी अन्य योजना में खर्च करना कठिन होता है पर नयी व्यवस्था में किसी दल विशेष की सरकार द्वारा लिए गए निर्णय आने वाली सरकार और जनता के लिए समस्या भी बन सकते हैं ? इन योजनाओं के लिए धनराशि आवंटित किये जाने के नियमों को और भी कठोर बनाया जाना चाहिए क्योंकि बिना किसी बड़े उत्तरदायित्व के किसी प्रदेश की जनता को सीएम के भरोसे कैसे छोड़ा जा सकता है अभी तक केंद्र की सरकार के साथ तालमेल बैठाने की अनिवार्यता के चलते योजनागत आवंटन में बदलाव उतना आसान नहीं था जो संभवतः आने वाले समय में केंद्र के लिए बड़ी समस्या भी बन सकता है.
                         जब पीएम खुद संघीय व्यवस्था को मज़बूत करने के बारे में चिंतित हैं और यह भी कहते हैं कि राज्यों के साथ भेदभाव किया जाता रहा है तो उन्हें इस संघीय व्यवस्था को और भी अधिक मज़बूत किये जाने के बारे में सोचना ही होगा. क्या नीति आयोग के लिए ऐसा संभव नहीं है कि उसकी योजनाएं राज्यों के बजाय मंडल या जनपद के आधार पर बनायीं जाएँ ? इस तरह की किसी व्यवस्था से केंद्र और संबंधित राज्य के पास देश के हर जनपद के बारे में पूरी जानकारी तो होगी ही साथ ही विभिन्न योजनाओं में उसकी कितनी सहभागिता की आवश्यकता है यह भी पता चल जायेगा. पर यह ऐसा काम होगा जिस पर राज्य संभवतः आसानी से राज़ी ही नहीं होंगें क्योंकि इसके माध्यम से उनको राजनैतिक कारणों से विभिन्न फंड्स को अपने मनपसंद जिले में खर्च करने की आज मिली हुई खुली छूट समाप्त हो जाएगी ? आज केंद्र जब बदलाव की राह पर है तो उसे योजनाओं को बिल्कुल निचले स्तर तक पहुँचाने की इस व्यवस्था के बारे में भी सोचना चाहिए इससे जहाँ देश के हर जिले को अपनी आवश्यकता के अनुसार फंड्स मिल सकेंगे वहीं आने वाले समय में कोई भी जिला विकास की इस प्रक्रिया से अछूता भी नहीं रह पायेगा. क्या मज़बूत पीएम राज्यों को इस बात के लिए आसानी से राजी कर इस तरह के काम कर पाने में सफल होंगें यह तो भविष्य ही बताएगा पर इससे कम किसी भी योजना के फण्ड को सीधे राज्यों के हवाले करने से ही धरातल पर समग्र परिवर्तन नहीं किया जा सकता है.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 24 जून 2015

लखवी-पाक-चीन और भारत

                                        मुंबई हमले को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला अब दोनों देशों के बीच से निकालकर संयुक्त राष्ट्र तक पहुँच गया है क्योंकि भारत की तरफ से बहुत सारे सबूतों को उपलब्ध कराये जाने के बाद भी पाक ने इस मामले की गंभीर पैरवी नहीं की उसके चलते ही वहां की कोर्ट ने उसे सबूतों के अभाव में रिहा करने का आदेश दिया था. भारत समेत अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन, फ़्रांस और रूस भी लखवी की रिहाई पर अपना खुला विरोध पाक के सामने जता चुके हैं फिर भी उसके खिलाफ मौजूद साक्ष्यों को मानने से पाक हमेशा की तरह ही इंकार करता रहता है और यूएन में सदैव ही भारत के खिलाफ काम करने वाले चीन ने इस मामले में जिस तरह से भारत के प्रस्ताव पर रोक लगाने का काम किया है उससे यही साबित होता है कि भारत में बदली हुई सरकार और खुद पीएम मोदी के चीन से चाहे जितने भी अच्छे और मधुर सम्बन्ध क्यों न हों पर भारत के खिलाफ किसी भी मामले में चीन सदैव पाक के साथ ही खड़े होने की अपनी नीति से हटने वाला भी नहीं है जो कि बदली परिस्थिति में भारत और व्यक्तिगत तौर पर मोदी के लिए एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है.
                                   पाक के खिलाफ चीन ने कभी भी भारत के किसी प्रस्ताव का समर्थन आज तक नहीं किया है तो देश में जो लोग यह आशा लगाये बैठे थे कि अब मोदी के व्यक्तिगत रिश्ते होने के बाद संभवतः अब चीन इस तरह के मामलों में भारत के खिलाफ कुछ करने से बचना चाहेगा यह घटना उनकी आँखें खोलने का काम ही करने वाली हैं पर संभवतः स्मार्ट सिटी और दुनिया भर के अन्य मामलों में चीन की मदद आँख मूँद कर लेने को लालायित पीएम मोदी के पास इतना समय नहीं है कि वे चीन को उसके ही दांव से रोकने की इच्छा शक्ति का प्रदर्शन कर सकें. वैश्विक स्तर पर अपने को विकास का पुरोधा बनाने  के लिए जिस तरह से पीएम के स्तर से ही इस तरह के मामलों की अनदेखी की जा रही है वह भी देश के लिए अच्छी नहीं है क्योंकि आने वाले समय में जब हमारे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में चीन की भागीदारी और भी बढ़ जाएगी तो वह अपने व्यापारिक हितों को बचाये रखने के लिए कुछ भी करने तक जा सकता है. बेशक मोदी सरकार ने वैश्विक स्तर पर अपनी सक्रियता से बहुत कुछ पाया है पर महत्वपूर्ण मामलों में खुद पीएम का ऐसा रुख लोगों को हैरान कर देता है.
                                 भारत की तरफ से म्यांमार कार्यवाही पर जिस तरह से गंभीर राजनैतिक और रणनीतिक चूक की गयी यह उसका भी प्रतिफल हो सकता है क्योंकि इस घटना के बाद से चीन और पाक बहुत चिढ़े हुए नज़र आ रहे हैं. भारत को इस तरह के मामले को यूएन में ले जाने से पहले स्थायी सदस्य देशों की राय भी लेनी चाहिए थी जिससे चीन के इस संभावित कदम का वहीं पर जवाब दिया जा सकता पर भारत सरकार का आंकलन यहाँ पर गड़बड़ा गया है और अब कानूनी अड़चनों के कारण भारत इस मामले को दोबारा यूएन में उठाने लायक भी नहीं रह गया है. यदि कोई स्थायी सदस्य जिसके नागरिक भी २६/११ के हमले में मारे गए हों अपने स्तर से फिर से इस मामले की पैरवी करने की तरफ कोशिश करे तभी लखवी का मामला दोबारा से प्रतिबन्ध समिति के सामने विचार के लिए जा सकता है वर्ना भारत के स्तर अब यह मामला बंद ही हो चुका है. क्या अब भारत सरकार अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ़्रांस और रूस के सहयोग से इस मामले को पूरी तैयारी के साथ फिर से प्रतिबन्ध समिति में लाने के लिए ठोस प्रयास कर पायेगा यह तो आने वाले समय में ही पता चल पायेगा पर अभी चीन से अपनी पाक से दोस्ती का पूरा हक़ तो अदा ही कर दिया है.          
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 17 जून 2015

मैगी विवाद और उद्योग

                                       देश में आमतौर पर खाद्य पदार्थों को लेकर जनता से सरकार तक में जागरूकता की बहुत कमी पायी जाती है जिसके चलते कई बार ऐसे उत्पाद भी बाजार में धड़ल्ले से बिकते हुए नज़र आते हैं जो स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालते हैं. अब जब नेस्ले की मैगी अपने आप में ही विवाद का बड़ा कारण बन चुकी है तो केंद्र और राज्य सरकारों के पास इस मसले पर सोचने और खाद्य निरीक्षकों को और भी ज़िम्मदेार किये जाने का समय आ चुका है. वैसे तो देश में पहले से ही खाद्य पदार्थों में उपयोग किये जाने वाले विभिन्न घटकों को लेकर एक मानक निर्धारित किया जा चुका है पर इस तरह से किसी खाद्य पदार्थ को लेकर कभी भी गहन जांच करने के मामले कम ही सामने आते हैं. निश्चित तौर पर मैगी अपने आप में हर घर तक पहुंचा हुआ ब्रांड है और इसमें जिस स्तर पर खतरनाक रसायन पाये गए हैं वे आने वाले दिनों में लापरवाही के कारण होने वाले किसी बड़े गंभीर संकट की तरफ ही इशारा किया करते हैं क्योंकि जब इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जा रहा है तो उसी स्तर पर इसके दुष्प्रभाव भी दिखाई देने वाले हैं.
                              इस तरह के मामलों से निपटने के लिए अब केंद्र और राज्य सरकारों में उचित समन्वय की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक इस तरह के गंभीर मामलों में राज्य केंद्र की लड़ाई को किनारे नहीं किया जायेगा तब तक इस क्षेत्र को पूरी तरह से सुरक्षित नहीं किया जा सकता है क्योंकि देश में केंद्र और राज्यों में अलग अलग दलों की सरकारें होने पर वे गंभीर मामलों में भी राजनीति करने से नहीं चूका करती हैं जिसका सीधा असर आम जनता पर ही पड़ा करता है. अब इस दिशा में एक कठोर केंद्रीय कानून की आवश्यकता है जिसका राज्यों द्वारा पूरी तरह से अनुपालन किया जाना आवश्यक किया जाना चाहिए क्योंकि जब राज्यों के स्तर पर यह काम किया जाता है तो विभिन्न दलों की अलग अलग सोच होने के कारण गड़बड़ी को पकड़ने की गंभीर कोशिश भी नहीं की जाती है. बेशक देश में हर तरह की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को अपना काम करने की पूरी छूट है पर क्या वे इस तरह की मनमानी करने के लिए स्वतंत्र रूप से छोड़ी जा सकती हैं जबकि उनके द्वारा की जा रही लापरवाही सबके सामने आ चुकी है ? सरकार को खाद्य क्षेत्र में लगी हुई सभी देशी विदेशी कम्पनियों के लिए मानकों को और भी कडा कर नियमित जांच के बारे में भी सोचना चाहिए.
                             इस तरह के किसी भी बड़े चलते हुए ब्रांड के बंद होने से इससे जुड़े हुए लोगों पर भी उसका दुष्प्रभाव पड़ने से नहीं रोका जा सकता है और यही सब मैगी मामले में भी होता दिखाई दे रहा है. इसके उत्पादन से लगाकर वितरण और बिक्री तक जो भी लोग इससे अपनी रोज़ी रोटी कमा रहे थे उन पर भी संकट मड़राने लगा है जबकि देखा जाये तो सीधे तौर पर उनकी कोई भी गलती नहीं है. आज बड़े औद्योगिक समूहों के बारे में तो सरकारें भी सोचती हैं पर कारखानों में काम करने वाले कामगारों से लगाकर मज़दूरी कर अपना जीवन चला रहे लोगों के लिए इस तरह से ज़िंदगी कितनी कठिन हो जाती है इस पर कोई भी सोचना नहीं चाहता है. अभी मैगी कारखाने और उससे जुड़े हुए समूहों में अस्थायी लोगों को हटाये जाने की अपुष्ट ख़बरें सामने आनी शुरू हो चुकी हैं क्योंकि विवाद लम्बे समय तक चलते रहने से कम्पनी भी इन लोगों को कहाँ पर रखेगी यह किसी को नहीं पता है ? बड़ी कम्पनी फिलहाल तो अपने मैगी से जुड़े लोगों को अन्य उत्पादों में लगा सकती है पर इसकी सप्लाई चेन से जुड़े हुए लोगों के पास आज अभी से काम खत्म हो चुका है तो इन लोगों के बारे में भी चिंतित होने की बहुत आवश्यकता भी है.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 11 जून 2015

सुरक्षा मामले और गोपनीयता

                                                          महत्वपूर्ण और सामरिक मामलों में जिस स्तर की संवेदनशीलता और गोपनीयता का परिचय ज़िम्मेदार लोगों को देना चाहिए मोदी सरकार उसमें पूरी तरह से विफल रही है. भारत-म्यांमार सीमा या सीमा पार हुए भारतीय सेना के इस अभियान पर देश में जिस तरह से बयानबाज़ी की गयी उसके बाद म्यांमार के राष्ट्रपति कार्यालय की तरफ से आया बयान भारतीय नेताओं को असहज स्थिति में डालने के लिए काफी है. सेना के बयान में जिस तरह से इस बात को बताते समय पूरी तरह से मामले की संवेदनशीलता का ध्यान रखा गया था वहीं नेताओं ने इस मुद्दे पर छिछली राजनीति करने की शुरुवात कर दी जिसमें पूर्व सैन्य अधिकारी और अब केंद्रीय राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने अपने हर बयान में बढ़-चढ़ कर बातें की जिसका असर यह हुआ है कि म्यांमार ने भारतीय नेताओं को आइना दिखाने की पहल कर दी है. म्यांमार भी भारत की तरह संप्रभु देश है भले ही वहां पर तानाशाही है पर उसका मतलब यह तो नहीं निकाला जा सकता है कि भारतीय सेना ने उसके क्षेत्र का उल्लंघन किया और वह कुछ भी नहीं कर सका ? म्यांमार से १९९५ में ही एक समझौता हो चुका है जिसमें यह स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि भारत विरोधी किसी भी आतंकी समूह को वहां पर पनपने नहीं दिया जायेगा और इसी क्रम में सेना इस तरह के कई सफल ऑपरेशन पहले भी चला चुकी है.
                                      इस घटना के बाद जिस तरह से केंद्र सरकार के ज़िम्मेदार लोगों ने इसे केवल राजनैतिक कारणों से ही परोक्ष रूप से पाकिस्तान के लिए एक चेतावनी के रूप में बताना शुरू कर दिया उसके बाद इस मामले में पाकिस्तान ने भी अपनी टांग अड़ा दी है और भारत को एक तरह से अपने स्तर पर सचेत भी कर दिया है. देश की राजनीति में थोड़े से लाभ के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किये गए किसी बेहतर कूटनीतिक प्रयास को किस तरह से बर्बाद किया जा सकता है यह इसका एक उदहारण मात्र है जबकि सैन्य सहयोग को लम्बे समय तक बनाये रखने के लिए कई बार इस तरह के अभियानों की सफलता पर भी कुछ खास बात नहीं की जाती है क्योंकि उसके दूरगामी परिणाम भी हुआ करते हैं. जिन जवानों ने इस अभियान में हिस्सा लिया उनकी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर आई हुई है आखिर सेना के इस गोपनीय अभियान की तस्वीर किस तरह से सार्वजनिक हुई इस पर सरकार कुछ सोचना चाहेगी ? जिन लोगों ने अभियान में हिस्सा लिया तो उनके बारे में ऐसी सार्वजनिक चर्चा और प्रदर्शन आखिर उनके लिए किस तरह का समर्थन कहा जा सकता है जिसमें उनके लिए खतरों को बढ़ाया ही जा रहा है पर संभवतः अपने कुछ राजनैतिक लाभ के लिए सरकार के पास इन जवानों के लिए सोचने का मौका ही नहीं है.
                                 भारतीय सेना विश्व की सर्वश्रेष्ठ सेनाओं में गिनी जाती है क्योंकि उसके मानवीय चेहरे की कदर आज पूरी दुनिया करती है तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा चलाये जाने वाले किसी भी शांति सेना के अभियान में भारतीय सेना की उपस्थिति ही लोगों के लिए संजीवनी का काम करती है क्योंकि उन्हें लगता है कि इस सेना के मानवीय पहलुओं को समझने से उनकी दिक्कतें वास्तव में ही कम होने वाली हैं. इस मामले में सेना के शीर्ष अधिकारी की तरफ से जो बयान दे दिया गया था उसके बाद केवल सेना की तारीफ करते हुए अन्य बातों को इससे क्या अलग रखने की आवश्यकता नहीं थी ? म्यांमार ने जिस तरह से भारतीय पक्ष के इस दावे का खंडन कर दिया है तो इससे क्या एक बेहतर और सटीक सामरिक प्रयास खोखली राजनीति में नहीं उलझ गया है और क्या आने वाले समय में म्यांमार की तरफ से इस तरह के अभियानों को चलाने के लिए उतनी छूट दी जाएगी जितनी अभी तक मिलती रही है ? यह सब कुछ ऐसी बातें हैं जिन पर नेताओं को चुप रहकर केवल सैन्य स्तर पर ही निपटना चाहिए क्योंकि जब तक इस तरह के सहयोग को दोनों पक्षों की तरफ से संयमित रूप से नहीं किया जायेगा तब तक सेना के लिए सही माहौल बनाया जाना संभव नहीं हो सकता है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 2 मार्च 2015

जम्मू कश्मीर में नयी राजनीति

                                    लम्बी राजनैतिक जद्दोजेहद और विचार विमर्श के बाद आखिर जम्मू कश्मीर को राज्य की नयी सरकार मिल ही गयी पर जिस तरह से शपथ ग्रहण के बाद अपने पहले सम्बोधन में ही सीएम मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने राष्ट्रवादी भाजपा और मोदी के सामने जम्मू कश्मीर में शांति पूर्वक सम्पन हुए चुनावों के लिए पाकिस्तान, अलगाववादियों के मंतव्य को भी रेखांकित किया उससे भाजपा को यह तो पता चल ही गया होगा कि यह गठबंधन उसके लिए अब तक का सबसे कठिन साबित होने वाला है. इसके लिए हर तरह की तैयारियां करने में संघ के पूर्व वरिष्ठ कार्यकर्त्ता और अब भाजपा के महासचिव राम माधव ने जिस तरह से अपनी पूरी जान लगाकर समझौते को अंतिम रूप तक पहुँचाने की कोशिश की हैं उनके लिए इस तरह के बयान निश्चित तौर पर ही झटके से कम नहीं हैं. अभी तक भाजपा का कश्मीर को लेकर जो भी रुख रहा करता है इस बार उसने सरकार बनाने के लिए उनसे व्यापक स्तर पर समझौता कर लिया है और एक समय अलगाववादियों के धीमे स्वर में समर्थन करने वाले मुफ़्ती के साथ सरकार बनाने के लिए खुद को तैयार किया है.
                           मुफ़्ती के लिए इस तरह का बयान अपन उन समर्थकों के लिए देना मजबूरी ही था क्योंकि जो भाजपा धारा ३७० हटाने पर सदैव मुखर रहा करती है यदि उसके साथ सरकार बनायीं जा रही है तो जिन लोगों ने भाजपा के खिलाफ घाटी में मुफ़्ती को समर्थन दिया था उनकी संतुष्टि के लिए कुछ बोलना भी उनकी मजबूरी ही अधिक लगती है. मुफ़्ती के साथ सरकार चलाना इसलिए भी समस्याएं पैदा कर सकता है क्योंकि सेना को जवाबदेह बनाने के लिए मुफ़्ती द्वारा एक और अनर्गल बात कही गयी है. भारतीय सेना आज भी जिन परिस्थितियों में कश्मीर में काम कर रही है उसमें संभवतः दुनिया की कोई भी सेना इतने अच्छे से नहीं कर सकती है पर विभिन्न मुद्दों को लेकर जिस तरह से आतंकी और अलगाववादी जनता को कानून तोड़ने के लिए उकसाते हैं कई बार उसके कारण भी समस्याएं उग्र हो जाया करती हैं. सेना की तरफ से कभी भी एक तरफा कार्यवाही नहीं की जाती है तो आम लोगों द्वारा सेना के साथ सुरक्षा सम्बन्धी सहयोग न करने की स्थिति में क्या किया जा सकता है यह भी देखने का विषय है. सेना के विशेषाधिकार में कटौती को सेना ने पूरी तरह से नकार दिया है जिससे भी नीतिगत स्तर पर टकराव बना रह सकता है.
                          राजनीति में रहकर कोई भी स्थायी शत्रु या मित्र नहीं हो सकता है यह इसका एक अच्छा उदाहरण भी है क्योंकि अपने विरोधियों जिनके अलग होकर चुनाव लड़े जाते रहते हैं कई बार संख्या बल को पूरा करने के लिए इसी तरह से साथ मिलकर सरकार का गठन भी किया जाता रहा है और इसमें देश की दोनों बड़ी पार्टियां कांग्रेस और भाजपा का एक जैसा ही रिकॉर्ड रहा है. राजनीति में कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता है इसलिए भाजपा ने कितना बड़ा समझौता जनसंघ के अपने संस्थापक और कश्मीर के लिए जान गंवाने वाले मुखर्जी के लिए किया है इसका कोई मतलब नहीं है. हर दल अपनी सत्ता चलाने के लिए इस तरह की पलटियां मारा ही करता है जैसे कि बिहार में नितीश भाजपा आज अलग हैं और उनके विरोध में तीन साल तक चिल्लाने वाले लालू और कांग्रेस उनके साथ खड़े हैं. देश के अन्य राज्यों में न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाना और उस पर टिके रहने आसान है पर जम्मू कश्मीर में यह सबसे मुश्किल काम है. अब यह तो समय ही बताएगा कि इस सरकार को कितने दिनों तक कोई ऐसे मसले का सामना नहीं करना पड़ता है जिसमें सत्ता की डोर इनके हाथों से खिसकती नज़र आये.     
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सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

बजट सत्र और अध्यादेश

                                        आज से शुरू हो रहे बजट सत्र से देश के साथ ही मोदी सरकार को बहुत सारी आशाएं हैं क्योंकि अभी तक सरकार जिस बजट के माध्यम से पिछले वित्तीय वर्ष में काम कर रही थी वह कहीं न कहीं से मनमोहन सरकार की योजनाओं पर ही बनाया गया था भले बाद में मोदी सरकार ने पूर्ण बजट प्रस्तुत किया हो पर उस पर पिछली सरकार की पूरी छाप दिखाई दे रही थी. इस सत्र में सरकार के पहले पूर्ण बजट के माध्यम से जहाँ उसके काम करने की दिशा निर्धारित होने वाली है वहीं दूसरी तरफ विवादित मुद्दों पर विपक्ष द्वारा सरकार को घेरने का काम भी किया जाने वाला है. अभी तक विपक्ष को परोक्ष रूप से उपेक्षित कर रही मोदी सरकार को इस बार राज्यसभा में अपनी कमज़ोर स्थिति के कारण महत्व देने के बारे में सोचना पड़ा है जो कि देश के लिए अच्छा ही है क्योंकि पिछले साल सरकार के सत्ता में आने के बाद से सरकार इस राय के साथ आगे बढ़ रही थी कि वह सदन में जो कुछ भी करना चाहेगी आसानी से कर लेगी और कमज़ोर ही सही पर लोकसभा में विपक्ष का सम्मान नहीं कर रही थी पर अब स्थिति बदलती नज़र आ रही है.
                              लोकसभा में सरकार ने अपनी मज़बूत स्थिति का जो लाभ पिछले सत्रों में उठाया और अब महत्वपूर्ण बिलों को पास करवाने में उसको जिस तरह से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस समेत अन्य दलों के सहयोग की ज़रुरत पड़ने वाली है उसने यह समझते हुए पूरी तरह से इस बार अपने होमवर्क को सही तरह से करने का प्रयास किया है वह भारतीय लोकतंत्र की एक अन्य खूबी है. फिलहाल अब इस वर्ष केवल बिहार में ही चुनाव होने हैं और वे भी अभी लगभग छह माह दूर हैं तो सरकार और विपक्ष से यह आशा की जा सकती है कि वे देशहित में आवश्यक विधायी कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर करने का प्रयास करेंगें जिससे जो नीतिगत समस्या पिछली लोकसभा में दिखाई देती थी वह अब सामने आकर सदन को रोकने का काम नहीं करेगी. आज भाजपा को विपक्षी दलों से रचनात्मक और देश के विकास के लिए सहयोग कई आवश्यकता है पर वह यह भूल गयी है कि महत्वपूर्ण बिलों को लटकाने में पिछली लोकसभा में उसका सबसे बड़ा योगदान था जिसके चलते कहीं न कहीं से अल्पमत से चल रही मनमोहन सरकार के लिए निर्णय करना कठिन भी हो जाता था.
                        लोकतान्त्रिक परम्पराओं के चलते सदन में सरकार के साथ विपक्ष भी महत्वपूर्ण हुआ करता है इस बार सरकार ने मजबूरी में ही सही पर इस बात का ध्यान तो रखने की कोशिश की है. सरकार की तरफ से संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू ने जिस तरह से सोनिया गांधी से उनके आवास पर भेंट की और सदन को सुचारू रूप से चलाने में उनके सहयोग को स्पष्ट रूप से माँगा वह भी सही कदम है. खुद नायडू ने भी यह स्वीकार किया कि सोनिया गांधी ने भूमि अधिग्रहण बिल को लेकर अपनी चिंताएं ज़ाहिर की हैं पर अन्य पांच अध्यादेशों पर सहयोग की बात हो गयी है उससे अब सरकार पर सदन चलाने का दबाव अधिक बढ़ जाने वाला है क्योंकि विपक्षी दल अब केवल इस अध्यादेश में अपने अनुसार बदलाव करने की कोशिशें करने वाले हैं. सरकार के लिए गुलाम नबी आज़ाद का राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष होना भी कारगर हो सकता है क्योंकि अपने लम्बे राजनैतिक जीवन में आज़ाद ने विधायी कार्यों में सदैव ही सरकार को सहयोग करने की पूरी कोशिश की है आज़ाद आज इस पद पर हैं तो सरकार को इस स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश भी करनी चाहिए और यह भी समझना चाहिए कि जिस प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर अन्ना से संघ तक उस पर हमलावर है तो क्या उसे स्वरुप में बदलाव किया जाना देशहित में नहीं होगा ?  
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बुधवार, 28 जनवरी 2015

ओबामा का भारत दौरा

                               अपने कार्यकाल में दूसरी बार भारत का दौरा करने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने आज के समय जिस तरह से भारतीय महत्व को समझते हुए पूरी तरह से एक नयी शुरुवात की तरफ बढ़ने की कोशिशें शुरू की हैं वह कितने आगे तक जा पाती हैं यह तो आने वाला ही बताएगा क्योंकि यह ओबामा का दूसरा कार्यकाल है और अमेरिकी कानून के अनुसार वे अब तीसरी बार इस पद पर नहीं चुने जा सकते हैं तो जब २०१७ के चुनाव के बाद अमेरिका में नए राष्ट्रपति सत्ता संभालेंगें तो उनका भारत के प्रति क्या रवैया रहने वाला है यह भी अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है. देशों के सम्बन्ध नेताओं की सोच और सामरिक नीतियों के साथ कूटनीतिक पहल पर अधिक टिके होते हैं और इनका किसी एक काल और परिस्थिति के साथ बांधकर कभी भी सही तरह से आंकलन नहीं किया जा सकता है. ओबामा ने निश्चित तौर पर भारत के साथ बेहतर संबंधों के लिए लगातार प्रयास करने की अपनी मंशा को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है साथ ही उन्होंने आज के भारत के साथ अमेरिका के आगे के हितों को भी समझने की चेष्टा भी की है.
                         ओबामा मनमोहन सिंह से बहुत अधिक प्रभावित रहे हैं और आज वे उनके द्वारा शुरू किये गए इस प्रयास को और भी आगे ले जाने के लिए संकल्पित भी दिखाई दे रहे हैं इसलिए उन्होंने भारत को केवल व्यापारिक साझेदार से आगे बढ़कर रणनीतिक साझेदार बनाये जाने की बातें भी शुरू कर दी हैं. भारत ने आज तक पूरी दुनिया पर अमेरिकी प्रभाव को दूर ही रखते हुए अपने स्तर से ही सभी स्वतंत्र नीतियों का निर्धारण किया है और इस यात्रा के बाद किसी भी परिस्थिति में उस नीति में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आने वाला है क्योंकि अमेरिका आज विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और राजनैतिक शक्ति भले ही हो पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में दोनों देशों के नागरिकों में एक दूसरे को लेकर संदेह बने ही रहते हैं. अमेरिका जिस तरह से केवल अपने लाभ के लिए ही किसी भी देश के साथ अपने संबधों को निर्धारित करने में विश्वास करता है वहीं भारत का इन मामलों में अलग तरह से सोचना ही रहा करता है जैसे अफगानिस्तान में भारत की सैन्य क्षमताओं का उपयोग करने की कोशिशें करने में अमेरिका को कभी भी सफलता नहीं मिली जबकि छद्म रूप से वह पाक को आतंक के खिलाफ वैश्विक युद्ध में अपने बेहतर साझीदार के रूप में प्रचारित करने से नहीं चूकता है.
                    भारत के लिए रूस, ईरान, ईराक़ और सऊदी अरब लम्बे समय से एक बड़े व्यापारिक और सांस्कृतिक साझेदार रहे हैं यहाँ तक ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों पर भारत ने कभी भी कोई बड़ा उत्साह नहीं दिखाया और सदैव अपनी नीतियों की अपने संबंधों के अनुसार ही समीक्षा की. आज रूस संकट में है तो क्या यह हमारी ज़िम्मेदारी नहीं बनती है कि हम उसके साथ खड़े हों क्योंकि पहले भी अंतर्राष्ट्रीय दबावों के समय हमारी नीति मध्यमार्गी ही अधिक रही है और हम किसी भी एक ध्रुव में खुले तौर पर कभी भी शामिल नहीं रहे हैं. तात्कालिक और दीर्घवधि में ओबामा के इस दौरे का लाभ और हानियां दिखाई देने वाली हैं पर आज भारत की बड़ी जनसँख्या और दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते और सम्पन होते मध्य वर्ग के चलते हम हर व्यापारिक देश के चहेते ही बने रहने वाले हैं. आज हमारी इस शक्ति का हर व्यापारिक देश दोहन करना चाहता है अब यह हमारी नीतियों पर ही निर्भर करने वाला है कि हम इस अवसर का लाभ अपने लोगों को सशक्त करने में करने वाले हैं या फिर दूसरे देशों की नीतियों के अनुसार इसका लाभ दूसरों को उठाने देना चाहते हैं फिलहाल ओबामा का यह दौरा भारत अमेरिका संबधों में पिछले दशक में शुरू हुए नए आयामों को आगे बढ़ाने में बेहतर साबित होता दिखाई दे रहा है.               
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सोमवार, 10 नवंबर 2014

शिवसेना के विकल्प

                                                   हर बात पर अपनी ज़िद पर अड़े रहने के स्वाभाव से भरपूर शिवसेना के सामने आज के राजनैतिक माहौल में अपने अस्तित्व को बचाये रखने का संकट अधिक बलवती दिखाई दे रहा है. पिछले कुछ महीनों में उसकी तरफ से होने वाली रणनीतिक चूकों के कारण ही आज वह २५ वर्षों तक अपने ही सहयोगी रहे दल भाजपा से सशंकित नज़र आ रही है. यह उसकी विडंबना ही है कि आज जब केंद्र में मज़बूत बहुमत के साथ भाजपा की सरकार है तो उसे अपने सम्मान के बचाव के लिए उस तरह के रास्ते खोजने पड़ रहे हैं जैसे विरोधियों की सरकार होने पर भी नहीं खोजने पड़े थे. किसी भी दल के नेता चाहे कितनी भी बड़ी बड़ी बातें कर लें पर सत्ता का सुख उनसे दूर होते ही वे बेचैन होने लगते हैं और कहीं से भी सत्ता के दरवाज़े तक पहुँचने की कोई भी उम्मीद उन्हें अपनी निष्ठाएँ बदलने के लिए उकसा ही दिया करती है और वे नैतिकता को किनारे कर पाला बदल सत्ता के सुख भोगने लगते हैं.
                                                   आज यदि शिवसेना अनावश्यक रूप से भाजपा से टकराने की कोशिशें कर रही है तो उससे उसका भय ही सामने आ रहा है क्योंकि अब कहीं न कहीं से मोदी और भाजपा ने अपने पहले मंत्रिमंडल विस्तार से यह सन्देश देने में सफलता पा ली है कि सुरेश प्रभु की तरह शिवसेना के लोग यदि भाजपा के साथ आना चाहें या फिर वे अपने दल में टूट कर सरकार का समर्थन करना चाहें तो उसके लिए भी रास्ते खुले हुए हैं. अब दूसरों पर हमलावर रहने वाली शिवसेना के पास कोई ख़ास विकल्प शेष नहीं बचे हैं तथा आज भी हताशा में वह जिस तरह से बयानबाज़ी कर सरकार और भाजपा पर शर्तें और अल्टीमेटम की राजनीति के माध्यम से दबाव बनाने की कोशिशें कर रही है उसके सुखद परिणाम आने की संभावनाएं बहुत ही कम हैं. भाजपा के लिए नयी नयी शर्तें रखने के पीछे उसकी मंशा भी सिर्फ इतनी ही है कि उसके विधायक पार्टी छोड़ने के बारे में न सोचने लगें और उसके बचा हुआ जनाधार भी खिसकने लगे.
                                                   वैसे तो सुरेश प्रभु शालीनता के साथ राजनीति करने में ही विश्वास किया करते हैं पर आज जो स्थिति बन चुकी है तो मोदी और शाह की तरफ से शिवसेना के लिए यह एक चुनौती ही है कि वे अपने दल को बचा सकते हों तो बचा लें क्योंकि जिस तरह से महाराष्ट्र में विधान सभा अध्यक्ष के लिए चुनाव होने की संभावनाएं बन रही हैं तो देवेन्द्र सरकार के लिए कोई भी रणनीतिक चूक बहुत भारी हो सकती है. एनसीपी के सरकार के खिलाफ वोट होने की स्थिति में तो सदन से बाहर जाने का आश्वासन देवेन्द्र को मिला हुआ है पर अस्थिर विधानसभा में सर्वेसर्वा रहने वाले अध्यक्ष की कुर्सी का लोभ एनसीपी कब तक छोड़ पायेगी सारा मामला इस बात पर ही टिक गया है. शाह और मोदी कि तरफ से जिस तरह से शिवसेना के प्रति ठंडा रुख अपनाया जा रहा है उससे यही लगता है कि वे भी शिवसेना को सबक सिखाने के साथ उसे तोड़कर देवेन्द्र सरकार को स्थिर करने का मन बना चुके हैं पर उद्धव ठाकरे और शिवसेना को अभी भी यह बात समझ में नहीं आ रही है.      
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शनिवार, 18 अक्टूबर 2014

काले धन पर राजनीति

                                                                     सुप्रीम कोर्ट में संप्रग सरकार की तरह की भाषा बोलने के बाद से राजग सरकार और पीएम नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया से लगाकर टीवी तक हर जगह विरोधियों के निशाने पर हैं और भाजपा के पास बोलने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचा है क्योंकि उन्होंने आम चुनावों में प्रचार के दौरान जिस तरह से तत्कालीन संप्रग सरकार पर गंभीर आरोप लगाये थे उसके बाद उनकी अपनी सरकार के सुर भी उसी तरह के सुनाई दे रहे हैं. यह सही है कि अमीर भारतीयों का बहुत सारा धन विदेशों में जमा है पर इस मामले पर अभी तक कोई ठोस कार्यवाही का ताना बाना इसलिए भी नहीं बुना जा सका है क्योंकि स्विस बैंक के नियमों के तहत वहां की सटीक जानकारी के बिना वह कोई भी जानकरी किसी भी देश की सरकार को उपलब्ध नहीं कराता है. यह बात चुनाव के समय भाजपा और मोदी को भी पता थी पर उन्होंने स्वामी रामदेव के सुरों में सुर मिलाते हुए जिस तरह से जनता को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की आज वह टूटती नज़र आ रही है. देश के अंदर कानून परिवर्तन जितनी आसानी से संभव है देश के बाहर के कानूनों पर वह तेज़ी कभी भी संभव नहीं है.
                                                     सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार पिछली और वर्तमान सरकार स्विस सरकार के संपर्क में है और अपने बैंकों के मामले में जिस तरह से स्विस सरकार उनका समर्थन करती है तो उससे किसी बड़ी सहायता की आशा रखना भी गलत ही है. स्विट्ज़रलैंड की अर्थव्यवस्था ही पर्यटन और इन बैंकों पर बहुत हद तक निर्भर करती है तो वह अपनी आय के इस बड़े स्रोत को किसी भी स्तर पर क्यों कमज़ोर करना चाहेगा ? भारतीय परिप्रेक्ष्य में काला धन चुनावी मुद्दा अधिक है पर उसे लाने के प्रयास तो दोनों देशों के संबंधों और अंतर्राष्ट्रीय कानून से बंधे हुए हैं. स्विस सरकार इनकी किस हद तक रक्षा करती है यह इसी बात से पता चलता है कि विश्व के सबसे ताकतवर देश अमेरिका को भी आज तक काले धन के मुद्दे पर वहां से कोई बड़ी सफलता नहीं हासिल हुई है और जो भी प्रयास किये गए हैं वे कभी भी अंतिम परिणीति को नहीं पा सके हैं तो भारत को वहां से कितनी उपलब्धि हासिल होगी यह समय की बात है.
                                                     काले धन पर आज देश में कड़े प्रयत्न करने और भ्रष्टाचार निरोधी तंत्र को मज़बूत करने की भी आवश्यकता है जिससे पिछले भ्रष्टाचार को खोलने के साथ भविष्य में इसे रोकने या न्यूनतम स्तर तक लाने की कोशिश की जा सके. देश केवल बयानबाज़ी से नहीं चला करता है पर उसका भी अपना एक महत्व हुआ करता है अब समय आ गया है कि इस तरह के देश के लिए महत्वपूर्ण मसलों पर राजनैतिक दल संसद में संकल्प पारित करें और उस पर पूरी तरह से टिकने की कोशिशें भी करें. एक दूसरे पर निजी हमलों से देश की भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई पर ही असर पड़ने वाला है और उससे भविष्य में परिस्थितियां और भी बुरी हो सकती हैं. भाजपा और मोदी ने कानूनी और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनावों में जमकर राजनीति कर जनता को नए तरह के सपने दिखाए और अब कांग्रेस भी उस पर उसी तरह से हमले कर रही है ? अच्छा हो कि सभी दल समवेत रूप से कानूनों और समझौतों की समीक्षा करें और यदि कोई कानून या समझौता देश के हित में नहीं है तो उसे हटाने का सर्वसम्मत निर्णय भी करें क्योंकि इस तरह के गंभीर मुद्दों पर अब घटिया दलीय राजनीति तो बंद की ही जानी चाहिए.        
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गुरुवार, 24 जुलाई 2014

मानवाधिकार परिषद में इसराइल विरोध और भारत

                                             भारतीय विदेश नीति की एक बड़ी खूबी आज़ादी के बाद से ही यह रही है कि दुनिया भर में समय समय पर आने वाली विभिन्न समस्याओं से भी वह अपने अनुसार ठीक ढंग से निपट लिया करती है. ताज़ा मामले में ग़ाज़ा पट्टी पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की आपातकालीन बैठक में भारत ने इसराइल के खिलाफ आये प्रस्ताव के पक्ष में मत देकर फिलिस्तीन के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित कर दी है. इस प्रस्ताव के पक्ष में २९ और विरोध में केवल अमेरिका का वोट गया जबकि १७ देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया. यहूदियों के साथ अरबों के इस संघर्ष में भारत ने सदैव शांति की वकालत की है और कई बार इसराइल के रुख का विरोध करते हुए डेविस कप जैसे महत्वपूर्ण आयोजन में भी इसराइल के साथ लम्बे समय तक खेलने से इंकार भी किया है. भारत में राजग की सरकार होने के कारण कई लोग भारत की नीति बदलने की बात कर रहे थे पर अब यह स्पष्ट हो चुका है कि भारत सरकार अपनी स्थापित विदेश नीति में फिलहाल कोई बदलाव नहीं कर रही है.
                                          देश में नरसिम्हा राव की सरकार के समय भारत ने इसराइल से महत्वपूर्ण राजनयिक संबंधों को आगे बढ़ाने के बारे में सोचना शुरू किया था और तब से आज तक सामरिक और विज्ञानं के क्षेत्र में भारत और इसराइल बहुत करीब आ चुके हैं तथा दोनों देशों के बीच रक्षा सम्बन्ध भी निरंतर ही मज़बूत होते जा रहे हैं. भारत को भी आतंकियों से जुड़ी समस्या से देश के विभिन्न भागों में लगातार निपटना पड़ता है जिससे इसराइल के साथ उसके रक्षा समझौते बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं. देश घरों की तरह नहीं चला करते हैं और उन्हें सही दिशा में पूरी गति से आगे बढ़ाने के लिए दीर्घकालिक नीतियों की आवश्यकता होती है. आज भारत के इसराइल के साथ चल रहे रक्षा और अन्य अनुसंधान सम्बन्धी सहयोग के चलते क्या भारत उसकी एकदम से अनदेखी कर सकता है ? किसी भी सही और व्यापक सोच वाले देश से तो कम से कम ऐसी आशा नहीं की जा सकती है. भारत का अरब देशों की राजनीति और व्यापार में भी बहुत बड़ा सहयोग है तो उसे उन संबंधों को भी देखना ही पड़ता है.
                                          चीन और पाक सीधे तौर पर भारत के साथ अनावश्यक दुश्मनी बढ़ाने में लगे रहते हैं पर इसके साथ ही भारत और पाक में रोज़मर्रा कि चीज़ें मंहगी होने पर बहुत बार दोनों देश ही एक दूसरे को राहत पहुँचाने का काम किया करते हैं. चीन चाहे कितनी बार भी सीमा का उल्लंघन कर ले पर आज के समय में विश्व के सबसे बड़े उभरते हुए आर्थिक बाज़ार भारत की अनदेखी नहीं कर सकता है. समस्याओं को आज की तारीख में आर्थिक और सामाजिक मूल्यों की कसौटी पर कसा जाता है और भारत की तरफ से इन संबंधों को निभाने में कोई समस्या कभी भी नहीं आई है. भारतीय संसद भले ही इसराइल के खिलाफ कोई प्रस्ताव न लाए पर यूएन में भारतीय रुख की जानकारी पूरी दुनिया को हो ही गयी है. मध्यपूर्व की स्थिति को सुधारने के लिए अब हमास को मिस्र के प्रस्ताव पर विचार करना चाहिए क्योंकि बिना कोई बीच का रास्ता निकले बात सुधरने वाली नहीं है. इसराइल जैसे दुश्मन से लड़ने के लिए जितनी शक्ति चाहिए वह आज तक मिस्र, सीरिया आदि देश भी नहीं पा सके हैं इसीलिए वे इसराइल को नाराज़ कर इस संघर्ष में अपने दम पर कुछ भी नहीं करना चाहते हैं और यूएन के प्रस्तावों पर वोट करने तक ही खुद को सीमित किये हुए हैं.         
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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

पाकिस्तान और राजनयिक शिष्टाचार

                                                               अपने जन्म के समय से ही रोज़ नए विवादों में घिरने वाले और आज दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकियों को पोषित करने में लगे हुए देश पाकिस्तान ने जिस तरह से भारतीय सिख श्रद्धालुओं के सम्मान में आयोजित भोज में अपनी मंशा को एक बार फिर से प्रदर्शित किया उससे यही पता चलता है कि वह भारत के साथ सद्भाव बढ़ाने की चाहे जितनी कसमें खा ले पर उसके मंतव्य कभी भी ऐसे नहीं हो सकते हैं कि दोनों देशों के सम्बन्ध थोड़ा सामान्य हो सकें. भारत पाक के बीच में जिस तरह से सदैव ही सम्बन्ध तनाव पूर्ण रहा करते हैं उस परिस्थिति में पाक की इस तरह की हरकत से सिख श्रद्धालुओं पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ा पर पाकिस्तान की मंशा अवश्य ही स्पष्ट हो गयी कि वह चाहे कुछ भी कहे पर उसकी प्राथमिकता आज भी भारत के घरेलू मामलों में उलझने से आगे नहीं बढ़ पायी है. भारतीय चुनावों के बीच जिस तरह से यात्रियों से मोदी को हराने की अपील सरकारी प्रवक्ता द्वारा की गयी उसका कोई मतलब नहीं बनता था क्योंकि ये लोग पाक की बात क्यों मानेंगें ?
                                                               यह सही है कि पूरी दुनिया के लिए सदैव ही भारतीय लोकतंत्र के इस महापर्व पर हर बार इसी तरह से निगाहें लगी रहती हैं पर इस बार जिस तरह से दुनिया के सबसे तेज़ी से बढ़ते बाज़ार भारत में सबकी दिलचस्पी बनी हुई है उससे यही लगता है कि सभी को अपनी मंशा पूरी करवाने के प्रयास करने पड़ रहे हैं. भारत की आज़ादी के समय भी कुछ देशों ने इस तरह की भविष्यवाणी की थी कि अपनी कमज़ोरियों के चलते भारत खुद ही टूट जायेगा पर उन सभी वैश्विक ठेकेदार देशों को हमने यह दिखा दिया कि हमारे में इतनी ताकत है कि हम अपने दम पर उठकर खड़े हो सकते हैं और समय आने पर अपने दुनिया को भी अपने अनुसार चलने पर मजबूर भी कर सकते हैं भले ही उसके लिए आर्थिक, सामाजिक या राजनैतिक कारण ही ज़िम्मेदार क्यों न हों ? आज भी जिस तरह से हम आगे बढ़ते ही जा रहे हैं उस परिस्थिति में किसी भी देश के लिए भारत पहले तो एक बाज़ार होता है फिर उसे वह अपने प्रतिद्वंदी के रूप में दिखाई देने लगता है.
                                                              पाक जैसे विफल देश से सामान्य, राजनयिक या कूटनैतिक शिष्टाचार की आशा लगाना भी बेकार ही है क्योंकि उसके पास करने के लिए कुछ भी नहीं है और वह आज के तेज़ी से आगे बढ़ते हुए विश्व में केवल आतंकी तत्वों का एक केंद्र ही बनकर रह गया है. क्या पाक सरकार को इतना भी शिष्टाचार नहीं आता है कि वह अपने यहाँ धार्मिक यात्रा पर आये हुए इन श्रद्धालुओं से किस तरह से बात करे ? उसके लिए बात करने के बहुत सारे अवसर भी थे पर भारतीय चुनावों के बारे में इस तरह की सलाह देने की कोशिश क्या भारत के आंतरिक मामलों में सीधा दखल नहीं है ? कोई सामान्य राजनेता या आतंकियों का पैरोकार यदि इस तरह की बातें करता तो समझ में आ सकता था पर दो देशों के बीच सरकारी प्रवक्ता के इस तरह के बयान से पाक का घटियापन ही ज़ाहिर होता है. इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी बात यह भी है कि पाक अपने यहाँ के सामान्य हालातों को सँभालने में आज पूरी तरह से विफल है और भारत के लोगों को इस तरह की सलाह देने के लिए उसकी तत्परता कितनी अधिक है यही दिखता है कि पाक जैसे पडोसी से सदैव ही सचेत रहने की आवश्यकता रहने वाली है.    
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