मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 2 March 2015

जम्मू कश्मीर में नयी राजनीति

                                    लम्बी राजनैतिक जद्दोजेहद और विचार विमर्श के बाद आखिर जम्मू कश्मीर को राज्य की नयी सरकार मिल ही गयी पर जिस तरह से शपथ ग्रहण के बाद अपने पहले सम्बोधन में ही सीएम मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने राष्ट्रवादी भाजपा और मोदी के सामने जम्मू कश्मीर में शांति पूर्वक सम्पन हुए चुनावों के लिए पाकिस्तान, अलगाववादियों के मंतव्य को भी रेखांकित किया उससे भाजपा को यह तो पता चल ही गया होगा कि यह गठबंधन उसके लिए अब तक का सबसे कठिन साबित होने वाला है. इसके लिए हर तरह की तैयारियां करने में संघ के पूर्व वरिष्ठ कार्यकर्त्ता और अब भाजपा के महासचिव राम माधव ने जिस तरह से अपनी पूरी जान लगाकर समझौते को अंतिम रूप तक पहुँचाने की कोशिश की हैं उनके लिए इस तरह के बयान निश्चित तौर पर ही झटके से कम नहीं हैं. अभी तक भाजपा का कश्मीर को लेकर जो भी रुख रहा करता है इस बार उसने सरकार बनाने के लिए उनसे व्यापक स्तर पर समझौता कर लिया है और एक समय अलगाववादियों के धीमे स्वर में समर्थन करने वाले मुफ़्ती के साथ सरकार बनाने के लिए खुद को तैयार किया है.
                           मुफ़्ती के लिए इस तरह का बयान अपन उन समर्थकों के लिए देना मजबूरी ही था क्योंकि जो भाजपा धारा ३७० हटाने पर सदैव मुखर रहा करती है यदि उसके साथ सरकार बनायीं जा रही है तो जिन लोगों ने भाजपा के खिलाफ घाटी में मुफ़्ती को समर्थन दिया था उनकी संतुष्टि के लिए कुछ बोलना भी उनकी मजबूरी ही अधिक लगती है. मुफ़्ती के साथ सरकार चलाना इसलिए भी समस्याएं पैदा कर सकता है क्योंकि सेना को जवाबदेह बनाने के लिए मुफ़्ती द्वारा एक और अनर्गल बात कही गयी है. भारतीय सेना आज भी जिन परिस्थितियों में कश्मीर में काम कर रही है उसमें संभवतः दुनिया की कोई भी सेना इतने अच्छे से नहीं कर सकती है पर विभिन्न मुद्दों को लेकर जिस तरह से आतंकी और अलगाववादी जनता को कानून तोड़ने के लिए उकसाते हैं कई बार उसके कारण भी समस्याएं उग्र हो जाया करती हैं. सेना की तरफ से कभी भी एक तरफा कार्यवाही नहीं की जाती है तो आम लोगों द्वारा सेना के साथ सुरक्षा सम्बन्धी सहयोग न करने की स्थिति में क्या किया जा सकता है यह भी देखने का विषय है. सेना के विशेषाधिकार में कटौती को सेना ने पूरी तरह से नकार दिया है जिससे भी नीतिगत स्तर पर टकराव बना रह सकता है.
                          राजनीति में रहकर कोई भी स्थायी शत्रु या मित्र नहीं हो सकता है यह इसका एक अच्छा उदाहरण भी है क्योंकि अपने विरोधियों जिनके अलग होकर चुनाव लड़े जाते रहते हैं कई बार संख्या बल को पूरा करने के लिए इसी तरह से साथ मिलकर सरकार का गठन भी किया जाता रहा है और इसमें देश की दोनों बड़ी पार्टियां कांग्रेस और भाजपा का एक जैसा ही रिकॉर्ड रहा है. राजनीति में कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता है इसलिए भाजपा ने कितना बड़ा समझौता जनसंघ के अपने संस्थापक और कश्मीर के लिए जान गंवाने वाले मुखर्जी के लिए किया है इसका कोई मतलब नहीं है. हर दल अपनी सत्ता चलाने के लिए इस तरह की पलटियां मारा ही करता है जैसे कि बिहार में नितीश भाजपा आज अलग हैं और उनके विरोध में तीन साल तक चिल्लाने वाले लालू और कांग्रेस उनके साथ खड़े हैं. देश के अन्य राज्यों में न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाना और उस पर टिके रहने आसान है पर जम्मू कश्मीर में यह सबसे मुश्किल काम है. अब यह तो समय ही बताएगा कि इस सरकार को कितने दिनों तक कोई ऐसे मसले का सामना नहीं करना पड़ता है जिसमें सत्ता की डोर इनके हाथों से खिसकती नज़र आये.     
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