मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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सोमवार, 18 अप्रैल 2016

प्रोटोकॉल और सम्मान

                                                                  अपनी ईरान यात्रा के दौरान विदेश मंत्री सुषमा स्वाराज ने राष्ट्रपति हसन रूहानी के साथ जिस तरह से ईरानी और इस्लामिक परम्पराओं का सम्मान किया वैसा लम्बे समय से राजनयिक हलकों में किया जाता रहा है क्योंकि जब बात दो सभ्यताओं और संस्कृतियों और देशों के लोगों के मिलने की होती है तो दूसरे पक्ष का सम्मान करने से कोई भी देश या उसका प्रतिनिधि छोटा नहीं हो जाता है. भारत और भारतीय नेताओं से सदैव ही दूसरे देशों की स्थानीय और धार्मिक परम्पराओं का अनुपालन ही किया है तो उस परिस्थिति में सुषमा स्वराज को लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह से आलोचनाओं का दौर शुरू हुआ है उसका कोई मतलब ही नहीं बनता है. इस बात को लेकर जिस तरह से भारत में भाजपा और सरकार के हिंदुत्व वादी एजेंडे से पीछे हटने को लेकर जिस तरह की टिप्पणियां देखने को मिल रही हैं दोनों देशों के हज़ारों वर्षों के साझा इतिहास के सामने उसका कोई महत्त्व नहीं है और अच्छा है कि भारत सरकार भी अभी तक स्थापित विदेश नीति के उन तत्वों में भारतीयता का वह पुट बनाए रखना चाहती है.
                                                   किसी भी क्षेत्र विशेष या राष्ट्र के दौरे के समय महत्वपूर्ण भारतीय नेता इस तरह की सौजन्यता को सदैव ही प्रदर्शित करते हैं जिसके माध्यम से दूसरे देश के लोगों और विश्व में यह सन्देश दिया जा सके कि भारत उनकी परम्पराओं और धार्मिक मान्यताओं का पूरा सम्मान करता है यह छोटे छोटे कदम होते हैं जो कई बार बड़ी कूटनीतिक सफलता तक ले जाने में नेताओं को बहुत मदद किया करते हैं. भारतीय समाज और लोग सदैव ही मुल रूप से सहिष्णु रहे हैं और उनके इस गुण के कारण ही आज पूरे विश्व में भारत के लोगों को जो सम्मान दिया जाता है वह अन्य लोगों के लिए दुर्लभ होता है. सुषमा स्वराज का सांकेतिक पोशाक पहन कर ईरानी मान्यताओं का सम्मान करना उन्हें या भाजपा को कहीं से भी असहज नहीं कर सकता है क्योंकि ईरान में भारत की छवि परम्परावादी देश की ही है. दूसरों के सामने भारतीय समाज भी अपनी बहु बेटियों को सर ढकने की सलाह देने में नहीं चूकता है तो सुषमा स्वराज का ऐसा करना किसी भी तरह से गलत नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इससे पहले लम्बे समय तक देश पर शासन करने वाली पूर्व पीएम इंदिरा गांधी भी स्वयं कभी भी सर से पल्लू को हटने नहीं देती थीं.
                                               भारतीय समाज की सौजन्यता को किसी से भी सीख लेने की आवश्यकता नहीं है तथा देश में इस तरह से सक्रिय कुछ तत्वों की बातों को पूरी तरह से अनदेखा भी किया जाना चाहिए. आज जिस तरह से सोशल मीडिया बहुत प्रभावी हो चुका है तो उस परिस्थिति में ऐसी बातें समाचारों में आने से पहले ही वहां पर जगह बना लेती हैं और उसके परिणाम स्वरुप इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इन बातों को समाचारों में शामिल करना पड़ता है. देश की अंतर्राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप दूसरे देशों की मान्यताओं और परम्पराओं का सम्मान करते हुए ही आगे बढ़ने की कोशिश सरकार को करनी चाहिए जिससे ईरान के साथ व्यापारिक, सांस्कृतिक सम्बन्धों के मज़बूत होने से दोनों देशों के लिए अच्छा समय आ सकता है. आर्थिक प्रतिबंधों के चलते जब ईरान के साथ अधिकांश देशों ने तेल व्यापार को बहुत कम या बंद ही कर रख था तब भी भारत ने उसके साथ तेल व्यापार को प्राथमिकता दी और अंतर्राष्ट्रीय दबाव को दोनों देशों के हितों में मानने से पूरी तरह इंकार ही कर दिया था तो आज परिस्थितियां व्यापार के अनुकूल होने पर भारत को अपनी इस विरासत को नए आयाम देने की आवश्यकता है न कि इस तरह के छोटे मामलों में उलझने की.  
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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

भारत-अफ्रीका परंपरा और संबंध

                                                                           देश के निर्माण में अपना किसी भी स्तर पर योगदान करने वाले नेताओं को भले ही सरकार पूरी तरह से भूल गयी हो पर भाजपा की कथित मीडिया टीम के लिए भारत अफ्रीका समिट में नेहरू-इंदिरा का जिक्र कहीं से भी संघ, मोदी और भाजपा को रास नहीं आया होगा। आज़ादी के बाद पूरी दुनिया में भारत को हर तरह से स्वीकार्य बनाये जाने के लिए नेहरू द्वारा किये गए प्रयासों को अनदेखा करते हुए जिस तरह से भाजपा ने पिछले चुनावों में उंनके चरित्र हनन से लेकर लगभग हर हथकंडा अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी उसकी उस मानसिकता को भी अफ्रीका के नेताओं ने पूरी दुनिया के सामने बहुत अच्छी तरह से आइना दिखा दिया है क्योंकि भारत की अभी तक की छवि पूरी तरह से सहिष्णु और सद्भाव बढ़ाने वाले राष्ट्र की ही रही है पर कहीं न कहीं से भाजपा के मातृ संगठन संघ द्वारा आज़ादी के बाद नेहरू के नेतृत्व में देश ने जो कुछ भी हासिल किया था उसे नकारने का काम ही अधिक किया जाता रहा है और उनकी कुछ नाकामियों को इस तरह से प्रदर्शित किया जाता है जैसे उन्होंने देश के लिए कुछ भी नहीं किया हो ?
                      लोकतंत्र में राजनैतिक विरोध होना अवश्यमभावी है क्योंकि विपरीत विचारधाराओं में से ही लोगों को अपने लिए सरकार चुनने की आज़ादी के बारे में अपने अधिकार का उपयोग करना होता है और इसी क्रम में देश ने कई बार शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण भी देखे हैं जो शायद दुनिया के लिए एक अचम्भे से अधिक कुछ भी नहीं हैं क्योंकि पिछली सदी में स्वातंत्र हुए देशों में जिस तरह से समस्याएं बनी रहती हैं भारत ने उससे पूरी तरह मुक्ति ही पा रखी है. संघ का देश में एक अपना ही अलग एजेंडा रहा है और उसी के तहत वह भाजपा से अपने काम करवाने की कोशिशें करता रहता है पर जिस समिट के लिए मोदी सरकार ने पूरा ज़ोर सिर्फ इस बात पर ही लगा दिया था कि यह केवल मोदी और भाजपा का ही सम्मलेन रह जाये तो दक्षिण अफ्रीका और ज़िम्बाब्वे के नेताओं ने अपनी स्पष्टवादिता से उनकी इस मंशा पर पूरी तरह से पानी ही फेर दिया जब उन्होंने मंच से ही भारत के साथ अफ्रीका महाद्वीप के रिश्तों के ज़िक्र में नेहरू और इंदिरा गांधी का ज़िक्र पूरी शिद्दत के साथ किया।
                            दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने जिस तरह से पिछली सदी में अपने देश के साथ संबंधों को बढ़ाने और विकास की बात करने के लिए नेहरू के योगदान की चर्चा की उससे यही लगता है कि भले ही देश की राजनीति में आज प्रभावी भूमिका निभा रहे संघ और मोदी सरकार के लिए नेहरू और इंदिरा की उपेक्षा करना आसान हो पर दुनिया और ख़ास तौर पर अफ्रीका के लोग आज भी उनके योगदान को नहीं भूल पाये हैं. इसी क्रम में जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रोबर्ट मुगाबे ने और भी आगे जाते हुए लम्बे समय तक भारत में राज करने वाली कांग्रेस पार्टी को भी महान बताया उससे केवल यही सीखा जा सकता है कि भले ही आज कोई भी दल या नेता अप्रभावी हो चुका हो पर उसके कार्यकाल में लिए गए फैसलों से प्रभावित होने वाले लोगों के लिए वह सदैव ही महत्वपूर्ण ही रहा करता है. आज यदि अफ्रीका के नेता इतने दिनों बाद भी नेहरू इंदिरा को याद कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर उनके काम तो बहुत ही महत्वपूर्ण रहे होंगे पर आज संघ, भाजपा और मोदी अपने देश की उस विरासत से पीछा छुड़ाना चाह रहे हैं जो अब देश के इतिहास में दर्ज़ हो चुकी है.
            लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुई किसी भी सरकार को देश चलाने की पूरी स्वतंत्रता संविधान में दी गयी है पर अपनी सोच से इतर किसी अन्य को अपनी विरासत विरासत का हिस्सा न मानने वाली इस संघ की परंपरा को आज मोदी सरकार आगे बढ़ाने में लगी हुई है जिससे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उसकी छोटी सोच ही प्रदर्शित होती है क्योंकि यदि विश्व के साथ लम्बे समय तक भारत के संबंधों की रखवाली करने वाले नेताओं को भी इतनी महत्वपूर्ण समिट में भुला दिया जाता है तो जिन्होंने उनके साथ काम किया या उनकी नीतियों के चलते बहुत लाभ उठाया है वे किसी भी तरह से उसे नहीं भूलने देते हैं और इस समिट में संभवतः अफ्रीका के इन शीर्ष नेताओं ने यही बात सार्वजनिक मंच से कहकर एक तरह से मोदी सरकार को सन्देश देने का काम ही किया है. दूसरे नेता इस तरह की बातों रुख अपनाते हैं यह उनकी बात है पर भारत की श्रेष्ठ परंपरा का निर्वहन करते हुए नए युग में प्रवेश करने के बारे में एक स्पष्ट सन्देश इन सीधे साधे अफ़्रीकी नेताओं स्वर तो दे ही दिया गया है.  
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रविवार, 24 मई 2015

राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीयता

                                                          लगता है कि जनता द्वारा दिखाए जा रहे भरपूर समर्थन के बीच कुछ नेताओं द्वारा संविधान द्वारा मान्य और परंपरा के रूप में स्थापित मानकों का उल्लंघन करना एक नयी तरह की राजनीति करने की शुरुवात भर ही है. कश्मीर घाटी में अलगाववादियों के उकसावे और समर्थन के चलते भारतीय झंडे का अपमान किये जाने और पाकिस्तानी झंडे लहराने की ख़बरें तो आती ही रहती है पर कल जिस तरह से तमिलनाडु की सीएम जयललिता के दोबारा शपथ लेने के समय उनके महूर्त को सही समय से मिलाने के लिए राष्ट्रगान को ही संक्षिप्त रूप में बजाया गया उसे किस श्रेणी के राष्ट्रवाद में रखा जाना चाहिए ? राष्ट्रवाद की यह परिभाषा किसी भी तरह से सही नहीं कही जा सकती है क्योंकि जब तक पूरे देश में सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय या राज्य के सम्मान से जुड़े हुए प्रतीकों का ही अनादर रोकने के लिए कठोर प्रयास और अनुशासन का सहारा नहीं लिया जायेगा तब तक किसी भी तरह से किसी पर उंगली नहीं उठाई जा सकती है. राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े हुए मसलों पर देश को किस तरह से निपटना चाहिए संभवतः इस पर राजनैतिक कारण और तात्कालिक लालच अधिक प्रभावी हो जाते हैं.
                                                   यह सही है कि तमिलनाडु देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ नेताओं के लिए उनके समर्थक बहुत आसानी से अपनी जान तक दे दिया करते हैं फिर उस राज्य में इस तरह की घटना के लिए किसी भी सरकारी या राजनैतिक स्तर पर कोई गंभीर प्रतिक्रिया नहीं सुनाई देना अपने आप में चिंताजनक भी है. यदि खुद जयललिता इस बात को गलत मानती हैं तो उन्हें इस पर कठोर कार्यवाही करने के बारे में सोचना चाहिए पर जिस भी अधिकारी के निर्देश पर यह काम किया गया होगा वह निश्चित तौर पर यह भी जानता होगा कि तमिलनाडु में रहकर किसी भी तरह से जया की हर बात का सम्मान करना ही पड़ता है भले ही उससे देश के सम्मान में कुछ कमी आती हो. ज्योतिष में बहुत अधिक विश्वास करने वाली जया के लिए इस बार का शपथग्रहण बहुत ही महत्वपूर्ण था और संभवतः इस पूरे कार्यक्रम को अधिकारियों के स्थान पर ज्योतिषियों के परामर्श से ही बनाया गया था क्योंकि केवल राष्ट्रगान का समय काटने के अलावा वहां पर लगभग सभी औपचारिकताएं पूरी ही की गयी थीं जिससे ऐसा भी लगता है कि देश की प्रतिक्रिया जाने के लिए संभवतः ऐसा किया गया हो ?
                                           अब जब बात बात में राष्ट्रीयता और देश भक्ति की बातें करने वाली राष्ट्रवादी भाजपा की सरकार है और राज्यसभा में उसकी कमज़ोर स्थिति के चलते वह अपने महत्वपूर्ण बिलों को पारित कराने के लिए किसी भी तरह से सरकार के अंदर और बाहर अधिक समर्थन जुटाने की कोशिशों में लगी हुई है तो उसका खोखला राष्ट्रवाद कहीं किसी कोने में पड़ा हुआ धूल खाता हुआ आसानी से देखा जा सकता है. कश्मीर घाटी में जिस तरह से लगभग हर शुक्रवार पाकिस्तानी झंडे लहराए जा रहे हैं उसके बाद भी भाजपा की तरफ से कुछ भी नहीं कहा जा रहा है जबकि विपक्ष में होने पर वह अलगाववादियों के बयानों पर ही बहुत हो हल्ला मचाया करती थी ? यदि राष्ट्रगान सम्बंधित यह घटना यूपी, बिहार या बंगाल में हुई होती तो भाजपा के संबित पात्रा जैसे पता नहीं कितने प्रवक्ताओं की फ़ौज़ इस बात को उखाड़ने में लगी रहती और उन पर सीधे तौर पर देश द्रोही होने का आरोप लगाने से भी नहीं चूकती ? इस बार भाजपा और मोदी को दक्षिण में अम्मा की ठीक वैसी ही ज़रूरत है जैसे कि उत्तर में मुफ़्ती की इसलिए कश्मीर या तमिलनाडु में जो कुछ भी हो रहा है उसमें भाजपा के स्वार्थ और दोहरे रवैये के कारण भारतीय सम्मान को रोज़ ही कहीं किनारे रखा जा रहा है और जनता पीएम के उस नारे को याद कर रही है कि "देश नहीं झुकने दूंगा" ??? 
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सोमवार, 18 मई 2015

प्रोटोकॉल - अधिकारी और नेता

                                                    देश में असली मुद्दों से ध्यान बांटने की कोशिशों में लगे हुए मीडिया के पास संभवतः अच्छी ख़बरों का अकाल ही पड़ गया है तभी पीएम के छत्तीसगढ़ दौरे के समय वहां ड्यूटी पर तैनात एक जिलाधिकारी को सिर्फ कथित प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने के लिए नोर्टिस जारी करना उसके लिए महत्वपूर्ण खबर बन चुकी है. आज भी जिस तरह से अधिकांश मामलों में अंग्रेज़ों या फिर आज़ादी के समय के कानून ही देश में चल रहे हैं उनमें से कई अप्रासंगिक भी हो चुके हैं साथ ही यह अच्छी बात भी है कि राजग सरकार अब इनमें से अनुपयोगी हो चुके बहुत सारे कानूनों को निरस्त कर आज के समय के अनुसार नए कानून बनाये जाने की तरफ भी कदम बढ़ा चुकी है. आज़ादी के पहले से ही सरकारी अधिकारियों के लिए एक ड्रेस कोड भी इसी तरह से बनाया गया है जिसमें उनको विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में किस तरह से कपडे पहनने हैं इस बात का स्पष्टीकरण भी किया गया है फिर भी यदा कदा यह प्रश्न भी उठते ही रहते हैं कि उक्त स्थान पर प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया गया तथा समबन्धित लोगों से एक स्पष्टीकरण भी मांग लिया जाता है पर इस बार इस बात को इतना आगए बढ़ाने का कोई तुक समझ नहीं आता है.
                                      चिलचिलाती धूप में पीएम की आगवानी के लिए खड़े एक जिलाधिकारी द्वारा जिस तरह से अपनी आँखों की सुरक्षा के लिए काला चश्मा लगाया गया और उसी पर छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें प्रोटोकॉल की याद भी दिलवाई उससे यही लगता है कि उक्त अधिकारी और सरकार के बीच संभवतः सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. आज जब देश में खुद पीएम मोदी द्वारा प्रोटोकॉल के रूप में लगभग हर स्थापति परंपरा की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं तो उसका असर यदि निचले स्तर पर बैठे हुए अधिकारियों पर भी दिखाई दे रहा है तो उसे किस तरह से गलत साबित किया जा सकता है ? देश में संवैधानिक शक्ति की दृष्टि से पीएम के पास सब कुछ होता है और यदि उनकी तरफ से ही प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया जाना इस मीडिया को नहीं दिखाई देता है तो अब यह देश के लिए चिंता की बात है ओबामा कि भारत यात्रा के दौरान खुद पीएम ने किस तरह से काला चश्मा लगाया था क्या तब किसी को देश के पीएम की उस हरकत और अंतर्राष्ट्रीय प्रोटोकॉल की याद आई थी ? तब तो पिछलग्गू मीडिया केवल पीएम को फैशन आइकॉन बताने से नहीं चूक रहा था तो अब एक डीएम के इस तरह से करने पर सरकार से लगाकर मीडिया तक को यह अखर ही गया.
                                     बेशक जनता से जुड़ाव दिखाने के लिए नेता कुछ ऐसे काम भी किया करते हैं जो सामान्य प्रोटोकॉल और शिष्टाचार के दायरे में नहीं आता है पर इसका अर्थ यह तो नहीं होना चाहिए कि देश के अंदर से लगाकर विदेशों तक में अपने कार्यक्रमों में खुद पीएम भी देश की इज़्ज़त दांव पर लगाते रहें ? मोदी द्वारा विदेशों में भारतीय समुदाय को जिस तरह से सम्बोधित करते समय अपनी एक साल पुरानी सरकार की अच्छाइयों पर बात करने से अधिक पिछली सरकार की बातें करना अच्छा लगता है क्या उससे उनकी खुद की और देश की छवि विदेशों में अच्छी होती है ? अब पीएम की तरफ से लगातर अंतराष्ट्रीय स्तर पर विदेशों में अपनी बात कहने के लिए पिछली सरकार की नाकामियों का ज़िक्र करना एक आदत हो चुकी है उन्हें अभी तक यह समझ में नहीं आया है कि यदि उस सरकार की छवि इतनी अच्छी होती तो क्या वह सत्ता से बाहर हो जाती फिर विदेशों में जाकर अपने देश की राजनीति की बातें करना कहाँ से सही कहा जा सकता है और यह किस तरह से देश के पीएम के प्रोटोकॉल के अनुसार सही कहा जा सकता है ? देश के अंदर की राजनीति पर कभी भी विदेशों में कोई भी नेता बात नहीं किया करता है क्योंकि विदेशों में वो देश के पीएम के तौर पर जाते हैं न कि अपने विरोधी दलों के नेताओं की आलोचना करने पर इस तरह से मोदी विदेशों में लगातार इस तरह की बातें करके अपना और देश का मान घटाने का काम ही करने में लगे हुए हैं.         
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शनिवार, 11 अप्रैल 2015

ओडिशा- कम उम्र का मातृत्व

                                             २०११ की जनगणना के अनुसार ओडिशा में १५ वर्ष से कम आयु की लड़कियों के माँ बनने की गति पूरे देश में सबसे अधिक रही है जिससे यह राज्य अपने आप ही मातृ-शिशु मृत्यु दर में भी देश में सबसे आगे रहा है. चार साल पुराने आंकड़ों पर नज़र डाली जाये तो इससे एक बात साफ़ हो जाती है कि या तो राज्य में मातृ शिशु कल्याण के कार्यक्रमों को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है या फिर राज्य सरकार अपने आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले निवासियों को अभी तक यह समझाने में विफल रही है कि कम उम्र में लड़कियों की शादी करने से उनके और होने वाले बच्चे की जान पर अधिक खतरा रहता है. २०११ के अनुसार राज्य में १५ वर्ष से कम उम्र में माँ बनने वाली लड़कों की संख्या ११००० हज़ार थी तथा राज्य में लगभग ६० लाख लड़कियों की आयु १५ वर्ष से कम है और इसमें से भी ४२ हज़ार की शादियां हो चुकी है जिसमें से भी लगभग ११ हज़ार अपना १५ वां जन्मदिन मनाने से पहले ही माँ बन चुकी है तथा ४ हज़ार के करीब ऐसी लड़कियों हैं जो तब तक दो बच्चों की माँ बन चुकी हैं.
                                      इसके साथ ही कम उम्र में माँ बनने के बहुत सारे खतरों के चलते ही आज ओडिशा में मातृ मृत्यु दर प्रति हज़ार २३५ है जबकि इसका राष्ट्रीय स्तर १७८ है तथा शिशु मृत्यु दर ५७ है जो राष्ट्रीय औसत ४४ से बहुत अधिक है. हालाँकि गौर से देखा जाये तो इसके पीछे सामाजिक, आर्थिक के साथ अन्य बहुत से कारण भी काम करते रहते हैं पर किसी भी तरह से इससे सबसे बुरा असर केवल इन कम उम्र की लड़कियों पर ही पड़ता है. देश के अन्य राज्यों की तरह ओडिशा की नवीन सरकार भी इस तरह के सामाजिक कार्यों को करने में अवश्य ही लगी हुई है पर दुर्भाग्य से ज़मीनी स्थिति में कोई अंतर नहीं आ पा रहा है. अभी तक राज्य के विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर नवीन सरकार का काम बहुत अच्छा रहा है उसे देखते हुए उनसे यह आशा की जा सकती है कि आने वाले समय में वे राज्य में व्याप्त इस बुराई पर भी कुछ ठोस कर पाने में सफल हो पायेंगें. आदिवासी बहुल राज्य होने के कारण ही आज भी ओडिशा में कम उम्र के लड़कियों कि शादी करने का रिवाज़ पूरी तरह से चल रहा है जो कि इस पूरे परिदृद्य को बुरी तरह से बिगाड़ने का काम भी स्वतः ही कर रहा है.
                           इस समस्या से निपटने के लिए जहाँ आदिवासी बहुल क्षेत्रों में शिक्षा के बेहतर प्रसार के साथ ही सामाजिक स्तर पर कड़ी मेहनत के साथ कम करने की आवश्यकता है वहीं केंद्र सरकार की तरफ से भी सारी आर्थिक मदद की आशा की जाती है. नवीन पटनायक ने राज्य के बहुत सारे क्षेत्रों को सुधारने का कार्य बहुत ही अच्छे तरीके से किया है और आने वाले समय में अब उनका ध्यान इस तरफ भी जाने ही वाला है. किसी भी सामाजिक बुराई से निपटने का सबसे प्रभावी हथियार शिक्षा ही होता है और यदि ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा के स्तर को सुधारने की कोशिशें सफल होने लगें तो इस सामाजिक समस्या का कोई हल निकाल पाना आसान हो सकता है. इस कार्य को कानूनी स्तर पर उतनी सरलता से नहीं किया जा सकता है जितना इसके दुष्प्रभावों के बारे में प्रचार प्रसार करने से किया जा सकता है यह कार्य तभी सफल हो सकता है जब इसके लिए सभी सम्बंधित पक्ष ज़मीन पर ठोस प्रयासों के साथ आगे बढ़ें. पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा का सही प्रसार होना ही चाहिए इससे सभी लोग सहमत हैं पर यह कार्य केवल सरकारी स्तर पर संभव भी नहीं है इसके लिए अब ग्राम पंचायतों से लगाकर दूर दराज़ के क्षेत्रों तक सही सोच के साथ जाने की बहुत ज़रुरत सामने आ गयी है.       
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रविवार, 1 मार्च 2015

बजट की राजनीति

                                            देश में हर बहुत अच्छे, अच्छे, लोकलुभावन या सामान्य बजट के प्रस्तुत किये जाने के बाद हमेशा ही नेताओं की प्रतिक्रियाएं ऐसी ही होती है जिनमें सत्ता पक्ष को वह क्रन्तिकारी लगता है और विपक्ष को दिशाहीन पर इसमें उन अर्थशास्त्रियों की बातों और विचारों का कोई महत्त्व नहीं रहा करता है जिनको आर्थिक मामलों की वास्तविक जानकारी होती है. बात १९९१ के आर्थिक सुधारों से करें तो लोगों ने नरसिंह राव पर देश बेचने का आरोप भी लगाया था पर आज देश में कोई ऐसा दल बचा हुआ है जो उनके द्वारा शुरू की गयी मज़बूत आर्थिक गतिविधियों के लिए मुक्त बाज़ार की प्रशंसा न करता हो और समय आने पर उसके द्वारा केंद्र या राज्य में खुली आर्थिक नीतियों को समर्थन न किया गया हो ? देश में राजनीति जिस निचले स्तर पर पहुंची हुई है उसमें किसी भी तरह से स्वीकार्यता और सामंजस्य की बातें करना ही एक अपराध माना जाता है सत्ताधारी दल यदि किन्हीं विशेष प्रस्तावों के साथ आगे बढ़ना चाहता है तो विपक्ष अपने दम पर उसको रोकने की पूरी कोशिश करता है जिसमें सदैव देश का ही नुकसान हुआ करता है और हमारी विकास की गति भी बाधित होती रहती है.
                                          क्या अब देश के राजनैतिक दलों को नयी तरह से सोचने की आवश्यकता नहीं है जिसमें सभी लोग पूरी तरह से आर्थिक मामलों में अनावश्यक बयानबाज़ी करने से बच सकें और हर दल के पास एक आर्थिक मामलों की समिति भी हो जो अपने दल या सरकार के लिए समय समय पर विभिन्न विश्लेषणों के माध्यम से आर्थिक मामलों पर खुले विमर्श की नीति पर चल सकने में समर्थ हो जिससे पार्टी विशेष के स्थान पर देशहित को नारों से आगे बढाकर मज़बूती से आगे बढ़ने तक ले जाया जा सके. किसी भी नीति के आने के बाद जिस तरह से उसकी सफलता के लिए बहुत सारे आयाम काम किया करते हैं वहीं उनके रास्ते में आने वाले अवरोधों पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है. सरकार के लिए बजट बनाना एक चुनौती होती है पर हमारे देश में सत्ताधारी दल चाहे कितना भी अच्छा बजट बना ले और उसे सफलत तक पहुंचा भी दे पर जब तक विपक्षी उसकी आलोचना नहीं कर लेते हैं उन्हें चैन नहीं मिलता है. क्या भारत जैसे देश में पूरी तरह से मुक्त अर्थव्यवस्था कारगर हो सकती है या फिर हमें आज भी अगले कुछ दशकों तक मिश्रित रूप से आगे बढ़ने की अपनी नीति पर ही चलना चाहिए यह भी बड़ा प्रश्न है.
                 अब समय आ गया है कि देशहित में सभी दलों को स्वेच्छा से यह काम करने की तरफ बढ़ना चाहिए जिसमें विभिन्न मसलों पर पार्टियों के अंदर ही सुव्यवस्थित समितियों का गठन किया जा सके जो पार्टी की नीतियों को स्पष्ट रूप से जनता के सामने लाने के साथ ही देश के लिए एक बेहतर माहौल बनाने की दिशा में काम करने के लक्ष्य तक सोच सकने में सफल हो. इस मामले में लोकतंत्र की परिपक्वता को लेकर किसी के मन में कोई संदेह भी नहीं होना चाहिए क्योंकि हमारा लोकतंत्र वैसे तो अपने आप में सम्पूर्ण ही है और जिन विपरीत परिस्थितियों के बीच देश ने पिछले सात दशकों में तरक्की की है वह भी दुनिया को अचम्भित करने वाली ही है. वैश्विक आर्थिक परिदृश्य का असर तो सारे देशों पर पड़ता है पर भारत की आर्थिक चुनौतियों और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अब समग्र नीतियों के साथ आगे बढ़ने का समय आ गया है बड़े नीतिगत परिवर्तनों के बारे में पहले लोकसभा में व्यापक चर्चा होनी चाहिए और उसके बाद ही नीतिगत परिवर्तनों को आगे बढ़ाया जाया चाहिए. जैसा कि मोदी खुद ही यह कई बार कह चुके हैं कि वे सबके साथ सबका विकास करना चाहते हैं तो इस पर धरातल पर भी उनकी तरफ से ठोस काम किये जाने की ज़रुरत है और हर बात का श्रेय लेने के स्थान पर सहयोग को बढ़ावा देना सरकार की तरफ से ही शुरू किया जा सकता है.   
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शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

राष्ट्रपति अभिभाषण और सांसद

                                        देश में सरकार और सांसद हमेशा ही इस बात का आलाप गाते रहते हैं कि संसद सर्वोपरि है पर कल जिस तरह से राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के बाद उसे पारित किये जाने से पहले सदन में केवल २६८ सांसद ही मौजूद थे वह इन नेताओं के खोखले बयानों की बातों को ही दोहराता लगता है. सत्तापक्ष की तरफ से जहाँ केवल २०३ और विपक्ष की तरफ से ६५ सांसद  ही सदन में बैठे हुए थे तो सदन के प्रति इन सभी सांसदों और पार्टियों की उपेक्षा भरी भूमिका के बारे में आसानी से समझा जा सकता है. चुनावों के समय जहाँ सभी नेता भारतीय लोकतंत्र के तराने छेड़ते नज़र आते हैं वहीं जब देश के लिए सार्थक और ठोस बहस करने वाले समय में वे सारा कुछ अपने कुछ बड़े नामों पर ही छोड़कर कहीं और गायब हो जाते हैं क्या अब संसद को खुद ही अपने में कुछ ऐसा नहीं करना चाहिए कि जो भी सांसद बिना पूर्व सूचना के सदन की बैठकों के समय गायब रहें उनके उस माह के वेतन भत्तों को पूरी तरह से रोक लिया जाना चाहिए जिससे सदन की गरिमा में कुछ बढ़ोत्तरी दबाव के कारण ही हो सके.
                           चर्चा पर उत्तर देते समय खद पीएम ने जिस तरह से मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना के बारे में खिल्ली उड़ाई उससे यह भी साबित होता है कि वे अपने भाषण को मसालेदार बनाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो सकते हैं क्योंकि जब वे मनरेगा को कांग्रेस की विफलता बता रहे थे तो वह कहीं न कहीं से पूरे देश की ही विफलता थी और जिस तरह से पीएम ने देश के आर्थिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदलने वाली इस योजना का उपहास किया उसे किस तरह की सकारात्मक राजनीति कहा जा सकता है ? एक तरफ वे विपक्ष को देश के विकास के लिए साथ आने की नसीहतें देते दिखाई देते हैं तो वहीं दूसरी तरफ वे देश के उन गरीबों के लिए परिवर्तनकारी योजना का बड़े पैमाने पर उपहास करते हैं क्या सदन में खुद पीएम के इस तरह का आचरण सरकार के अन्य मंत्रियों को इस तरह की बयानबाज़ी के लिए प्रेरित नहीं करने वाला साबित होगा और सदन की कार्यवाही में लगातार व्यवधान का कारण भी नहीं बनेगा ? पीएम की तरफ से इस तरह के बयानों से सदन में परहेज़ किया जाना चाहिए क्योंकि सदन की चर्चा गंभीर रखने की ज़िम्मेदारी खुद सरकार की अधिक होती है.
                 देश की संसद में प्रस्ताव पारित होने के बाद जिन लोगों ने भी सदन की कार्यवाही देखी होगी तो उनको देश के साथ किया जा रहा मज़ाक अच्छी तरह से समझ में आ गया होगा क्योंकि इसके तुरंत बाद ही जिस तरह से सदस्यों के संशोधनों को पटल पर रखने की कोशिशें की जा रही थीं वे किस तरह से लोकतंत्र की मर्यादा की रक्षा कर रही थीं और क्या सदन में कोरम पूरा था ? हद तो तब हो गयी कि जब मीनाक्षी लेखी के प्रस्ताव का खुद उन्होंने भी समर्थन नहीं किया तो पीठासीन अधिकारी को कहना पड़ा कि अरे कम से कम आप तो अपने प्रस्ताव का समर्थन कीजिये यदि सदन में इस तरह से काम होता है तो सदन की कार्यवाही का सीधा प्रसारण बंद कर चाहे जो कुछ भी किया जाये पर देश के सामने इस सर्वोच्च सदन में संसदीय परम्पराओं की इस तरह से खिल्ली तो न उड़ाई जाये. क्या नए सांसदों को सरकार या लोकसभाध्यक्ष की तरफ से यह स्पष्ट निर्देश नहीं दिया जाना चाहिए कि उनके लिए ९०%  से अधिक उपस्थिति अनिवार्य है क्योंकि ये वही लोग हैं जिन्हें आने वाले समय में सरकार या विपक्ष में बैठकर गंभीर चर्चाओं के माध्यम से देश के लिए कुछ करना है. आशा है कि सदन में सभी दलों के वरिष्ठ संसद इस तरह की किसी बाध्यता के बारे में भी विचार करेंगें जिससे सदन में बैठने को लेकर सांसदों को और भी अधिक प्रेरित करते हुए आगे बढ़ा जा सके.       
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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

नेता,नैतिकता और बिहार का सन्दर्भ

                                               बिहार में जिस तरह से रोज़ ही नयी राजनैतिक गतिविधियाँ दिखाई व सुनाई दे रही हैं उनसे यही लगता है कि जब तक मांझी सीएम के तौर पर वहां बैठे हुए हैं तो इस सब से पार पाना किसी के भी बस में नहीं रहा गया है. आमतौर पर राजनीति में नेताओं द्वारा नैतिकता की लम्बी चौड़ी कहानियां सदैव ही सुनाई जाती रहती हैं पर जब धरातल पर कुछ करने का समय आता है तो उनको जैसे मति भ्रम हो जाता है और वे अपने द्वारा ही दिए गए इन उपदेशों को अपनी सुविधा के लिए पूरी तरह से भूल जाया करते हैं. आज जब मांझी पर इस बात के लिए प्रश्चिन्ह लग चुका है कि सदन का विश्वास उन्हें हासिल भी है या नहीं तो इस स्थिति में उनके द्वारा बड़े नीतिगत फैसले आखिर किस हक़ से लिए जा रहे हैं ? इस तरह के विलक्षण मामलों में क्या अब कोई ऐसी नैतिकता की नियामवली नहीं होनी चाहिए जिस पर चलना नेताओं के लिए एक आदर्श स्थिति मानी जाये क्योंकि एस आर बोम्मई और कल्याण सिंह के इसी तरह के विवादों में यह लगभग तय ही हो चुका है कि इन परिस्थितियों में क्या किया जाना चाहिए.
                                                                  इस तरह के मामलों में हमारे नेता देश के सामने क्या आदर्श प्रस्तुत कर पाते हैं यही चिंता का विषय है क्योंकि जब भी कोई ऐसा संकट सामने आता है तो कोर्ट के माध्यम से ही नेता एक दूसरे को नीचा दिखाने के बारे में सोचते रहते हैं तथा विधायिका की ज़िम्मेदारी पता नहीं कहाँ विलुप्त हो जाती है और उसकी जगह सत्ता लोलुप नेताओं की पूरी फ़ौज़ ही दिखाई देने लगती है. बिहार मामले में कोर्ट ने पहले नितीश को कोई बड़ी राहत नहीं दी पर अब जब माझी द्वारा बड़े नीतिगत पर राजनैतिक रूप से एक दांव के रूप में बड़े निर्णय लिए जाने लगे तो कोर्ट ने उन पर केवल दैनिक फैसलों तक सीमित रखने के बारे में स्पष्ट आदेश जारी कर दिया है. ऐसे मामलों में क्या राज्यपाल को केंद्र में बैठे हुए दल की महत्वकांक्षाओं की पूर्ति का साधन ही बनाया जाना चाहिए वह भी तब जब बिहार के पास लम्बे राजनैतिक और कानूनी जीवन वाले केसरीनाथ त्रिपाठी के रूप में एक बेहद कारगर राज्यपाल मौजूद हों ? केंद्र को इस तरह के किसी भी मामले में पूरी तरह से स्पष्ट दखल देकर देश के लोकतंत्र को सर्वोपरि रखने की कोशिश करनी चाहिए भले ही उसमें केंद्र या राज्य में किसी भी दल की सरकारें क्यों न हों.
                           एक तरफ बिहार में पिछड़ापन एक बड़ा मुद्दा होता है और जब उसके विकास के लिए काम किये जाने वाला बजट सत्र आहूत किया जा चुका हो तो उससे पहले इस तरह की अनिश्चितता का क्या मतलब बनता है ? आज भाजपा मांझी को केवल नितीश के सामने एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करने में लगी हुई है जबकि वह यह बड़ी बात भूल जाती है कि जब राज्य का पूर्ण बजट बनाया जाना है तो आने वाले समय में इस तरह की अनिश्चितता राज्य को कितनी भारी पड़ सकती है फिर भी उसकी प्राथमिकता केवल नितीश को परेशान करने तक ही सीमित है. यह वही नितीश हैं जनके साथ चुनाव लड़कर उसने दोबार सत्ता का सुख बिहार में भोगा है और आने वाले समय में यदि चुनावों के बाद भाजपा बिहार में सरकार बनाने में सफल हो जाती है तो भी उसे नितीश की इन बेहतर योजनाओं की मांझी के लोकलुभावन वायदों से अधिक सहायता मिलने वाली है. यह देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारे नेता और राजनैतिक दल सदैव ही इस तरह की राजनीति के खिलाफ तो होते हैं पर समय मिलने पर वे अपने को सबसे घटिया राजनीति का पैरोकार साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं और देश का इसी तरह से नुक्सान होता रहता है पर उनके दलों की सरकारें बची रह जाती हैं.    
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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

बिहार और संविधान

                                                                     काफी लम्बे समय के बाद देश में एक बार फिर से बिहार में १९९८ के यूपी जैसी स्थिति सामने आई है और सम्भावना इस बात की दिख रही है कि अल्पमत में आये और जेडीयू से निष्कासित सीएम मांझी को विधान सभा में बहुमत साबित करने का अवसर और समय राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी द्वारा दिया जायेगा क्योंकि पहले जिस तरह से मांझी द्वारा दिल्ली में यह दावा किया गया था कि वे मंत्रमंडल का विस्तार करना चाहते हैं उससे मामला उलझ सा गया लगता है. यदि मांझी द्वारा इस तरह के दावे न किये जाते तो संभवतः केसरी नाथ उनसे आगामी बजट सत्र में पहले बहुमत साबित करने केलिए कह सकते थे पर इस मामले में मांझी और भाजपा के आंकलन में गड़बड़ी रह गयी और जेडीयू में उतने बड़े पैमाने पर विभाजन नहीं हुआ जिसकी उम्मीद की जा रही थी. अब जब मामला जानबूझकर उलझाया जा रहा है तो बिहार के राज्यपाल के साथ ही केंद्र सरकार पर भी दबाव बनने वाला है क्योंकि इसी वर्ष चुनावी बिसात बिछने से अब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिये ही परिस्थितियां आसान नहीं रहने वाली हैं.
                             राज्यपाल के पास ऐसी परिस्थिति में खुले तौर पर सबसे सुगम संवैधानिक विकल्प यही होता है जिसमें वह सरकार से सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए कह सकते हैं पर इसके लिए राजयपाल द्वारा अनावश्यक रूप से जो समय लिया जा रहा है वह चुनावी वर्ष में केवल भाजपा को संभावित लाभ दिलाने के चलते ही लग रहा है. बिहार की जाति आधारित राजनीति में विधान सभा चुनावों में इसी दम पर बहुत कुछ दांव पर लगा रहने वाला है तो किसी के लिए भी इसकी अनदेखी करना आसान नहीं रहने वाला है. सदन में जब सत्ताधारी दल के अध्यक्ष के रूप में शरद यादव की तरफ से राज्यपाल को सूचित कर दिया गया है कि मांझी अब उसके विधान मंडल दल के नेता नहीं हैं और उनके स्थान पर नितीश को नया नेता चुन लिया गया है तो उन्हें सीधे तौर पर कार्यवाही करते हुए मांझी इस्तीफ़ा न देने की स्थिति उन्हें बर्खास्त करने या सदन का विश्वास हासिल करने के लिए कहना चाहिए पर वे जिस तरह से जेडीयू के इस मामले का राजनैतिक रूप से भाजपा के लिए दुरूपयोग कर रहे हैं उसका कोई औचित्य नहीं है.
                            जब एक बार यह तय किया जा चुका है कि किसी भी सरकार के लिए सदन में ही विश्वास मत हासिल करने से अच्छा कोई विकल्प नहीं हो सकता है तो इस तरह से राजनैतिक अनिश्चितता को बनाये रखने से जनता में क्या सन्देश जाने वाला है ? यह भी पूरी तरह से सही है कि विगत में केंद्रीय सत्ताधारी दलों के द्वारा राज्यपाल के पद का इसी तरह से दुरूपयोग भी किया जाता रहा है पर कल्याण सिंह- जगदम्बिका पाल के मामले में एक बार सदन की सर्वोच्च्च्ता साबित हो चुकी है तो उस पर तुरंत निर्णय लेने के स्थान पर समय काटने से क्या खरीद फरोख्त का समय नहीं दिया जा रहा है ? जनता ने पिछली सरकारों के साथ भी सब कुछ देखा था और आज भी वह नैतिकता की बातें करने वाली भाजपा की स्थिति को देख रही है जो कहने और करने में कितनी अलग है संभवतः सबके सामने आ रहा है और इसीलिए जनता को वह भी राजनीति करने में किसी मामले में पार्टी विद डिफरेंस कहीं से भी नहीं लगती है. संवैधानिक संकट की परिस्थितियों में सरकार को बचाये जाने के लिए जिस तरह के उदाहरण अभी तक सामने आये हैं आज भी उन पर अमल करने से केंद्र सरकार पता नहीं क्यों डर रही है  शायद उसे इसी बहाने से बिहार में विकास एक स्थान पर जातिगत राजनीति का अगला सबक सीखने का अच्छा अवसर मिल रहा है जिसे वह पूरी तरह से भुनाना भी चाह रही है.        
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शनिवार, 1 नवंबर 2014

धार्मिक कार्यक्रम और गीत-संगीत

                                                                              मुंबई के जुहू बीच पर चल रहे छठ पूजा के कार्यक्रम में बुधवार को जिस तरह से मुंबई पुलिस ने मशहूर गायक सोनू निगम को कुर्बान फिल्म का एक गाना गाने से रोक दिया उसका कोई औचित्य नहीं बनता है क्योंकि अधिकतर धार्मिक कार्यक्रमों के नाम पर इस तरह के लोकप्रिय गीत गाने का चलन पिछले कुछ वर्षों से देश में बढ़ता ही जा रहा है. पुलिस का स्टेज पर जाकर गाने को बीच में रोकने के लिए कहना और साथ ही यह भी कहना कि यह धार्मिक कार्यक्रम है इसमें आप भजन या देशभक्ति के गीत ही गा सकते हैं कहीं न कहीं से सोनू की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला ही है क्योंकि आयोजकों ने उनसे जिस तरह का गीत गाने के लिए कहा होगा वे उसी तरह से कार्यक्रम को चला रहे होंगें. यदि पुलिस को गाने को रोकने के लिए जनता से कुछ आपत्तियां मिली थीं तो उसे इस मसले पर आयोजकों को सूचित करने चाहिए था जिसके बाद सोनू को शालीनता के साथ भी इस तरह के गाने गाने से रोका जा सकता था.
                                                               आज पूरे देश में धार्मिक कार्यक्रमों के नाम पर जिस तरह से अराजकता का बोलबाला बढ़ता जा रहा है उससे निपटने के लिए सरकार और आयोजकों के पास कोई रास्ता नहीं बचा है क्योंकि रात भर चलने वाले माता के जगराते हों या अन्य कोई कार्यक्रम उनमें जिस तरह से फ़िल्मी गीतों की पैरोडी पर धार्मिक गीतों को गाने का चलन बढ़ता जा रहा है उस पर रोक लगाने के लिए पुलिस की नहीं बल्कि आयोजकों की मानसिकता को सुधारने की आवश्यकता है. जब आयोजकों द्वारा इस बात का प्रचार किया जाता है कि किसी कार्यक्रम में कौन बड़ा गायक आ रहा है तो इसी बात पर कार्यक्रम की सफलता टिक जाती है तो इसमें धर्म का कोई स्वरुप बचता ही कहाँ है ? पुलिस को यदि इस तरह के मामले में कुछ भी आपत्तिजनक लगता है तो उसे इसके लिए गायक के स्थान पर आयोजकों के लिए पहले से ही स्पष्ट दिशा निर्देश जारी कर देने चाहिए जिससे आयोजक और आने वाले कलाकारों को यह स्पष्ट हो सके कि स्थिति क्या है.
                                                             यह बात बिलकुल सही है कि धार्मिक आयोजनों से इस तरह के गीत संगीत के कार्यक्रम को अलग ही रखना चाहिए पर इसी बहाने से स्थानीय नेता और सामाजिक संस्थाएं अपने कार्यक्रम को सफल बना कर अगले वर्ष के लिए आयोजकों का जुगाड़ किया करती हैं. जब यह विशुद्ध आर्थिक मामला है तो इसको धर्म से जोड़ने वालों के हितों को पुलिस द्वारा जांचा जाना चाहिए जिससे आने वाले समय में इस तरह की स्थिति न उत्पन्न होने पाये. धार्मिक कार्यक्रमों की गरिमा बनाये रखने की ज़िम्मेदारी पुलिस से अधिक आयोजकों पर होती है जिससे किसी भी तरह से इंकार नहीं किया जा सकता है. कलाकार पर इसी तरह की प्रस्तुति करने का दबाव होता है जिससे वह भीड़ को बांधकर रख सके. यदि पुलिस को यह लगता है कि धार्मिक कार्यक्रम में शालीनता होनी चाहिए तो उसे आने वाले वर्षों से इसके लिए एक स्पष्ट आचार संहिता के अनुपालन की शर्त भी आयोजकों के सामने रखनी चाहिए और इस तरह के अशालीन तरीके से कार्यक्रम को रोकने से बचना भी चाहिए.   
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मंगलवार, 23 सितंबर 2014

पीएम के कार्यक्रम की शालीनता

                                                                              कर्नाटक के तुमकुर में पीएम के बुधवार के दौरे को लेकर जिस तरह से भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट दिशा निर्देश जारी किया हैं उससे यही लगता है कि कम से कम वहां की इकाई ने इस बात को गंभीरता से लिया है कि पीएम के किसी भी आधिकारिक कार्यक्रम को किसी भी तरह की राजनीति से पूरी तरह से मुक्त रखा जाये. इससे पूर्व महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखण्ड में पीएम के सरकारी कार्यक्रमों में जिस तरह से स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं ने गैर भाजपाई दलों के सीएम के भाषणों में व्यवधान डाला और उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया उसकी सभी दलों ने कड़ी आलोचना की थी पर भाजपा ने इस तरह की घटनाओं का यह कहकर बचाव किया था कि जनता अन्य लोगों को सुनना नहीं चाहती है ? लोकतंत्र को पार्टियों कि सुविधा के अनुसार हांका नहीं जा सकता है और अभी तक भाजपा लोकतंत्र को कुछ इस तरह से ही अपनी सुविधानुसार आगे बढ़ाना चाहती है.
                                                                   पीएम के रूप में कोई भी व्यक्ति देश का प्रतिनिधित्व करता है और जब कोई भी सरकारी कार्यक्रम हो तो उसमें अभी तक इस तरह की छिछली राजनीति कभी भी नहीं की जाती रही है फिर भी भाजपा ने अपनी स्थानीय इकाइयों की इस तरह की हरकतों को नज़रअंदाज़ किया उसके बाद से ही अन्य जगहों पर भी यही घटनाक्रम दोहराया गया जिसके बाद भाजपा ने इसको रोकने के स्थान पर बड़ी ही बेशर्मी से इसका बचाव किया था. देश में स्थापित लोकतंत्र है और उसका सम्मान पूरी दुनिया के लोग किया करते हैं पर इस तरह से लोकतंत्र में किसी को दबाने का काम करने वाले सत्तारूढ़ दल की मानसिकता किस स्तर तक काम करती है यह भी पता चल जाता है ? जो विपक्ष में हैं उनको भी इस तरह के हथकंडों से बचना ही चाहिए क्योंकि सीएम और पीएम राज्य व देश में लोकतंत्र के सर्वोच्च प्रतिनिधि हुआ करते हैं जिनकी अवमानना करना किसी भी स्तर पर शोभा नहीं देता है.
                                                                    वरिष्ठ भाजपा नेता आर अशोक ने जिस तरह से पार्टी कार्यकर्ताओं को इस कार्यक्रम के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश जारी किये हैं वे अपने आप में महत्वपूर्ण हैं अब यह तो बुधवार को ही पता चल पायेगा कि उस पर वास्तव में कितना अमल किया जाता है और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की मंशा किस हद तक इस तरह की अभद्रता रोकने में है ? पार्टियों के पास लोकतंत्र में अपने बात कहने का पूरा हक़ है और यदि भाजपा अपने इस उत्साही कार्यकर्ताओं का साथ देना चाहती है तो उसे भी पीएम के सरकारी कार्यक्रम के साथ ही उसी शहर में भाजपा का एक कार्यक्रम भी आयोजित करवा लेना चाहिए जिससे इस तरह की अशोभनीय स्थिति से बचा जा सके और भाजपा कार्यकर्ताओं के अहम की संतुष्टि भी हो सके. वैसे कुछ भी हो पहली बार भाजपा ने इस तरह का निर्देश जारी किया है जिससे यह पता चलता है कि संभवतः वह भी इस मसले पर गंभीर है क्योंकि यदि दूसरी पार्टियों ने भी यह रवैया अपना लिया तो पीएम के कार्यक्रम और भाजपा के लिए नयी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं.            
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मंगलवार, 9 सितंबर 2014

दिल्ली की सरकार

                                                        दिल्ली की सरकार जिस तरह से पूरी तरह से भंवर में उलझती दिखायी दे रही है उसे यही लगता है कि आने वाले समय में वहां पर कुछ भी संभव है. राजनैतिक स्तर पर भाजपा वहां सरकार बनाने की कोशिशों में जिस तरह से लगी हुई है वह उसकी अपनी प्राथमिकता है पर आम आदमी पार्टी द्वारा इस मामले को कोर्ट में घसीटे जाने के बाद से परिस्थितियां बहुत बदल गयी हैं और एलजी व् सरकार के लिए कोई निर्णय कर पाना उतना आसान नहीं रह गया है. सोमवार को जिस तरह से आप ने एक स्टिंग के माध्यम से भाजपा पर निशाना लगाया और उसके बाद से भाजपा को जवाब देते नहीं बन रहा है तो अब दिल्ली में चुनावों की संभावनाएं बलवती हो चुकी हैं. सरकार के लिए कोई भी फैसला करना केवल तब ही आसान रहने वाला था जब मामला केवल राजनैतिक मोर्चे पर ही चल रहा होता और जिस तरह से कोर्ट ने पिछले महीने में सरकार को कई बार कड़े निेदेशों और सवालों से परेशान किया है तो मोदी-शाह की टीम इसे हलके में नहीं ले सकती है.
                                                      राजनैतिक संभावनाएं और प्राथमिकताएं किस तरह से नेताओं और सामान्य लोगों को अपने निर्णयों से पलटने की तरफ धकेल देती हैं यह सभी लगातार देखते ही रहते हैं पर फरवरी में संप्रग सरकार ने जिस तरह से नयी सरकार पर दिल्ली का मामला छोड़ दिया था वह अब राजग सरकार के गले की हड्डी साबित हो रहा है. पिछले वर्ष के विधान सभा चुनावों और आम चुनावों के बाद दिल्ली की जनता में भाजपा के प्रति उतना लगाव नहीं रह गया है यह बात भाजपा की समझ में भी आ रही है और उसी डर के कारण वह अपन स्तर से दिल्ली विधान सभा भंग कर चुनाव करवाने के पक्ष में नहीं दिखाई देती है. भाजपा के पक्ष में कांग्रेस से कुछ अलग कर दिखाने का यह मौका भी हाथ से जाता रहा है क्योंकि अब उसके नेताओं को अपने ही दिल्ली पार्टी के नेताओं से स्पष्टीकरण मांगने पड़ रहे हैं फिर भी उस पर कीचड उछल ही जा रहा है. जोड़-तोड़ से सरकार बनाने की किसी भी कोशिश का खुलेआम विरोध करने वाले पार्टी खुद परदे के पीछे यही खेल खेलने में लगी हुई है.
                                        दिल्ली की जनता ने भी जिस तरह से शीला दीक्षित की सरकार देखी और उसके बाद चल रही यह उठापटक भी तो भाजपा के लिए यह स्थिति सुखद तो नहीं हो सकती है. वैसे भी कांग्रेस द्वारा नियुक्त किये गए राज्यपालों में सिर्फ शीला दीक्षित को अभयदान मिला हुआ था कि वे जब तक चाहें पद पर बनी रह सकती हैं क्योंकि भाजपा उनके दिल्ली कि राजनीति में सक्रिय होने के नुकसान को अच्छी तरह से समझती है. राजनाथ सिंह का स्पष्ट सन्देश भी शीला को दिल्ली की राजनीति के करीब लाने से नहीं रोक सका जो कि अब भाजपा के लिए और भी कठिन परिस्थितियों के समान है. अच्छा होता कि भाजपा इस बार बिना किसी देर के चुनाव करवाने की घोषणा कर देती जिससे उसके पास भी यह कहने का अवसर तो रहता कि उसने अलग तरह से काम किया है पर दिल्ली में वह दूसरी यूपी की कल्याण सरकार की तरह ही पिछले दरवाज़े से अपनी सरकार बनाने में लगी हुई है जिसका असर उसकी चुनावी संभावनाओं पर तो पड़ ही चुका है.       
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बुधवार, 3 सितंबर 2014

राजनैतिक नियुक्तियां और राजनीति

                                                                        सुप्रीम कोर्ट के पूर्व प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवम का नाम जिस तरह से केरल के राज्यपाल के रूप में सामने आ रहा है उसके बाद देश में इन पदों पर बैठने वाले लोगों को लेकर अभी तक चली आ रही परंपरा पर बहस छिड़ने की सम्भावना बलवती हो गयी है. किसी भी केंद्र सरकार को संविधान ने यह छूट दे रखी है कि वह अपनी पसंद से किसी भी राज्य में किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति कर सकती है और आज़ादी के बाद से ही वरिष्ठ नेताओं को इस तरह के पद देकर उनकी राजनैतिक सेवाओं को जीवन के अंतिम समय में कुछ सुगम किया जाता रहा है तथा कई बार प्रभावशाली नेताओ को केंद्र की राजनीति से दूर करने के लिए ही उनको इस तरह के पद देकर शांत किया जाता रहा है और लगभग सभी प्रधानमंत्रियों ने इस अघोषित नियम का अपनी सुविधानुसार अनुपालन भी किया है. देश के संविधान को लचीला बनाये जाने के पीछे मुख्य कारण यही था कि आवश्यकता पड़ने पर उसमें से ही किसी भी समस्या का कोई रास्ता निकाला जा सके.
                                                                         सत्ता से बाहर रहते हुए तथा इस वर्ष सत्ता में पहुँचने तक भाजपा इस बात की पक्षधर रही है कि किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे हुए किसी भी व्यक्ति को इस तरह से किसी भी राजनैतिक महत्त्व और उद्देश्यों को पूरा करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. पिछले वर्ष जब से भाजपा में पुरानी पीढ़ी को किनारे करने और नयी पीढी को सामने लाने की कोशिशें शुरू हुई हैं तब से खुद आज की भाजपा में कितने परिवर्तन आ चुके हैं यह सभी को दिखाई भी दे रहा है और परम्पराओं को पालने पोसने वाले नेताओं के स्थान पर हर परंपरा और कानून को पुराना बताकर बदलने की एक नयी कवायद रोज़ ही देश में दिखाई भी देने लगी है. कोई भी राजनैतिक दल किस तरह की नीतियों से चलना चाहता है यह उसके नेतृत्व पर ही निर्भर करता है और इस मामले पर अन्य लोगों को मुद्दों पर आलोचना करने का अधिकार तो है पर किसी की कार्यशैली पर कोई लगाम नहीं लगा सकता है.
                                                                अभी तक जो भाजपा देश में चल रहे सिद्धांतों और परम्पराओं को मान रही थी आज उसकी वह पीढ़ी हाशिये पर पहुँच चुकी है और अब उससे उस तरह के मानदंडों को पूरा करने की आशा करनी भी नहीं चाहिए. बेशक पुराने पड़ चुके नियमों को समाप्त किया जाना चाहिए और उनके स्थान पर आज के हिसाब से नए कानूनों को स्थान दिया जाना चाहिए पर जिन बातों पर पार्टी के विपक्ष में रहते हुए असहमति रहा करती थी आज वे सही कैसे होते जा रहे हैं ? या तो पार्टी तब गलत हुआ करती थी या फिर वह आज अपनी मनमानी करने की तरफ बढ़ना चाहती है. कांग्रेस ने जो कुछ भी परंपरा के नाम पर देश को दिया वह उस समय का है जब विपक्ष इन मुद्दों पर कोई आवाज़ नहीं उठाता था पर भाजपा लम्बे समय तक इन मुद्दों पर अपने विरोध को दिखाती रही है तो क्या देश की पहली गैर कोंग्रेसी सरकार होने के नाते उस पर परिवर्तन करने की यह ज़िम्मेदारी और भी अधिक नहीं आ जाती है पर शायद लाभ के स्थान पर परम्पराओं के अनुपालन और संभावित हानि के स्थान पर विपक्ष को संख्या बल के आधार पर नीचा दिखाने की सोच के साथ ही यह सरकार आगे बढ़ने का संकल्प भी ले चुकी है.    
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बुधवार, 27 अगस्त 2014

भाजपा संसदीय बोर्ड का पुनर्गठन

                                                                                  चुनाव लड़ने और मंत्रिमंडल के गठन के समय भाजपा के वरिष्ठों को अति सक्रिय राजनीति से अलग रखने के निर्णय की चाहे जिस भी तरह से आलोचना की जाये पर भारर्तीय परिप्रेक्ष्य में बुजुर्गों द्वारा सत्ता चलाने की परंपरा देखते हुए लगातार युवा पीएम देखने के लिए देश को अभी कई दशकों का इंतज़ार करना पड़ सकता है. किसी भी पार्टी को उसके वर्तमान नेतृत्व द्वारा किस तरह से चलाया जाता है यह पूरी तरह से उस पार्टी विशेष का अंदरूनी मामला हुआ करता है पर भारतीय राजनीति में दूसरे दलों के परिवर्तनों पर टिप्पणी करने के अनावश्यक चलन के कारण इस पर भी बयानबाज़ी की जाती है. निश्चित तौर पर भारतीय लोकतंत्र अपने आप में जनता की सक्रियता के चलते बहुत ही अच्छी स्थिति में है पर नेताओं में आज भी उतने गुण नहीं आ पाये हैं जो एक परिपक्व लोकतंत्र में होने चाहिए. परिवर्तन के चलते ही देश, नेता और राजनीति अच्छे-बुरे दौर से गुज़रा करते हैं फिर भी इसका हर स्तर पर स्वागत ही किया जाना चाहिए.
                                                  भाजपा ने जिस तरह से अपने वरिष्ठों को पहले मंत्रिमंडल और फिर पार्टी के सबसे बड़े निर्णायक समूह से अलग किया है उसे किसी भी तरह से गलत नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि लोकतंत्र में पीढ़ियों में इसी तरह से सत्ता और पार्टी में शक्तियों का हस्तांतरण हुआ करता है. वर्तमान में जसी तरह से नरेंद्र मोदी भाजपा में सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय नेता के रूप में सबके सामने आये हैं तो उनकी किसी भी बात का विरोध कर पाना किसी भी भाजपा नेता के बस के बाहर ही है. अटल बिहारी तो अवस्था के चलते अब सक्रिय जीवन से ही कई वर्षों से दूर हैं पर पार्टी के अन्य वरिष्ठों अडवाणी और जोशी को अब यह समझना ही होगा कि उनका दौर समाप्त हो गया है जिससे उनके लिए इस नयी पीढ़ी की राजनीति को स्वीकार करने में और भी अधिक मदद मिलेगी. जिन लोगों ने अपने पूरे जीवन को इस तरह से एक दर्शन के रूप में पार्टी के लिए लगा दिया हो उनके लिए इस सच को स्वीकार कर लेना ही उचित है.
                                                    अभी तक देश में कुछ ऐसी परंपरा नहीं बन पायी है कि नेता लोग सार्वजनिक जीवन से खुद ही अलग होने के लिए कोई सीमा चुन लेते पर अब जब यह प्रारम्भ हो चुका है तो इसका स्वागत भी किया जाना चाहिए. सत्ता की राजनीति में वरिष्ठों के अनुभव की भी बहुत आवश्यकता होती है और जब उसकी आवश्यकता हो तब पार्टी को अपनी उस धरोहर की अनदेखी भी नहीं करनी चाहिए. भाजपा में जिस तरह से अडवाणी के खेमे को चुनाव प्रचार शुरू होने के पहले से ही किनारे किये जाने का क्रम शुरू किया गया था उससे उनका मन आहत हुआ क्योंकि नयी पीढ़ी ने उनकी वरिष्ठता की अनदेखी की वहीं स्वयं अडवाणी ने भी इस बात को समझने का कोई प्रयास नहीं किया कि अब अटल-अडवाणी-जोशी युग भी समाप्ति की तरफ बढ़ चुका है. राजनीति में कोई भी स्थायी शत्रु या मित्र नहीं होता है आज आडवाणी खेमे के लिए पार्टी में अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए खुद को साबित करना पड़ रहा है और किसी भी लोकतंत्र में इस तरह की घटनाएँ पार्टियों को अंदर से मज़बूती नहीं प्रदान किया करती हैं.  
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शनिवार, 26 जुलाई 2014

नेता प्रतिपक्ष और सदन

                                                                आज़ादी के बाद से ही देश में सरकार के साथ विपक्ष की भूमिका को सरकारी काम काज के सञ्चालन में महत्वपूर्ण मानते हुए जिस तरह से नेता प्रतिपक्ष की अवधारणा को संविधान में समाहित किया गया था तब से लेकर आज तक इस नियम के अंतर्गत कुछ भी खास परिवर्तन नहीं हुए हैं. १९५६ में पहली बार यह नियम बनाया गया था कि लोकसभा की कुल १०% या सत्ताधारी दल के बाद सर्वाधिक सीट पाने वाले सबसे बड़े विपक्षी दल को ही सदन में नेता प्रतिपक्ष की मान्यता दी जाएगी. इस नियम के कारण ही लोकसभा में १९६९ में पहली बार नेता प्रतिपक्ष के पद पर कोई बैठने में सक्षम हो सका था. उसके बाद १९७७ में इस नियम में कुछ संशोधन कर इस पद के लिए कुछ सुविधाओं आदि की बात भी कही गयी जिससे पूरे मामले में नया मोड़ आ गया और उसके बाद से धीरे धीरे पिछले दो दशक में देश की आवश्यकताओं के अनुरूप इस नियम में संशोधन कर नेता प्रतिपक्ष को भी यह मानते हुए कि उसे देश में सरकार चला रही पार्टी के बाद सबसे अधिक मत मिले हैं उसे भी विभिन्न निर्णयों में शामिल करने कि शुरुवात की गयी.
                                                              देश में लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए जिस तरह से लोकसभाध्यक्ष के पास केवल सीटों के माध्यम से विपक्ष के नेता का चुनाव करने की छूट मिली हुई है उससे भी यह नियम वर्तमान समय में और भी पेचीदा हो गया है. अभी तक जिस तरह से मतों के प्रतिशत के स्थान पर केवल सीटों को ही प्राथमिकता दे गयी थी तो उस समय आज की स्थिति की कल्पना भी नहीं कि गयी थी. पहले नेता प्रतिपक्ष केवल कहने के लिए ही हुआ करते थे पर जब से देश में महत्वपूर्ण नियुक्तियों में उसकी भूमिका को बहुत बढ़ा दिया गया है तो इस बार उस स्थिति से कैसे निपटा जायेगा यह तो समय ही बताएगा पर सरकार की तरफ से यह स्पष्ट किया जा चुका है कि जब जनता ही नहीं चाहती तो किसी को वह पद क्यों दे ? राजनैतिक और कानूनी स्तर पर यह बात बिलकुल सही बैठती है पर जब संसदीय परम्पराओं की बात की जाये तो विपक्ष को उचित स्थान न दिया जाना किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है.
                                                              इस मुद्दे पर आज के नियमों के अंतर्गत कोई भी निर्णय लेना लोकसभाध्यक्ष का काम होता है और नियम सारा कुछ उनके विवेक पर ही छोड़े जाने की बात करते हैं. यदि उन्हें लगता है कि इस पद पर किसी को होना चाहिए तो वे इसके लिए स्वतंत्र हैं पर क्या कोई पीएम की बात से आगे जाकर निर्णय ले सकता है यह सोचने की बात है. अब इस मसले को यहीं पर बंद मान लिया जाना चाहिए क्योंकि जब तक सरकार इस नियम में कोई संशोधन नहीं करती है तब तक इस पर केवल बातें ही की जा सकती हैं. अब यह कानूनी रूप से देखे का विषय होगा कि सरकार के इस कदम के खिलाफ कोई कानूनी प्रक्रिया कोर्ट में टिक भी सकती है या फिर सरकार अपने मन से अब बिना प्रतिपक्ष के नेता के ही सभी महत्वपूर्ण नियुक्तियां करने की तरफ बढ़ जाती है ? कांग्रेस को भी चाहिए कि इस मुद्दे पर अब वह कुछ भी न करते हुए सरकार के कार्यों का गुणदोष के अनुसार विवेचन करती हुई विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करने की तरफ सोचना शुरू करे.        
    
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शनिवार, 14 जून 2014

सरकारी बंगले और नैतिकता

                                           केंद्रीय संसदीय कार्य और शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने जिस तरह से पूर्ववर्ती संप्रग सरकार में मंत्री रहे नेताओं से उनके सरकारी आवास खाली करने के लिए कहा है उससे यही लगता है कि आज भी लोकतंत्र में नेताओं को सरकारी सुविधाएँ भोगने में असीम सुख मिलता है. शहरी विकास मंत्रालय के माध्यम से ही दिल्ली में केंद्र सरकार के मंत्रियों को उनके पद और वरिष्ठता के अनुसार आवासों का आवंटन किया जाता है एक समय परिस्थिति में सरकार बदलने पर और नयी लोकसभा के गठन पर निवर्तमान मंत्रियों और सांसदों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपबे आवास को एक महीने की समय सीमा में छोड़ देंगें पर आज यह एक परंपरा सी बनती दिखाई दे रही है कि सांसद और मंत्री आसानी से अपने ये आवास खाली करने को राज़ी ही नहीं होते हैं जिससे कई बार मंत्रालय और सरकार के सामने असहज स्थिति उत्पन्न हो जाती है.
                                          जब जनता ने किसी व्यक्ति या सरकार को अपने जनादेश से सत्ता से हटा दिया है तो यह उनका कर्तव्य बनता है कि वे हर तरह की सरकारी सुविधाएँ स्वतः ही छोड़ दें और अपने क्षेत्र के नए प्रतिनिधियों के लिए मंत्रालय को आवश्यक उपाय और प्रबंध करने के अवसर प्रदान करें पर यह अभी तक कोई स्थापित परंपरा नहीं बन पायी है जबकि इस बार निवर्तमान पीएम मनमोहन सिंह ने परिणाम आने के साथ ही अपने नए बंगले में जाने की तैयारियां बहुत पहले से ही शुरू कर दी थी क्योंकि उनको यह पता था कि अब वे इस पद पर नहीं रहने वाले हैं. उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों के लिए भी उनके आचरण का अनुकरण करना अच्छा होता क्योंकि जब तक सरकार में बैठे हुए मंत्री ही अच्छे व्यवहार का प्रदर्शन नहीं कर पायेंगें तब तक आम सांसदों से ऐसे प्रदर्शन की आशा कैसे की जा सकती है.
                                          सत्ता बदलने के साथ ही पूर्व मंत्रियों और सांसदों को उनके आवास खाली कराने की ज़िम्मेदारी केवल शहरी विकास मंत्रालय की ही नहीं होनी चाहिए क्योंकि ये किसी न किसी दल के सदस्य भी तो होते ही हैं तो इस परिस्थिति में सभी दलों को अपने इन सांसदों को खुद ही इन आवासों को खाली करने के लिए बोलना चाहिए. यह भी सही है मंत्रालय द्वारा इन पूर्व मंत्रियों और सांसदों को जो एक महीने की समय सीमा भी दी जाती है उसकी भी कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि चुनाव के दौरान ही सभी को इस बात के लिए तैयार कर देना चाहिए कि हारने की स्थिति में उन्हें एक हफ्ते में ही यह सुविधाएँ छोड़नी होंगीं. इस समस्या से निपटने के लिए चुनाव के दौरान ही ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि नयी संसद की बैठक से पहले ही सभी को आवास मिल सकें और पूर्व मंत्री और संसद नए आने वाले लोगों के लिए खुद ही मार्ग प्रशस्त कर सकें.      
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गुरुवार, 12 जून 2014

नेता प्रतिपक्ष और सदन

                                                         १९७७ और १९९८ के नेता प्रतिपक्ष के चयन से सम्बंधित कानूनों के निर्धारण के बाद देश के संसदीय इतिहास में पहली बार सबसे बड़े विपक्षी दल को इतनी कम सीटें मिली हैं कि उनको स्वाभाविक रूप से नेता प्रतिपक्ष का पद नहीं मिलने वाला है तो सरकार के सामने कितने विकल्प शेष रह जाते हैं जिन पर अमल करते हुए वो संसदीय परंपरा में नेता प्रतिपक्ष को चुने बिना किये जाने वाले विभिन्न महत्वपूर्ण चयनों को किस तरह से पूरा कर पायेगी. आज जो लोग आज़ादी के बाद देश में नेता प्रतिपक्ष न होने की बातें कर रहे हैं उन्हें शायद यह नहीं पता है कि जब नेहरू और इंदिरा का समय था तो उस समय विपक्षी दल के नेता को महत्वपूर्ण नियुक्तियों में इस तरह से शामिल भी नहीं किया जाता था तो किसी भी तरह के संकट की बात सोची ही नहीं जा सकती थी पर आज जिस तरह से बाद में किये गए संशोधनों के माध्यम से नेता प्रतिपक्ष को भी देश की महत्वपूर्ण नियुक्तियों में शामिल कर लिया गया है तो उसके बिना ये काम कैसे निपटाये जायेंगें यह सरकार के लिए महत्वपूर्ण समस्या बन चुका है ?
                                                                 देश में लोकतंत्र को हर परिस्थिति में मज़बूत किया जाये इसको देखते हुए ही लोकसभा उपाध्यक्ष पद और सबसे महत्वपूर्ण लोक लेखा समिति की अध्यक्षता विपक्षी दल को सौंपे जाने की परंपरा बनायीं गयी थी जिसे कमोबेश सभी दलों ने आसानी से अभी तक निभाया भी है पर इस बार जिस तरह से दस प्रतिशत सीटों का मुद्दा नेता प्रतिपक्ष चुनने की राह में रोड़ा बन रहा है तो क्या इसमें सीटों के साथ मतों के अखिल भारतीय स्तर पर प्राप्त मतों के प्रतिशत की व्यवस्था भी नहीं की जानी चाहिए ? यह संकट चूंकि पहली बार सामने आया है तो इस पर सरकार को ही लोकसभाध्यक्ष, संसदीय कार्य मंत्री और संसदीय मामलों के विशेषज्ञों की सलाह से काम करना होगा पर अंतिम फैसला संविधान में कहने के लिए लोकसभाध्यक्ष पर ही छोड़ा गया है. इस मामले पर जितनी राजनीति की जा रही है उसकी भी कोई आवश्यकता नहीं है और सरकार को अब बजट सत्र के पहले ही इस मसले को सुलझा लेने की तरफ सोचना ही होगा. यदि सरकार इन नियमों का हवाला देकर नेता प्रतिपक्ष पर किसी को नहीं लाती है तो उसे नियुक्तियों में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका को नियंत्रित करने के लिए संशोधन पेश कर राजनीति को विराम देने के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट कर देनी चाहिए.
                                                               सरकार की मंशा इस पद पर जयललिता और ममता के गठजोड़ के उम्मीदवार को बैठाने की है पर ये दोनों ही नेता अपनी पार्टी में दूसरे सत्ता केंद्र को रोकने के लिए अपने अलावा किसी और को महत्वपूर्ण पद दिए जाने के बहुत खिलाफ रहा करते हैं तो इस परिस्थिति में यदि ये सरकार की मंशा के अनुरूप साझा उम्मीदवार सामने नहीं लाती हैं तो यह नेता प्रतिपक्ष का पद सरकार कांग्रेस को दे सकती है और लोकसभा उपाध्यक्ष के साथ लोक लेखा समिति की अध्यक्षता इन दलों को सौंपी जा सकती है. आने वाले समय में संसदीय गरिमा को देखते हुए सरकार को अविलम्ब इन महत्वपूर्ण पदों के लिए अपनी मंशा ज़ाहिर कर देनी चाहिए और इन दलों के द्वारा नामित सदस्यों को समितियों में नियुक्त कर देना चाहिए. वैसे इन क्षेत्रीय दलों की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर संकुचित सोच आने वाले समय में सरकार के निर्णयों में अड़ंगा लगाने का काम भी कर सकती है. उस खतरे को देखते हुए पीएम और भाजपा लोक लेखा समिति और लोकसभा उपाध्यक्ष का पद इन दलों को इतनी सहजता से केवल कांग्रेस को किनारे करने की नीति के कारण देकर अपनी राजनैतिक समस्याओं को भविष्य में बढ़ाने का काम करने वाले हैं या नहीं यह तो समय ही बताएगा पर इतने कमज़ोर विपक्ष ने इस बार सरकार के सामने यह नयी समस्या खड़ी कर ही दी है.
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सोमवार, 5 मई 2014

बाल विवाह और कानून

                                                                हाल ही में बाल विवाह पर अंकुश लगाये जाने की कोशिशों के तहत छत्तीसगढ़ सरकार ने निमंत्रण पत्र पर वर-वधु की आयु छपवाने को आवश्यक बनाने के लिए एक आदेश जारी किया है जिसके बाद इस आदिवासी बहुल राज्य में नए तरह की बहस छिड़ गयी है. आज़ादी के बहुत पहले से ही राजा राम मोहन राय ने जिस तरह से हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों में से एक बाल विवाह को रोकने के सम्बन्ध में प्रयास शुरू करते हुए समाज को जागरूक करने का काम शुरू किया था उसके बाद आज भी सरकारी प्रयासों के बाद भी देश से इस कुरीति को समाप्त करने में सफलता मिलती नहीं दिख रही है और ऐसा भी नहीं है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस दिशा में कोई प्रयास नहीं करती हैं पर संभवतः उनके ये प्रयास जिस स्तर पर होने चाहिए उनमें ही कहीं बड़ी कमी है. देश में हर मसले को जिस तरह से राजनीति से जोड़कर देखने में लोग माहिर हैं उसमें कोई भी अच्छा प्रयास आज तक सफल नहीं हो पाया है इसलिए इसे समाज सुधार के साथ सामाजिक बुराई के रूप में भी देखने की आवश्यकता है.
                                                       इस तरह एक प्रयास को जहाँ आम लोग एक बिना बात का झंझट मान रहे हैं वहीं कार्ड छापने वाले लोगों का कहना है कि इससे उनके लिए मुसीबतें और भी बढ़ने वाली हैं क्योंकि कार्ड छापने वाले पर ही पुलिस और प्रशासन अपना दबाव बनाने का काम करने वाले हैं. इस स्थान पर यह विचार किया जाना चाहिए कि आखिर किस तरह के सामाजिक आर्थिक या अन्य तरह के प्रोत्साहन देकर बाल विवाह को रोका जा सकता है और विशेषकर आदिवासी महिलाओं को कम उम्र में शादी होने के कारण उन कष्टों को याद करने के लिए कहा जाना चाहिए जिनसे वे खुद ही गुज़री हैं और उनसे यह सवाल भी पूछे जाने चाहिए कि क्या वे अपनी बच्चियों को भी वही सारे कष्ट देना चाहती हैं ? समाज में कमी बताकर सुधार नहीं किया जा सकता है पर जिन लोगों ने उन कमियों के कारण विपरीत परिस्थितियों का सामना किया है यदि उनको इस तरह के कार्यक्रमों में शामिल कर लिया जाये तो सुधार की गुंजाईश बढ़ जाती है.
                                                     सरकारों को भी दंडात्मक कार्यवाही करने के स्थान पर प्रोत्साहन की तरफ भी बढ़ना चाहिए क्योंकि कानून कड़े कर देने से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और आम लोगों की समस्याएं बढ़ जाया करती हैं. आदिवासी या अन्य समूहों के साथ समाज के सभी वर्गों की लड़कियों के विवाह को १८ वर्ष तक रोकने पर उनके परिवार को विशेष सुविधाएँ दी जानी चाहिए और उन लड़कियों की शादी के लिए सरकार को एक अलग से फंड भी बनाना चाहिए जिसके माध्यम से उनकी शादी के समय एक मुश्त धनराशि उनके परिवारों को दी जा सके. इससे जहाँ धन की कमी के कारण होने वाले बेमेल और बाल विवाहों को रोका जा सकेगा वहीं समाज में इससे प्रभावित होने वाले लोगों के जीवन स्तर में आने वाले सुधार को एक पैमाने के रूप में इस्तेमाल भी किया जा सकेगा. राज्य सरकारें इन लड़कियों के लिए १८ वर्ष की उम्र तक हर तरह के खर्चों की व्यवस्था भी कर सकती हैं जिनमें नि:शुल्क शिक्षा और प्रोत्साहन राशि भी हो सकती है. अब सरकारों को मानवीय चेहरे के साथ समाज सुधार की तरफ बढ़ने की आवश्यकता है क्योंकि कठोर नियमों से भी इसे रोका नहीं जा सकता है.   
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रविवार, 20 अप्रैल 2014

चुनाव आचार संहिता और सरकार

                                                     देश में आम चुनाव के चलते जिस तरह से सभी सरकारी काम एकदम से ठप से पड़ जाते हैं और कई बार महत्वपूर्ण प्रशासनिक कामों के करने में भी सरकारों को दिक्कत का सामना करना पड़ता है उस स्थिति में आखिर देश की व्यवस्था कैसे चलायी जाए यह प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है. नौसेना में हादसों के बाद जिस तरह से प्रमुख के इस्तीफे के बाद से वहां पर कोई तैनाती नहीं हुई थी उस पर नियुक्ति के बाद और लोकपाल की नियुक्ति को लेकर जिस तरह से भाजपा ने चुनाव आयोग का दरवाज़ा खटखटाया है उस स्थिति पर विचार करने की आवश्यकता है। देश में सामान्य प्रशासनिक काम चलते ही रहने चाहिए इस बात से सभी राजनैतिक दल सहमत तो हैं पर आवश्यकता पड़ने पर वे इस बात को भूल जाते हैं कि इतने महत्वपूर्ण पदों को खाली नहीं रखा जा सकता है. लोकपाल पर तो पहली बार ही काम हो रहा है पर यदि नौसेना प्रमुख की नियुक्ति को देखा जाये तो आने वाले समय में कुछ ठोस भी सामने आ सकता है और भविष्य के लिए एक मार्ग निर्धारित किया जा सकता है।
                                                                       सेना और सुरक्षा बलों से जुड़े हुए महत्वपूर्ण पदों के लिए अब देश में एक नीति बनाने की आवश्यकता है क्योंकि किसी भी परिस्थिति में इन पदों पर नियुक्तियां किया जाना देश के सैनिकों के मनोबल को बनाये रखने के लिए आवश्यक भी होता है।  अच्छा ही कि पुरानी बातों को भूलकर अब कुछ ऐसा भी किया जाये जिससे इस तरह की परिस्थिति में पहले से ही निर्धारित पैनल में से अधिकारियों को चुनने के लिए व्यवस्था बन सके और चुनावी माहौल में महत्वपूर्ण नियुक्ति को करने से पहले सरकार नेता प्रतिपक्ष को बुलाकर उनकी भी सहमति लेकर ही आएगे बढ़ने की कोशिश करे। यह लोकतंत्र की आवश्यक परिणीति होनी चाहिए पर अपने काम को निकालने में माहिर नेता चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों सरकार को घेरने से पीछे नहीं हटते हैं और अनावश्यक राजनीति को आगे कर महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी देश के परस्पर विरोधी रुख को ही दुनिया के सामने स्पष्ट किया करते हैं।  सरकार पर भाजपा यह आरोप लगाती है कि वह महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति तक नहीं कर पाती है और जब कोई नियुक्ति की जाती है तो उसका इस तरह से विरोध किया जान किस तरह से उचित कहा जा सकता है ?
                                                                        लोकपाल को नौसेना प्रमुख की नियुक्ति के समकक्ष नहीं रखा जा सकता है क्योंकि देश में पहली बार लोकपाल की नियुक्ति की जा रही है फिर भी जिस तरह से इसके साथ ही नौसेना प्रमुख की नियुक्ति को भी जोड़ा गया वह भाजपा की मंशा को ही दिखाता है क्योंकि एक तरफ वह सरकार पर निर्णय लेने में कमज़ोर होने का आरोप लगाती रही है वहीं दूसरी तरफ सेना से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे पर इस तरह की राजनीति करने से भी नहीं चूकती है ? सेना की नियुक्ति के मसले पर सरकार को भी अपनी सीमायें पता हैं इसलिए उसने केवल वरिष्ठता में दूसरे स्थान पर आने वाले धवन को नियुक्त कर दिया है क्योंकि उनसे वरिष्ठ व्यक्ति की कमान में ही सबसे अधिक दुर्घटनाएं नौसेना में हुई हैं इसलिए उनके नाम पर विचार भी नहीं किया गया है। इस तरह के मसलों पर सरकार को  अपनी मंशा साफ़ रखते हुए ही यह सब करना चाहिए और विपक्ष के नेता को भी विश्वास में लेना चाहिए था पर भाजपा में जिस तरह के मतभेद चल रहे हैं उनको देखते हुए यदि सरकार सुषमा स्वराज से बात करती भी तो क्या मोदी खेमा इसे आसानी से हज़म कर पाता संभवतः इसी मसले से बचने के लिए सरकार ने अपने आप ही फैसला कर लिया हो ? राजनीति को आवश्यक प्रशासनिक कामों से चुनाव के समय भी दूर रखने की कोशिश सभी दलों को करनी चाहिए जिससे देश की रफ़्तार पर कोई असर न पड़ने पाये।    
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गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मोदी - मुसलमान और उर्दू

                                            देश में पता नहीं लोगों की सोच को क्या होता जा रहा है क्योंकि नरेंन्द्र मोदी की उर्दू वेबसाइट के फ़िल्म जगत कि मशहूर हस्ती सलीम खान द्वारा लोकार्पण किये जाने के बाद जिस तरह से बयानबाज़ी शुरू की गयी है उसका कोई मतलब नहीं बनता है. आज भारतीय राजनीति में धूमकेतु की तरह उभर रहे देश के सबसे विवादास्पद नेता नरेंद्र मोदी यदि लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए उर्दू भाषा का सहारा ले रहे हैं तो इसका सभी तरफ से स्वागत ही होना चाहिए क्योंकि इससे उनके उन विरोधियों को भी उनके बारे में अधिक जानने को मिलेगा जो अभी तक सबके सामने नहीं आ पाया है. देश का संविधान सभी भाषाओँ की प्रगति के लिए निरंतर ही प्रयास किये जाने की बात करता है पर इस तरह से यदि देश में अधिकांश उर्दू शिक्षित मुसलमानों की आबादी तक अपनी बात पहुँचाने के लिए मोदी द्वारा यह प्रयास किया जा रहा है तो इसके विरोध का कोई मतलब नहीं बनता है क्योंकि जिन लोगों को यह लगता है की उर्दू की इस साइट से मोदी को वोट मिल जायेंगें वे भ्रम में जी रहे हैं.
                                           देश के नेताओं की पहुँच यदि देश की भाषाओँ में ही आम लोगों तक होती रहे तो उससे अच्छा कुछ भी नहीं हो सकता है क्योंकि जिन लोगों में आपसी विश्वास की कमी है वे अपनी बात यदि एक दूसरे की भाषा में करने में सक्षम हो जाएँ तो देश की बहुत बड़ी समस्या को भी आसानी से सुलझाया जा सकता है. आज भी जिस तरह से भाषा के नाम पर विवाद किये जाते हैं उनका कोई मतलब नहीं होता है पर कुछ लोगों को मोदी के साथ सलीम और सलमान खान का इस तरह से जुड़ना भी रास नहीं आ रहा है ? इस मुद्दे पर सलीम खान ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस साइट ले लोकार्पण को उनका भाजपा को समर्थन न समझा जाये वे कांग्रेस के वोटर रहे हैं और अच्छा प्रत्याशी होने पर वे उसके लिए फिर से वोट भी करेंगें, वे उर्दू की तरक्की के लिए सदैव प्रयासरत रहे हैं और मोदी की इस साइट के लोकार्पण का केवल उनका यदि मक़सद था फिर भी कुछ लोगों को यह सलीम खान का गलत कदम ही लग रहा है. देश का हर नागरिक अपने अनुसार किसी भी धर्म भाषा और राजनैतिक विचारधारा से जुड़ने को स्वतंत्र है और यदि सलीम या सलमान खान को मोदी के गुणों से लगाव या अपने सम्बन्ध हैं तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है ?
                                          मोदी एक तरफ जितने विवादित रहे हैं दूसरी तरफ उतने ही लोकप्रिय भी हैं पर एक बात तो तय ही है कि उन्होंने यह साइट कुछ चुनावी लाभ के लिए ही जारी की है क्योंकि वे जितने वर्षों से सत्ता में हैं तो यह काम वे पहले भी कर सकते थे पर जिस तरह से उन्होंने इसका समय चुना है तो विरोधियों को उन पर हमला करने का अवसर भी मिल गया है. गौर से यदि देखा जाये तो मोदी के काम करने की शैली सदैव से ही ऐसी रही है कि वे सही काम भी ऐसे समय के साथ करते हैं जिसमें कुछ अनावश्यक और निरर्थक विवाद भी हो जिससे उनके बारे में चर्चा होती रहे. ऐसे में यदि वे इस साइट के उद्घाटन के लिए सलीम खान का चुनाव करते हैं तो इसमें कोई नयी बात नहीं है. फ़िल्म उद्योग द्वारा भी इस बारे में जिस तरह से प्रतिक्रियां दिखाई जा रही हैं वे भी अनावश्यक ही हैं क्योंकि भले ही किसी भी मंशा के साथ यह साइट शुरू की गयी है उससे मोदी के रणनीतिकारों में भी इस भाषा की महत्ता समझ में आने वाली बात ही अधिक परिलक्षित होती है उर्दू को इस तरह से महत्व दिए जाने से एक बार फिर से भारत की सामान्य बोलचाल की भाषाएँ अपनी जीवंतता को सिद्ध करने की तरफ ही अग्रसर होती लगती हैं.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...