मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 28 February 2015

राष्ट्रपति अभिभाषण और सांसद

                                        देश में सरकार और सांसद हमेशा ही इस बात का आलाप गाते रहते हैं कि संसद सर्वोपरि है पर कल जिस तरह से राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के बाद उसे पारित किये जाने से पहले सदन में केवल २६८ सांसद ही मौजूद थे वह इन नेताओं के खोखले बयानों की बातों को ही दोहराता लगता है. सत्तापक्ष की तरफ से जहाँ केवल २०३ और विपक्ष की तरफ से ६५ सांसद  ही सदन में बैठे हुए थे तो सदन के प्रति इन सभी सांसदों और पार्टियों की उपेक्षा भरी भूमिका के बारे में आसानी से समझा जा सकता है. चुनावों के समय जहाँ सभी नेता भारतीय लोकतंत्र के तराने छेड़ते नज़र आते हैं वहीं जब देश के लिए सार्थक और ठोस बहस करने वाले समय में वे सारा कुछ अपने कुछ बड़े नामों पर ही छोड़कर कहीं और गायब हो जाते हैं क्या अब संसद को खुद ही अपने में कुछ ऐसा नहीं करना चाहिए कि जो भी सांसद बिना पूर्व सूचना के सदन की बैठकों के समय गायब रहें उनके उस माह के वेतन भत्तों को पूरी तरह से रोक लिया जाना चाहिए जिससे सदन की गरिमा में कुछ बढ़ोत्तरी दबाव के कारण ही हो सके.
                           चर्चा पर उत्तर देते समय खद पीएम ने जिस तरह से मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना के बारे में खिल्ली उड़ाई उससे यह भी साबित होता है कि वे अपने भाषण को मसालेदार बनाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो सकते हैं क्योंकि जब वे मनरेगा को कांग्रेस की विफलता बता रहे थे तो वह कहीं न कहीं से पूरे देश की ही विफलता थी और जिस तरह से पीएम ने देश के आर्थिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदलने वाली इस योजना का उपहास किया उसे किस तरह की सकारात्मक राजनीति कहा जा सकता है ? एक तरफ वे विपक्ष को देश के विकास के लिए साथ आने की नसीहतें देते दिखाई देते हैं तो वहीं दूसरी तरफ वे देश के उन गरीबों के लिए परिवर्तनकारी योजना का बड़े पैमाने पर उपहास करते हैं क्या सदन में खुद पीएम के इस तरह का आचरण सरकार के अन्य मंत्रियों को इस तरह की बयानबाज़ी के लिए प्रेरित नहीं करने वाला साबित होगा और सदन की कार्यवाही में लगातार व्यवधान का कारण भी नहीं बनेगा ? पीएम की तरफ से इस तरह के बयानों से सदन में परहेज़ किया जाना चाहिए क्योंकि सदन की चर्चा गंभीर रखने की ज़िम्मेदारी खुद सरकार की अधिक होती है.
                 देश की संसद में प्रस्ताव पारित होने के बाद जिन लोगों ने भी सदन की कार्यवाही देखी होगी तो उनको देश के साथ किया जा रहा मज़ाक अच्छी तरह से समझ में आ गया होगा क्योंकि इसके तुरंत बाद ही जिस तरह से सदस्यों के संशोधनों को पटल पर रखने की कोशिशें की जा रही थीं वे किस तरह से लोकतंत्र की मर्यादा की रक्षा कर रही थीं और क्या सदन में कोरम पूरा था ? हद तो तब हो गयी कि जब मीनाक्षी लेखी के प्रस्ताव का खुद उन्होंने भी समर्थन नहीं किया तो पीठासीन अधिकारी को कहना पड़ा कि अरे कम से कम आप तो अपने प्रस्ताव का समर्थन कीजिये यदि सदन में इस तरह से काम होता है तो सदन की कार्यवाही का सीधा प्रसारण बंद कर चाहे जो कुछ भी किया जाये पर देश के सामने इस सर्वोच्च सदन में संसदीय परम्पराओं की इस तरह से खिल्ली तो न उड़ाई जाये. क्या नए सांसदों को सरकार या लोकसभाध्यक्ष की तरफ से यह स्पष्ट निर्देश नहीं दिया जाना चाहिए कि उनके लिए ९०%  से अधिक उपस्थिति अनिवार्य है क्योंकि ये वही लोग हैं जिन्हें आने वाले समय में सरकार या विपक्ष में बैठकर गंभीर चर्चाओं के माध्यम से देश के लिए कुछ करना है. आशा है कि सदन में सभी दलों के वरिष्ठ संसद इस तरह की किसी बाध्यता के बारे में भी विचार करेंगें जिससे सदन में बैठने को लेकर सांसदों को और भी अधिक प्रेरित करते हुए आगे बढ़ा जा सके.       
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