मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मुस्लिम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मुस्लिम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 21 मई 2016

मायावती और सोशल इंजीनियरिंग

                                                             यूपी विधान सभा के २००७ के चुनावों में गुपचुप तरीके से सतीश चन्द्र मिश्र जैसे सहयोगियों के भरोसे जिस सोशल इंजीनियरिंग के सहारे मायावती ने लम्बे अर्से बाद यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी तो पिछले चुनावों में हार और २०१७ के चुनावों की तैयारियों में उनकी तरफ से इसे एक बार फिर से आज़माने की कोशिश की जा रही है पर इस बार इसमें सबसे बड़ा खतरा भाजपा की तरफ से दिखाई दे रहा है. भाजपा ने जिस तरह से लोकसभा चुनावों में परंपरागत रूप से बसपा के वोटबैंक रहे पिछड़े समूहों में मज़बूत सेंधमारी की थी उससे मायावती आज भी चिंतित हैं क्योंकि समाज के दूसरे वर्गों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने और विजय पाने की उनकी मंशा तभी सफल हो सकती है जब उनका अपना वोटबैंक सुरक्षित रहे वर्ना विधान सभा चुनाव भी कहीं न कहीं से उसके लिए आशानुरूप परिणाम देने वाले नहीं होंगे. इस बात का एहसास बसपा और मायावती को भी है पर इससे पर पाने के लिए अभी तक कोई ठोस उपाय सामने नहीं आ पा रहा है. यूपी में कांग्रेस जिस तरह से लड़ाई में होती ही नहीं है तो मुस्लिम वोटों को सहेजने का काम करने के लिए इस बार मायावती विशेष प्रयास करती हुई दिखाई दे रही हैं जिससे किसी भी परिस्थिति में उनके अपने वोटबैंक में कुछ बिखराव होने के बाद भी बैलेंस बनाए रखने में परेशानी न हो.
                                      बसपा के लिए दलित-मुस्लिम गठजोड़ शुरू से ही बहुत अच्छा साबित होता रहा है और यह पूरे प्रदेश में काम भी करता है इसलिए बसपा के लिए यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है कि जहाँ मुस्लिम २०%  या उससे अधिक हैं वहां पर मज़बूत मुस्लिम प्रत्याशी बसपा के लिए बहुत अच्छा कर सकता है और इस बार ८० वर्तमान विधायकों को छोड़कर जिस तरह से इस समीकरण के माध्यम से पूरे प्रदेश को साधने की कोशिश की जा रही है उस परिस्थिति में बसपा अच्छा प्रदर्शन भी कर सकती है. भाजपा की तरफ से केशव मौर्या को प्रदेश की बागडोर सौंपे जाने के बाद यह भी संभव है कि वह बसपा के वोटबैंक में सेंध लगा सके और कुछ स्थानों पर बसपा के इन प्रयासों पर पानी भी फेर सके. दलित मुस्लिम का साथ आना बसपा के लिए जितना लाभदायक हो सकता है सही तरह से उसके साथ न्याय न किये जाने की स्थिति में वह पूरी तरह से बैकफायर भी कर सकता है क्योंकि अधिक स्थानों पर मुस्लिम चेहरे होने से भाजपा दलितों में इस आधार पर भी अपनी बात पहुँचाने का काम कर सकती है कि इन चुनावों में दलितों की हितैषी पार्टी किस तरह से उनके हितों का ध्यान नहीं रख रही है जबकि भाजपा इस बार आरक्षित वर्ग से अधिक लोगों को टिकट देने की तरफ जाती हुई दिख रही है.
                                     मायावती के पक्ष में जो बात सबसे अनुकूल है वह यही कि उनके वोटबैंक को उनके सीएम बनने की राह में कोई भी रोक नहीं सकता है क्योंकि दिल्ली का चुनाव सभी को पता था कि मायावती उसकी लड़ाई में भी नहीं है इसलिए उस समय कांग्रेस को रोकने के लिए समाज के हर वर्ग ने भाजपा के पक्ष में वोट दिए थे पर विधान सभा चुनाव में खुद मायावती के यूपी के सीएम बनने के सपने का जुड़ाव भी होता है जिससे उनका काम कुछ हद तक आसान हो जाता है. प्रदेश में मुस्लिम वोट निर्णायक साबित हो सकता हैं पर जिस तरह से उनके बड़े स्तर पर एक बार फिर से बिखराव के संकेत मिल रहे हैं तो उस परिस्थिति में उनका ज़मीन पर कितना असर दिखाई देगा यह तो समय ही बता पाएगा. ओवैसी के यूपी आने से भाजपा को सबसे बड़ा लाभ मिल सकता है क्योंकि प्रदेश के मुस्लिम कांग्रेस, सपा और बसपा की राजनीति देख भी चुके हैं और ओवैसी उनके लिए नया चेहरा भी हैं. यदि मुस्लिम वोट एकमुश्त किसी पार्टी को जाने के स्थान पर टैक्टिकल वोटिंग को अपनाता है तो बसपा का काम भले ही कुछ अधूरा रह जाये पर भाजपा को प्रदेश में रोकने का काम करने में वह सफल भी हो सकता है. फिलहाल तो मायावती के पास मुस्लिम वोटर जाने को तैयार है पर उसका कितना विपरीत असर बसपा की संभावनाओं पर पड़ सकता है यह बता पाना और समझ पाना अभी थोड़ा मुश्किल काम लग रहा है. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

समाजवादी पेंशन- आरक्षण और राजनीति

                                                                 लगता है कि यूपी में अखिलेश यादव के नेतृत्व में चल रही समाजवादी सरकार का कानूनी विभाग सही ढंग से काम नहीं कर रहा है जिसके चलते सरकार को कई बार हाई कोर्ट समेत अन्य स्थानों पर कानूनी झिड़की सुनने को मिलती रहती है. सामान्यतया नियम यह है कि किसी भी नए अध्यादेश या कानून को बनाते समय उसके सभी कानूनी पहलुओं की जांच की जाती है और कानून को अंतिम रूप देने से पहले इन पर अच्छी तरह से विचार कर लिया जाता है. पहले देश में ऐसी स्थिति नहीं थी और सरकारें जो कुछ भी करती थीं उनका कोई विरोध नहीं किया जाता था. आज वैसी स्थिति नहीं रह गयी है और शिक्षा के साथ सामाजिक और कानूनी जागरूकता बढ़ने के कारण आज सरकारों के बड़े बड़े फैसलों को भी कानूनी समस्याओं का सामना करना पड़ जाता है जिससे सरकार के उन प्रयासों में विलम्ब तो होता ही है साथ ही उनकी मंशा भी अधूरी रह जाती है.
                                                             ताज़ा प्रकरण में जिस तरह से लखनऊ स्थित एक एनजीओ हिन्दू फ्रंट फॉर जस्टिस ने ७ फरवरी २०१४ को जारी शासनादेश को चुनौती दी है उससे यह मामला अनावश्यक रूप से धार्मिक आधार पर बंट गया है. इस अध्यादेश में सरकार ने समाजवादी पेंशन के नाम पर शुरू की गयी योजना में अल्पसंख्यकों को २५% आरक्षण दिए जाने का प्रावधान किया गया है और इस आरक्षण के पेंच के कारण ही यह योजना आज विवादों के घेरे में आ चुकी है. कोर्ट ने इस मुद्दे पर सरकार से चार हफ्ते में जवाब भी माँगा है जिस पर सरकार को अपने पक्ष को रखने में मदद मिलने वाली है. सरकार को पूरे समाज या उसके किसी भी पिछड़े या वंचित वर्ग के लिए इस तरह की योजनाएं चलाने का अधिकार संविधान द्वारा दिया गया है पर आज इस प्रावधान का अधिकतर राज्यों में राज्य सरकारें मनमाने तरीके से दुरूपयोग करने में लगी रहती हैं जिससे उन वंचितों को लाभ मिलने में और भी अधिक देर होती है.
                                 कोर्ट ने आरक्षण के मुद्दे पर केवल संवैधानिक प्रावधानों के आरक्षण सम्बन्धी उल्लंघन पर ही जवाब माँगा है क्योंकि सरकार के सामान्य कार्यों में कोई भी कोर्ट अनावश्यक दखल नहीं दिया करती है पर जब कानूनी तौर पर संवैधानिक पेंच फँस जाय करता है तो उसे सरकार से जवाब मांगने पड़ते हैं. अच्छा होता कि इस योजना में सरकार ने इस तरह के किसी भी प्रावधान को करने से पहले अल्पसंख्यकों समेत पूरे राज्य में ईमानदारी से पात्र व्यक्तियों का चयन करने में पूरी शक्ति लगायी होती जिससे उन तक इस योजना का लाभ पहुँचाया जा सकता पर उसके स्थान पर लोकसभा चुनावों से पहले सरकार ने इसमें विशेष रूप से अल्पसंख्यकों के लिए व्यवस्था कर अच्छी योजना का भी कबाड़ा कर दिया है. हालाँकि कोर्ट ने योजना पर रोक लगाने से मना कर दिया है पर याचिकाकर्ता को साथ ही यह छूट भी दी हैं कि यदि सरकार इस आधार पर चयन करती है तो वह मामला कोर्ट के संज्ञान में लाकर उस पर अलग से आदेश लिया जा सकता है. इस घटना से एक बार फिर से यह स्पष्ट हो जाता है कि आने वाले समय में हमारे नेता सुधरने वाले नहीं हैं और वे इसी तरह से अनावश्यक रूप से पहले से ही काम के बोझ से दबे कोर्ट का समय ख़राब करने वाले हैं.       समाजवादी पेंशन- आरक्षण और राजनीति
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

मोदी - मुसलमान और उर्दू

                                            देश में पता नहीं लोगों की सोच को क्या होता जा रहा है क्योंकि नरेंन्द्र मोदी की उर्दू वेबसाइट के फ़िल्म जगत कि मशहूर हस्ती सलीम खान द्वारा लोकार्पण किये जाने के बाद जिस तरह से बयानबाज़ी शुरू की गयी है उसका कोई मतलब नहीं बनता है. आज भारतीय राजनीति में धूमकेतु की तरह उभर रहे देश के सबसे विवादास्पद नेता नरेंद्र मोदी यदि लोगों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए उर्दू भाषा का सहारा ले रहे हैं तो इसका सभी तरफ से स्वागत ही होना चाहिए क्योंकि इससे उनके उन विरोधियों को भी उनके बारे में अधिक जानने को मिलेगा जो अभी तक सबके सामने नहीं आ पाया है. देश का संविधान सभी भाषाओँ की प्रगति के लिए निरंतर ही प्रयास किये जाने की बात करता है पर इस तरह से यदि देश में अधिकांश उर्दू शिक्षित मुसलमानों की आबादी तक अपनी बात पहुँचाने के लिए मोदी द्वारा यह प्रयास किया जा रहा है तो इसके विरोध का कोई मतलब नहीं बनता है क्योंकि जिन लोगों को यह लगता है की उर्दू की इस साइट से मोदी को वोट मिल जायेंगें वे भ्रम में जी रहे हैं.
                                           देश के नेताओं की पहुँच यदि देश की भाषाओँ में ही आम लोगों तक होती रहे तो उससे अच्छा कुछ भी नहीं हो सकता है क्योंकि जिन लोगों में आपसी विश्वास की कमी है वे अपनी बात यदि एक दूसरे की भाषा में करने में सक्षम हो जाएँ तो देश की बहुत बड़ी समस्या को भी आसानी से सुलझाया जा सकता है. आज भी जिस तरह से भाषा के नाम पर विवाद किये जाते हैं उनका कोई मतलब नहीं होता है पर कुछ लोगों को मोदी के साथ सलीम और सलमान खान का इस तरह से जुड़ना भी रास नहीं आ रहा है ? इस मुद्दे पर सलीम खान ने स्पष्ट रूप से कहा है कि इस साइट ले लोकार्पण को उनका भाजपा को समर्थन न समझा जाये वे कांग्रेस के वोटर रहे हैं और अच्छा प्रत्याशी होने पर वे उसके लिए फिर से वोट भी करेंगें, वे उर्दू की तरक्की के लिए सदैव प्रयासरत रहे हैं और मोदी की इस साइट के लोकार्पण का केवल उनका यदि मक़सद था फिर भी कुछ लोगों को यह सलीम खान का गलत कदम ही लग रहा है. देश का हर नागरिक अपने अनुसार किसी भी धर्म भाषा और राजनैतिक विचारधारा से जुड़ने को स्वतंत्र है और यदि सलीम या सलमान खान को मोदी के गुणों से लगाव या अपने सम्बन्ध हैं तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है ?
                                          मोदी एक तरफ जितने विवादित रहे हैं दूसरी तरफ उतने ही लोकप्रिय भी हैं पर एक बात तो तय ही है कि उन्होंने यह साइट कुछ चुनावी लाभ के लिए ही जारी की है क्योंकि वे जितने वर्षों से सत्ता में हैं तो यह काम वे पहले भी कर सकते थे पर जिस तरह से उन्होंने इसका समय चुना है तो विरोधियों को उन पर हमला करने का अवसर भी मिल गया है. गौर से यदि देखा जाये तो मोदी के काम करने की शैली सदैव से ही ऐसी रही है कि वे सही काम भी ऐसे समय के साथ करते हैं जिसमें कुछ अनावश्यक और निरर्थक विवाद भी हो जिससे उनके बारे में चर्चा होती रहे. ऐसे में यदि वे इस साइट के उद्घाटन के लिए सलीम खान का चुनाव करते हैं तो इसमें कोई नयी बात नहीं है. फ़िल्म उद्योग द्वारा भी इस बारे में जिस तरह से प्रतिक्रियां दिखाई जा रही हैं वे भी अनावश्यक ही हैं क्योंकि भले ही किसी भी मंशा के साथ यह साइट शुरू की गयी है उससे मोदी के रणनीतिकारों में भी इस भाषा की महत्ता समझ में आने वाली बात ही अधिक परिलक्षित होती है उर्दू को इस तरह से महत्व दिए जाने से एक बार फिर से भारत की सामान्य बोलचाल की भाषाएँ अपनी जीवंतता को सिद्ध करने की तरफ ही अग्रसर होती लगती हैं.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

आईएसआई राहुल और संघ

                                                      राहुल गाँधी के मुज़फ्फरनगर में आईएसआई द्वारा मुस्लिम युवकों को भड़का कर उनका अपने काम में इस्तेमाल किये जाने से सम्बंधित बयान आने के बाद जिस तरह से राजनीति गर्माने लगी थी अब लोगों को उस बयान की सच्चाई समझ में आने लगी है. आम तौर पर आज तक कांग्रेस के नेता इस तरह के मुद्दों पर चुप्पी ही लगाये रहते थे और भाजपा तथा शिव सेना जैसे दलों के साथ संघ परिवार ही ऐसे आरोप लगते रहे हैं पर पूरे मामले को यदि राजनीति से आगे जाकर देखा जाए तो राहुल के बयान में कहीं न कहीं से काफी हद तक सच्चाई भी नज़र आती है तभी संघ ने खुले तौर पर राहुल का समर्थन करते हुए खुद द्वारा घोषत पीएम प्रत्याशी नरेन्द्र भाई मोदी से अपनी मतभिन्नता ज़ाहिर भी कर दी है. यह सही है कि देश के ढांचे में सभी आराम से रह और जी रहे हैं तथा पिछले कुछ वर्षों से मुसलमानों में शिक्षा का स्तर बढ़ने के बाद शिक्षित परिवारों के जीवन स्तर में आये सुधार ने अन्य मुसलमानों को भ शिक्षा की तरफ बढ़ने के लिए आकर्षित भी किया है फिर भी आज धर्म के नाम पर जिहाद की घुट्टी पिलाने की मानसिकता वाले लोग आज भी मौजूद हैं.
                                                   क्या आज तक ऐसे इलाकों में भाजपा अपने स्तर से इस बात का प्रचार कर वोटों को इकठ्ठा करने की कोशिशे नहीं करती रहती है और वास्तविक सच्चाई तो यह है कि आईएसआई आज भी पूरे देश में किसी भी मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र में इस तरह की कोशिशें करती हुई देखी जा सकती है. पहले मुंबई फिर दक्षिण के राज्यों के बाद वह यूपी पर पूरी तरह से नज़रें गडाए हुए है कि किसी भी तरह से इन युवकों के मन में भारत के प्रति नफरत की आग भड़काई जाये जिससे आने वाले समय में वह ये कह सके कि भारत में मुसलमानों के साथ अत्याचार होता ही रहता है ? जब से जम्मू कश्मीर की सीमा पर भारतीय चौकसी बढ़ी है तब से घाटी का माहौल क्यों सुधर गया है यह बात इस बयान की सच्चाई का एक पहलू मात्र ही है क्योंकि किसी समय कश्मीर में भी पाक की ऐसी हरकतों की कहीं न कहीं से अनदेखी अवश्य ही की गयी है. अब समय आ गया है कि एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के स्थान पर नेता और राजनैतिक दल इस समस्या का सही हल तलाशने के प्रयास करें जिससे आने वाले समय में मुस्लिम युवकों को पाक के चंगुल में उलझने से रोका जा सके.                                                     
                                                   यह सही है कि राहुल किसी संवैधानिक पद पर नहीं हैं पर एक सांसद होने के नाते यह संभव है कि उनके पास ऐसी कोई जानकारी भी हो यहाँ पर असली बात को जिस तरह से छोड़कर मुद्दे पर राजनीति को हावी होने दिया गया वह भारतीय नेताओं और राजनीति के कमज़ोर स्तर को ही प्रदर्शित करती हैं क्योंकि जब इस तरह का कोई बयान भाजपा दे तो वह सही पर यदि कांग्रेस के उपाध्यक्ष की तरह से यही बात कही जाए तो भाजपा की नज़रों में यह देश के मुसलमानों का अपमान होने लगता है ? समाज में यदि कहीं भी कुछ गलत हो रहा है तो उस पर सभी को बोलने का हक संविधान ने हमें दे ही रखा है ऐसे में राहुल के बयान को हल्का समझने वाले यह भूल जाते हैं कि संभवतः उनकी तरफ से यह बयान सिर्फ इसलिए आया हो कि आने वाले समय में भाजपा की तरफ से ऐसे आरोप तो लगाये ही जाने थे यहाँ पर जो बात अन्य राजनैतिक दलों को खल गयी कि इस मुद्दे पर राहुल ने आखिर जुबान क्यों खोली ? देश के मुसलमानों की आलोचना कर उन्हें आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है उसके लिए उनकी समस्याओं को दूर करने की तरफ पूरे मनोयोग से प्रयास करना ही होगा.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

मुस्लिम आरक्षण और राजनीति

                                          देश में मुसलमानों को आरक्षण दिए जाने की मांग पर आयोजित एक सम्मलेन में जिस तरह से एक बार फिर से कथित मुस्लिम नेताओं ने कौम की बेहतरी के बारे में सोचने के स्थान पर उन्हीं तत्कालीन कारणों को बहस के केंद्र में लाकर फिर उसी घिसीपिटी राजनीति की शुरुवात की उससे किसी भी तरह से मुसलमानों का भला नहीं होने वाला है. आरक्षण का मुद्दा अपने आप में ही इतना संवेदनशील है कि कोई भी राजनैतिक दल अपनी राजनैतिक मजबूरियों के चलते इस पर खुलकर बोल तो सकता है पर संविधान के कारण उसे लागू नहीं कर सकता है. आज क्या कारण है कि देश का मुसलमान पिछले दो दशकों में प्रगतिशील होने के बाद भी पिछड़ा ही नज़र आता है जब तक उस पर विचार नहीं किया जायेगा तब तक ज़मीनी हकीकत को सुधारने में कोई मदद नहीं मिलने वाली है क्योंकि नेताओं को अपने लाभ के लिए केवल मुसलमानों के डराकर उनके वोट लेने तक ही अपने को सीमित करने की जो परंपरा चल रही है वह भी सदैव ही मुसलमानों को आगे बढ़ने से बहुत रोकती है.
                                          आखिर क्या कारण है कि आज भी मुसलमानों को देश के राजनैतिक नेताओं द्वारा केवल अल्पसंख्यक शब्द से ही संबोधित किया जाता है जबकि देश में वास्तविक अल्पसंख्यकों की कोई पूछ ही नहीं है ? अब देश की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए मुसलमानों को आगे बढ़कर अपने हक की बात करनी चाहिए न कि इन नेताओं के सामने इस तरह की आरक्षण की बातें क्योंकि आरक्षण होने के बाद उनके पास सीमित अवसर हो जाते हैं जबकि देश की मुख्य धारा में शामिल होने के किसी भी बड़े प्रयास पर पानी फिर सकता है. आज देश के मुसलमानों की सबसे बड़ी आवश्यकता उनकी शैक्षिक योग्यता बढाने को लेकर होनी चाहिए क्योंकि जिस तेज़ी से पूरे देश और दुनिया में हर चीज़ शिक्षा से जुडती जा रही है तो उन्हें भी इस शिक्षा से आखिर क्यों वंचित किया जाये ? आज जिन स्थानों पर मुसलमानों ने शिक्षा पर ध्यान दिया है वह पर उनके जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार भी हुआ है पर अभी भी इस कोशिश को पूरी कौम के लिए शुरू करने की ज़रुरत है जबकि नेता अपने हित के लिए मुसलमानों के हितों की बात तो करते हैं पर उनके वास्तविक लाभ के लिए प्रयासरत दिखाई नहीं देते हैं ?
                                           आज समय की आवश्यकता केवल अल्पसंख्यकों के लिए योजनायें बनाने की नहीं वरन अल्पसंख्यक बहुत क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाएँ बढ़ाने की है क्योंकि जिन स्थानों पर मुसलमान बच्चों की शिक्षा की सही व्यवस्था है वहां पर वे सामान्य अभ्यर्थियों के साथ पूरी तत्परता के साथ अपनी क्षमता का प्रदर्शन करके आगे बढ़ते ही जा रहे हैं पर आज के समय ये घटनाएँ छुटपुट ही हैं और इसे सुधारने के लिए किसी बड़े अल्पसंख्यक संस्थान की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वहां पर पढ़ने के लिए कितने मुस्लिम बच्चे जा सकते हैं ? इसलिए आज हर उस जगह जहाँ पर मुसलमान रहते हैं इस तरह की छोटी पर मज़बूत शुरुवात करने की ज़रुरत है जहाँ से जीवन से जुडी सच्चाई का सामना करने का हौसला मिलता है पर आज के समय सरकारें केवल इस तरह की योजनायें बनाने में लगी हुई है जिनसे उनको चुनाव में कुछ वोट मिल जाएँ पर चाहे मुसलमानों की कितनी भी दुर्दशा क्यों न हो जाये ? अब समय आ गया है कि देश की योजनाओं में अलगाव करने के स्थान पर मुसलमानों को उनमें पूरी तरह से शामिल करने की बात की जाये क्योंकि आँखों पर चश्मा लगाकर ये नेता मुसलमानों को केवल एक पक्ष ही दिखाना चाहते हैं जबकि आज पूरा विकास का आकाश उनका भी अन्य लोगों की तरह खुलेमन से स्वागत करने को तैयार है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 12 अगस्त 2012

असोम, म्यांमार, मुस्लिम और मुंबई

             असोम में जारी जातीय हिंसा के कारण जिस तरह से वहां स्थानीय बोडो और बांग्लादेशी घुसपैठियों के बीच हुए संघर्ष के में काफी जान माल का नुकसान हुआ उसका असर मुंबई में भी पड़ता दिखाई दे रहा है. जिस तरह से मुंबई में रज़ा अकादमी की तरफ से असोम और म्यांमार में मुस्लिम समुदाय के साथ हो रही कथित ज्यादती के विरोध में एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन आज़ाद मैदान में किया गया था वह आख़िर किन कारणों से इतना हिंसक हो गया कि उसमें भाग लेने आये दो लोगों की मौत भी हो गयी ? इस बात की ज़िम्मेदारी आख़िर किस पर डाली जाये और इस तरह से किये जाने वाले प्रदर्शनों के शांतिपूर्वक न रहने पर इसका कौन ज़िम्मेदार ठहराया जाये ? क्या रज़ा अकादमी को भी इस बात का अंदाज़ा था कि वहां पर क्या हो सकता है या जानते हुए भी इस प्रदर्शन को हिंसक होने दिया गया ? कहीं न कहीं आयोजनकर्ताओं पर इसका इल्ज़ाम आना ही है क्योंकि जितनी बड़ी संख्या में लोगों को बुलाया जा रहा था और उन पर नियंत्रण रखने के लिए किसी भी तरह से कोई उपाय आयोजकों की तरफ़ से नहीं किये गए थे उन्हें क्या तैयारियों में कमी नहीं माना जाना चाहिए ? साथ ही किसी भी आयोजन के लिए बुलाये जा रहे लोगो की सुरक्षा के बारे में आख़िर कौन सोचेगा यह दायित्व आयोजक या पुलिस में से किसी पर तो होना ही चाहिए.
         पूरे प्रकरण में मुंबई पुलिस की क्या भूमिका रही क्योंकि उसने ही इस तरह की आयोजन को अंपनी अनुमति दी होगी इस बात पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है. साथ ही पुलिस ने इस बात पर भी ध्यान तो दिया ही होगा कि किन माध्यमों से लोगों को आजाद मैदान में बुलाया जा रहा है ? जिस तरह से नफ़रत फ़ैलाने वाले क्लिप को लगातार भेजकर लोगों को उकसाया गया उसके लिए क्या मोबाइल कम्पनियों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए ? क्या देश की ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास ऐसा कुछ है कि वे अचानक से बढे हुए इस तरह के मोबाइल ट्रैफिक पर निगरानी रखा सकें और देखें कि उसमें क्या जा रहा है और कहीं वह किसी धर्म या स्थान विशेष से सम्बंधित तो नहीं है ? इस पूरे प्रकरण में पुलिस की भूमिका और उसके ख़ुफ़िया तंत्र पर एक बार फिर से सवालिया निशान लग गए हैं क्योंकि १५ अगस्त नज़दीक आने पर जिस तरह से यह कहा जाता कि सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गयी है और महत्वपूर्ण स्थानों पर निगरानी की जा रही है उन वक्तव्यों का क्या देश के सन्दर्भ में कोई मतलब भी होता है या फिर इस तरह के अवसरों पर एक रस्म अदायगी के तौर पर ही इसे एक बयान जारी करने से अधिक और कुछ नहीं माना जाता है ? एक दिन पहले ही देश में जन्माष्टमी मनाई गयी है और उस समय भी जिस तरह से बड़ी संख्या में लोग घरों से बाहर होते हैं तो इस तरह की कोई लापरवाही बहुत बड़ी समस्या को जन्म दे सकती है. इस घटना से एक बार फिर से पुलिस की लापरवाही सामने आ गयी है कि वह कितनी सतर्क रहती है और उसका ख़ुफ़िया विभाग किस तरह से काम करता है. 
                किसी एक घटना का विरोध करने के लिए किस तरह से कुछ लोगों के उकसावे पर भीड़ इतनी अराजक हो गयी कि उसने मीडिया समेत आने जाने वाले वाहनों पर भी हमला शुरू कर दिया जबकि इन लोगों का वहां की घटनाओं से कोई सम्बन्ध नहीं था ? अभी तक असोम की समस्या को जातीय और क्षेत्रीय मसला कहा जा रहा था पर मुंबई में हुए इस तरह से प्रदर्शन के बाद वहां के मुस्लिम समुदाय पर अब इस बात के आरोप लगने ही वाले हैं कि उन्होंने मुंबई की सामाजिक संरचना को छिन्न भिन्न किया ? यह सही है कि असोम में हुई घटनाएँ किसी भी तरह से सही नहीं है पर जिस तरह से अफवाह पर भरोसा करके वहां पर आये बांग्लादेशियों ने सच को जाने बिना बोडो आदिवासियों पर हमले शुरू कर दिए उसके लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाये ? एक छोटी सी घटना ने किस तरह से इतना बड़ा रूप ले लिया कि बांग्लादेशियों ने संगठित तौर पर हमले शुरू कर दिए ? क्या असोम के किसी मूल निवासी मुस्लिम के साथ कुछ ऐसा किया गया जिसके लिए मुंबई में इतना बड़ा प्रदर्शन किया गया ? अगर यह प्रदर्शन असोम में मानवाधिकारों के हित के लिए किया जाता तो समझ में आता पर जिस तरह से इसे बांग्लादेशियों के हित में किया गया उसका कोई मतलब नहीं है और हिन्दू भावनाओं को उभारने में सफल रहने वाली शिवसेना के सामने इस तरह से कुछ भी करके मुंबई की आत्मा को छलनी ही किया जा सकता है. एक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समस्या को जिस तरह से मुंबई में धर्म से जोड़ने की कोशिश की गयी वह किसी भी तरह से आने वाले समय में विश्वास की खाई को चौड़ा करने का काम ही करने वाली है.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 1 मार्च 2012

दिल्ली पर आतंकी नज़रें

        एक बार फिर से जिस तरह से दिल्ली में संदिग्ध आतंकियों की गिरफ़्तारी हुई है उससे यही पता चलता है कि आतंकी किसी भी सूरत में वहां पर हमले करने की फ़िराक़ में हैं. पहले के मुकाबले अब देश और दिल्ली में ख़ुफ़िया तंत्र की पकड़ कुछ मज़बूत हुई है जिससे कई ऐसे संदिग्ध लोगों को हिरासत में लिया गया है जिनसे सुरक्षा सम्बन्धी ख़तरे होने की आशंका थी. आज भी जिस तरह से आम नागरिक अपनी इन सुरक्षा चिंताओं के बारे में पहले की तरह ही लापरवाह बना हुआ है उसके कारण ही देश का कोई भी हिस्सा इस तरह के खतरों से अछूता नहीं है ? जिस तरह से आम नागरिकों की तरफ से पुलिस द्वारा सुझाये गए सुरक्षा उपायों की लगातार अनदेखी की जा रही है उससे यही लगता है कि आज भी दिल्ली जैसी जगहों पर रहने वालों को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि उनके आस पास कौन रहने आया है या फिर कौन किस तरह के कामों में लगा हुआ है ? दिल्ली समेत पूरे देश में इस तरह के सुझाव पुलिस द्वारा दिए गए हैं कि किसी को भी अपने यहाँ काम करने या किरायेदार के रूप में रखने से पहले उसकी पुलिस द्वारा आवश्यक जांच करवा लें या पुलिस को उस बारे में सूचित करे पर आम लोग इस बात पर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं जिस कारण से भी इन आतंकियों को रुकने तारने में आसानी होती रहती है.
      यहाँ पर यह ध्यान देने वाली बात है कि इस तरह से घनी आबादी के बीच कहीं से भी आकर रहने वाले लोग ही संदिग्ध हो सकते हैं या फिर वे अपने इस तरह के किसी संक्षिप्त प्रवास के दौरान स्थानीय लोगों को आतंकियों के बारे में बताकर उनके मन में आतंकियों के बारे में सहानुभूति पैदा करने का काम कर सकते हैं ? आज जिस तरह से आतंकी संगठन समाज के हर वर्ग पर अपना जाल फ़ेंक रहे हैं तो ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि किसी को छोड़ देंगें क्योंकि उनका सारा ताना बाना अब स्थानीय निवासियों और अपने स्लीपिंग सेल पर ही टिका हुआ है. इस्राइल दूतावास की गाड़ी पर हमले के बाद से दिल्ली में पुलिस की गतिविधियाँ बढ़ी हुई हैं जिससे भी किसी भी तरह की संदिग्ध हरकतों पर पुलिस का ध्यान अधिक है. अब आतंकी जिस तरह से दिल्ली के कालेज जाने वाले युवा वर्ग को अपना निशाना बनाने की फ़िराक़ में हैं उससे बहुत सावधानी से बचने की आवश्यकता है क्योंकि इन स्थानों पर बड़ी संख्या में विद्यार्थी रहते हैं और बेहतर पढ़ाई और भविष्य की तलाश में कश्मीर समेत पूरे भारत से बच्चे यहाँ पर आते हैं ऐसे में इनको किसी बात पर बहलाना आसान होता है. आतंकियों का कोई ईमान नहीं होता है तभी वे इस तरह से पढ़ाई के लिए आने वाले बच्चों में अपने माड्यूल स्थापित करने की कोशिश करते हैं. 
         अब सबसे बड़ी बात यह है कि जो अभियान आतंकियों ने कश्मीर घाटी में चलाकर उसे पूरे देश से काटने का प्रयास किया था अब वे वहां पर सामान्य होती जिंदगी में कुछ बहुत बड़ा कर पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं जिससे उन्हें कश्मीर को लेकर पूरे देश में संदेह बनाये रखने में दिक्कतें हो रही हैं ऐसे में वे देश भर में पढ़ने जाने वाले कश्मीरी विद्यार्थियों पर अपनी उम्मीदें टिकाये हुए हैं. अब इस बात की ज़िम्मेदारी जम्मू कश्मीर सरकार समेत पूरे प्रान्त पर है कि वहां से जो भी लोग जिस काम से देश के किसी भी हिस्से में जा रहे हैं उनके बारे में सही सूचना उपलब्ध कराएँ क्योंकि इनमें से ही कुछ लोग देश में कश्मीर का नाम बदनाम करने में लगे हुए हैं. बहुत दिनों के बाद अब कश्मीर घाटी में कुछ अमन है और देश भर से पर्यटक वहां पर जाने लगे हैं तो ऐसे में संदेह का कोई भी काम वहां का पर्यटन उद्योग के लिए बहुत नुकसानदेह साबित होने वाला है. देश के लोगों में कश्मीरियों को लेकर जो संदेह आतंकी बनाये रखना चाहते हैं अब उसको ख़त्म करने की ज़िम्मेदारी भी कश्मीरियों की ही है. आतंकियों को खून खराबा चैये पर अब कश्मीरियों को यह तय करना है कि क्या वे अब भी पिछले २० वर्षों की तरह आतंकियों के साए में जीना चाहते हैं या फिर आज के माहौल को बनाये रखना चाहते हैं ? बहुत खून बह चुका है झेलम में अब वहां पर केवल विकास की बातें ही होनी चाहिए क्योंकि देश के साथ अब कश्मीर की भी यही ज़रुरत है.      
 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 11 जुलाई 2010

मुस्लिम जगत और बाक़ी दुनिया

पिछले कुछ वर्षों में इस्लाम के जिस कट्टरपंथी चेहरे को पूरे विश्व समुदाय ने देखा है उसका अंदाज़ा किसी नयी शुरुआत के समय ही पता चल पाता है. ओबामा प्रशासन की तरफ से मुस्लिम जगत से बात करने के लिए नियुक्त की गयी विशेष दूत फराह पंडित को अब इस बात का पता चल रहा है. उन्होंने मुस्लिम जगत और अमेरिका के संबंधों को सुधारने के लिए अब तक २४ से अधिक मुस्लिम बाहुल्य देशों की यात्रा की है. यह सही है कि ओबामा  प्रशासन ने जो पहल की है उसका मुस्लिम जगत को जैसा स्वागत करना चाहिए वैसा हो नहीं रहा है फिर भी आने वाले समय में इस बात पर ध्यान देना ही होगा कि विश्व के बहुत सारे मुस्लिम देशों और अन्य देशों के बीच किसी तरह की खाई बनाकर कोई विकास की बातें नहीं कर सकता है.
       आख़िर क्या ऐसा हो गया कि पूरी दुनिया के मुसलमान संदेह के घेरे में आ गए हैं ? इस बारे में बहुत बहस हो चुकी है जैसा कि हर जगह होता है सभी का एक उदारवादी चेहरा होता है तो दूसरा चेहरा बहुत खूंखार होता है. पिछले कुछ समय से इस्लाम की कमान ऐसे लोगों के हाथों में चली गयी जो केवल बन्दूक और बदले में विश्वास करते हैं. इन ग़लत लोगों के हाथ में सारा कुछ जाने से उन्होंने इसका ग़लत इस्तेमाल भी शुरू कर दिया. हर बात के लिए बदले की बातें की जाने लगीं और स्वयं इस्लामी जगत में विवाद इतने बढ़ गए कि दूसरे देशों को उनमें से अपना हित साधने का अवसर मिल गया ? कोई भी दूसरा देश बाहर से आकर मूल देश के बारे में उतनी संजीदगी से नहीं सोच सकता जितनी संजीदगी वहां के बाशिंदों में होती है ? कुछ देशों में नेताओं ने अपने को सबसे ऊपर सोचना और समझना शुरू कर दिया और अपने ही देश के नागरिकों पर ज़ुल्म ढाने शुरू कर दिए जिससे किसी बाहरी तत्व के आने पर नागरिकों ने अपने शासकों का ही विरोध किया और आने वाले तत्वों और देशों ने अपने हितों को साधना चालू रखा.
       अब भी समय है कि इस्लाम के उदारवादी लोग सामने आयें वर्ना अगले कुछ वर्षों तक अगर सारा कुछ ऐसे ही चलता रहा तो आने वाली पीढ़ी ही पूरे इस्लाम को कट्टर और बहुत उग्र मानने लगेगी जिससे आने वाले समय में इस तरह के तनाव और भी अधिक बढ़ जायेंगें. आज यह ज़िम्मेदारी मुस्लिम जगत पर अधिक है कि वे अपनी विश्वसनीयता को साबित करें साथ ही हर छोटी बड़ी शासकीय बातों में इस्लाम के इस्तेमाल से परहेज़ भी करें क्योंकि किसी भी फैसले पर जो इस्लाम विरोधी ताकतें हैं वे अपने को सही साबित करने के लिए इन सभी बातों का सहारा लेना शुरू कर देते हैं. मुस्लिम जगत में भटके कुछ लोग तो आतंकवादी हो सकते हैं पर पूरा मुस्लिम जगत आतंकी नहीं है अब इस बात को पूरी दुनिया को समझाने की ज़िम्मेदारी भी मुस्लिम जगत पर ही है.        

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 21 मार्च 2010

मदरसों की हालत...

लखनऊ में चल रहे मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड में इसके अध्यक्ष मौलाना राबे हसन नदवी ने मदरसों में सरकारी हस्तक्षेप से बिलकुल इंकार कर दिया है. उन्होंने मुस्लिम समाज से गैर मुस्लिम समाज के मन से इस्लाम के बारे में फैली भ्रांतियां दूर करने का आह्वाहन भी किया. उन्होंने कहा मुस्लिम औरतों को बराबर का हक मिले और मुसलमान खर्चीली शादियों, सूदखोरी आदि से दूर रहें. यह सही है कि दुनिया का कोई भी धर्म किसी भी दूसरे को भला बुरा नहीं कहता और सभी को साथ लेकर चलने की बात करता है.
         आज जिस तरह से केंद्र सरकार ने मदरसों की हालत सुधारने के लिए जो केंद्रीय कानून बनाने का प्रस्ताव किया है उसका विरोध करने का कोई मतलब नहीं बनता. एक तरफ मौलाना साहब ने तरक्की की बात की वहीं दूसरी तरफ़ मदरसों की हालत सुधारने का विरोध भी किया. आज के समय में जिस तरह से मदरसों की हालत ख़राब होती चली जा रही है और वहां पढ़ाने वाले शिक्षकों को जिस तरह कम पैसों में अपना खर्च चलाना पड़ता है उस सारी स्थिति को बदलने में इस तरह का कोई बोर्ड काफी मदद कर सकता है. आखिर सरकारी स्तर पर संचालित किये जाने वाले वक्फ़ बोर्ड भी तो अपना काम कर ही रहे हैं हाँ इतना अवश्य है कि कुछ लोग इसके माध्यम से अपने फायदे की बात कर रहे हैं. अगर सरकारी मदद मिलने से मदरसों में शैक्षणिक महाल में सुधार होता है तो उससे किसका भला होगा ? आख़िर सरकार की इस मंशा पर क्यों पानी फेरने का काम किया जा रहा है ? आज की तारीख़ में मदरसों के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वे स्वयं अपना खर्च चलते हुए अच्छी व्यवस्था कर सकें. इस स्थिति में अगर सरकार से कुछ पैसा इन मदरसों को मिल जाता है जिससे यहाँ पर भवन और अन्य बुनियादी सुविधाओं को बेहतर किया जा सके तो यह किस तरह से समाज के लिए हितकर नहीं होगा ? हाँ एक बात में सरकार का हस्तक्षेप नहीं बर्दाश्त किया जा सकता कि ये मदरसे वहां पर दीनी तालीम के आलावा कुछ और नहीं पढ़ाना चाहें तो कोई ज़बरदस्ती न की जाये. इतना तो किया ही जा सकता है कि विकास कर रहे मुस्लिम देशों में मदरसों कि व्यवस्था को देख समझ कर भारत में भी उनका उदाहरण देकर अच्छी शिक्षा देने का प्रबंध किया जा सकता है.
       इस तरह के काम केवल मिलकर ही किये जा सकते हैं भारत में हिन्दुओं की बहुतायत होने के कारण सरकार में भी यही अधिक हैं बस यही बात मुस्लिम समाज को कहीं से शंकालु बना देती है कि कहीं किसी दिन इन मदरसों पर कोई अन्य बंधन न लगा दिया जाये ? अगर सरकार पूरे मुस्लिम समाज के भले की बात कर रही है तो इसके पक्ष में मुस्लिम समाज को ही मंथन करने की आवश्यकता अधिक है.  

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...