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Wednesday, 16 October 2013

मुस्लिम आरक्षण और राजनीति

                                          देश में मुसलमानों को आरक्षण दिए जाने की मांग पर आयोजित एक सम्मलेन में जिस तरह से एक बार फिर से कथित मुस्लिम नेताओं ने कौम की बेहतरी के बारे में सोचने के स्थान पर उन्हीं तत्कालीन कारणों को बहस के केंद्र में लाकर फिर उसी घिसीपिटी राजनीति की शुरुवात की उससे किसी भी तरह से मुसलमानों का भला नहीं होने वाला है. आरक्षण का मुद्दा अपने आप में ही इतना संवेदनशील है कि कोई भी राजनैतिक दल अपनी राजनैतिक मजबूरियों के चलते इस पर खुलकर बोल तो सकता है पर संविधान के कारण उसे लागू नहीं कर सकता है. आज क्या कारण है कि देश का मुसलमान पिछले दो दशकों में प्रगतिशील होने के बाद भी पिछड़ा ही नज़र आता है जब तक उस पर विचार नहीं किया जायेगा तब तक ज़मीनी हकीकत को सुधारने में कोई मदद नहीं मिलने वाली है क्योंकि नेताओं को अपने लाभ के लिए केवल मुसलमानों के डराकर उनके वोट लेने तक ही अपने को सीमित करने की जो परंपरा चल रही है वह भी सदैव ही मुसलमानों को आगे बढ़ने से बहुत रोकती है.
                                          आखिर क्या कारण है कि आज भी मुसलमानों को देश के राजनैतिक नेताओं द्वारा केवल अल्पसंख्यक शब्द से ही संबोधित किया जाता है जबकि देश में वास्तविक अल्पसंख्यकों की कोई पूछ ही नहीं है ? अब देश की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए मुसलमानों को आगे बढ़कर अपने हक की बात करनी चाहिए न कि इन नेताओं के सामने इस तरह की आरक्षण की बातें क्योंकि आरक्षण होने के बाद उनके पास सीमित अवसर हो जाते हैं जबकि देश की मुख्य धारा में शामिल होने के किसी भी बड़े प्रयास पर पानी फिर सकता है. आज देश के मुसलमानों की सबसे बड़ी आवश्यकता उनकी शैक्षिक योग्यता बढाने को लेकर होनी चाहिए क्योंकि जिस तेज़ी से पूरे देश और दुनिया में हर चीज़ शिक्षा से जुडती जा रही है तो उन्हें भी इस शिक्षा से आखिर क्यों वंचित किया जाये ? आज जिन स्थानों पर मुसलमानों ने शिक्षा पर ध्यान दिया है वह पर उनके जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार भी हुआ है पर अभी भी इस कोशिश को पूरी कौम के लिए शुरू करने की ज़रुरत है जबकि नेता अपने हित के लिए मुसलमानों के हितों की बात तो करते हैं पर उनके वास्तविक लाभ के लिए प्रयासरत दिखाई नहीं देते हैं ?
                                           आज समय की आवश्यकता केवल अल्पसंख्यकों के लिए योजनायें बनाने की नहीं वरन अल्पसंख्यक बहुत क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाएँ बढ़ाने की है क्योंकि जिन स्थानों पर मुसलमान बच्चों की शिक्षा की सही व्यवस्था है वहां पर वे सामान्य अभ्यर्थियों के साथ पूरी तत्परता के साथ अपनी क्षमता का प्रदर्शन करके आगे बढ़ते ही जा रहे हैं पर आज के समय ये घटनाएँ छुटपुट ही हैं और इसे सुधारने के लिए किसी बड़े अल्पसंख्यक संस्थान की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वहां पर पढ़ने के लिए कितने मुस्लिम बच्चे जा सकते हैं ? इसलिए आज हर उस जगह जहाँ पर मुसलमान रहते हैं इस तरह की छोटी पर मज़बूत शुरुवात करने की ज़रुरत है जहाँ से जीवन से जुडी सच्चाई का सामना करने का हौसला मिलता है पर आज के समय सरकारें केवल इस तरह की योजनायें बनाने में लगी हुई है जिनसे उनको चुनाव में कुछ वोट मिल जाएँ पर चाहे मुसलमानों की कितनी भी दुर्दशा क्यों न हो जाये ? अब समय आ गया है कि देश की योजनाओं में अलगाव करने के स्थान पर मुसलमानों को उनमें पूरी तरह से शामिल करने की बात की जाये क्योंकि आँखों पर चश्मा लगाकर ये नेता मुसलमानों को केवल एक पक्ष ही दिखाना चाहते हैं जबकि आज पूरा विकास का आकाश उनका भी अन्य लोगों की तरह खुलेमन से स्वागत करने को तैयार है.  
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