मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 20 मई 2017

तीन तलाक़

                                  मुसलमानों में तीन तलाक़ की स्थिति को लेकर जिस तरह से हर पक्ष अपनी अपनी बातों को लेकर स्पष्टीकरण देने में लगा हुआ है उससे यही लगता है कि यह पूरा मामला इस्लाम में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से सम्बंधित होते हुए भी कानूनी उलझनों और बिना बात के बयानों में उलझता जा रहा है. किसी भी देश में नागरिकों को मिले मौलिक अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त हैं और भारतीय संविधान लिंग, धर्म, जाति, भाषा और नस्ल के आधार पर किसी भी भेदभाव के खिलाफ अपनी मंशा दिखाता है पर साथ ही मौलिक अधिकारों के अनुपालन में सभी नागरिकों से यह अपेक्षा भी रखता है कि वे संवैधानिक और कानूनी मुद्दों से टकराने वाले विभिन्न धार्मिक मुद्दों पर स्वयं ही कोई राह निकालने की मंशा भी रखें जिससे हर बात पर अनावश्यक रूप से विवाद न खड़े हो सकें. निश्चित तौर पर तीन तलाक़ की व्यवस्था इस्लामी निकाह में है पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट में यह स्वीकार किया कि वह भी मानता है कि तीन तलाक़ का ज़िक्र पवित्र क़ुरान में नहीं है उससे यही लगता है कि बोर्ड में भी तीन तलाक़ को लेकर मतभेद रहे हैं कि इस मुद्दे से किस तरह से निपटा जाये जिससे महिलाओं के अधिकारों की समग्र रक्षा भी हो सके और समाज की इस परंपरा पर कोई अनावश्यक रूप से उंगली भी न उठा सके.
                                 भारतीय मीडिया में जिस तरह से तीन तलाक़ को ख़त्म किये जाने की बात कही जा रही है असलियत में वैसा कुछ भी नहीं है क्योंकि हर पक्ष अपनी आवश्यकताओं के अनुसार बयान देने में लगा हुआ है और वह तथ्यों को अपने अनुसार मोड़ने का काम भी करने से नहीं चूक रहा है. मसला तीन तलाक़ को पूर्ण रूप से ख़त्म करने का कभी भी नहीं रहा है क्योंकि इस व्यवस्था को इस्लामिक माना जाता है अभी भारत में तीन तलाक़ की जो व्यवस्था चल रही है उसका क़ुरान में कहीं भी ज़िक्र नहीं है यह बात अब बोर्ड ने भी मानी है क्योंकि एक साँस में तीन बार तलाक़ बोले जाने को वर्षों दशकों पहले कई इस्लामिक देशों में खत्म किया जा चुका है जिसमें पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देश भी शामिल हैं. देश की आम जनता जिसमें हिन्दू मुसलमान सभी शामिल है उनको यह लग रहा है कि इस बार कोर्ट या सरकार तीन तलाक़ को ही ख़त्म कर देगी जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है क्योंकि मामला असलियत में तलाक़ दिए जाने की प्रक्रिया पर ही टिका हुआ है जिससे भ्रम की स्थिति बनती जा रही है. यह भी अच्छी बात है कि खुद बोर्ड की तरफ से भी निकाह के समय ही मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ से सम्बंधित और अधिकार दिए जाने सम्बन्धी संशोधनों और मुस्लिम समाज में तीन तलाक़ के वर्तमान स्वरूप के बारे में स्पष्टीकरण देने और समाज को जागरूक करने की बात की जा रही है क्योंकि समाज के अंदर की कमियों को समाज के प्रबुद्ध वर्ग और समाज के लिए काम करने वाले संगठनों के माध्यम से ही बड़े परिवर्तन बिना किसी विरोध के आसानी से किये जा सकते हैं.
                           सुप्रीम कोर्ट की संविधानिक पीठ ने इस मामले में अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया है और आने वाले समय में उसका इस मुद्दे पर निर्णय भी आ सकता है ऐसी स्थिति में जो भी निर्णय हो पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को अपने स्तर से भारत के इस्लामी समाज में वे वदलाव लाने के बारे में प्रयास शुरू करने ही चाहिए जिससे केवल तीन तलाक़ ही नहीं बल्कि अन्य मुद्दों पर भी जहाँ मुसलमानों को विभिन्न तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है उन पर भी सुधारात्मक प्रयास शुरू करने चाहिए. इस प्रयास से जहाँ पूरे समाज में विमर्श और सुधार की प्रक्रिया को शुरू करने में आसानी होगी वहीं आस्था से जुड़े वे मुद्दे जो समय के साथ परंपरा में बदल गए उन पर भी क़ुरान के अनुसार चलने की व्याख्या की जा सकेगी. मुस्लिम समाज में इस्लाम धर्म से जुड़े उन मसलों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता को यदि बोर्ड समझता है तो यह भारत के मुसलमानों और देश के लिए अच्छा ही साबित होगा क्योंकि मुद्दों को टालने से उन पर विवाद बढ़ते हैं जो अंत में न्यायिक समीक्षा और कानून बनाने की स्थिति तक चले जाते हैं. यदि विभिन्न इस्लामिक देशों में तीन तलाक़ के भारतीय स्वरुप को गैर इस्लामिक किया जा चुका है तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को भी इस मुद्दे पर तभी निर्णय ले लेना चाहिए था जिससे इस्लाम के मूल सिद्धांतों की अनदेखी किये बिना ही सही रास्ते पर चलने के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ जाती.          
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गुरुवार, 11 मई 2017

कश्मीर की कश्मीरियत


कश्मीर के कुलगाम में जिस तरह से आतंकियों ने छुट्टी पर आये सेना के अधिकारी की एक शादी समारोह से अगवा करने के बाद गोली मारकर कर दी उसके बाद कश्मीर के लोगों को यह सोचना ही पड़ेगा कि वे अब भी पाकिस्तान के इशारों पर चलकर किसका नुकसान करने में लगे हुए हैं. इस्लाम की सीखों पर चलने के सपने के साथ इस्लामी राज्य बना पाकिस्तान किस तरह से धार्मिक कट्टरता और फिर आतंकियों के पोषक के रूप में आज पूरी दुनिया में जाना जाता है वह सब जानते हैं. पाकिस्तान में एक समय जिन्होंने तालिब बनकर समाज में स्वीकार्यता बधाई थी वे तालिबान और फिर अलग नाम के समूह बनकर उसी इस्लामी धार्मिक समाज का कितना नुकसान कर चुके हैं ? एक समय पाकिस्तान कि सेना के आश्रय में पलने वाले ये इस्लामी चरमपंथी आज सीधे पाकिस्तानी सेना को ही चुनौती देने में लग चुके हैं इस बात की अनदेखी भी नहीं की जा सकती है. दक्षिणी कश्मीर घाटी में जिस तरह से चार जिलों में पाक समर्थित आतंकियों का अधिकांश मौन एवं सीमित खुला समर्थन बढ़ रहा है वह घाटी को भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान के रास्ते पर ले जाने का काम ही करने वाला है. आज कुलगाम के एक कश्मीरी मुसलमान सेना अधिकारी की सुनियोजित हत्या की गयी है कल को वे कश्मीरी मुसलमान सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और स्थानीय लोगों को सीधे ही निशाना बनाने लगेंगें ऐसी परिस्थिति में उन लोगों के वे बहकावे सामने आ जायेंगें जिसके तहत उन्होंने नब्बे के दशक में घाटी को कश्मीरी पंडितों से खाली करवा लिया था और आने वाले समय में यदि स्थानीय लोग इसी तरह से इन आतंकियों के प्रति सहानुभूति रखते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब इनकी बंदूकों की नलियां आम कश्मीरी मुसलमान की तरफ ही होंगीं. कश्मीर के लोगों, वहां की सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के साथ सम्पूर्ण भारत को इस मसले पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है वर्ना पानी सर से ऊपर होने में देर नहीं लगेगी और सुरक्षा बलों को अपनी सख्ती में और बढ़ोत्तरी करने को मजबूर होना पड़ेगा जिससे आखिर में वहां का स्थानीय निवासी होने के कारण आम कश्मीरी मुसलमान ही परेशानी झेलने वाला है.

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शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

तीन तलाक़ फिर चर्चा में

                                  मुस्लिम समाज में महिलाओं को दिए जाने वाले तीन तलाक़ को लेकर एक बार फिर से बहस का दौर शुरू हो चुका है जिसकी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार को जारी नोटिस की महत्वपूर्ण भूमिका भी है जिसमें कोर्ट ने सरकार से इस बारे में अपना रुख स्पष्ट करने को कहा था. सरकार ने इस मुद्दे को लैंगिग भेदभाव से जोड़ते हुए यह कहा कि इससे समाज में मुस्लिम महिलाओं को बराबरी के हक़ से वंचित किया जाता है इसलिए वह तीन तलाक़ का विरोध करती है जिसके बाद से ही यह बहस आज सबके केंद्र में आ गयी है कि आखिर इसमें क्या बुराइयां हैं और यदि कुछ गलत है तो उससे किस तरह से निपटने के लिए सुधार किये जाने की आवश्यकता भी है. आज जिस तरह का विमर्श शुरू हो चुका है वह इस तरह के कई मामलों में निरर्थक ही साबित होता है क्योंकि बहुमत वाली सरकार अपने स्तर से इस तरह एक मामलों में अपनी राय देने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र भी होती है. इस मुद्दे को १९८६ में भी शाहबानों के मामले के समाय काफी तूल मिला था पर उस समय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड दुनिया के अन्य देशों से नसीहतें लेकर किसी भी तरह के संशोधन से पीछे ही रह गया था और २/३ बहुमत से सरकार चला रहे राजीव गांधी को सरकार और कांग्रेस के अंदर के कुछ नेता यह समझाने में सफल हो गए थे कि इसे पर्सनल लॉ का मामला ही माना जाना चाहिए और इसके लिए किसी भी तरह एक बदलाव की बात करने के बारे में सरकार को कोई पहल नहीं करनी चाहिए. उस समय सुधार करने में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और केंद्र सरकार एक तरह से विफल ही साबित हुए थे पर अब एक बार फिर से समय आ गया है कि इस पर मुस्लिम समाज ही कोई रास्ता निकल कर सरकार और सुप्रीम कोर्ट को बताये कि क्या किया जा सकता है.
                                 आज परिस्थितियां एक बार फिर से उसी स्थिति में पहुँचती हुई दिखाई दे रही हैं जिसमें वही मुद्दा एक बार फिर से सामने आ गया है पर इस बार सरकार का रवैय्या पहले से अलग होने के कारण इस पर व्यापक बहस भी हो रही है. केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने जिस तरह से यह स्पष्ट किया है कि सरकार इस मामले पर बहस कराना चाहती पर किसी पर कुछ भी थोपा नहीं जायेगा उसके बाद इस मुद्दे पर अनावश्यक रूप से घबराने की कोई आयश्यकता भी नहीं है क्योंकि केवल सरकार के कह देने भर से ही कुछ नहीं होने वाला है. तीन तलाक़ को लेकर आज भी जो परंपरा भारत में चल रही है उसे कई इस्लामी देशों में अवैध घोषित किया जा चुका है यहाँ तक कि पाकिस्तान में भी १९५९ से ही तीन तलाक़ के भारतीय स्वरुप को छोड़ा जा चुका है. बांग्लादेश ने अपने उदय के समय १९७१ से ही इस पर रोक लगा थी और कानूनी रूप से इसको वहां समर्थन भी मिला हुआ है. ऐसी परिस्थिति में जब इस्लामी देशों में भी तीन तलाक़ की इस अवधारणा को अवैध घोषित किया जा चुका है तो भारत में इसके चलते रहने के क्या कारण हैं आज इस पर विचार किया जाना चाहिए और इसमें तलाक़शुदा महिलाओं की परेशानियों को भी जानने का प्रयास किया जाना चाहिए जिससे पूरी स्थिति को बदलने से पहले उसके लिए पूरी तैयारी भी की जा सके.
                                      यह मुद्दा चूंकि मुसलमानों से जुड़ा हुआ है तो इसके लिए देश के प्रसिद्ध इस्लामिक केंद्रों की राय भी मांगी जानी चाहिए क्योंकि इस्लाम के अनुरूप भारतीय मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ संबंधी मामलों में क्या अधिकार मिल सकते हैं यह वे ही अच्छे से बता सकते हैं अच्छा यह भी होगा कि इस मामले से सम्बंधित मंत्रालय जैसे मानव संसाधन विकास मंत्रलय, महिला और बाल विकास मंत्रालय, सामाजिक अधिकारिता मंत्रालय और केंद्रीय एवं राज्य महिला आयोगों द्वारा भी इस मुद्दे पर मुस्लिम महिलाओं की राय ली जाये उसके बाद किसी नतीजे पर पहुंचने की कोशिश की जाये. केवल विधि आयोग, न्याय मंत्रालय के माध्यम से केंद्र सरकार अपनी राय को कोर्ट के सामने रख सकती है और इस मुद्दे को इतना भी छोटा न किया जाये कि केवल केंद्र सरकार ही इस पर अपनी राय दे सके. सैकड़ों वर्षों से चल रही इस परम्परा को समाप्त कर आवश्यक सुधार करने के लिए केंद्र सरकार को राज्यों से भी विमर्श करना चाहिए जिससे मुस्लिम समाज को कहीं से यह न लगे कि उनके अधिकारों का हनन किया जा रहा है. अगर इस तरह के प्रश्न बार बार सामने आ रहे हैं तो देश के इस्लामिक केंद्रों के लिए भी यह विचार करने का समय है कि कमी कहाँ पर रह रही है और उससे बिना किसी तरह की राजनीति में उलझे हुए किस तरह से सही किया जा सकता है. सबसे अच्छा तो यह होगा कि सरकार अपनी तरफ से इस मुद्दे पर इस्लामिक केंद्रों को कुछ समय दे और इस समस्या का समाधान उनसे ही पूछे और कोर्ट भी इस पूरी कार्यवाही पर अपने स्तर से निगरानी करे जिससे आने वाले समय में इसमें वे संशोधन किये जा सकें जो आज विश्व के अन्य इस्लामिक देशों में किये जा चुके हैं.        
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बुधवार, 24 अगस्त 2016

अशांत कश्मीर और पाकिस्तान

                                                         पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े के चलते जम्मू कश्मीर देश के लिए आज़ादी के बाद से ही एक बड़ी समस्या के रूप में लगातार सामने आता रहा है क्योंकि पाकिस्तान को यह लगता है कि भारत के बंटवारे के समय जो नीति अपनायी गयी थी वह सही नहीं थी और कश्मीर में अधिक मुस्लिम आबादी होने के कारण पाकिस्तान का हिस्सा ही होना चाहिए भले ही वहां के शासक कुछ भी कहते रहें पर साथ ही वह गिलगित बाल्टिस्तान और बलोचिस्तान के लिए इस सूत्र को लागू नहीं करना चाहता जहाँ की जनता के लिए आज भी सामान्य जीवन जीना कठिन ही है. पाकिस्तान की राजनीति में सर्वाधिक प्रभावी पंजाबी समुदाय ने जिस तरह से सेना के साथ हर क्षेत्र में बढ़त बनायीं हुई है और वह आज भी अन्य क्षेत्रों और लोगों के दमन में लगा हुआ है उसके बाद उसके लिए कभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं. पाकिस्तान के चीन को छोड़कर अपने किसी भी पडोसी से मधुर सम्बन्ध नहीं है और आज भी उसके साथ केवल यही तमगा काम करता है कि वह मुसलमानों के लिए अलग से बनाया गया राष्ट्र है जो मुस्लिम समुदाय के लिए सर्वोत्तम साबित हो सकता है पर अपने गठन के तीन दशक में ही इस्लाम के नाम पर बनाये गए इस राष्ट्र ने बांग्लादेश में अपनी बढ़त खो दी थी जब मुक्तिवाहिनी के संघर्ष और पाकिस्तान के दमन के चलते पूर्वी पाकिस्तान उससे अलग हो गया था.
                                            निश्चित तौर पर पाकिस्तान में सेना सबसे आगे है पर सैन्य समाधान सदैव सही नहीं हुआ करते हैं और देश को सही दिशा देने के लिए राजनैतिक पहल भी आवश्यक हुआ करती है. अमेरिका के सन्दर्भ में यदि गौर से देखा जाये तो पाकिस्तान से जिस दिन उसका मतलब समाप्त हो जायेगा और वह उसके काम आना बंद हो जायेगा तो वह नाटो और अन्य क्षेत्रीय संगठनों को साथ लेकर उसके वर्तमान स्वरुप को बिगाड़ने का काम भी आसानी से कर सकता है. वर्तमान रूप का अखंड पाकिस्तान केवल तब तक ही दुनिया के नक़्शे पर है जब तक उसके पास अमेरिका की शक्ति है और जब भी अमेरिका के हितों पर पाकिस्तान से सीधे चोट की जाएगी तो वह इसके टुकड़े करने से भी बाज़ नहीं आएगा यह बात पाकिस्तान की समझ में नहीं आ रही है. आने वाले समय में पाकिस्तान के सिमटते स्वरुप से जहाँ पश्चिमी देशों को आसानी होगी वहीं वे इसके लिए अपनी सुविधा के अनुसार मानवाधिकार की बातें करते हुए पाकिस्तान पर भी हमला करने से नहीं चूकेंगें. वैसे भी केवल इस्लाम और सेना के नाम पर ही पाकिस्तान एक है वर्ना आज वहां के हर क्षेत्र में बड़ा असंतोष आसानी से महसूस किया जा सकता है जो कभी भी एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान के लिए समस्या खड़ी कर सकता है.
                                        पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के दावे को कश्मीर में सही नहीं माना जा सकता है सिर्फ इसलिये ही आज तक संयुक्त राष्ट्र से लगाकर किसी भी अन्य मंच से पाकिस्तान द्वारा यह मामला लगातार उठाये जाने के बाद भी उसे कोई मजबूत समर्थन या आश्वासन नहीं मिल पाया है जबकि अमेरिका उसकी आज़ादी के बाद से उसके साथ हर तरह की सुविधा और सहायता लेकर मौजूद रहा करता है. आने वाले समय में अराजक होते पाकिस्तान के खिलाफ उसका परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र होना ही बहुत बड़ा हथियार बन सकता है क्योंकि किसी एक बड़ी घटना के बाद पाकिस्तान के असुरक्षित परमाणु ज़खीरे को निष्क्रिय करने के लिए पूरी दुनिया में एक सहमति भी बन सकती है. भारत से पाकिस्तान की चाहे जितनी भी असहमति हो पर खुले तौर पर भारत के खिलाफ परमाणु हथियार का उपयोग करने के दुष्परिणाम से पाकिस्तान अच्छी तरह से वाकिफ है और वह जेहादियों को विभिन्न हथियारों की जानकारी देकर पश्चिमी देशों और अमेरिका के खिलाफ उन्हें उकसाने का काम करने में ही अपने हित भी देखता है. भारत यदि पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों उसी तरह से हस्तक्षेप करने लगे जैसा पाकिस्तान किया करता है तो उसके लिए अपने अस्तित्व को बचाये रखना भी कठिन होने वाला है यह बात खुद पाकिस्तान की सेना और राजनेताओं के संज्ञान में है संभवतः इसलिए ही वे कश्मीर में हर तरह का परोक्ष समर्थन देकर उसकी आज़ादी की बातें किया करते हैं और कश्मीरियों को भड़काने का काम करते रहते हैं.
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मंगलवार, 9 अगस्त 2016

भारत भाग्य विधाता

                                                                                      कुछ भी कहकर जल्दी ही अपने को मीडिया और लोगों की नज़रों में चढाने की एक नयी मानसिकता के साथ आजकल देश में नया चलन चल पड़ा है. इलाहाबाद के एक स्कूल प्रबंधन द्वारा जिस तरह से राष्ट्रगान में आयी पंक्ति "भारत भाग्य विधाता" को इस्लाम की मान्यताओं के विरुद्ध बताकर अपने स्कूल में उसके गाने पर प्रतिबंध लगा रखा गया था वह अपने आप में अजीब तरह की घटना ही है क्योंकि पूरे देश में कुछ लोग इस तरह की बातें करके अनावश्यक रूप से बेमतलब की चर्चाओं को सुर्ख़ियों में रखने का काम किया करते हैं. आज़ादी के बाद बनायीं गयी संविधान सभा ने "जन गण मन" को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया था और आज तक किसी मुस्लिम की तरफ से इस तरह से इसके विरोध की बात नहीं की गयी है पर अचानक से इलाहाबाद में किसी एक व्यक्ति को लगता है कि राष्ट्रगान इस्लाम विरोधी है ? असल में समस्या का मूल कारण कुछ और ही है जहाँ पर आज कोई भी खुद को इस्लाम का रक्षक बताकर इस तरह की बातें करके चर्चा में आ जाना चाहता है और दुर्भाग्य से हमारा कानून इस तरह के किसी भी मामले को ठीक ढंग से संभाल नहीं सकता है या फिर जिनके हाथों में कानून की रक्षा का भार है वे खुद ही इस तरह की परिस्थिति में संज्ञा शून्य हो जाते हैं.
                                     देश ने आम नागरिकों को मौलिक अधिकारों के अंतर्गत व्यक्तिगत रूप से पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दे रखी है पर साथ ही उन कर्तव्यों के बारे में भी स्पष्ट कर रखा है जिनकी देश नागरिकों से अपेक्षा करता है. आज देश के किसी भी धर्म को मानने वाले नागरिक को समान अधिकार मिले हुए हैं फिर क्यों कुछ नागरिक इस तरह की अनावश्यक बातों को लेकर पूरे समाज को इतनी आसानी से कटघरे में खड़ा कर सकते हैं ? क्या इन लोगों को अपने कर्तव्यों को भूलकर अधिकारों के अतिक्रमण करने के कारण इनके अधिकारों से वंचित नहीं कर देना चाहिए और क्या इनका अपने समाज को नीचा दिखाने के प्रयास में समाज से बहिष्कार नहीं होना चाहिए ? पर यह सब समाज के अंदर से ही हो सकता है तथा कानून आवश्यकता पड़ने पर अपने अनुसार कार्य कर सकता है जिसका समाज पर कोई असर नहीं पड़ता है. कोई भी व्यक्ति देश में अपनी धार्मिक मान्यताओं को केवल तब तक मान सकता है जब तक वह दूसरे की मान्यताओं में दखल नहीं देता है किसी भी तरह से अपनी मान्यताओं को कोई भी व्यक्ति या समाज सार्वजानिक रूप से दूसरे पर नहीं थोप सकता है यह भी इस देश के संविधान में लिखा है.
                                आज देश में संविधान में मिले अधिकारों पर जिस तरह से कुतर्क किये जाने लगे हैं उनसे लगता है कि हम भारतीय समाज के रूप में इतने अधिकारों को पचा नहीं सकते हैं तो संसद को एक बार फिर से नागरिकों को दिए गए अधिकारों पर विचार करना चाहिए और मुंह फाड़कर अधिकारों की दुहाई देने वालों के मुंह पर कर्तव्यों की उचित सिलाई भी करनी चाहिए. सभी को यह बात याद रखनी चाहिए कि अधिकार खैरात में मिली हुई वस्तु नहीं बल्कि कर्तव्यों के समुचित निर्वहन के पुरुस्कार स्वरुप मिली हुई नेमत ही है और यदि हम अपने कर्तव्यों में अनुत्तीर्ण होते हैं तो हमारे अधिकारों में आने वाले समय में कटौती की संभावनाएं भी स्वतः ही बढ़ जाती हैं. जिस एक स्कूल और उसके प्रबंधकों को कुछ पंक्तियों से उनकी धार्मिक मान्यताओं का अतिक्रमण होता दिखाई देता हैं क्या उन्हें अपने समाज पर लगने वाले उस सवाल की खरोंचे महसूस नहीं होती हैं जिनके भरने में काफी समय लगने वाला है ? क्या वे मौलाना आज़ाद, शहीद वीर अब्दुल हमीद और अब्दुल कलाम जैसे लोगों से अधिक धार्मिक हैं जिनके दिलों में धर्म से पहले हिंदुस्तान बसता था ? वंदे मातरम और भारत माता की जय बोलते हुए जब अब्दुल हमीद ने इस्लामी देश पाकिस्तान के पैटर्न टैंकों को ध्वस्त करना शुरू किया था तब क्या उनकी धार्मिक मान्यताएं नहीं थीं ? अवश्य थीं पर वे उस समय इस देश से मिले हुए अधिकार के इस्तेमाल के साथ अपने कर्तव्यों में पूरी तरह से डूबे हुए थे पर उनको कुछ भी करके मशहूर होने के स्थान पर अपने कर्तव्यों को पूरा करने से मिलने वाली शोहरत ज़्यादा प्यारी थी.      
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रविवार, 8 मई 2016

आतंकी, संदिग्ध, सुरक्षा और संविधान

                                                                 दिल्ली पुलिस द्वारा प्रतिबंधित संगठन जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) के कुछ दिन पहले हिरासत में लिए गए १३ युवकों में से ४ को प्राथमिक पूछताछ के बाद कोई सबूत न मिलने के बाद छोड़ दिया जो कि जाँच की दिशा की सही प्रगति को दिखाता है. पुलिस के अनुसार इन युवकों में बहुत अधिक गुस्सा था और वे इसी के चलते वैचारिक रूप से इस प्रतिबंधित संगठन के साथ जुड़ने के स्तर तक की बात सोचने लगे थे. आज वैश्विक आतंक की जो स्थिति है उसमें जब एक बड़ा परिवर्तन आ चुका है कि पहले यह देखा जाता था कि आर्थिक रूप से परेशान युवकों और परिवारों को अपने जाल में उलझाने के लिए आतंकियों के स्लीपर मॉड्यूल काम किया करते थे पर पिछले कुछ वर्षों में संचार क्रांति के चलते आम लोगों तक सूचनाओं की वैश्विक पैठ हुई जिसके बाद सभी लोगों को हर बात जानने के स्तर तक सूचनाएँ मिलने लगीं. निश्चित तौर पर आतंकी संगठन इस बात पर ध्यान दे रहे थे कि उनके साथ जुड़ने वालों में पूरे विश्व से शिक्षित लोग भी हों जिनका बाद में उपयोग कर वे आमलोगों को यह समझाने का प्रयास कर सकें कि देखो जिहाद की अवधारणा में अब सभी लोग शामिल हैं. पूरे विश्व में जिस तरह से आतंकियों ने अपनी चाल से इस पूरी लड़ाई को इस्लाम बनाम अन्य में बनाने के लिए प्रयास किया उसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए क्योंकि बिना उचित सबूतों के आतंक प्रभावित हर देश में संदिग्ध बताकर लोगों को हिरासत में रखने का चलन बढ़ने लगा जिसके बाद इन जेहादी गुटों का काम और भी आसान हो गया और वे यह कहने लगे कि अब पूरी दुनिया इस्लाम के खिलाफ एकजुट हो रही है.
                                            इस मुद्दे पर यदि भारत की बात की जाये तो हमारे लचर पुलिस और सुरक्षा ढांचे के साथ अभियोजन और जजों की कमी ने भी दोषियों के साथ निर्दोषों को भी अनावश्यक रूप से परेशान करने का काम ही किया है. यह बात पूरी तरह से सही है कि किसी भी आतंकी सम्बन्ध के महसूस होने पर हमारी सुरक्षा एजेंसियां हर उस व्यक्ति को हिरासत में लेने की कोशिश करती हैं जिसे उनके संदिग्ध किसी भी रूप में जानते हों जिसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह भी पड़ता है कि जिन चंद लोगों के खिलाफ सबूत खोजे जाने चाहिए उनके स्थान पर भीड़ के लिए सबूत ढूँढ़ने का काम किया जाने लगता है. जब मुख्य मुद्दे से फोकस हट जाता है तो सबूत इकठ्ठा करने की प्रक्रिया का अनुपालन भी नहीं हो पाता है. यह भी पूरी तरह से सच ही है कि हमारी पुलिस, सुरक्षा और ख़ुफ़िया एजेंसियां आज भी नए और आधुनिक तरह से त्वरित ढंग से काम करना नहीं सीखा पायी हैं जिसके चलते बिना मतलब के केवल संदेह के आधार पर ही लोगों को जेलों में रखे जाने की प्रवृत्ति भी बढ़ गयी है. इस ताज़ा मामले में जिस तरह से दिल्ली पुलिस ने इन चार छोड़े गए युवकों के लिए मानसिक चिकित्सक और सलाह की सहायता की व्यवस्था की है वह बिलकुल सही कदम है क्योंकि यदि कोई इन युवकों को भड़का रहा है तो उसके पीछे के कारण खोजे जाने चाहिए तथा उनको दूर करने का प्रयास भी किया जाना चाहिए.
                                    इन चार के बाद जो शेष लोग अभी भी हिरासत में हैं उनके बारे में भी जल्दी से ही सबूतों पर विचार कर निर्दोषों को छोड़ने का काम किया जाना चाहिए जिससे आतंक समर्थक किसी भी स्लीपर मॉड्यूल को यह कहने के अवसर न मिलें कि भारत में मुस्लिम युवकों को अवैध तरीके से हिरासत में रखा जाता है. ख़ुफ़िया एजेंसियों और पुलिस को इस तरह के मामलों से निपटने में विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए और उन्हें यह भी समझाया जाना चाहिए कि ऐसे मामलों में बहुत तेज़ी से अंजाम तक पहुँचाया जाये. केवल संदेह के आधार पर हिरासत में लिए गए लोगों के परिजनों को उनसे मिलने पर किसी भी तरह की पाबन्दी भी नहीं होनी चाहिए जिससे घर वाले भी संतुष्ट रहें कि उनके परिजन पुलिस के पास भी सुरक्षित हैं. किसी दुष्चक्र में फंसकर आतंकियों के हाथों तक पहुँचने वाले युवकों के साथ पुलिस को जानकारी हासिल करने के साथ सहयोग की भावना भी दिखानी चाहिए क्योंकि जो वास्तव में आतंकियों से मिला हुआ होगा उसे छोड़ने पर आतंकी खुद अपने भेद खुलने के डर से मारने से नहीं चूकेंगे इसलिए ऐसे मामलों में पुलिस को बहुत अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता भी है.
                                     हमारी पुलिस को आतंकियों से सम्बन्ध रखने वाले किसी भी केस को सही तरह से सबूतों को इकठ्ठा करने से लगाकर अभियोजित करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए क्योंकि आज पूरे देश में हमारा पुलिस तंत्र अंग्रेज़ों के ज़माने की परंपरा का निर्वहन करने में ही लगा हुआ है. अभी भी ठोस सबूत कैसे इकठ्ठा किये जाते हैं और उनको किस तरह से अभियोजित किया जाना चाहिए इस मामले में हमारी पुलिस पूरी तरह से लचर ही साबित होती है. अब समय आ गया है कि आतंकी गतिविधियों उनके समूहों स्लीपर मॉड्यूलों से निपटने के लिए हर राज्य के युवा पुलिस अधिकारियों की विशेष ट्रेनिंग शुरू की जाये जिससे वे सतही जांचों से आगे बढ़कर वास्तविक सबूतों पर विचार कर सकें तथा सबूतों के अभाव में संदिग्धों को तुरंत रिहा करने का साहस भी दिखा सकें. सबूत मिलने के बाद इन मुक़दमों को सामान्य अदालतों में चलाये जाने के स्थान पर विशेष स्थानों पर ही चलाया जाना चाहिए और यदि संभव हो तो सबूत इकठ्ठा करने के बाद आतंकी गतिविधियों से जुड़े सभी मामले राज्यों की राजधानियों में ही पंजीकृत किये जाने चाहिए जिससे पुलिस के प्रशिक्षित लोग वहां पर अदालती कार्यवाही के लिए पूरा समय देने के लिए उपलब्ध भी हों. संदेह के आधार पर लिए गए लोगों के खिलाफ सबूत इकठ्ठा करने के लिए भी एक समय सीमा होनी चाहिए जिसके बाद उन्हें विशेष निगरानी के साथ घर जाने की अनुमति भी होनी चाहिए क्योंकि इससे आम लोगों में पुलिस और व्यवस्था के प्रति गुस्सा कम होगा जो कि लम्बे समय में देश के लिए अच्छा ही साबित होगा.         
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सोमवार, 18 अप्रैल 2016

प्रोटोकॉल और सम्मान

                                                                  अपनी ईरान यात्रा के दौरान विदेश मंत्री सुषमा स्वाराज ने राष्ट्रपति हसन रूहानी के साथ जिस तरह से ईरानी और इस्लामिक परम्पराओं का सम्मान किया वैसा लम्बे समय से राजनयिक हलकों में किया जाता रहा है क्योंकि जब बात दो सभ्यताओं और संस्कृतियों और देशों के लोगों के मिलने की होती है तो दूसरे पक्ष का सम्मान करने से कोई भी देश या उसका प्रतिनिधि छोटा नहीं हो जाता है. भारत और भारतीय नेताओं से सदैव ही दूसरे देशों की स्थानीय और धार्मिक परम्पराओं का अनुपालन ही किया है तो उस परिस्थिति में सुषमा स्वराज को लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह से आलोचनाओं का दौर शुरू हुआ है उसका कोई मतलब ही नहीं बनता है. इस बात को लेकर जिस तरह से भारत में भाजपा और सरकार के हिंदुत्व वादी एजेंडे से पीछे हटने को लेकर जिस तरह की टिप्पणियां देखने को मिल रही हैं दोनों देशों के हज़ारों वर्षों के साझा इतिहास के सामने उसका कोई महत्त्व नहीं है और अच्छा है कि भारत सरकार भी अभी तक स्थापित विदेश नीति के उन तत्वों में भारतीयता का वह पुट बनाए रखना चाहती है.
                                                   किसी भी क्षेत्र विशेष या राष्ट्र के दौरे के समय महत्वपूर्ण भारतीय नेता इस तरह की सौजन्यता को सदैव ही प्रदर्शित करते हैं जिसके माध्यम से दूसरे देश के लोगों और विश्व में यह सन्देश दिया जा सके कि भारत उनकी परम्पराओं और धार्मिक मान्यताओं का पूरा सम्मान करता है यह छोटे छोटे कदम होते हैं जो कई बार बड़ी कूटनीतिक सफलता तक ले जाने में नेताओं को बहुत मदद किया करते हैं. भारतीय समाज और लोग सदैव ही मुल रूप से सहिष्णु रहे हैं और उनके इस गुण के कारण ही आज पूरे विश्व में भारत के लोगों को जो सम्मान दिया जाता है वह अन्य लोगों के लिए दुर्लभ होता है. सुषमा स्वराज का सांकेतिक पोशाक पहन कर ईरानी मान्यताओं का सम्मान करना उन्हें या भाजपा को कहीं से भी असहज नहीं कर सकता है क्योंकि ईरान में भारत की छवि परम्परावादी देश की ही है. दूसरों के सामने भारतीय समाज भी अपनी बहु बेटियों को सर ढकने की सलाह देने में नहीं चूकता है तो सुषमा स्वराज का ऐसा करना किसी भी तरह से गलत नहीं कहा जा सकता है क्योंकि इससे पहले लम्बे समय तक देश पर शासन करने वाली पूर्व पीएम इंदिरा गांधी भी स्वयं कभी भी सर से पल्लू को हटने नहीं देती थीं.
                                               भारतीय समाज की सौजन्यता को किसी से भी सीख लेने की आवश्यकता नहीं है तथा देश में इस तरह से सक्रिय कुछ तत्वों की बातों को पूरी तरह से अनदेखा भी किया जाना चाहिए. आज जिस तरह से सोशल मीडिया बहुत प्रभावी हो चुका है तो उस परिस्थिति में ऐसी बातें समाचारों में आने से पहले ही वहां पर जगह बना लेती हैं और उसके परिणाम स्वरुप इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इन बातों को समाचारों में शामिल करना पड़ता है. देश की अंतर्राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप दूसरे देशों की मान्यताओं और परम्पराओं का सम्मान करते हुए ही आगे बढ़ने की कोशिश सरकार को करनी चाहिए जिससे ईरान के साथ व्यापारिक, सांस्कृतिक सम्बन्धों के मज़बूत होने से दोनों देशों के लिए अच्छा समय आ सकता है. आर्थिक प्रतिबंधों के चलते जब ईरान के साथ अधिकांश देशों ने तेल व्यापार को बहुत कम या बंद ही कर रख था तब भी भारत ने उसके साथ तेल व्यापार को प्राथमिकता दी और अंतर्राष्ट्रीय दबाव को दोनों देशों के हितों में मानने से पूरी तरह इंकार ही कर दिया था तो आज परिस्थितियां व्यापार के अनुकूल होने पर भारत को अपनी इस विरासत को नए आयाम देने की आवश्यकता है न कि इस तरह के छोटे मामलों में उलझने की.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 3 अप्रैल 2016

चीन-पाक और आतंकवाद

                                                  जिहाद की अवधारणा को पूरे विश्व में फ़ैलाने में लगे हुए पाकिस्तान के कुछ आतंकी समूहों को वहां की सरकार का किस हद तक साथ मिलता है यह संयुक्त राष्ट में चीन द्वारा मसूद अज़हर से सम्बंधित मसले पर साफ़ हो गया है. आज वैश्विक आतंक को जिस तरह से सऊदी अरब से मिलने वाले पैसों के दम पर पाकिस्तान द्वारा अमली जामा पहनाया जा रहा रहा है उसके चलते वैश्विक आतंक से लड़ने में कई देशों का खोखलापन भी ज़ाहिर होता है. पूरी दुनिया जानती है कि धार्मिक शिक्षा के साथ अज़हर का संगठन किस तरह से पूरे पाक में जेहादी तत्वों की भर्ती में लगातार लगा रहता है और आज वहां की स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि आने वाले समय में समझदार लोग सीरिया और इराक की तरह वहां से पलायन करने के बारे में सोचना शुरू कर सकते हैं पर आज पाकिस्तान की नकारात्मक छवि के कारण वहां के निवासियों को पूरी दुनिया में संदेह की नज़रों से देखा जाने लगा है और साथ ही अब स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि किसी भी देश के मुसलमान को कुछ देशों में आसानी से प्रवेश भी नहीं मिल पा रहा है.
                                    भारत के पास जितने भी सबूत होते हैं पाक उनको एकदम से नकारने की अपनी पुरानी नीति पर ही चलता हुआ दिखाई दे रहा है बात चाहे पठानकोट से सम्बंधित विशेष टीम के भारत आने की हो या फिर संयुक्त राष्ट्र में आतंक से लड़ने की दोनों ही परिस्थितियों में पाक की तरफ से केवल दुनिया को सन्देश देने की कोशिशें भर चल रही हैं जिससे उस पर भारत से सहयोग न करने के आरोप आसानी से न लगाए जा सकें. भारत लम्बे समय से आतंकवाद से पीड़ित रहा है और हमारी तरफ से तीन दशकों से कही जा रही बातों को पूरे विश्व ने कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया क्योंकि उसको यह लगता था कि यह भारत की अपनी समस्या है पर आज जिस तरह से पूरे यूरोप समेत दुनिया का हर हिस्सा इस्लामी जिहाद की चपेट में आता जा रहा है तो इन देशों और इनके नेताओं कि आँखें खुल रही है पर चीन जैसे बहुत सारे देश आज भी वास्तविकता को इसलिए भी स्वीकार नहीं करते हैं क्योंकि उनके मुक़ाबले खड़े होने की स्थिति में आ चुके भारत के खिलाफ षड्यंत्रों के माध्यम से केवल पाक के ये जेहादी तत्व ही कुछ काम कर सकते हैं तथा भारत मजबूरी में ही सही पर अपने संसाधनों को इस क्षेत्र में लगाने के बारे में सोचेगा.
                               निश्चित तौर पर इस बार भी चीन को अपने निकटस्थ सहयोगी पाक के मसूद को बचाने के बदले में पाकिस्तान से बहुत कुछ हासिल भी हो सकता है पर इससे वैश्विक आतंक से लड़ने की उस परिकल्पना को बुरी तरह  धक्का लगने वाला है जिसके चलते इन मुट्ठी भर आतंकियों को नियंत्रित करने के बारे में सोचा जा रहा है. एक तरफ यूएएन आतंकवाद पर परिचर्चा करता है जिसमें विश्व भर के नेता आते हैं वहीं चीन अपनी राजनीति के चलते अपने वीटो का उपयोग कर पाक को बचाने का काम करता हुआ नज़र आता है. निश्चित तौर पर अब भारत के लिए चीन को कडा सन्देश देने का समय आ चुका है और इस मामले को सभी स्तरों पर उठाया जाना भी चाहिए जिससे विश्व के अन्य देशों का सहयोग भारत को मिल सके. भारत अपने यहाँ चीन की आर्थिक गतिविधियों पर नियंत्रण लगाकर भी उसे कडा सन्देश दे सकता है पर व्यापार को हर मुद्दे पर प्राथमिकता देने में लगी मोदी सरकार किस हद तक इससे अलग हो पायेगी यह समय ही बताएगा क्योंकि हमारे दम पर अपनी आर्थिक समृद्धि को आगे ले जाने के बाद चीन यदि हमारे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम करने की तरफ जाता है तो हमें भी उसके साथ अपने आर्थिक सम्बन्धों को नए सिरे से परिभाषित करने के बारे में गम्भीरता सोचना ही होगा.    
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शनिवार, 23 जनवरी 2016

भारतीय युवा मुस्लिम

                                                                        एक बार फिर से एनआईए द्वारा देश भर में कई जगह छापेमारी के बाद जिस तरह से आतंकी संगठनों के स्लीपर सेल के रूप में काम कर रहे लोगों को संदेह के आधार पर पकड़ा है उसके बाद २६ जनवरी को देश भर में गड़बड़ी करने के लिए प्रयासरत लोगों के लिए यह काम करना उतना आसान नहीं रहने वाला है क्योंकि इसके बाद ख़ुफ़िया एजेंसियों और पुलिस की नज़रें भी इस तरह की गतिविधियों पर अधिक जम गयी हैं. इस स्थिति में जब तक कुछ ठोस सबूत हाथ नहीं आते हैं तब तक गृह मंत्रालय भी कुछ कहने से बच रहा है और उसकी तरफ से अभी तक इस बात की पुष्टि भी नहीं की गयी है कि इन संदिग्धों के आईएस से कोई सम्बन्ध हैं भी या नहीं. रूड़की से हिरासत में लिए गए चार संदिग्धों से मिली जानकारियों के अनुसार ही विभिन्न एजेंसियों द्वारा जाँच को आगे बढ़ाये जाने पर इस तरह की कुछ और सूचनाएँ भी सामने आती चली गईं जिससे यह संदेह होने लगा कि भले ही ये सभी लोग इस ख़ुफ़िया मिशन में सीधे तौर पर शामिल न हों पर उनके इस गतिवविधि में शामिल लोगों के साथ कुछ सम्बन्ध तो अवश्य ही थे.
                                                            आईएस और अन्य आतंकी संगठनों की यही चाल रहा करती है कि वे अपने समूह को मज़बूत करने के लिए की जाने वाली नयी भर्ती के लिए कुछ ऐसा मसाला इकठ्ठा कर सकें जिससे वे यह साबित कर सकें कि भारत में मुसलमानों के साथ बहुत अत्याचार हो रहा है. इस तरह के भ्रामक प्रचार के दम पर वे पहले से ही कुछ लोगों को अपने पक्ष में करने में कुछ हद तक सफल भी हुए हैं पर तालिबान और अल क़ायदा जैसे संगठनों की तरह उनकी नज़रें भी भारत के विशाल मुस्लिम जनमानस पर ही टिकी रहती हैं कि किस तरह से इस बड़ी आबादी के युवाओं को अपने जोड़ने में सफलता मिले. यह बहुत ही घातक स्थिति हो सकती है क्योंकि अभी तक इंटरनेट के प्रसार के कम होने के कारण किसी संगठन को नेट के माध्यम से जानकारी नहीं मिल पाती थी पर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से भारत के दूर दराज़ के क्षेत्रों में भी इंटरनेट की पहुँच हो गयी है उसके बाद यही लगता है कि आने वाले समय में इस तरह से आतंकियों दुष्प्रचार से प्रभावित होकर उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले युवाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी भी हो सकती है क्योंकि धर्म पर आधारित मामलों के सामने आने पर व्यक्ति सामाजिकता आदि को बहुत आसानी से भूल जाता है.
                                           इस परिस्थिति में जाँच एजेंसियों के साथ पुलिस की ज़िम्मेदारी भी विवेचना करने के स्तर पर बहुत बढ़ जाती है क्योंकि अभी तक इस तरह के अधिकांश मामलों में विवेचना की गुणवत्ता उतनी अच्छी नहीं होती कि संदिग्ध बताकर हिरासत में लिए गए लोगों के खिलाफ आरोपों को कोर्ट में साबित किया जा सके जिस कारण से भी कई बार निर्दोषों को लम्बे समय तक जेल में रखे जाने की कई घटनाएँ सामने आई हैं. विवेचना करने वाली एजेंसियों को अब अधिक जागरूक और कानून परक होने की आवश्यकता है तथा जिन लोगों के खिलाफ मज़बूत सबूत हों केवल उनके खिलाफ ही आरोप पत्र भी दाखिल करने के बारे में ही सोचना चाहिए अन्य लोगों को केवल निगरानी के स्तर तक ही रखा जा सकता है. हलके आरोप कभी भी अदालतों में नहीं टिक सकते हैं तो इस दिशा में बिना सबूतों के किसी को भी आरोपी बनाये जाने की मानसिकता से बचने की आवश्यकता है. यहाँ पर यह बात इसलिए सामने आती है क्योंकि अभी तक अधिकांश मामलों में यही सब होता रहा है और सामान्य कानून व्यवस्था से जुडी समस्याओं की तरह से ही इन घटनाओं की विवेचना भी की जाती है.
                                          इस परिस्थिति से निपटने के लिए अब हमारी केंद्र और राज्य की सभी जांच एजेंसियों के साथ  ख़ुफ़िया एजेंसयों का तालमेल भी किया जाना चाहिए जिससे विवेचना में आवश्यक सभी तथ्यों का समावेश किया जा सके तथा जो वास्तव में संदिग्ध हों केवल उनको ही आरोपी बनाया जाना चाहिए जिससे मुक़दमें की सुनवाई भी तेज़ी से संभव हो सके. क्या आज हमारी पुलिस के स्तर पर की जाने वाली अधिकांश विवेचना आतंकी मामलों में भी उसी तरह टिक सकती है जैसी अन्य मुक़दमों में अनावश्यक रूप से टिकी रहती है ? देश की ख़ुफ़िया व्यवस्था के साथ ही अब इस दिशा में भी अधिक तार्किक विवेचना करने की आवश्यकता है और यह हमारी पुलिस अपने आप नहीं सीख सकती है. इसके लिए उसे आधुनिकतम तकनीक से साथ कानून के उन पहलुओं की बारीक जांच भी सिखाई जानी चाहिए जिनके सबूत के तौर पर साबित न कर पाने के कारण कई बार सामान्य और आतंक आदि के मामलों में संदिग्ध लोग आसानी से छूट जाया करते हैं.
                                    इस सबके साथ जो सबसे आवश्यक बात है अब उस पर भी सभी को ध्यान देने की आवश्यकता भी है कि आखिर हमारे युवा मुस्लिमों में से कुछ लोग किस तरह से आतंकी चंगुल में आ जाते हैं ? इस पहलू पर आज भी अधिक ध्यान नहीं दिया जा रहा है क्योंकि इस शिकंजे में उनके उलझने से बचने के लिए क्या उपाय अपनाये जाने चाहिए इस बारे में युवाओं को कोई जागरूक नहीं करना चाहता है. आज युवाओं को इन आतंकी संगठनों के संपर्क में आने के खतरों के बारे में स्पष्ट रूप से समझाया जाना चाहिए और साथ ही यह भी बताया जाना चाहिए कि आतंक की राह पर चलकर उनके परिवार और मित्रों को बाद में किस तरह से समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. इस तरह के किसी भी धार्मिक, आर्थिक या सामाजिक प्रलोभन से किस तरह से बचा जाये इस बात की भी जानकारी युवाओं को दी जानी चाहिए साथ ही उनके लिए हर जिले में एक हेल्पडेस्क भी होनी चाहिए जहाँ पर वे अपने आस पास होने वाली किसी भी संदिग्ध गतिविधि और परिस्थिति की सूचना गोपनीय तरीके से भी दे सकें. जागरूक युवाओं के साथ देशद्रोह में लगे हुए लोगों को चिन्हित करना आसान रहने वाला है और जो शिक्षित युवा भी धार्मिक होने के कारण इस गिरफ्त में आ जाते हैं उनको भी बचाने की आज बहुत आवश्यकता भी है जिससे देश सुरक्षित होने के साथ एक साथ आगे बढ़ने के बारे में सोचना शुरू कर सके.           
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रविवार, 3 जनवरी 2016

पाकिस्तानी आतंक और भारतीय राजनीति


                                                              आज़ादी के बाद से ही जिस तरह से पाकिस्तान की तरफ से भारत को अस्थिर करने की एक स्थायी नीति पर काम किया जा रहा है वहीं उसके मुकाबले भारत की पाकिस्तान से सम्बंधित नीति में लगातार राजनीति के चलते गंभीर बदलाव देखे जाते रहे हैं जिसका परिणाम आज देश के सामने है. पाकिस्तान में जहाँ १९४७ के कबाइली से लगाकर आज तक सेना, राजनेता, धार्मिक नेता, जिहादी और आतंकवादियों में भारत के प्रति एक नीति स्पष्ट रूप से देखी जाती है वहीं हमारे यहाँ इसे केवल सत्ता और विपक्ष की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है जिससे भी आज़ादी कितने वर्षों बाद भी राजनैतिक रूप से भारत इस मामले में सदैव ही पाकिस्तान से पिछड़ जाता है. भाजपा की विपक्ष में रहते हुए बेहद आक्रामक पाक नीति सामने आती है पर जब उसे सत्ता मिलती है तो उसके शीर्ष नेता अपने अतीत के बयानों और नीतियों को भूलकर केवल पाकिस्तानी नेताओं के साथ गलबहियां करते हुए ही नज़र आते हैं. भारत में राजनैतिक दलों के स्थान पर सत्ता की लचर पाकिस्तान नीति है जो सत्ता पक्ष को चुप करा विपक्ष में बैठे हुए नेताओं को सरकार पर हमला करने का अवसर देने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर पाती है.
                                 पिछले १० वर्षों में इस तरह के हमलों के समय जिस तरह से सत्ता में होने के कारण कांग्रेसी नेता सधे हुए शब्दों में बयान दिया करते थे आज वह स्थिति भाजपा के सामने आ चुकी है और जिस तरह की आग भाजपा वाले विपक्ष में रहकर उगला करते थे अभी वहां तक पहुँचने में कोंग्रेसियों को बहुत समय लगने वाला है. इस परिस्थिति में अब सरकार के पास करने के लिए क्या होता है और क्या अब भी हमारी संसद और नेता इस आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से बाहर निकल कर पाकिस्तान पर कुछ ठोस नीति बनाये जाने के बारे में सोचना भी चाहते हैं ? आज भाजपा के नेता आतंक के मुद्दे पर राजनीति न करने की सलाह देते हुए नज़र आ रहे हैं पर वे अपने उस समय को भूल जाते हैं जब ऐसे किसी भी मुद्दे पर वे कांग्रेस नीत सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाने से नहीं चूकते थे ? यदि भाजपा तब सही थी तो इसका मतलब यही है कि आज भाजपा मुस्लिम तुष्टिकरण में आकंठ डूबी हुई है और कांग्रेस पूरी तरह से राष्ट्रवादी रुख पर चल रही है ? महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश के नेताओं का यह मतिभ्रम आखिर हमें और देश को कहाँ ले जाने वाला है इसका उत्तर किसी के पास भी नहीं है.
                 आतंक का कोई धर्म नहीं होता पर आज के वैश्विक परिवेश में जिस तरह से विभिन्न देशों के चंद महत्वाकांक्षी लोगों द्वारा कम समय में अपने प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए इस्लाम का सहारा लिया जा रहा है उससे अधिकतर खूंखार आतंकी संगठन मुस्लिम ही दिखाई दे रहे हैं. आतंक का जो भी वैश्विक स्वरुप है वह भारत के नियंत्रण से बाहर ही है पर आज भी पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के सामने मजबूर होते पाकिस्तानी नेता सदैव ही रबर स्टाम्प से अधिक कुछ भी नहीं होते हैं. इस तरह के हमले की पटकथा तो २५ दिसंबर को मोदी की लाहौर यात्रा के दौरान ही लिख दी गयी थी क्योंकि यदि भारत पाक के बीच विवाद समाप्त होता है तो दुनिया भर से कश्मीर और जिहाद के नाम पर इकठ्ठा किये जा रहे पैसों पर रोक लग जाएगी और इन कथित धार्मिक, आतंकी और सेना के लिए जिहाद के लिए पैसे मिलने बंद हो जायेंगे. पाक अपनी नीति को समय समय पर भारत के साथ राजनैतिक स्तर पर भी ज़िंदा रखने की कोशिश करता रहता है जिससे वह विश्व को सन्देश दे सके कि वह क्षेत्र में शांति चाहता है और भारत के सत्ता प्रतिष्ठान स्पष्ट नीति के अभाव में केवल बातचीत को पटरी पर रखने की बातें करते हुए ही नज़र आते रहते हैं.  मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

जम्मू-कश्मीर और ग्राम सुरक्षा समितियां

                                           १९८९ में कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों का एक सोची समझी रणनीति के तहत सफाया करने का पाकिस्तानी और हुर्रियत समेत कश्मीर के अलगावादियों का अभियान घाटी में उनके हिसाब से लगभग सफल ही रहा था जिसमें उन्होंने निर्दोष कश्मीरी पंडितों के खुले नरसंहार का मूक समर्थन किया था. इसके बाद पीर पंजाल के दूर दराज़ के क्षेत्रों में बसे हुए क्षेत्रों में ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए तैनात किये गए जवानों के अतिरिक्त एक विशेष योजना के अंतर्गत विशेष प्रशिक्षण और हथियार दिए गए थे जिसके बाद इस क्षेत्र में इन लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकी थी. आज इन ३००० ग्राम सुरक्षा समितियों में लगभग २४६०२ लोग एसपीओ के रूप में जुड़े हुए हैं जो आतंकियों के आने जाने समेत उनसे सीधे तौर पर मुक़ाबला करने और सुरक्षा बलों को महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए काम किया करते हैं. इस सप्ताह इन लोगों द्वारा तीन लोगों को मारे जाने के बाद घाटी में अलगाववादी राजनीति ने फिर से अपने सुर अलापने शुरू कर दिए हैं. यह सभी जानते हैं कि इन अलगाववादियों को कोई व्यापक समर्थन नहीं है पर खुद को नज़रों में आने से बचाने के लिये आम कश्मीरी इनका विरोध न कर मूक समर्थन में खड़ा नज़र आता है.
                              इस बार संभवतः गलत पहचान के कारण या जानबूझ कर ही इन लोगों द्वारा की गई गोलीबारी में एक बच्चे समेत तीन लोगों के मारे जाने के बाद आतंक समर्थक अलगाववादी भी इस मामले पर राजनीति करने लगे हैं और वे बहुत बेशर्मी के साथ यह भी कहते हैं कि इन समितियों द्वारा जम्मू क्षेत्र में एक विशेष अभियान के तहत मुसलमानों का सफाया किया जा रहा है. ये लोग यह भूल जाते हैं कि किस तरह से शांति पूर्वक घाटी के विकास में अपना योगदान दे रहे इनके पडोसी कश्मीरी पंडितों के साथ कितना अत्याचार किया गया था तब इनके पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं था क्योंकि तब वे भी घाटी को हिन्दू-सिख मुक्त करने के पाकिस्तान के अभियान का एक हिस्सा थे और किसी भी कश्मीरी धार्मिक नेता या हुर्रियत समेत अन्य किसी ने भी उन घटनाओं का खुला विरोध नहीं किया था ? आज जब जम्मू क्षेत्र में उनके हिसाब से इस तरह की घटना मुसलमानों के खिलाफ हुई है तो वे घाटी को बंद करने का आह्वाहन करने में लगे हुए हैं. क्या वे १९८९ में यह भूल गए थे कि जिन कश्मीर पंडितों को उन्होंने बेरहमी से मारने और अत्याचार करने पर चुप्पी साध रखी थी आज कश्मीर उनके बिना कैसा है ?
                        इस मामले में आम तौर पर सुरक्षा बलों और सुरक्षा समितियों पर ही अधिक दबाव रहा करता है क्योंकि जिस तरह से कश्मीरी मुसलमानों के हुर्रियत जैसे समूहों के नेताओं को अपनी सुविधा के अनुसार ही मानवाधिकार याद आते हैं वह अब नहीं चल सकता है क्योंकि आज उनके हर कदम पर दुनिया भर की नज़र भी रहा करती है. सद्भाव और सुरक्षा एक तरफा नहीं चल सकते हैं अच्छा होता कि हुर्रियत विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों को पूरी सुरक्षा और सम्मान से घाटी में लाने के लिए भी कभी घाटी में बंद का आह्वाहन करती जिससे इन ठोकर खा रहे कश्मीरी पंडितों को भी लगता कि घाटी में आज भी उन्हें याद किया जाता है. सुरक्षा बलों और ग्राम सुरक्षा समितियों को अपने कार्यवाही में विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक किसी भी गलती की गुंजाईश रहेगी हुर्रियत अपनी घटिया राजनीति से बाज़ नहीं आने वाली है. आज यदि कश्मीर में हुर्रियत के नेता इतना बोल पाते हैं तो वह भी भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती ही है क्योंकि उसके बिना किसी भी स्तर पर उनको इतनी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं मिल सकती थी. क्या पाकिस्तान या किसी अन्य इस्लामी देश में कोई इस तरह से सत्ता के खिलाफ इतना बोलकर भी सरकारी सुरक्षा का अधिकारी हो सकता है आज उनके लिए यह विचार करने का समय है. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 28 दिसंबर 2015

भारतीय मुसलमान और चुनौतियाँ

                                                            लखनऊ में मौलाना आज़ाद विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में बोलते हुए केंद्रीय गृह मंत्री ने जिस तरह से एक मुस्लिम परिवार का ज़िक्र किया जिसके मुखिया ने खुद उनसे संपर्क कर बेटे को आईएसआईएस के चंगुल में जाने से बचाने का अनुरोध किया था तो सभा में बैठे हुए लोगों को भी आश्चर्य हुआ. देश में राजनैतिक कारणों से जेहादी आतंक के किसी भी मामले पर मुसलमानों के जुड़ाव को लेकर एक अजीब तरह की बहस सदैव ही चलती रहती है जिसका आज के वैश्विक सूचना के युग में कोई स्थान नहीं होना चाहिए क्योंकि आज हर व्यक्ति के पास सूचना का सही गलत हर तरह का भंडार इंटरनेट के चलते उपलब्ध हो गया है. मुसलमानों के बीच बोलते हुए राजनाथ सिंह यदि इस तरह की बात कहना चाहते हैं तो यह एक तरह से उन परिवारों के लिए सन्देश भी हो सकता है जिनके बच्चे किसी भी कारण से आज जेहादी आतंक के किसी भी स्वरुप के प्रति नरम रुख अपनाते हैं और अपने परिवारों को अनावश्यक संकट में डाल दिया करते हैं. यह सही है कि अभी तक गरीबी और अन्य तरह की समस्याओं के चलते मुस्लिम युवाओं को गैर कानूनी कामों में समाज विरोधी तत्वों द्वारा आसानी से इस्तेमाल किया जा रहा था पर आईएस के आने के बाद अब पूरी दुनिया से शिक्षित और अमीर मुसलमानों का झुकाव भी इस तरफ बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है.
                                यह सही है कि दुनिया में मुस्लिम आबादी में दूसरे स्थान आने के बाद भी भारत से कभी भी अल क़ायदा, तालिबान या आईएस को उस अनुपात में कोई समर्थन नहीं मिला जिसकी आबादी के अनुरूप उन्होंने सदैव परिकल्पना ही की थी और आज भी भारत के मुसलमान उनके लिए एक चुनौती ही हैं कि इतने बड़े भूभाग पर वे अपने प्रभाव को उस तरह से नहीं जमा पा रहे हैं जैसा वे विश्व के अन्य देशों में करने में सफल रहे हैं. इस परिस्थिति में अब जब भारत के मुसलमानों के बारे में केंद्रीय गृह मंत्री भी यह मानते हैं कि कोई आतंकी संगठन यहाँ के मुसलमानों को उस तरह से प्रभाव में नहीं ले सकता है तो अब उनको राज्य सरकारों के साथ मिलकर संदिग्ध आतंकी संबंधों के चलते पूरे देश के विभिन्न स्थानों में हिरासत में लिए गए मुस्लिम युवाओं के बारे में सोचना चाहिए. ख़ुफ़िया जानकारी के दम पर जिस तरह से लोगों को पुलिस और अन्य एजेंसियों द्वारा उठाया जाता रहता है और उस प्रक्रिया को भी एक सुदृढ़ कानून के माध्यम से सही करने की आवश्यकता भी है और पुलिस को भी सही तरह से प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है जिससे वह विवेचना को सही तरह से पूरा कर मामले को ख़त्म करने की दिशा में बढ़ सके क्योंकि आज भी केवल संदेह के आधार पर बहुत सारे लोगों को इसी तरह से जेल में डालकर उनके खिलाफ कोई कार्यवाही भी नहीं की जा रही है.
                             पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे मामले भी सामने आये हैं जिनमें संदिग्ध लोगों को इसी तरह से हिरासत में लिया जाता रहा है और कई वर्षों की लम्बी कानूनी प्रक्रिया के बाद उन्हें कोर्ट द्वारा सबूतों के अभाव में बरी किये जाने की घटनाएँ भी हुई हैं. आतंक से जुड़े किसी भी व्यक्ति की गिरफ़्तारी और उसके खिलाफ विवेचना और मुक़दमा चलाने के लिए अब हमें अपने सिस्टम को सुधारने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक देश में सही कानून के द्वारा अपराधियों को सजा और संदिग्धों को सम्पूर्ण जाँच के बाद शीघ्रताशीघ्र रिहा करने की नीति नहीं अपनायी जाती है तब तक भारतीय मुस्लिम समाज में कुछ लोगों को अवैध तरीके से हिरासत में रखे जाने से पुलिस को नहीं रोका जा सकता है. अब समय आ गया है कि राजनाथ सिंह इस मुद्दे पर खुद ही पहल करें और चूंकि वे लखनऊ जैसे समृद्ध मुस्लिम संस्कृति वाले क्षेत्र का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं तो उन पर इस बात की अधिक ज़िम्मेदारी भी आ जाती है. अभी उनके पास इस दिशा में परिवर्तन करने के लिए काफी लम्बा समय है और यह बदलाव भाजपा की सरकार ही आसानी से कर सकती है क्योंकि मुसलमानों से जुड़े इतने संवेदनशील मुद्दों पर जब भी कांग्रेस या अन्य गैर भाजपा सरकारों द्वारा कुछ भी करने का प्रयास किया जाता है तो भाजपा सदैव ही उन पर मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाने का आरोप लगाया करती है.
                            देश की ख़ुफ़िया एजेंसियों के इनपुट्स पर पुलिस के लिए कार्यवाही करना ज़रूरी होता है क्योंकि कई बार इसके माध्यम से बड़ी घटनाओं को टालने में सफलता भी मिली है पर इसके जो कई अन्य खतरे सामने आते हैं भारतीय कानून और समाज के साथ सरकार भी कभी उनके परिणामों पर विचार नहीं करना चाहते हैं जिससे आतंकी संगठनों को इन आंकड़ों के माध्यम से उन भोले भाले युवकों को बरगलाने में आसानी होती है कि देखो किस तरह से भारत में निर्दोष मुसलमानों को सिर्फ इसलिए ही प्रताड़ित किया जाता है कि वे मुसलमान हैं. हालांकि इस दुष्प्रचार का कोई व्यापक असर नहीं होता है फिर भी युवाओं के मन में यह बात तो अवश्य ही आती है कि उनकी गलती क्या थी ? अब देश को इस बारे में सोचना ही होगा क्योंकि जब देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी को सुरक्षा और जीवन से जुडी हुई चिंताओं के बीच आतंकी संगठन से सांठ-गांठ होने के संदेह में लम्बे समय तक हिरासत में इन कोई मुक़दमा चलाये रखने की प्रवृत्ति दिखाई देगी तो उसके परिणाम बहु अच्छे भी नहीं हो सकते हैं. आज गृह मंत्री और पीएम के पास देश के अन्य पुराने कानून को समाप्त करने और उनके स्थान पर नए कानून लाने के अपने प्रयासों के बीच इस दिशा में भी गंभीरता के सह सोचना ही होगा क्योंकि जब तक देश के अंदर के माहौल को और भी अच्छा नहीं किया जायेगा तब तक दोनों तरफ से संदेह के बादलों की धुंध छंटने वाली नहीं है. 
    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 27 दिसंबर 2015

मोदी की पाक यात्रा

                                                                अपने त्वरित निर्णयों से देश दुनिया के राजनैतिज्ञों और मीडिया को चौंकाने में माहिर पीएम मोदी ने जिस गोपनीयता भरी तैयारी के साथ पाक की औचक यात्रा की उससे यही लगता है कि आने वाले समय में यदि भारत में किन्हीं इस्लामी जेहादी संगठनों द्वारा यदि कोई आतंकी हमला नहीं किया गया तो दोनों देशों के बीच के रिश्तों में अभूतपूर्व सुधार भी आ सकता है. भाजपा के पास सदैव ही इस बात की बढ़त रहा करती है कि वह आसानी से पाक से वार्ता कर सके क्योंकि देश के अन्य सभी दल पाक के साथ बराबरी के स्तर पर सम्बन्ध रखने की नीति पर लगभग सहमत ही दिखाई देते हैं और विपक्ष में रहने पर केवल भाजपा ही हर बार पाक से किसी भी तरह के सम्बन्ध बहाली पर आक्रामक रहा करती है. अटल के बाद मोदी भी इसी तरह की कोशिश करने में लगे हुए हैं क्योंकि सैद्धांतिक रूप से देश के सभी दल सीमा पर शांति ही चाहते हैं और आने वाले समय में यदि भारत-पाक संबंधों में गतिरोध टूटता है तो उसका लाभ दोनों देशों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक स्तर पर भी अच्छी तरह से मिलेगा.
                                                 भारत पाक में राजनैतिक स्तर पर इस यात्रा का जो समर्थन व विरोध किया जाना है वह शुरू भी हो चुका है पर जिस तरह से जेहादी संगठन इस मामले पर एकदम से अलग थलग पड़ गए हैं उससे यही लगता है कि इस सकारात्मक अवसर को रोकने के लिए वे किसी भी स्तर तक जा सकते हैं. भारत के पक्ष में इस बार जो सबसे महत्वपूर्ण बात जा रही है वह पेशावर सैनिक स्कूल पर आतंकियों के हमले के बाद सेना के रुख में बड़े बदलाव के रूप में है क्योंकि पिछले साल के उस हमले के बाद पहली बार पाक सेना से आतंकियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान शुरू किया था हालाँकि उसमें भी अभी तक उसने केवल तालिबान और अन्य विदेशी आतंकियों से समूह और ठिकानों को ही अधिक निशाना बनाया है पर भारत के विरुद्ध सक्रिय आतंकियों को अपनी मदद अभी भी जारी ही रखी है जिससे भारत पर हमले का खतरा अभी भी उतना ही बना हुआ है जैसा पहले रहा करता था. भारत के लिए आदर्श स्थिति तब तक नहीं आ सकती है जब तक पाक सेना खुद ही सीमा पर आतंकी गतिविधियों पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाती है और सीमा पर चल रहे उन जेहादी कैंप्स को बंद नहीं करती है.
                              सद्भाव बनाये रखने की अब बड़ी ज़िम्मेदारी पाक पर भी आ रही है हालाँकि इस बार जिस तरह से सेना के पूर्व जनरल जंजुआ को शरीफ ने पाक का एनएसए बनाया है उससे शरीफ सरकार और सेना के बीच संवाद बढ़ा भी है क्योंकि यदि मोदी की यात्रा के लिए सेना की तरफ से सकारात्मक रुख नहीं अपनाया जाता तो यह यात्रा के वैचारिक स्तर तक ही सिमट कर रह जाती. पाक सेना के रुख में वर्तमान बदलाव कोई बड़ा ह्रदय परिवर्तन नहीं है और कश्मीर को लेकर उसका रुख सदैव की तरह ही रहने वाला है इसलिए इस परिस्थिति में अब भारत को अधिक सतर्क रहने की भी आवश्यकता है क्योंकि ९८/९९ में इसी तरह के प्रयासों के साथ अटल की लाहौर यात्रा ने देश को कारगिल युद्ध की तरफ बढ़ा दिया था और हमारी ख़ुफ़िया जानकारियां किसी काम नहीं आ पायी थीं. यह भी सही है कि पाक के इस तरह के प्रयासों के बाद से अब हमारी सेना अधिक चौकन्नी भी रहने लगी है जिससे ऐसी किसी भी घुसपैठ की सम्भावना भी कम हो गयी है. दोनों देशों के बीच सम्बन्ध अब सुधरने चाहिए और पीएम मोदी को देश को विश्वास में भी लेना चाहिए जिससे एक बार शुरू की गयी प्रक्रिया को अब सही समय सीमा के साथ आगे बढ़ाने में भी सफलता मिले और दोनों देशों के बीच सम्बन्ध अच्छे स्तर तक पहुंचे.                               
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रविवार, 13 दिसंबर 2015

असहिष्णुता का वैश्विक रूप

                                                                 देश में पिछले कुछ महीनों से सहिष्णुता-असहिष्णुता पर चल रही बहस और राष्ट्रीय सम्मानों के साथ पुरुस्कार लौटने की जो प्रक्रिया चल रही थी आज पूरी दुनिया में उसी मुद्दे पर चर्चा शुरू हो चुकी है. अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद के चुनाव में उम्मेदवारी के लिए मैदान में उतरे डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह से वैश्विक इस्लामी चरमपंथ बढ़ने और उससे अमेरिका को सुरक्षित रखने के मसले पर अपने रुख को स्पष्ट किया था उसके बाद अमेरिका में भी इस मुद्दे पर बहस शुरू हो चुकी है. उनके बयान का किसी भी सभ्य समाज में समर्थन नहीं किया जा सकता है फिर भी उनकी बातों का समर्थन करने वाले आसानी से मिल जाते हैं क्योंकि आज भी जिस तरह से सम्पूर्ण मुस्लिम जगत में आईएस, बोको हरम, तालिबान और अल क़ायदा जैसे संगठनों का खुले तौर पर स्पष्ट विरोध नहीं किया जाता है वह कहीं न कहीं से अन्य समुदायों को इस तरह से इकठ्ठा होने का अवसर ही दिया करते हैं. आईएस आज भी दुनिया को मध्यकलीन कानून से चलाना चाहता है और वह अपने लाभ के लिए इस्लाम की मनमानी और उग्र व्याख्या करने से भी नहीं चूकता है जिससे जहाँ विश्व भर में मुस्लिम युवक उससे जुड़ने की कोशिशें करते हुए दिखाई देते हैं तथा वह अपनी उस रणनीति में सफल होता भी दिखाई देता है जिसके माध्यम से वह अपनी इस लड़ाई को इस्लाम बनाम गैर इस्लाम बनने की कोशिशों में लगा है.
                       इस्लाम की यदि आईएस द्वारा सही व्याख्या की जा रही होती तो भारत के एक हज़ार से अधिक धार्मिक विद्वानों की तरफ से संयुक्त राष्ट्र और अन्य देशों को आईएस के खिलाफ फ़तवा देने और भेजने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती. आज खुद इस्लाम के अनुयायियों को यह तय करना है कि उन्हें किस तरह का मुसलमान बनकर दुनिया में अपना सहयोग देना है क्योंकि कुछ संगठनों की हरकतों से आज पूरी दुनिया में मुस्लिम समुदाय को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है और अब खुद मुसलमानों पर ही इस बात का दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे अपने अंदर से उन लोगों को आगे करना शुरू करें जो इस्लाम के सही मूल्यों को आगे लाने का काम कर सकें. यह समय ऐसा है कि इस्लामी चरमपंथियों के दबाव को पूरा विश्व महसूस कर रहा है पर लोकतंत्र और मानवीय मूल्यों की रक्षा करने के संकल्प के साथ वे खुलकर इस तरह से कोई काम नहीं कर सकते हैं. यह भी सही है कि आज विभिन्न इस्लामी चरमपंथी गुटों को विश्व की बड़ी ताकतें अपने हितों को साधने के लिए मदद दे रही हैं पर इससे पूरे विश्व में जो बंटवारा हो रहा है वह आने वाले समय के लिए बहुत ही घातक साबित हो सकता है.
                      फेसबुक और गूगल के सीईओ द्वारा जिस तरह से बहुलता वादी समाज की पैरवी की जा रही है वही सम्पूर्ण विश्व के लिए एक मिसाल बन सकती है और इसके लिए सभी को समवेत रूप से प्रयास करने की आवश्यकता भी होगी. ऐसी परिस्थितियों में यदि आईएस सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों में अपना प्रभाव ज़माने में सफल हुआ तो आने वाले समय में पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ा संकट भी उत्पन्न हो सकता है क्योंकि जब तक विश्व के बड़े देश इससे निपटने की रणनीति खोजेंगें इन देशों की वैज्ञानिक और आर्थिक ताकत तथा सम्पूर्ण ढांचे का दुरूपयोग करने की कोशिश भी आतंकियों द्वारा की जा सकती है. आईएस मुसलमानों को अन्य सभी समुदायों के खिलाफ भड़काना चाहता है और यदि अन्य लोग भी ट्रंप की भाषा बोलने लगेंगें तो उससे आईएस का काम आसान ही होने वाला है. अब समय आ गया है कि केवल इस्लाम के पीछे छिपे हुए इन चरमपंथियों पर सटीक प्रहार किये जाएँ और इनके आर्थिक स्रोतों को पूरी तरह से बंद किया जाये. इसके साथ ही केवल इन आतंकियों न कि पूरे इस्लाम से निपटने के लिए कारगर रणनीति के तहत एक वैश्विक योजना बनायीं जाये जिस पर सभी छोटे बड़े देश पूरी तरह से अमल भी करें. अब वैचारिक हमला इन चरमपंथियों पर ही होना चाहिए न कि पूरे इस्लाम पर क्योंकि उससे असहिष्णुता बढ़ेगी और वह आईएस के लिए मरने वाले और फिदायीन बनाने का काम ही करेगी.    
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बुधवार, 9 दिसंबर 2015

आईएस - बांग्लादेश से प० बंगाल तक

                                                                       पूरी दुनिया पर कब्ज़ा करने की मंशा पाले हुए नफरत के सहारे युवाओं में अपनी पैठ बढ़ाने में लगा हुआ आज का सबसे क्रूर आतंकी संगठन आईएस किस तरह से भारतीय मुसलमानों को देश की मुख्य धारा से अलग थलग करना चाहता है इसके कई प्रमाण सुरक्षा एजेंसियों को मिलने शुरू हो चुके हैं और यह ऐसा मुद्दा है जिस पर केंद्र और राज्य सरकारों को प्राथमिकता के आधार पर सही दिशा में काम करने की आवश्यकता है क्योंकि गलत तरह से उठाये गए किसी भी कदम और उससे फैलने वाले दुष्प्रचार से आईएस को अपनी पैठ और मज़बूत करने में मदद ही मिलने वाली है. पिछले वर्ष २ अक्टूबर को बर्दवान जिले में हुए बम विस्फोट के बाद जिस तरह से प० बंगाल की एजेंसियों को उसमें कुछ महत्वपूर्ण विदेशी लिंक्स मिले थे उसके बाद ममता सरकार ने स्पष्ट रूप से सम्पूर्ण जाँच एनआईए को सौंप दी थी जिससे कुछ और भी खुलासे हुए तथा ममता सरकार ने इसे प्राथमिकता में लेते हुए सीमावर्ती थानों में मदरसों पर निगरानी रखने के लिए विशेष चौकसी शुरू कर दी. इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस क्षेत्र में बांग्लादेशियों को पहचानना मुश्किल भी होता है क्योंकि वे बोलचाल और हर मामले में स्थानीय निवासियों जैसे ही दिखाई देते हैं.
                               ममता सरकार ने इस मामले को जितनी कठोरता के साथ संवेदनशीलता भी बनाये रखी है वह अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि अधिकांश मामलों में पुलिस द्वारा एक तरफ़ कार्यवाही की जाती है जिसमें सामान्य कानूनी प्रक्रियाओं का अनुपालन भी नहीं किया जाता है और कई बार जिन्हें दुर्दांत आतंकी बताकर हिरासत में लिया जाता है वर्षों बाद सबूतों के अभाव में उन्हें कोर्ट द्वारा बरी भी कर दिया जाता है. प० बंगाल के अधिकांश मदरसों को संचालित करने वाली संस्था जमात-ए-उलेमा-ए-हिन्द के राज्य प्रमुख सिद्दिकुल्लाह चौधरी भी इस मामले में राज्य सरकार के साथ खड़े दिखाई देते हैं जो ममता सरकार की बड़ी कामयाबी भी कही जा सकती है क्योंकि कई स्थानों पर ऐसा भी देखा गया है कि पुलिस व अन्य एजेंसियों को स्थानीय मदरसा संचालकों के साथ आम नागरिकों का प्रतिरोध भी झेलना पड़ता है जिससे सरकार और मदरसों के बीच दूरियां और भी अधिक बढ़ जाती हैं जबकि ऐसी विषम परिस्थति में मदरसों और स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों के बीच अच्छा तालमेल होना बहुत आवश्यक एवं महत्वपूर्ण होता है.
                               प० बंगाल के सीमावर्ती मदरसों में कुछ ऐसे संदिग्ध लोग दिखाई देने शुरू हुए थे जो कुछ दिन वहां रहने के बाद गायब हो जाते थे पर इस मामले को जिस संवेदनशीलता के साथ संभाला गया वह अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है और आज वहां पर यह स्थिति है कि किसी भी संदिग्ध की सूचना देने के लिए खुद मदरसा प्रबंधक भी ध्यान रखने लगे हैं. आईएस को लगता है कि दक्षिण एशिया में अपने पैर पसारने के लिए उसे भारत के मुसलमानों का सहयोग आवश्यक ही होगा और वह इसी क्रम में बांग्लादेश के साथ लगती हुई भारतीय सीमा का लाभ उठाने की सोच रहा है पर फिलहाल तो उसकी इस मंशा पर ममता सरकार ने समझदारी से पानी फेर दिया है फिर भी ऐसा नहीं है कि राज्य और देश के लिए यह संकट टल गया हो. पूरे देश में ही हर राज्य सरकार को इसी तरीके से मदरसों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपने यहाँ आने वाले लोगों में किसी की भी संदिग्ध हरकतों पर नज़र रखने के लिए प्रेरित करने के प्रयास शुरू करने चाहिए क्योंकि किसी स्थान पर किसी संदिग्ध के पाये जाने से पूरे देश के हर मदरसे पर प्रश्नचिन्ह लगाने में जुटी हुई कुछ शक्तियां इस मामले को भी गरमाना ही चाहेंगीं. पूरे देश के मदरसों को स्वेच्छा से प० बंगाल की तरह राज्य सरकार के साथ पूरे सहयोग को दिखाना चाहिए जिससे उनके मदरसों पर कभी भी कोई अलगाववादी नज़र न गड़ा सके.      
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बुधवार, 25 नवंबर 2015

असहिष्णुता, आमिर और मुसलमान

                                                       बिहार चुनाव निपटने के बाद एक बार लगने लगा था कि असहिष्णुता, बीफ अभिव्यक्ति की आज़ादी आदि ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें चुनाव के समय ही एक योजना के तहत विभिन्न राजनैतिक दल उठाते रहते हैं पर क्या वास्तव में देश के अंदर असहिष्णुता बढ़ रही है या फिर कहीं से यह क्रिया की सामान्य प्रतिक्रिया ही है जिसके अंतर्गत समाज के विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों में काम करने वाले महत्वपूर्ण व्यक्तियों के लिए भी यह एक मुद्दा है ? आज देश के आम नागरिकों को ईमानदारी के साथ इन सभी मसलों पर सोचना ही होगा क्योंकि अभी तक कारण चाहे जो भी रहे हों पर भारतीय मुसलमानों ने खुले तौर पर कभी भी देश के अंदर या दुनिया के किसी भी हिस्से में चरमपंथी इस्लाम का समर्थन नहीं किया है और संभवतः पूरी दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश होगा जहाँ लगभग एक हज़ार इस्लामिक धार्मिक संस्थाओं ने संयुक्त रूप से आईएस के खिलाफ फतवा जारी किया है और उसे संयुक्त राष्ट्र तथा दुनिया के मुख्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों को भी भेजा गया है. यह भारतीय मुसलमान की उस मनोदशा को भी दिखाता है जो कहीं न कहीं से उसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली घटनाओं के फलस्वरूप झेलनी पड़ती है.
                           हर समाज और देश में सहिष्णु तथा कट्टर लोग हुआ करते हैं पर आज जिस तरह से इस्लाम को असहिष्णुता का पर्याय माना जाने लगा है और भारत में इस्लाम के साथ ईसाईयों के खिलाफ भी विद्वेषपूर्ण बयानों और धमकियों में बढ़ोत्तरी हुई है उससे यही लगता है कि समाज में हर वर्ग अपने विरूद्ध कुछ भी सुनना नहीं चाहता है. आज यदि भारतीय मुसलमानों के खिलाफ किसी हद तक दुष्प्रचार चल रहा है तो इसके लिए खुद मुसलमानों को भी आत्ममंथन करने की आवश्यकता भी है क्योंकि देश के विभिन्न राजनैतिक दल अपनी आवश्यकतानुसार मुस्लिम वोट बैंक का इस्तेमाल किया करते हैं जो कि काफी हद तक सहिष्णु हिन्दू समाज के लोगों की सोच पर दुष्प्रचार के माध्यम से यह साबित कर देता है कि भारतीय मुस्लिम इस तरह के काम किया करते हैं. सवाल यह भी है कि देश के किसी समूह, वर्ग या धर्म को यदि अपनी राष्ट्रभक्ति साबित करने के लिए कहा जाता है तो इसका समर्थन करने वाले कहाँ से आ रहे हैं ? भारत के मुसलमानों को हर उस बात और व्यक्ति से दूरी बनाने की कोशिश करनी ही होगी जो कहीं न कहीं से मुस्लिम ध्रुवीकरण से लाभान्वित होना चाह रहा है.
                       आज़ादी के बाद से ही पाकिस्तान के शासकों के नाम पर जिस तरह से भारतीय बच्चों के नाम रखे जाने का एक चलन सा रहा है क्या वह भी उनके खिलाफ एक हथियार के रूप में इन संगठनों द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है ? यह सही है जब भारतीय मुसलमान भी किसी भी तरह के नामों को रखने के लिए स्वतंत्र हैं पर क्या उनके पास नामों की इतनी कमी है कि उन्हें वही नाम अच्छे लगते हैं जो पाकिस्तान के शासकों के हुआ करते हैं ? यह सब कुछ ऐसा भी है कि जाने-अनजाने में इस तरह से जो काम भारतीय मुस्लिम समाज में हो रहा है वह भी किसी स्तर पर उनके खिलाफ दुष्प्रचार को मज़बूत कर सहिष्णु हिन्दुओं में से कुछ लोगों को उनके खिलाफ करने में सफल हो जाता है. आज भारतीय मुसलमानों के लिए अपने लिए सब कुछ पाना आसान है पर किसी भी स्तर पर उन्हें अपने अंदर इस तरह के किसी भी काम से परहेज़ ही करना चाहिए भले ही थोड़े लोगों द्वारा कुछ किया जा रहा हो. हिंसा लम्बे समय तक कहीं भी नहीं टिक सकती है आज यदि भारतीय मुसलमान दुनिया भर में सबसे शांत है तो वह सिर्फ इसलिए भी है कि उसे यहाँ की राजनीति में पूरा दखल देने का अधिकार प्राप्त है और वह पंचायत स्तर से संसद तक अपने प्रतिनिधि चुनने और भेजने में सफल रहते हैं. कुछ दलों के द्वारा इस तरह के मुद्दों पर आक्रामक होने से सिर्फ मुस्लिम समाज का ही नुकसान होना है इसलिए उन्हें किसी भी नेता या राजनैतिक दल से किसी भी तरह की सौदेबाज़ी दे दूर ही रहना चाहिए क्योंकि आज देश में एक ऐसा वर्ग भी सक्रिय है जो उसे भारत विरोधी साबित करने में लगा हुआ है.       
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सोमवार, 16 नवंबर 2015

वैश्विक आतंक के पोषक

                                                             विश्व में बढ़ रही आतंकी घटनाओं के पीछे जिस तरह से कई संगठनों का हाथ सामने आता ही रहता है उसके बाद भी दुनिया इस बारे में सोचना नहीं चाहती है कि ऐसा ही चलते रहने पर आने वाले समय में इससे पूरी दुनिया में इस्लाम और गैर इस्लाम के नाम पर विभाजन और भी अधिक् बढ़ने की संभावनाएं भी हैं. आज आतंक का जो सबसे खतरनाक चेहरा सामने आ रहा है वह सिर्फ दुनिया की बड़ी ताकतों के खिलौने के रूप में ही है और दुर्भाग्य से स्थानीय कारणों से लड़ रहे इस्लामिक चरमपंथियों को अपना मोहरा बनाकर यह सब करना दुनिया की बड़ी ताकतों का एक पसंदीदा खेल भी बनता जा रहा है. यूरोप पर आसन्न खतरे के बाद जिस तरह से अब दुनिया भर के नेताओं ने अंताल्या में जी २० समूह की बैठक में गंभीर चिंता प्रगट की है क्या वह सच में चिंता भी है या केवल दुनिया के प्रभावशाली और विकासशील देशों के साथ मिलकर लिया गया एक और संकल्प मात्र ही है जिसके पूरा होने में हमेशा की तरह संदेह ही रहने वाला है. दुनिया भर के प्रभावशाली देश जिस तरह से अपने प्रभुत्व को बढ़ाने में किसी भी हद तक जाने को तैयार रहा करते हैं आज का इस्लामी आतंक उसी का वीभत्स चेहरा मात्र है.
                               किसी बड़े अंतर्राष्ट्रीय मंच से जिस तरह से दुनिया के बड़े देशों के साथ स्थानीय देशों या समूह विशेष के देशों की तरफ से आतंक पर जिस तरह की चिंताएं दिखाई जाती हैं वे संभवतः राजनैयिक मजबूरी ही अधिक है क्योंकि किसी भी परिस्थिति में इन देशों की तरफ से इन आतंकी संगठनों को रोकने का काम कभी भी गंभीरता के साथ नहीं किया जाता है जिसका दुष्परिणाम आज दुनिया के सामने आता ही जा रहा है. जिस लादेन को खुद अमेरिका ने खड़ा किया था जब उसने अमेरिका से मतभेद के बाद सीधे उसे ही चुनौती दे दी तब अमेरिका की समझ में आया कि आतंक क्या होता है और उसे अपने लम्बे चौड़े फौजी लश्कर के साथ अल क़ायदा को खत्म करने की ठानी. सवाल यही है कि सोवियत संघ के अफगानिस्तान में आने के बाद से ही यह देश आतंकियों की नयी फैक्ट्री के रूप में जाना जाता है और आज भी स्थानीय कारणों से रूस पर दबाव बनाये रखने के लिए अमेरिका वहां अपना पूरा दखल भी चाहता है पर इन बड़े देशों की लड़ाई में अफगानिस्तान से लगाकर इराक और सीरिया तक आतंक के पाँव किस तरह से फ़ैल चुके हैं यह आज इन देशों को नहीं दिख रहा है. फ़्रांस ने भी पेरिस हमले के बाद अपने पड़ोस के इन आतंकियों के खिलाफ हवाई हमले करना शुरू किया है जो कि वो पहले भी कर सकता था.
                          दुनिया से आतंक केवल खोखले संकल्पों से दूर नहीं होने वाला है इसके लिए सबसे पहले यह देखना होगा कि आतंकियों को धन और हथियार कहाँ से मिल रहे हैं क्योंकि यदि इनके इन रास्तों को ही बंद किया जा सके तो सारी परेशािनयां अपने आप ही ख़त्म हो सकती हैं. अब दुनिया को अच्छे और बुरे आतंकियों की बकवास से दूर आना होगा और मानवता के खिलाफ जो भी देश, समूह या धर्म काम कर रहा हो उसके खिलाफ अपने स्वार्थों को किनारे करते हुए निष्पक्ष होकर कदम उठाने चाहिए. आखिर इन आतंकियों के पास इतने घातक हथियार कहाँ से आ रहे हैं क्या बड़े देशों के शस्त्र निर्माता ही इस खेल में शामिल नहीं हैं क्योंकि जो हथियार प्रतिबंधित हैं और कहीं से भी नहीं मिल सकते हैं वे आखिर इन समूहों को इतनी आसानी से कैसे मिल जाते हैं ? संयुक्त राष्ट्र को चंद देशों के खिलौने से आगे बढ़कर पूरी दुनिया के सामने एक सशक्त संस्था के रूप में स्थापित करना भी आज का लक्ष्य होना चाहिए और आतंक से निपटने के बीच में आने वाले किसी भी प्रस्ताव पर वीटो करने का अधिकार सभी देशों से छीन लिया जाना चाहिए क्योंकि अधिकतर ये वीटो प्राप्त देश अपने गुर्गे देशों की रक्षा करने के लिए इस अधिकार का दुरूपयोग करते हुए देखे जाते हैं.         
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बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

पाक - इस्लामी आतंक का पोषक

                         अपनी स्थापना के समय से ही भारत के लिए समस्या बने हुए पाक ने कभी भी सही राह पर चलते हुए दोनों देशों के बीच के संबंधों को सही करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया है जिसके मूल में संभवतः पाक की वह मानसिकता है जो भारत को अपना प्रतिद्वंदी मानती है जबकि आज भी पाक यदि अपने यहाँ से भारत में चलने वाले कश्मीरी अलगाववादी को समर्थन और सहयोग देना बंद कर दे तो स्थितियों को सँभालने में कोई ख़ास समय नहीं लगने वाला है. दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद से पाक के लोगों को नेताओं और सेना द्वारा कुछ इस तरह की घुट्टी पिलाई गयी है जिसमें उन्हें भारत अपना सबसे बड़ा दुश्मन दिखाई देता है और पाक के अनावश्यक रूप से सीमा पर तनाव बढ़ाने की कोशिशों के चलते आज भारत में भी पाक का नाम लेना एक समस्या ही है.
                    पाकिस्तानी टीवी चैनेल दुनिया को दिए गए एक बयान में वहां के पूर्व शासक परवेज़ मुशर्रफ ने जिस तरह से इस बात को स्वीकार किया है कि दुनिया भर के लिए आतंक का पर्याय बने हुए ओसामा, जवाहरी और अन्य आतंकी संगठन उनके हीरो हैं तो उसके बाद कुछ भी कहने सुनने के लिए शेष नहीं रह जाता है क्योंकि अभी तक पाक के वर्तमान या पूर्व शासक इस तरह की बातें खुलकर नहीं किया करते थे पर शायद मुशर्रफ अपने को एक तानाशाह के बाद राजनेता के रूप में किसी भी तरह से स्थापित करना चाहते हैं जिससे उनके द्वारा इस तरह के बयान दिए जा रहे हैं.  अमेरिका को शुरू से ही यह सब पता है पर दक्षिण एशिया की सबसे मज़बूत ताकत भारत के लगातार बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने और उसे स्थानीय समस्याओं में उलझाये रखने के लिए वह भी इन घटनाओं से आँखें मूंदे ही रहता है जिसका दुष्परिणाम वह ९/११ के रूप में भुगत भी चुका है.
                   पाकिस्तानी नेताओं की तरफ से ऐसे भारत विरोधी बयान सदैव ही दिए जाते रहे हैं पर पहली बार जिस तरह से मुशर्रफ ने कभी अमेरिका और दुनिया के लिए सरदर्द बने आतंकियों को पाकिस्तान का हीरो बताने की कोशिश की है वह पाक के घरेलू राजनैतिक दबाव की तरफ ही इशारा करती है. हालाँकि बाद में मुशर्रफ ने यह भी माना कि आज ये आतंकी संगठन पाक के लिए एक चुनौती बन चुके है और इनसे सख्ती से निपटा जाना भी ज़रूरी है तो शायद इस्लाम के नाम पर निर्दोषों रक्त बहाये जाने को लेकर भारत को महसूस होने वाली पीड़ा को वे भी महसूस कर रहे हैं. आतंकियों को केवल आतंक फैलाना है जहाँ गैर इस्लामिक लोग हैं वे वहां उनको मार रहे हैं और जहाँ केवल इस्लाम को मानने वाले हैं वहां वे फिरकों के आधार पर मुसलमानों को मारने में भी परहेज़ नहीं कर रहे हैं. फिलहाल तो पाक ऐसे दलदल में फँस चुका है जहाँ से निकलने के लिये जिस दृढ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है वह शायद ही पाक में आ पाये।
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शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

हज हादसा

                                                             दुनिया भर के मुसलमानों की पवित्र हज यात्रा के दौरान एक बार फिर से हुए हादसे ने जहाँ है यात्रा पर गए लोगों के परिजनों को हिलाकर रख दिया वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इस हादसे के बाद भी अपनी अनावश्यक राय देने से बाज़ नहीं आये. ईरान की तरफ से आये बयान को कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता है क्योंकि सऊदी सरकार की तरफ से यात्रा के लिए हर संभव अच्छे प्रयास किये ही जाते हैं पर जहाँ दुनिया भर से लाखों लोग इस तरह से यात्रा पर आये हों वहां पर कई बार कुछ समस्याओं के कारण हादसे हो भी जाते हैं. पूरी हज यात्रा में बकरीद के दिन ही सारे यात्री एक ही जगह पर इकठ्ठा होते हैं क्योंकि इसी दिन हज को पूरा माना जाता है भले ही कुछ यात्री पहले गये हो या अभी दो दिन पहले ही पहुंचे हों. इस यात्रा के विभिन्न चरणों को अलग अलग चरणों में संपन्न कराया जाता है पर बकरीद का दिन सबसे बड़ी चुनौती का होता है क्योंकि सभी यात्रियों को यात्रा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण और आवश्यक काम इस दिन ही करने होते हैं जिससे सरकार और यात्रियों पर इसे सुरक्षित रूप से संपन्न कराने का दबाव बढ़ जाता है.
                              पूरी दुनिया का कोई भी हिस्सा हो और चाहे कितने भी अनुशासित लोग क्यों न हों पर जब बड़े समूह में कुछ अचानक से ही गड़बड़ होता है तो व्यवस्था में लगे हुए लोगों के लिए इसे सम्भालना मुश्किल हो जाता है. इस हादसे की क्या वजह रही यह तो समय के साथ ही पता चल पायेगा पर आरम्भिक जांच में गर्मी और है यात्रियों के दो समूहों के आमने सामने आ जाने से इस तरह की घटना होने की बात कही जा रही है. मानवीय स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि धार्मिक मामलों में अचानक से सभी एक जैसे हो जाते हैं और शिक्षित या अशिक्षित लोगों का फर्क मिट जाता है हर व्यक्ति धार्मिक मान्यताओं एक अनुसार परम्पराओं को सबसे पहले ही निभाना चाहता है और जब भी महत्वपूर्ण व्यवस्था गत मामलों में इस तरह से नियमों से अलग हटना शुरू किया जाता है तो कहीं न कहीं इ इस तरह के गंभीर हादसों के होने से बचा नहीं जा सकता है. इतनी बड़ी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अब सऊदी सरकार को भी कुछ महत्वपूर्ण कामों पर ज़ोर डालना होगा साथ ही सम्बंधित देशों में भी हज यात्रियों को आवश्यक ट्रेनिंग दी जानी चाहिए.
                               पूरी हज यात्रा में किस तरह से कब और क्या करना है यह हर यात्री को पता होना चाहिए और किसी गंभीर हादसे के होने पर यात्रियों को क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए इस बात की भी पूरी ट्रेनिंग देकर इनें भेजा जाना चाहिए क्योंकि कई बार अपनी जान बचाने के लिए गलत तरीके से किये गए प्रयासों से भी राहत में बाधा पड़ने लगती है और स्थापित व्यवस्था भंग हो जाती है. सऊदी सरकार को दुनिया भर के देशों से संपर्क कर एक कारगर व्यवस्था के बारे में यात्रियों को जागरूक करना चाहिए और जो संभावित हादसे के स्थान हो सकते हैं वहां पर यात्रियों को किस तरह से सावधानियां बरतनी चाहिए इस बारे में भी पहले से ही समझाया जाना चाहिए. हज यात्रा की तैयारियों में कई महीने लगते हैं तो चयनित यात्रियों को इस बारे में उनके सम्बंधित ज़िले या तहसील और ब्लॉक में एक बार इस सम्बन्ध में पूरी जानकारी देने की कोशिश करनी चाहिए जिससे लोग जागरूक भी रहें और किसी भी हादसे के लिए वहां के प्रशासन के लिए किसी भी तरह की समस्या न पैदा करें. भारत से बहुत बड़ी संख्या में लोग हज करने जाते हैं तो सभी को इस यात्रा के बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए. सऊदी सरकार को भी दोबारा यात्रा करने के इच्छुक लोगों को हर तरह से रोकने का प्रयास भी करना चाहिए जिससे जो लोग एक बार भी वहां नहीं पहुँच पाये हैं उनको भी यह अवसर मिल सके और वहां की भीड़ को भी रोका जा सके. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

केरल सुन्नी महालु की पेशकश

                                           आज जब देश में जगह जगह पर लाउडस्पीकर लगाने को लेकर छोटे संघर्षों से लगाकर सांप्रदायिक दंगे हो जाना आम बात हो चुकी है तो उस स्थिति में देश के पूर्ण साक्षर प्रदेश केरल के सुन्नी महालु फेडरेशन की तरफ से जुडी लगभग ८००० मस्जिदों से इन्हें केवल अज़ान और आवश्यक उद्घोषणाओं तक ही सीमित रखे जाने की अपील की गयी है अब चूंकि यह केरल की सुन्नी मुसलमानों से जुडी हुई सबसे बड़ी समिति है तो इसकी इस अपील का निश्चित तौर पर अच्छा प्रभाव ही सामने आने वाला है. जिस तरह से इस बात की शुरुवात खुद मस्जिदों से जुडी हुई समिति में सामने आई और अधिकांश लोग इससे सहमत भी दिखे तो यह देश के लिए एक नई मिसाल और परिवर्तन के रूप में सामने आ सकता है. कुछ लोगों द्वारा इस बात पर भी सहमति बनाने के प्रयास किये गए कि स्थान विशेष में कई मस्जिदें होने पर केवल एक मस्जिद से ही प्रार्थना की जाये जिससे आम जनता को परेशानी न हो यदि आने वाले समय में इस तरह की कोई सहमति बन पाती है तो यह देश के सहिष्णु स्वरुप के लिए बहुत अच्छा हो सकता है.
                        कोई काम जब किसी के दबाव में किया जाता है तो लोकतंत्र में राजनैतिक कारणों से उसका विरोध भी आसानी से शुरू हो जाता है आम तौर पर अभी तक यही देखा गया है कि स्थान विशेष की समस्या में जब विभिन्न दलों के नेता शामिल हो जाते हैं तो परिस्थितियां और भी वीभत्स हो जाती हैं क्योंकि धार्मिक आधार पर होने वाले ध्रुवीकरण से अलग अलग जगहों पर अलग अलग दलों को लाभ भी मिलते रहते हैं. यहाँ तो स्वेच्छा से शुरू की गयी बातों की है पर क्या सभ्य समाज में विशेषकर हिन्दू और मुसलमानों की तरफ से इस तरह की कोशिश की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जब ये लाउडस्पीकर नहीं होते थे तो संभवतः प्रार्थनाओं में असर अधिक हुआ करता था पर आज धर्म में दिखावे का जिस हद तक समावेश हो गया है वह देश के लिए विषबेल जैसा साबित हुआ है जिसे जितना उखाड़ने की कोशिश की जाती है वह उतनी ही मज़बूत होती जाती है और दोनों धर्मों के अनुयायियों को एक दूसरे के सामने लाती रहती है. धर्म में प्रार्थना के स्थान पर जब से दिखावे ने स्थान बना लिया है तब से मनुष्य के लिए ध्वनि प्रदूषण के घातक स्तर तक पहुँच जाने वाले इन लाउडस्पीकरों पर नियंत्रण करने के लिए कोई निर्णय अपने आप नहीं लिया गया है.
                         इस प्रयास में केरल के इस समुदाय और इसके फेडरेशन की सफलता की कामना पूरे देश को करनी चाहिए जिससे यही मॉडल स्वेच्छा से देश के अन्य राज्यों में भी अपनाया जा सके. यह सभी जानते हैं कि लाउडस्पीकर धार्मिक गतिविधियों की जानकारी देने के लिए ही उपयोग में लाये जाने चाहिए पर आज जिन क्षेत्रों में तनाव रहा करता है वहां छोटे से धार्मिक स्थान और सीमित आबादी होने पर भी बड़ी संख्या में इनका दुरूपयोग किया जाता है और खेद की बात यह भी है कि समाज के ज़िम्मेदार लोग भी खुद को इस सब मामलों से दूर ही रखना चाहते हैं जिससे मामला उन लोगों के हाथों में आसानी से चला जाता है जो इस मुद्दे पर भी विद्वेष भड़काने की कोशिशों में लगे रहते हैं. देश को धार्मिक लोगों से अधिक ज़िम्मेदार नागरिकों की आवश्यकता होती है क्योंकि जब कोई नागरिक देश के लिए ज़िम्मेदारी निभाने की बात करेगा तो उसके लिए इस तरह के छोटे मामलों पर भी धर्म से पहले देश आएगा और वह देश के सद्भाव को बनाये रखने के लिए धर्म पर विवेक को प्राथमिकता देने की तरफ भी बढ़ पायेगा. इस तरह के मामले यदि धर्म की इस तरह की समितियों के माध्यम से हल किये जाने लगें तो यह आम नागरिकों के साथ देश के लिए भी बहुत अच्छा रहेगा.         
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...