मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 16 November 2015

वैश्विक आतंक के पोषक

                                                             विश्व में बढ़ रही आतंकी घटनाओं के पीछे जिस तरह से कई संगठनों का हाथ सामने आता ही रहता है उसके बाद भी दुनिया इस बारे में सोचना नहीं चाहती है कि ऐसा ही चलते रहने पर आने वाले समय में इससे पूरी दुनिया में इस्लाम और गैर इस्लाम के नाम पर विभाजन और भी अधिक् बढ़ने की संभावनाएं भी हैं. आज आतंक का जो सबसे खतरनाक चेहरा सामने आ रहा है वह सिर्फ दुनिया की बड़ी ताकतों के खिलौने के रूप में ही है और दुर्भाग्य से स्थानीय कारणों से लड़ रहे इस्लामिक चरमपंथियों को अपना मोहरा बनाकर यह सब करना दुनिया की बड़ी ताकतों का एक पसंदीदा खेल भी बनता जा रहा है. यूरोप पर आसन्न खतरे के बाद जिस तरह से अब दुनिया भर के नेताओं ने अंताल्या में जी २० समूह की बैठक में गंभीर चिंता प्रगट की है क्या वह सच में चिंता भी है या केवल दुनिया के प्रभावशाली और विकासशील देशों के साथ मिलकर लिया गया एक और संकल्प मात्र ही है जिसके पूरा होने में हमेशा की तरह संदेह ही रहने वाला है. दुनिया भर के प्रभावशाली देश जिस तरह से अपने प्रभुत्व को बढ़ाने में किसी भी हद तक जाने को तैयार रहा करते हैं आज का इस्लामी आतंक उसी का वीभत्स चेहरा मात्र है.
                               किसी बड़े अंतर्राष्ट्रीय मंच से जिस तरह से दुनिया के बड़े देशों के साथ स्थानीय देशों या समूह विशेष के देशों की तरफ से आतंक पर जिस तरह की चिंताएं दिखाई जाती हैं वे संभवतः राजनैयिक मजबूरी ही अधिक है क्योंकि किसी भी परिस्थिति में इन देशों की तरफ से इन आतंकी संगठनों को रोकने का काम कभी भी गंभीरता के साथ नहीं किया जाता है जिसका दुष्परिणाम आज दुनिया के सामने आता ही जा रहा है. जिस लादेन को खुद अमेरिका ने खड़ा किया था जब उसने अमेरिका से मतभेद के बाद सीधे उसे ही चुनौती दे दी तब अमेरिका की समझ में आया कि आतंक क्या होता है और उसे अपने लम्बे चौड़े फौजी लश्कर के साथ अल क़ायदा को खत्म करने की ठानी. सवाल यही है कि सोवियत संघ के अफगानिस्तान में आने के बाद से ही यह देश आतंकियों की नयी फैक्ट्री के रूप में जाना जाता है और आज भी स्थानीय कारणों से रूस पर दबाव बनाये रखने के लिए अमेरिका वहां अपना पूरा दखल भी चाहता है पर इन बड़े देशों की लड़ाई में अफगानिस्तान से लगाकर इराक और सीरिया तक आतंक के पाँव किस तरह से फ़ैल चुके हैं यह आज इन देशों को नहीं दिख रहा है. फ़्रांस ने भी पेरिस हमले के बाद अपने पड़ोस के इन आतंकियों के खिलाफ हवाई हमले करना शुरू किया है जो कि वो पहले भी कर सकता था.
                          दुनिया से आतंक केवल खोखले संकल्पों से दूर नहीं होने वाला है इसके लिए सबसे पहले यह देखना होगा कि आतंकियों को धन और हथियार कहाँ से मिल रहे हैं क्योंकि यदि इनके इन रास्तों को ही बंद किया जा सके तो सारी परेशािनयां अपने आप ही ख़त्म हो सकती हैं. अब दुनिया को अच्छे और बुरे आतंकियों की बकवास से दूर आना होगा और मानवता के खिलाफ जो भी देश, समूह या धर्म काम कर रहा हो उसके खिलाफ अपने स्वार्थों को किनारे करते हुए निष्पक्ष होकर कदम उठाने चाहिए. आखिर इन आतंकियों के पास इतने घातक हथियार कहाँ से आ रहे हैं क्या बड़े देशों के शस्त्र निर्माता ही इस खेल में शामिल नहीं हैं क्योंकि जो हथियार प्रतिबंधित हैं और कहीं से भी नहीं मिल सकते हैं वे आखिर इन समूहों को इतनी आसानी से कैसे मिल जाते हैं ? संयुक्त राष्ट्र को चंद देशों के खिलौने से आगे बढ़कर पूरी दुनिया के सामने एक सशक्त संस्था के रूप में स्थापित करना भी आज का लक्ष्य होना चाहिए और आतंक से निपटने के बीच में आने वाले किसी भी प्रस्ताव पर वीटो करने का अधिकार सभी देशों से छीन लिया जाना चाहिए क्योंकि अधिकतर ये वीटो प्राप्त देश अपने गुर्गे देशों की रक्षा करने के लिए इस अधिकार का दुरूपयोग करते हुए देखे जाते हैं.         
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