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मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

जम्मू-कश्मीर और ग्राम सुरक्षा समितियां

                                           १९८९ में कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों का एक सोची समझी रणनीति के तहत सफाया करने का पाकिस्तानी और हुर्रियत समेत कश्मीर के अलगावादियों का अभियान घाटी में उनके हिसाब से लगभग सफल ही रहा था जिसमें उन्होंने निर्दोष कश्मीरी पंडितों के खुले नरसंहार का मूक समर्थन किया था. इसके बाद पीर पंजाल के दूर दराज़ के क्षेत्रों में बसे हुए क्षेत्रों में ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए तैनात किये गए जवानों के अतिरिक्त एक विशेष योजना के अंतर्गत विशेष प्रशिक्षण और हथियार दिए गए थे जिसके बाद इस क्षेत्र में इन लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकी थी. आज इन ३००० ग्राम सुरक्षा समितियों में लगभग २४६०२ लोग एसपीओ के रूप में जुड़े हुए हैं जो आतंकियों के आने जाने समेत उनसे सीधे तौर पर मुक़ाबला करने और सुरक्षा बलों को महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए काम किया करते हैं. इस सप्ताह इन लोगों द्वारा तीन लोगों को मारे जाने के बाद घाटी में अलगाववादी राजनीति ने फिर से अपने सुर अलापने शुरू कर दिए हैं. यह सभी जानते हैं कि इन अलगाववादियों को कोई व्यापक समर्थन नहीं है पर खुद को नज़रों में आने से बचाने के लिये आम कश्मीरी इनका विरोध न कर मूक समर्थन में खड़ा नज़र आता है.
                              इस बार संभवतः गलत पहचान के कारण या जानबूझ कर ही इन लोगों द्वारा की गई गोलीबारी में एक बच्चे समेत तीन लोगों के मारे जाने के बाद आतंक समर्थक अलगाववादी भी इस मामले पर राजनीति करने लगे हैं और वे बहुत बेशर्मी के साथ यह भी कहते हैं कि इन समितियों द्वारा जम्मू क्षेत्र में एक विशेष अभियान के तहत मुसलमानों का सफाया किया जा रहा है. ये लोग यह भूल जाते हैं कि किस तरह से शांति पूर्वक घाटी के विकास में अपना योगदान दे रहे इनके पडोसी कश्मीरी पंडितों के साथ कितना अत्याचार किया गया था तब इनके पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं था क्योंकि तब वे भी घाटी को हिन्दू-सिख मुक्त करने के पाकिस्तान के अभियान का एक हिस्सा थे और किसी भी कश्मीरी धार्मिक नेता या हुर्रियत समेत अन्य किसी ने भी उन घटनाओं का खुला विरोध नहीं किया था ? आज जब जम्मू क्षेत्र में उनके हिसाब से इस तरह की घटना मुसलमानों के खिलाफ हुई है तो वे घाटी को बंद करने का आह्वाहन करने में लगे हुए हैं. क्या वे १९८९ में यह भूल गए थे कि जिन कश्मीर पंडितों को उन्होंने बेरहमी से मारने और अत्याचार करने पर चुप्पी साध रखी थी आज कश्मीर उनके बिना कैसा है ?
                        इस मामले में आम तौर पर सुरक्षा बलों और सुरक्षा समितियों पर ही अधिक दबाव रहा करता है क्योंकि जिस तरह से कश्मीरी मुसलमानों के हुर्रियत जैसे समूहों के नेताओं को अपनी सुविधा के अनुसार ही मानवाधिकार याद आते हैं वह अब नहीं चल सकता है क्योंकि आज उनके हर कदम पर दुनिया भर की नज़र भी रहा करती है. सद्भाव और सुरक्षा एक तरफा नहीं चल सकते हैं अच्छा होता कि हुर्रियत विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों को पूरी सुरक्षा और सम्मान से घाटी में लाने के लिए भी कभी घाटी में बंद का आह्वाहन करती जिससे इन ठोकर खा रहे कश्मीरी पंडितों को भी लगता कि घाटी में आज भी उन्हें याद किया जाता है. सुरक्षा बलों और ग्राम सुरक्षा समितियों को अपने कार्यवाही में विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक किसी भी गलती की गुंजाईश रहेगी हुर्रियत अपनी घटिया राजनीति से बाज़ नहीं आने वाली है. आज यदि कश्मीर में हुर्रियत के नेता इतना बोल पाते हैं तो वह भी भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती ही है क्योंकि उसके बिना किसी भी स्तर पर उनको इतनी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं मिल सकती थी. क्या पाकिस्तान या किसी अन्य इस्लामी देश में कोई इस तरह से सत्ता के खिलाफ इतना बोलकर भी सरकारी सुरक्षा का अधिकारी हो सकता है आज उनके लिए यह विचार करने का समय है. 
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गुरुवार, 11 सितंबर 2014

राहत कार्य और तैयारियां

                                                        एक बार फिर से जम्मू कश्मीर की बाढ़ के बाद सब कुछ वैसा ही दिखाई देने लगा है जैसा कि पिछले वर्ष उत्तराखंड में और उससे पहले लेह में भी देखा जा चुका है. देश में प्राकृतिक आपदाओं के समय हमारी पूरी व्यवस्था किस तरह से हर बार ही ध्वस्त होती नज़र आती है यह हमेशा ही दिखायी देता है. इस मामले में केवल उड़ीसा को अपवाद कहा जा सकता है क्योंकि वहां पर आपदाओं के लगातार आते रहने के बाद जिस तरह से नवीन पटनायक ने तटीय क्षेत्रों में स्थायी रूप से राहत और बचाव के सभी उपाय कर लिए हैं वे अपने आप में सम्पूर्ण ही लगते हैं क्योंकि पिछले वर्ष ही वहां आये तूफ़ान में जिस तरह से लोगों को बचाया गया वह अपने आप में मौसम विज्ञानं और राज्य सरकार का अभूतपूर्व काम ही था. आज भी देश के हर स्थान पर अलग अलग तरह की आपदाओं के चलते नागरिकों की सुरक्षा सम्बन्धी समस्याएं सामने आती ही रहती हैं और उनका स्थान विशेष पर बहुत ही बुरा प्रभाव भी पड़ता है. इससे निपटने के लिए अब स्थानीय स्तर पर ही सभी सुविधाएँ उपलब्ध कराने की तरफ सोचने की आवश्यकता बढ़ती ही जा रही है.
                                                  देश में पर्यावरण पर जिस तरह से राजनीति होती रहती है वह भी आज इस तरह की आपदाओं के लिए बहुत ही खतरनाक साबित होती है अभी तक केवल स्थानीय भ्रष्टाचार के कारण ही पर्यावरण की अनदेखी की जाती है और क्षेत्र विशेष के प्राकृतिक और भौगोलिक वातावरण की अनदेखी अपने आप में इस तरह की अदाओं को जन्म देने का काम करती हैं. सरकार के पास करने के लिए जो कुछ भी तंत्र के रूप में है वह किसी न किसी वजह से प्रभावित हो जाता है और उसके दुष्प्रभाव को बाद की पीढ़ियां झेलने के लिए अभिशप्त हो जाती हैं. वर्तमान राजग सरकार ने जिस तरह से पश्चिमी घाट के लिए पर्यावरण विशेषज्ञों की राय को अनसुना करने का मन बना लिया है वह भी आने वाले दशकों में ऐसा ही कुछ नहीं दिखायेगा इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता है. नदियों के प्राकृतिक रूप से छेड़छाड़ करने से जो कुछ भी असामान्य बारिश के रूप में सामने आता यही वह आज हमें दिखाई भी दे रहा है.
                                                   देश ने संचार मामलों में बहुत अधिक तरक्की कर ली है और आने वाले समय में इसके और भी आगे बढ़ने की सम्भावना है पर क्या देश को केवल इस तरह के आधुनिकतम संचार तंत्र के भरोसे छोड़ा जा सकता है जबकि आपदा के समय ये हर बार ही काम करना बंद कर दिया करते हैं ? आज देश के बारहवीं कक्षा के छात्रों को हैम रेडियो के सञ्चालन का आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए और हर एक ग्राम सभा स्तर पर सांसद या विधायक निधि से एक हैम रेडियो संचालक और उसकी अनुपस्थिति में एक सहायक की स्वैच्छिक नियुक्ति की जानी चाहिए. इस क्षेत्रों में यदि पहले से ही कोई हैम रेडियो संचालक मौजूद है तो उसके माध्यम से आपातकालीन संचार सेवाओं को सुनिश्चित किया जाना चाहिए. हैम रेडियो अपने आप में एक ऐसा उपकरण है जो सौर ऊर्जा से भी आसानी से संचालित हो सकता है. संभवतः कश्मीर जैसी स्थिति में सरकार और सेना इसके सञ्चालन की अनुमति नहीं दे सकेगी पर देश के अन्य भागों में तो इसके स्टेशन शुरू करने के बारे में सोचा ही जा सकता है.             
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सोमवार, 27 दिसंबर 2010

फिर से कोहरे की मार

दिल्ली ने एक बार फिर से घने कोहरे के साथ सब कुछ पटरी से उतरते देखा. अभी तक कोई भी यह बता पाने में सक्षम नहीं हो पा रहा है कि आख़िर कब दिल्ली या देश के उत्तरी भागों में इस तरह से हर वर्ष हवाई और रेल यात्री परेशान होते रहेंगें फिर भी इन सारी परिस्थितियों से निपटने के लिए कोई ठोस उपाय अभी तक भारत में कुछ भी नहीं किया जा सका है. यह सही है कि इस तरह की प्राकृतिक रूप से विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए कभी भी सारा कुछ ठीक नहीं हो सकता है पर जिस स्तर पर इससे निपटा जाना चाहिए अभी तक वैसे उपाय नहीं अपनाये जा रहे हैं. दुनिया के बहुत सारे हिस्सों में आज भी हमारे यहाँ से अधिक कोहरा होता है पर वहां पर इस तरह से जिंदगी पूरी तरह से ठप नहीं हो जाया करती है ?
          रेल विभाग अभी तक कोहरे से निपटने के लिए पुरानी पटाखे लगाने वाली व्यवस्था के सहारे ही चल रहा है कहने को भारतीय रेल ने बहुत तरक्की कर ली है पर अभी भी हमें इस मामले में कोई महारत हासिल नहीं हो पायी है. वैसे भी इस देश में रेल सभी का सबसे निरीह विभाग है जो भी गुस्सा होता है वह केवल रेल को रोक कर या उसकी संपत्ति को नुक्सान पहुंचा कर ही कुछ हासिल करना चाहता है ? लगता है प्रकृति को भी रेल से कुछ ज्यादा ही प्यार है तभी मौसम का सबसे ज्यादा असर इस पर ही होता है ?
         देश में सब कुछ है पर अगर कुछ नहीं है तो वह है मज़बूत इच्छा शक्ति....... आज अगर हम चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं पर शायद रेल भवन में बैठने के लिए हर सरकार पर दबाव डालकर इसे पाने वाले सहयोगी दल आज तक रेल को अपनी शर्तों पर ही चलते रहे हैं पिछले १५ वर्षों से सबसे बड़े सरकारी दल के पास रेल विभाग कभी भी नहीं रहा तो लगता है कि इस मंत्रालय के लिए केवल सौदे बाज़ी ही होती रहती है पर इसके विकास और सुधार पर कम ही ध्यान दिया जाता है. हवाई यात्रा के बारे में क्या कहा जाये क्योंकि यह एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर सरकार से लगाकर आला अधिकारी तक बहुत दिलचस्पी लेते हैं पर इस क्षेत्र में जो सुधार किये जाने चाहिए वह अभी तक नहीं किये जा सकें है जहाँ पर कम दृश्यता में उड़ने के लिए तकनीक है तो वहां पर पायलट प्रशिक्षित नहीं हैं ? अभी सरकार ने उड़ानों के लिए कुछ नियमों में ढील देने की कोशिश की है पर इससे केवल कुछ हद तक संकट कम किया जा सकता है इसका पूरा उपचार किया जाना अभी भी बाकी है.   

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