मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

सैनिकों का मानवाधिकार

यह अच्छा ही हुआ कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस बात पर विचार करने के लिए सैन्य अधिकारियों के तीन बच्चों की मांग को स्वीकार कर रक्षा मंत्रालय से जवाब माँगा है और यह भी पूछा है कि सैनिकों के मानवाधिकार को सुरक्षित रखने के बारे में सरकार और रक्षा मंत्रालय की क्या नीति है ? आज जब कश्मीर समेत देश के हर हिस्से में सुरक्षा बलों और पुलिस के साथ आम नाराज़ लोगों, माओवादियों, आतंकियों और आतंक का समर्थन करने वाले पत्थर बाज़ों से निपटने में सरकारें बिना किसी नीति के काम कर रही हैं तो क्या इस परिस्थिति में अब यह सोचना का समय नहीं है कि सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस में भी हमारे देश के जवान ही भर्ती होते हैं जो विषम परिस्थितियों में अपने कर्तव्य का निर्वहन करते रहते हैं तो क्या उनके भी आम मानव का जैसे अधिकारों का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए ? सोचा जाना चाहिए कि क्या पत्थरबाजों से अपनी जान बचाने के लिए आत्मरक्षा में चलायी गयी गोलियों में पत्थरबाजों के मरने पर सैन्य अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज़ करना उचित है ? अब समय आ गया है कि सरकार स्पष्ट करे और यदि इस दिशा में अभी तक देश में कोई नीति नहीं है तो संसद में अविलम्ब एक विधेयक लाकर हमारे जवानों की सुरक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा करने वाले कानून को पारित कराये जिससे देश की सीमा और अशांत क्षेत्रों में काम करने वाले सैनिकों समेत उनके परिवार के लोग भी राजनैतिक दबाव या लाभ में दर्ज़ होने वाले मुक़दमों से बच सकें . 

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गुरुवार, 11 मई 2017

कश्मीर की कश्मीरियत


कश्मीर के कुलगाम में जिस तरह से आतंकियों ने छुट्टी पर आये सेना के अधिकारी की एक शादी समारोह से अगवा करने के बाद गोली मारकर कर दी उसके बाद कश्मीर के लोगों को यह सोचना ही पड़ेगा कि वे अब भी पाकिस्तान के इशारों पर चलकर किसका नुकसान करने में लगे हुए हैं. इस्लाम की सीखों पर चलने के सपने के साथ इस्लामी राज्य बना पाकिस्तान किस तरह से धार्मिक कट्टरता और फिर आतंकियों के पोषक के रूप में आज पूरी दुनिया में जाना जाता है वह सब जानते हैं. पाकिस्तान में एक समय जिन्होंने तालिब बनकर समाज में स्वीकार्यता बधाई थी वे तालिबान और फिर अलग नाम के समूह बनकर उसी इस्लामी धार्मिक समाज का कितना नुकसान कर चुके हैं ? एक समय पाकिस्तान कि सेना के आश्रय में पलने वाले ये इस्लामी चरमपंथी आज सीधे पाकिस्तानी सेना को ही चुनौती देने में लग चुके हैं इस बात की अनदेखी भी नहीं की जा सकती है. दक्षिणी कश्मीर घाटी में जिस तरह से चार जिलों में पाक समर्थित आतंकियों का अधिकांश मौन एवं सीमित खुला समर्थन बढ़ रहा है वह घाटी को भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान के रास्ते पर ले जाने का काम ही करने वाला है. आज कुलगाम के एक कश्मीरी मुसलमान सेना अधिकारी की सुनियोजित हत्या की गयी है कल को वे कश्मीरी मुसलमान सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और स्थानीय लोगों को सीधे ही निशाना बनाने लगेंगें ऐसी परिस्थिति में उन लोगों के वे बहकावे सामने आ जायेंगें जिसके तहत उन्होंने नब्बे के दशक में घाटी को कश्मीरी पंडितों से खाली करवा लिया था और आने वाले समय में यदि स्थानीय लोग इसी तरह से इन आतंकियों के प्रति सहानुभूति रखते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब इनकी बंदूकों की नलियां आम कश्मीरी मुसलमान की तरफ ही होंगीं. कश्मीर के लोगों, वहां की सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के साथ सम्पूर्ण भारत को इस मसले पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है वर्ना पानी सर से ऊपर होने में देर नहीं लगेगी और सुरक्षा बलों को अपनी सख्ती में और बढ़ोत्तरी करने को मजबूर होना पड़ेगा जिससे आखिर में वहां का स्थानीय निवासी होने के कारण आम कश्मीरी मुसलमान ही परेशानी झेलने वाला है.

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सोमवार, 12 सितंबर 2016

सीमापार से आतंक

                                                                कश्मीर घाटी में जिस तरह से दो महीनों से अराजकता की स्थिति बनी हुई है उसी बीच पाकिस्तान की तरफ से एक बार फिर से सर्दियाँ बढ़ने और बर्फ पड़ने से पहले आतंकियों की नयी खेप भारत में भेजने की कोशिशें तेज़ कर दी गयी हैं. एक ही दिन में सीमा पर जिस तरह से कई स्थानों पर आतंकी कार्यवाही देखने को मिली उससे यही लगता है कि इस मोर्चे पर अब पाक के साथ और अधिक सख्ती करने का समय आ गया है और यह काम केवल स्थानीय सीमा पर ही नहीं किया जाना चाहिए बल्कि आवश्यकता पड़ने पर इसे कूटनैतिक, राजनैतिक और आर्थिक हर तरह के मोर्चे आज़माया जाना चाहिए जिससे पाकिस्तान पर वास्तव में कुछ ठोस दबाव डाला जा सके. विपक्ष में रहने पर पाक के खिलाफ मुखर रहने वाली भाजपा ही सत्ता में आने पर पाक से हर तरह के सम्बन्ध मज़बूत करने की बात करने लगती है क्योंकि विपक्ष के रूप में कभी भी कांग्रेस की तरफ से बातचीत का उस स्तर पर राजनैतिक कारणों से विरोध नहीं किया जाता है जैसा करने में भाजपा को महारत हासिल है. संसद ने भी जिस तरह से कश्मीर की अशांति पर एकमत से मोदी सरकार का समर्थन किया उससे उसे आगे बढ़ने की शक्ति भी मिली और दुनिया में सन्देश भी चला गया है कि भारत के राजनैतिक दलों में चाहे कितने भी मतभेद क्यों न हों पर राष्ट्रीय मसलों पर वे सदैव एक साथ ही खड़े दिखाई देते हैं.
                                  २६/११ के बाद से जिस तरह से मनमोहन सरकार ने पाक से किसी भी तरह की द्विपक्षीय संबंधों पर एक तरह से रोक ही लगा दी थी वह २०१४ तक उसी तरह चलती रही और यहाँ तक दोनों देशों के बीच खेलों तक पर भी इस राजनैतिक कटुता का असर भी पड़ा था और एक नीति के तहत बिना कुछ बोले ही मनमोहन सरकार ने पाक को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग थलग कर दिया था पर मोदी सरकार ने अपनी पारी शुरू करते समय एक बार फिर से सभी दक्षिण एशियाई देशों को बुलाने के साथ पाक को न्योता दिया जिसका उसने अभी तक नाजायज़ फायदा ही उठाया है. सरकार बनने के लगभग दो साल बाद अब पीएम मोदी को यह लगा रहा है कि पाक को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग थलग करना आवश्यक हो गया है तो क्या सरकार की तरफ से पाकिस्तान के आंकलन में कमी नहीं रह गयी या कूटनैतिक मोर्चों पर मोदी सरकार ने पाक के सम्बन्ध में जो कुछ सोचा था वह वैसा नहीं हो पाया ? पाक आज़ादी के समय से ही विश्वसनीय नहीं रहा है तो उस स्थिति में अटल सरकार के साथ कारगिल के समय किये गए बर्ताव के बारे में आंकलन करने में मोदी सरकार से चूक तो हो ही गयी है जिसे सुधारने के लिए अब वे पाक को अलग थलग करने की बात करने लगे हैं.
                          इस मामले में अब भारत द्वारा पाक को दिया गया मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा अविलंब वापस लेना चाहिए क्योंकि आज पाक की नीतियों से परेशान बांग्लादेश और अफगानिस्तान तक उसके खिलाफ अपने विरोध को खुलेआम प्रदर्शित कर रहे हैं जबकि चुनावी भाषणों में पाक को चुटकियों में मसलने की बाते करने वाले पीएम मोदी और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी अब पाक को लेकर निर्णय ही नहीं कर पा रहे हैं. पाक के आतंक निर्यात करने के कारण जनता और राजनैतिक दलों में उसके खिलाफ सख्त क़दमों की राय सदैव ही रही है पर अब जब पाक किसी भी तरह से मान नहीं रहा है तो समय आ गया है कि उसको पूरी तरह से अलग थलग करने के प्रयास भी शुरू किये जाएँ तथा वह मध्य एशिया तक माल की आवाजाही पर जितनी रोक लगता है उतनी ही अब भारत को भी पाक पर लगानी चाहिए. सीमा पर व्यापार को एक चेतावनी के रूप में एक दायरे में सीमित कर देना चाहिए तथा पाक की तरफ से बदलाव न दिखाई देने की स्थिति में सीमा पर व्यापार को पूरी तरह से प्रतिबंधित भी कर देना चाहिए. केवल एक तरफ व्यापार से पाक को ही अधिक लाभ मिल रहा है तो उस परिस्थिति में भारत को कड़े कदम उठाने और पाक पर दबाव बनाने से भी नहीं चूकना चाहिए तभी पाक पर सही मायनों में दबाव बनाया जा सकेगा.    
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मंगलवार, 6 सितंबर 2016

कश्मीर - वार्ता का अवरोध

                                        जुलाई माह से ही घाटी के लोगों समेत पूरे देश के लिए समस्या बना हुआ कश्मीर अपने आप में ऐसे सवाल खड़े कर देता है जिससे पार पाने के लिए केवल राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर ही वार्ता से काम नहीं चलने वाला है क्योंकि जून का टूरिस्ट सीज़न बीतने के बाद और अमरनाथ यात्रियों की संख्या में बंद के चलते अभूतपूर्व गिरावट के बाद अब आम कश्मीरियों के सामने रोज़ी रोटी का संकट भी आ गया है. अपनी खूबसूरती के लिए पूरी दुनिया में मशहूर कश्मीर आज जिस तरह से कुछ कारणों से केवल चंद लोगों के अराजक हाथों में बंधक बना हुआ है वह निश्चित तौर पर चिंता का विषय भी है क्योंकि इससे वहां पर सम्पूर्ण काम एक तरह से ठप ही हो गया है. बच्चों की पढ़ाई सबसे अधिक प्रभावित हो रही है क्योंकि आने वाले समय में इन दो महीनों के नुकसान की भरपाई कर पाना अपने आप में संभव नहीं होने वाला है तो जो बच्चे प्रतियोगी और बोर्ड की परीक्षाओं के लिए तैयारी कर रहे हैं उनके लिए सबसे बड़ी समस्या सामने आने वाली है. अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए अब यह घाटी के लोगों की ज़िम्मेदारी बनती है कि स्थितियों को सामान्य करने के लिए वे हर स्तर पर प्रयास करके मुद्दे का हल खोजने का प्रयास करें.
                                              आमतौर पर केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से किये जाने वाले प्रयासों को गलत तो नहीं कहा जा सकता है पर जिस तरह से घाटी और जम्मू क्षेत्र से अपने प्रभावों के कारण पीडीपी और भाजपा को अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती है वहीं अब शांति बहाली के लिए दोनों जगह सरकार में शामिल होने के कारण भाजपा पर दोहरा दबाव बन रहा है. कश्मीर समस्या के शुरू होने से अभी तक जिस तरह का भाजपा का स्टैंड रहा करता था अब केंद्र में उसकी पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद उस पर अमल कर पाना एक बहुत बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रहा है क्योंकि सत्ता बनाये रखने के लिए भाजपा को पीडीपी की ज़रुरत है पर यही ज़रुरत उसकी जम्मू क्षेत्र में राजनैतिक संभावनाओं पर ग्रहण सा लगाती दिखती है. अभी तक भाजपा कश्मीर मुद्दे पर केवल केंद्र सरकारों पर आरोप ही लगाया करती थी पर अब जब उसे कार्यवाही करने के लिए स्वयं ही निर्णय लेना है तो वह कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं दिखाई दे रही है. भाजपा समर्थित सोशल मीडिया टीम जिस तरह से इन मुद्दों को लेकर सोशल मीडिया पर उग्र भाषा का समर्थन करते हुए देखे जाते हैं उसके बाद अब भाजपा पर अपनों का भी दबाव बढ़ता जा रहा है और परिस्थितियां कुछ ऐसी बिगड़ती जा रही हैं कि उनसे निपटने का कोई रास्ता सामने नहीं दिखाई दे रहा है.
                                    दबाव या स्वेच्छा में जिस भी कारण से मोदी सरकार ने जिस तरह से आनन फानन में केंद्रीय सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को घाटी भेजने और उसके माध्यम से कुछ हासिल करने की आधे अधूरे मन से जो कोशिश की उसका कोई परिणाम निकलना भी नहीं था क्योंकि संभवतः सरकार यह दिखाना चाहती थी कि वह तो सभी पक्षों से संविधान के दायरे में रहकर बात करने को तैयार है पर अलगाववादी ही बात नहीं करना चाहते हैं. इतने संवेदनशील मुद्दे पर राष्ट्रभक्ति में अधिक ओतप्रोत होते हुए हमारे कुछ न्यूज़ चैनल भी जिस तरह की ख़बरें और फीचर प्रसारित कर रहे हैं उनसे भी घाटी में कोई सकारात्मक सन्देश नहीं जा रहा है इसलिए अब समय आ गया है कि इस मसले पर इस तरह की दबाव वाली नीति का सभी पक्ष त्याग करें और घाटी के हित में ठोस वार्ता पर आगे बढ़ें. मुद्दे का समाधान तब तक नहीं हो सकता है जब तक वहां के सभी पक्ष खुले मन से आगे नहीं आयेंगें बेशक हुर्रियत के बारे में केंद्र कुछ भी राय रखे पर उनकी तरफ से बंद बुलाये जाने पर आम लोग बाहर निकलना भी नहीं चाहते हैं जिससे उनकी मंशा तो पूरी हो जाती है और बेरोज़गार युवकों को पाकिस्तान से प्रायोजित फण्ड के माध्यम से प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान भी मिलता रहता है. निश्चित तौर पर बातचीत तो भारतीय संविधान के दायरे में ही होगी पर अब केंद्र के सामने वह रास्ता खोजने की चुनौती है जिसके माध्यम से सभी पक्षों को बातचीत के लिए एक मंच पर लाया जा सके.    
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रविवार, 28 अगस्त 2016

कश्मीर में वार्ता की राह

                                                                   बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से ही पाक के इशारे पर सुलग रही कश्मीर घाटी के लिए अब केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग और मतभेदों के साथ वार्ता की बात भी सामने आ रही है. निश्छित तौर पर इस परिस्थिति से  केवल कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता है पर जिस तरह से इस महत्वपुर्ण मुद्दे पर भारत और केंद्र सरकार की छवि पर आंच आ रही है उस पर तत्काल कदम उठाये जाने की आवश्यक भी है. पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह की घाटी यात्रा और फिर सीएम महबूब मुफ़्ती का दिल्ली में पीएम मोदी से मिलना यही दर्शाता है कि अभी तक बातचीत का विरोध करने वाली राज्य सरकार ने भी अपने तेवरों में कुछ नरमी दिखाई है और अब वह केंद्र की तरह से भी कुछ आश्वासन चाहती है जिससे राज्य में इस गतिरोध को तोड़ा जा सके तथा जनजीवन को सामान्य किया जा सके. सीएम महबूबा का कहना कि केवल ५% लोगों ने पूरी घाटी को बंधक बना रखा है कहीं तक सही है पर बाकि ९५% अपनी जान बचाने के चक्कर में सामने आने से डर भी रहे हैं और जब तक यह डर कम नहीं होगा घाटी के आम लोग सामने नहीं आ पायेंगें.
                             अपने गठन के समय से बुरहान वानी के मारे जाने तक मोदी सरकार ने पाक और नवाज़ शरीफ से हर स्तर पर सम्बन्ध सुधारने की हर संभव कोशिशें की पर पाक की इन्हीं हरकतों के चलते उसे मुम्बई हमले के बाद अलग थलग करने के लिए ही मनमोहन सरकार ने किसी भी द्विपक्षीय मुद्दे पर हर स्तर पर पाक से वार्ताएं बंद कर दी थीं और केवल उन्हीं मंचों से पाक से सम्बन्ध रखा जा रहा था जो अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अन्तर्गत आते थे. मोदी सरकार के सम्बन्ध सुधारने के प्रयासों को किसी भी तरह से गलत नहीं कहा जा सकता है पर केवल सुधारने के लिए ही अटल सरकार ने लाहौर बस यात्रा के साथ हो रही कारगिल घुसपैठ पर ध्यान नहीं दिया जिसकी बड़ी कीमत हमें अपने जवानों को खोकर चुकानी पड़ी थी. अब जिस तरह से पीडीपी-भाजपा सरकार में फिर से घाटी और जम्मू का बंटवारा दिखाई दे रहा है वह कहीं से भी मामले को शांत नहीं कर सकता है क्योंकि आज़ादी के बाद से ही कश्मीर को लेकर दिए गए अति उग्र राष्ट्रवादी बयानों में भाजपा ने जो कुछ भी कहा था आज वह उसे वार्ता के लिए राज़ी होने से रोक रहा है पर मोदी लीक से हटकर चलने में विश्वास करते हैं तो हो सकता है कि संघ और पार्टी की लाइन से हटकर वे अलगाववादियों से बात करने की पहल भी कर दें।
                            धर्मगुरु श्री श्री रविशंकर ने कल जिस तरह से बुरहान वानी के पिता के साथ आश्रम में ली गयी अपनी एक फोटो ट्विटर पर शेयर की उससे लगता है कि बातचीत के लिए मोदी सरकार मन बना चुकी है पर उसके लिए सही समय और शर्तों पर बात चल रही है. यदि श्री श्री के हस्तक्षेप से ही कश्मीर का गतिरोध टूट सकता है तो उसमें कोई बुराई नहीं है पर जिन राष्ट्रवादियों को बुरहान वानी के पिता के स्कूल मास्टर होने पर आपत्ति थी वे श्री श्री के साथ उनकी फोटो देखकर अवश्य ही निराश होंगें। सरकार की इस तरह की हर दिशा में की जा रही कोशिशों को सही कहा जा सकता है पर उसके मंत्रियों, संघ विचारकों और पार्टी पदाधिकारियों को भी यह समझना होगा कि अब भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है और देश के सामने आने वाली इस तरह की किसी भी समस्या का समाधान उसे ही करना है. एक तरफ पीएम, एचएम् और डीएम पीओके की बात करते हैं तथा कहते हैं कि कश्मीर कोई मसला ही नहीं है वहीँ विदेश राज्य मंत्री अकबर कहते हैं कि कश्मीर द्विपक्षीय मामला है और पाक इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाकर कुछ भी हासिल नहीं क्र सकता है. सरकार को इस तरह की राजनीति से आगे बढ़कर कश्मीर घाटी के लिए ठोस बातचीत का माहौल बनाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए.
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बुधवार, 24 अगस्त 2016

अशांत कश्मीर और पाकिस्तान

                                                         पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े के चलते जम्मू कश्मीर देश के लिए आज़ादी के बाद से ही एक बड़ी समस्या के रूप में लगातार सामने आता रहा है क्योंकि पाकिस्तान को यह लगता है कि भारत के बंटवारे के समय जो नीति अपनायी गयी थी वह सही नहीं थी और कश्मीर में अधिक मुस्लिम आबादी होने के कारण पाकिस्तान का हिस्सा ही होना चाहिए भले ही वहां के शासक कुछ भी कहते रहें पर साथ ही वह गिलगित बाल्टिस्तान और बलोचिस्तान के लिए इस सूत्र को लागू नहीं करना चाहता जहाँ की जनता के लिए आज भी सामान्य जीवन जीना कठिन ही है. पाकिस्तान की राजनीति में सर्वाधिक प्रभावी पंजाबी समुदाय ने जिस तरह से सेना के साथ हर क्षेत्र में बढ़त बनायीं हुई है और वह आज भी अन्य क्षेत्रों और लोगों के दमन में लगा हुआ है उसके बाद उसके लिए कभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं. पाकिस्तान के चीन को छोड़कर अपने किसी भी पडोसी से मधुर सम्बन्ध नहीं है और आज भी उसके साथ केवल यही तमगा काम करता है कि वह मुसलमानों के लिए अलग से बनाया गया राष्ट्र है जो मुस्लिम समुदाय के लिए सर्वोत्तम साबित हो सकता है पर अपने गठन के तीन दशक में ही इस्लाम के नाम पर बनाये गए इस राष्ट्र ने बांग्लादेश में अपनी बढ़त खो दी थी जब मुक्तिवाहिनी के संघर्ष और पाकिस्तान के दमन के चलते पूर्वी पाकिस्तान उससे अलग हो गया था.
                                            निश्चित तौर पर पाकिस्तान में सेना सबसे आगे है पर सैन्य समाधान सदैव सही नहीं हुआ करते हैं और देश को सही दिशा देने के लिए राजनैतिक पहल भी आवश्यक हुआ करती है. अमेरिका के सन्दर्भ में यदि गौर से देखा जाये तो पाकिस्तान से जिस दिन उसका मतलब समाप्त हो जायेगा और वह उसके काम आना बंद हो जायेगा तो वह नाटो और अन्य क्षेत्रीय संगठनों को साथ लेकर उसके वर्तमान स्वरुप को बिगाड़ने का काम भी आसानी से कर सकता है. वर्तमान रूप का अखंड पाकिस्तान केवल तब तक ही दुनिया के नक़्शे पर है जब तक उसके पास अमेरिका की शक्ति है और जब भी अमेरिका के हितों पर पाकिस्तान से सीधे चोट की जाएगी तो वह इसके टुकड़े करने से भी बाज़ नहीं आएगा यह बात पाकिस्तान की समझ में नहीं आ रही है. आने वाले समय में पाकिस्तान के सिमटते स्वरुप से जहाँ पश्चिमी देशों को आसानी होगी वहीं वे इसके लिए अपनी सुविधा के अनुसार मानवाधिकार की बातें करते हुए पाकिस्तान पर भी हमला करने से नहीं चूकेंगें. वैसे भी केवल इस्लाम और सेना के नाम पर ही पाकिस्तान एक है वर्ना आज वहां के हर क्षेत्र में बड़ा असंतोष आसानी से महसूस किया जा सकता है जो कभी भी एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान के लिए समस्या खड़ी कर सकता है.
                                        पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के दावे को कश्मीर में सही नहीं माना जा सकता है सिर्फ इसलिये ही आज तक संयुक्त राष्ट्र से लगाकर किसी भी अन्य मंच से पाकिस्तान द्वारा यह मामला लगातार उठाये जाने के बाद भी उसे कोई मजबूत समर्थन या आश्वासन नहीं मिल पाया है जबकि अमेरिका उसकी आज़ादी के बाद से उसके साथ हर तरह की सुविधा और सहायता लेकर मौजूद रहा करता है. आने वाले समय में अराजक होते पाकिस्तान के खिलाफ उसका परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र होना ही बहुत बड़ा हथियार बन सकता है क्योंकि किसी एक बड़ी घटना के बाद पाकिस्तान के असुरक्षित परमाणु ज़खीरे को निष्क्रिय करने के लिए पूरी दुनिया में एक सहमति भी बन सकती है. भारत से पाकिस्तान की चाहे जितनी भी असहमति हो पर खुले तौर पर भारत के खिलाफ परमाणु हथियार का उपयोग करने के दुष्परिणाम से पाकिस्तान अच्छी तरह से वाकिफ है और वह जेहादियों को विभिन्न हथियारों की जानकारी देकर पश्चिमी देशों और अमेरिका के खिलाफ उन्हें उकसाने का काम करने में ही अपने हित भी देखता है. भारत यदि पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों उसी तरह से हस्तक्षेप करने लगे जैसा पाकिस्तान किया करता है तो उसके लिए अपने अस्तित्व को बचाये रखना भी कठिन होने वाला है यह बात खुद पाकिस्तान की सेना और राजनेताओं के संज्ञान में है संभवतः इसलिए ही वे कश्मीर में हर तरह का परोक्ष समर्थन देकर उसकी आज़ादी की बातें किया करते हैं और कश्मीरियों को भड़काने का काम करते रहते हैं.
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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

कश्मीरी, कश्मीरियत और ज़िन्दगी

                                                                                      आज़ादी के बाद से ही जिस तरह से कश्मीर घाटी को भारत पाकिस्तान के बीच विवादित क्षेत्र घोषित करवाने के लिए पाकिस्तान ने पूरा ज़ोर लगाया हुआ है उसके सभी प्रयासों के बाद भी उसे कुछ ख़ास मिलता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है इससे हताश होकर वह अपने कुछ किराये के आतंकियों (जिन्हें वह जेहादी कहता है) के माध्यम से घाटी का माहौल बिगाड़ने की हर संभव कोशिश भी करता रहता है. १९४७ में जिस तरह से अपनी आज़ादी के बाद भारत ने खुद को संभालना शुरू किया था और बहुत सारे विवादित मसलों पर अंग्रेजों की मध्यस्थता से पाकिस्तान से बातचीत भी चल रही थी उसे देखते हुए कबाइलियों के वेश में पाकिस्तान की नियमित सेना का ओल्ड मुग़ल रोड पर कब्ज़ा करने और कश्मीर को भारत से अलग करने की कोशिशों को तत्कालीन भारतीय नेतृत्व और भारतीय सेना ने जिस तरह से विफल किया वह इतिहास का हिस्सा और आरोप प्रत्यारोप लगाने का विषय बना हुआ है. आज भी कश्मीर में इतने आधुनिकतम संचार और सुरक्षा उपकरणों के होते हुए घुसपैठ को रोक पाना आसान नहीं है तो १९४७ की इस सैन्य विहीन इलाके की में भारत की स्थिति का अंदाज़ा भी आसानी से लगाया जा सकता है.
                          पिछले एक महीने से कर्फ्यू झेल रही कश्मीरी जनता के पास अब कितने विकल्प शेष बचते हैं क्योंकि एक आतंकी के मारे जाने पर यदि मुट्ठी भर हुर्रियत और अलगावाद समर्थक लोग पूरी घाटी को इस तरह से जीने के लिए मजबूर कर सकते हैं तो इसके लिए केवल सरकार, सेना और प्रशासन को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. जब इतने बड़े पैमाने पर पुलिस पर सुनियोजित तरीके से हमला किया जाता है तो उससे बचने के लिए सुरक्षा बलों के पास क्या विकल्प शेष रह जाते हैं ? भारतीय सुरक्षा बलों पर जिस तरह से कश्मीरियों के दमन का आरोप लगाया जाता है उसकी सच्चाई इस बात से ही पता चल जाती है कि सुरक्षा बलों की तरफ से सीमित बल प्रयोग करने की नीति का किस तरह से अलगाववादी नाजायज़ फायदा उठा रहे हैं क्योंकि आधुनिक हथियारों से लैस सुरक्षा बल यदि फायरिंग करने पर आमादा होते तो उनके ३५०० से अधिक जवान भी इस संघर्ष में घायल नहीं होते. आम कश्मीरी को ही अब यह तय करना होगा कि उसके लिए आतंकियों की मौत पर इस तरह की प्रतिक्रिया देना किस हद तक सही है क्योंकि पाक समर्थक आतंकी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि यदि आम लोगों की रोज़ी रोटी आराम से चलती रहेगी तो वे जेहाद के बारे सोचना भी नहीं चाहेंगें और उनकी नीति बुरी तरह विफल हो जाएगी इसलिए ही वह लगभग हर साल किसी न किसी बहाने से कश्मीरियों के लिए कमाई वाली वार्षिक अमरनाथ यात्रा के समय ही इस तरह से घाटी को अशांत करने की कोशिश करते हैं.
                                      आज बहुत सारे लोग मानवीयता की बातें कर रहे हैं पर मानवाधिकार क्या आम लोगों के ही होते हैं और क्या सुरक्षा बलों में काम करने वाले चाहे वे कश्मीरी हों या कोई अन्य उनके लिए मानवाधिकारों के विकल्प बंद होते हैं ? दोनों तरफ के घायलों की संख्या को देखते हुए अब यह कहना कठिन ही है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन किस तरफ से हो रहा है ? युवाओं के मारे जाने या घायल होने पर उनके भविष्य की बातें तो की जाती हैं पर जिन युवाओं ने बेहतर भविष्य के लिए सुरक्षा बलों में जाने का विकल्प चुना उनके भविष्य के बारे में को इन सोचेगा ? क्या घाटी में तैनात सुरक्षा बल आमलोगों पर किसी तरह की ज्यादती रोज़ ही करते हैं जिसके विरोध में कश्मीरी इतने उग्र हो जाते हैं ? आज घाटी की अंदरूनी सुरक्षा व्यवस्था में जम्मू कश्मीर पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बल ही तैनात हैं तो सेना की भूमिका पर बिना बात के संदेह करने से क्या हासिल होने वाला है ? जम्मू कश्मीर पुलिस में भी कश्मीरी युवा हैं और अलगाववादियों के समर्थन में सड़कों पर हाथों में पत्थर लिए सामने आने वाले भी कश्मीरी युवा ही हैं पर एक कश्मीर को शांत रखने की कोशिशों में हैं तो दूसरे पाक के प्रभाव में आकर अपनों से ही लड़ने पर आमादा हैं. कश्मीरियत अगर ज़िंदा होती तो आतंकियों द्वारा केरन में मारे गए युवा शौकत के लिए भी उसका दर्द दिखाई देना चाहिए था पर आज ऐसा कुछ भी सामने नहीं आता है और पाक के चक्कर में पड़कर कश्मीरी खुद ही अपनी ज़िन्दगी को और भी परेशानी भरी करने पर आमादा दिखाई देते हैं.
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शनिवार, 6 अगस्त 2016

सार्क की प्रासंगिकता

                                                                       दक्षिण एशिया के सात देशों को अपनी साझा समस्याओं और सुविधाओं को साझा करने के साथ  एक आर्थिक रूप से मजबूत क्षेत्र बनाने के सत्तर के दशक के शुरुवाती वर्षों में शुरू हुए प्रयासों ने ८ दिसंबर १९८५ को मूर्त रूप लिया जिसके बाद सार्क का गठन किया गया. इस समूह के चार्टर में शुरू से ही इस बात का उल्लेख किया गया था कि क्षेत्र के विकास के लिए सदस्य देश अपनी द्विपक्षीय समस्याओं को इन स्थान पर नहीं उठायेंगें क्योंकि इसके दो बड़े सदस्यों भारत-पाक के बीच बंटवारे के समय से ही गंभीर विवाद के रूप में कश्मीर और अंतरराष्ट्रीय सीमा मौजूद थी. आज इसके गठन के ३१ वर्ष होने पर भी पाकिस्तान ने यह बात नहीं समझी है कि इस मंच का सदुपयोग किस तरह से किया जाये क्योंकि उनको आज भी यही लगता है कि यदि भारत को पूरी छूट दे दी गयी तो वह पाकिस्तान के बाज़ार पर कब्ज़ा कर लेगा और उनके आर्थिक हित प्रभावित होने लगेंगें तभी आज भी उसकी तरफ से भारत को मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा नहीं दिया गया है और वह संगठन की मूल भावना के खिलाफ जाकर इस मंच से भी कश्मीर का मामला उठाने की कोशिशें लगातार ही करता रहता है जिसका इस संगठन के काम काज पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है और संगठन के गठन पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है.
                         हाल ही में इस्लामाबाद में सार्क देशों के गृह मंत्रियों की बैठक में पाकिस्तान ने जिस तरह का व्यवहार किया उसके बाद सार्क के होने या न होने के क्या मायने रह जाते हैं क्योंकि पूरी दुनिया जानती है कि आज पाक जेहादियों को अपरोक्ष रूप से हर तरह की मदद करता है और खास तौर पर भारत और अफगानिस्तान के लिए लगातार समस्याएं खडी करने का काम भी करता ही रहता है. इस तरह एक अंतरराष्ट्रीय मंचों से राजनयिक शिष्टाचार की अपेक्षा हर देश से की जाती है भले ही उनके आपस में कितने भी मतभेद क्यों न हों फिर भी जिस तरह से इस्लामाबाद में पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर का राग अलापकर बैठक को ख़राब करने की कोशिश की गयी उसके कोई सकारात्मक परिणाम भी सामने नहीं आने वाले हैं. जब बांग्लादेश भी पाकिस्तान के आतंक समर्थक रवैये के चलते अपने मंत्री को इस बैठक में भेजने से इंकार कर सकता है तो ऐसा करने में भारत को क्या दिक्कत है ? जिस तरह से पाकिस्तान का माहौल ख़राब होने के चलते आज वहां पर कोई भी देश क्रिकेट खेलने को राज़ी नहीं होता है ठीक इसी तरह से अब पाकिस्तान से हर तरह के अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को दूर करवाने की कोशिश अब भारत को भी करनी चाहिए.
                           सार्क के सम्बन्ध में भारत को अन्य देशों के साथ मिलकर अब पाकिस्तान को अलग थलग करने का समय आ गया है क्योंकि इसके चार्टर के अनुसार केवल एक देश ही सारी बातों के लिए ज़िम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है ? पाकिस्तान की तरफ से सार्क के हर कदम को रोकने की हर संभव कोशिशें की जाती हैं क्योंकि उसे लगता है कि देशों में इस स्तर का सहयोग बढ़ने पर भारत को ही इसका सबसे अधिक लाभ मिलेगा और वह कश्मीर जैसे विवादित मुद्दे पर बात कर पूरे माहौल को ख़राब करने की कोशिश करने में ही लगा रहता है. भारत को एक बात और भी स्पष्ट करने की आवश्यकता भी है कि पाकिस्तान के इस तरह एक रवैये के चलते अब उसके साथ सार्क स्तर पर सम्बन्ध रख पाना भी संभव नहीं है जिससे सदस्य देशों की तरफ से पाक पर कुछ दबाव भी बनाया जा सके. आज जब पूरा विश्व एक आर्थिक बाजार के रूप में सामने आ चुका है तो उस परिस्थिति में आखिर सदस्य देश इस तरह कब तक अपने आर्थिक हितों के लिए सार्क की तरफ ताकते रहेंगें ? इस पूरे मसले में भारत का ही सबसे अधिक नुकसान होता है इसलिए अब पहल उसकी तरफ से ही होनी चाहिए और सदस्य देशों की तरफ से सार्क और द्विपक्षीय व्यापारिक, आर्थिक, सामाजिक संबंधों के लिए एक समयबद्ध संरचना पर विचार करना चाहिए वार्ना सार्क अपने उद्देश्य को कभी भी हासिल नहीं कर पायेगा.           
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सोमवार, 25 जुलाई 2016

कश्मीर - अलगाववाद और सम्भावनाएं

                                                          आज़ादी के समय विभिन्न कारणों से जिस तरह सम्पूर्ण कश्मीर का भारत में विलय पूरी तरह नहीं हो सका और भौगोलिक परिस्थितियों के चलते भी उस समय मुग़ल रोड पर पाकिस्तान का कब्ज़ा हो जाने से घाटी तक पहुँच संभव न होने से जो समस्या शुरू हुई थी वह आज भी उसी तरह से जारी है. कश्मीर के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि उसे देश दुनिया में सभी अपने नज़रिये और चश्मे से ही देखना पसंद करते हैं क्योंकि १९४७  से इस पर जो कुछ भी कहा सुना गया है वह पूरी तरह से आज भी वहीं पर ही रुका हुआ है जिससे कश्मीर की प्रगति में रुकावट के साथ उसकी क्षमताओं के दोहन पर भी ग्रहण सा लग गया है. पिछले तीन दशकों में बढे इस्लामी चरमपंथियों ने कश्मीर घाटी को अपनी राजनीति का मोहरा बना लिया है. पंजाब में अस्सी के दशक में बढे आतंक पर काबू पाने के लिए राजीव सरकार ने जिस तरह से सीमा पर कांटेदार बाड़ लगाने का काम बड़े स्तर पर शुरू किया था उसके वहां बेहतर परिणाम भी मिले थे जिसको देखते हुए जम्मू कश्मीर में भी एलओसी तथा सीमा पर यही काम शुरू किया गया. आज यदि घाटी में घुसपैठ को कम करने और विदेशी आतंकियों को रोकने में देश को सफलता मिली है तो यह उस निर्णय के कारण ही है जिसे बाद की सभी सरकारों ने पूरी तत्परता के साथ आगे बढ़ाया भी है.
                                                  अलगाववाद के मुद्दे पर घाटी के लोगों से सख्ती से निपटने के लिए जिस तरह से पूरे भारत में दो तरह के विचार सामने आते रहते हैं उन पर भी सोचने का समय आ चुका है क्योंकि इतनी बड़ी आबादी के साथ यदि किसी भी तरह की अनावश्यक सख्ती की जाती है तो केंद्र सरकार को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी आलोचना का शिकार होना पड़ सकता है साथ ही पाकिस्तान को अपने उस दुष्प्रचार को आगे बढ़ाने में भी मदद मिल जायेगी जो सदैव ही उसकी मंशा में शामिल रहा करता है कि वह पूरे विश्व को यह बता सके कि भारत कश्मीरियों पर ज़ुल्म कर रहा है. आज भारत के बड़े आर्थिक बाजार के रूप में उभरने के बाद से कोई भी बड़ा देश इस तरह के मामलों में अपने हितों को देखते हुए पूरी चुप्पी ही लगा जाता है और यह कहकर अपना पीछा भी छुड़ा लेता है कि यह द्विपक्षीय मसला है और इसमें किसी भी अन्य देश के दखल का कोई मतलब भी नहीं बनता है. राजनाथ सिंह को सरकार चलाने में सामने आने वाली चुनौतियों का मुकाबला करने के बाद अब यह पता चल गया है कि विपक्षी दलों की बेंचों पर बैठकर सरकार पर आरोप लगाना कितना आसान होता है और सरकार के गृह मंत्री होने पर कितने मसलों पर किस तरह से बयान देने पड़ते हैं. पेलेट गन का उपयोग संयम के साथ ही किया जाता है क्योंकि किसी को मार डालने के लिए घाटी में सुरक्षा बल यदि लगे होते तो अब तक घाटी को साफ़ कर चुके होते वे वहां पर पूरी ज़िम्मेदारी के साथ अपने काम को अंजाम देने में लगे हुए हैं इसलिए उन पर और उनके निर्णयों पर अनावश्यक बोलने से किसी को भी कुछ हासिल नहीं होने वाला है.
                                 अब घाटी के अलगाववादी तत्वों के साथ पाकिस्तान को भी यह समझना ही होगा कि इस तरह आतंक फैलाकर बलपूर्वक कश्मीर को हासिल करने की उसकी नीति किसी भी तरह से उसके काम नहीं आने वाली है और जिस तरह से घाटी के लोगों पर राज्य के बड़ा बजट खर्च किया जाता है उसे लेकर लद्दाख और जम्मू में भी घाटी के लिए कोई सद्भावना नहीं है. यह ऐसी परिस्थिति है जिसमें राज्य के तीन हिस्से करना देश और कश्मीर के लिए एक बड़ा कदम हो सकता है. बेशक धारा ३७० का प्रावधान घाटी के स्वरुप को बनाए रखने के लिए ही किया गया था पर १९८९ के बाद कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद क्या घाटी १९४७ जैसी स्थिति में रह गयी है ? यदि कश्मीर के अलगाववादी नेता इसी तरह से राज्य को देश से अलग करने के मंसूबे पालते रहे तो यह भी संभव है कि भारतीय संविधान की धारा ३७० को केवल कश्मीर घाटी तक सीमित करने या पूरी तरह से ख़त्म करने का कोई प्रस्ताव भी संसद में आसानी से पारित हो जाये. आज कश्मीर घाटी की जो भी विशेष स्थिति है वह भारतीय संविधान द्वारा ही दी गयी है न कि कश्मीरियों को वह असीमित समय के लिए मिली हुई है भारतीय संसद पूर्ण संप्रभु है और कश्मीरियों के इस तरह के क्रियाकलापों से कभी उनको मिले हुए इस विशेष दर्ज़ पर भी चर्चा शुरू हो सकती है. पाकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर और भारतीय कश्मीर में स्पष्ट अंतर यह है कि यहाँ विकास की बात होती है और वहां पर अलगाववादियों के कैंप लगाकर विनाश की राह पर चलने के लिए उकसाने का काम किया जाता है.           
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गुरुवार, 5 मई 2016

कश्मीर सुपर -३०

                                                             अशांत क्षेत्र होने के चलते सदैव ही कश्मीर घाटी में सेना को गलत कारणों से चर्चा में रखने की जो कोशिश पाक समर्थित अलगाववादियों और जिहाद में लगे हुए आतंकियों द्वारा की जाती रहती है उसके अतिरिक्त भी सेना की तरफ से वहां के लोगों के जन जीवन को ऊंचा उठने के जो प्रयास लगातार किये जा रहे हैं उनके प्रति कश्मीर का स्थानीय मीडिया और राष्ट्रीय मीडिया भी उपेक्षा का भाव अपनाए रखता है. यह सही है कि अशांत क्षेत्र में काम करने वाली सेना और अर्धसैनिक बलों की तरफ से कई बार अनजाने में कुछ गलत कदम भी उठा लिए जाते हैं पर उन गलत क़दमों का कभी भी समर्थन नहीं किया जाता है और जाँच के बाद दोषी पाये जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कड़ी कार्यवाही भी की जाती है. साथ ही देश के अन्य स्थानों की तरह कश्मीर में भी किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा या अन्य विपरीत परिस्थितियों में सेना की तरफ से भरपूर मदद भी की जाती है जिससे यही पता चलता है कि सेना की भूमिका केवल अशांत क्षेत्र को शांत रखने तक ही सीमित नहीं रहा करती है बल्कि आवश्यकता पड़ने पर वह नागरिक प्रशासन का सहयोग भी करती है.
                                        कश्मीर के मेधावी छात्रों के लिए सेना ने बिहार के आनंद कुमार के सुपर-३० से प्रेरणा लेते हुए घाटी में भी आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए इसी तरह की व्यवस्था करने की कोशिशि शुरू की थी जिसके आज सकारात्मक परिणाम के रूप में ३० में से १५ छात्रों को मेंस में सफलता मिल गयी है और अब वे एडवांस परीक्षा की तैयारियों में लगे हुए हैं. यह सही है कि घाटी की विपरीत परिस्थितियों के चलते १९८९ से आज तक पूरी एक पीढ़ी अलगाववादियों के दुष्चक्र में उलझकर बर्बाद हो गयी है तथा राज्य में पढ़ाई का माहौल ही नहीं बचा है. इस परिस्थिति में जब छोटे बच्चों को भी पत्थरबाजी के लिए उकसाया जा रहा हो तो बच्चों में अपना भविष्य बनाने की बात कौन करने वाला है ? सेना की तरफ से २५ वर्ष पहले शुरू किये गए ऑपरेशन सद्भावना के अच्छे परिणाम सामने आने के बाद उसकी तरफ से राज्य के प्रतिभाशाली छात्रों के लिए देश की प्रतिष्ठित परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए सुपर-३० एक बड़ा कदम साबित हो सकता है. सेना की तरफ से पूरी कोशिश की जा रही है जिसमें कश्मीर के बच्चों को खुद को हर क्षेत्र में स्थापित करने की कोशिशें शुरू की जा सकें यदि इस बार इस प्रयास से कुछ बच्चे आईआईटी में सफल होते हैं तो यह घाटी में नयी संभावनाओं को भी जन्म दे सकती है.
                                 अलगाववाद के नाम पर जिस तरह से युवाओं को बरगलाया जा रहा है और उनके सामने केवल भारत से लड़ाई लड़ने के एकमात्र विकल्प को ही पेश किया जा रहा है उस परिस्थिति में यदि ३० बच्चे भी सेना के इस तरह के किसी भी प्रयास में भाग लेना शुरू करते हैं तो यह कश्मीर के लिए ही बेहतर भविष्य की नींव रखने का काम कर सकते हैं. आज राज्य में महबूबा सरकार के पास काम करने के अच्छे अवसर भी हैं क्योंकि उनकी बातों को अलगाववादियों से प्रभावित जगहों पर भी गम्भीरता से सुना जाता है तो इस अवसर को राज्य का माहौल बदलने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है. महबूबा सरकार की तरफ से वे राजनैतिक कदम उठाये जाने चाहिए जिनकी आवश्यकता है और सेना तथा केंद्र सरकार इस अवसर को घाटी के माहौल को हिंसा से शिक्षा की तरफ मोड़ने का काम शुरू कर सकते हैं. सेना पर आरोप लगाने वाले भी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि इस तरह के अशांत क्षेत्र में काम करना कितना कठिन होता है और किसी एक घटना से वर्षों की सद्भावना पर पानी फिर जाता है. कश्मीरियों को भी यह समझना होगा कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अब सही दिशा में उन्हें भी कदम उठाने हैं वरना इन अच्छे क़दमों के भी सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ पायेंगें. 
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बुधवार, 20 अप्रैल 2016

हंदवाड़ा और कानून

                                                             हंदवाड़ा में सेना के जवान द्वारा कथित रूप से एक स्थानीय लड़की को छेड़ने की अफवाह के बाद जिस तरह से पूरे मामले में जिस तरह से राजनीति शुरू हुई वह भले ही कुछ दलों और स्थानीय नेताओं के साथ कश्मीरी अलगाववादियों के लिए कुछ समय तक एक जीवंत मुद्दे के रूप में वोट दिलवाने का काम करती रहे पर आने वाले समय में पूरी कश्मीर घाटी के लिए उसका सन्देश अच्छा नहीं रहने वाला है. सेना के एक जवान पर आरोप लगाने के बाद अलगाववादियों ने जिस तरह से स्थानीय निवासियों को भड़काया और उसके साथ ही फैली हिंसा में चार कश्मीरी युवक भी मारे गए तो उससे हंदवारा या कश्मीरियों को क्या मिला आज यह सवाल कोई भी कश्मीरी अपने आप से क्यों नहीं पूछना चाहता है ? इस मामले में सेना को बदनाम करने की जिस स्तर पर एक सुनियोजित साज़िश की गयी अब उसके विरोध में कुछ भी क्यों नहीं कहा जा रहा है सम्भवतः लड़की के बयान के बाद उन लोगों की कलई खुल गई जो सेना पर आम कश्मीरियों को प्रताड़ित करने के आरोप लगाने से कभी भी नहीं चूकते हैं अब क्यों उन लोगों से कोई सवाल नहीं पूछा जा रहा है जिनकी घिनौनी राजनीति में युवकों की जान चली गयी है ?
                               लड़की के दो बार दिए गए बयान के बाद से यह स्पष्ट हो गया है कि उसे स्थानीय लड़के छेड़ा करते थे और इस मामले में उन्होंने लड़की को माध्यम बनाकर घाटी में अशांति का नया दौर शुरू करने की एक कोशिश की जा रही थी जिसे अब पूरी तरह से नाकाम कर दिया गया है. लड़की के अपने चाचा या मामा के घर पुलिस सुरक्षा में रहने को लेकर भी अनावश्यक सवाल खड़े किये जा रहे हैं कि अभी भी लड़की पुलिस की हिरासत में है जबकि जम्मू कश्मीर सरकार और पुलिस का कहना है कि उसे उन लड़कों और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए केवल पुलिस सुरक्षा दी गयी है उसके कहीं भी आने जाने पर सरकार की तरफ से कोई भी प्रतिबन्ध नहीं लगाए गए हैं. सरकार की तरफ से उसकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गयी है. यह भी संभव है कि आने वाले समय में कोई निर्दयी अलगाववादी उस निर्दोष लड़की की जान लेने की कोशिश भी कर सकता है क्योंकि उसके सच बयान करने के बाद उनकी राजनीति सबके सामने आ गयी है और उनके लिए मुंह छिपाने जैसी स्थिति बन गयी है.
                            पिछले कई वर्षों से जम्मू कश्मीर में पर्यटन का समय शुरू होने के साथ इस तरह की सुनियोजित साज़िश अलगाववादियों की तरफ से लगातार की जाती रही है और इनकी इस मंशा को आम कश्मीरी या तो समझना ही नहीं चाहता है या उनके भय के कारण उनके हाथों में खेलने को मजबूर रहा करता है. पर्यटन से आमलोगों को होने वाली आय के माध्यम से गरीब कश्मीरियों और व्यापारी वर्ग के लिए लाभ कमाने का मौका होता है पर जब घाटी में इस तरह के प्रदर्शन और बंद के साथ कर्फ्यू जैसे हालात रहेंगें तो पूरे देश और दुनिया से कोई क्यों वहां जाना चाहेगा ? अलगाववादियों की एक बड़ी मंशा यह भी रहा करती है कि आम कश्मीरी के सामने सदैव ही रोज़ी रोटी की समस्या बनी रहे जिससे हताश होकर नौजवान वर्ग भी अलगाववादियों की तरफ मजबूरी में झुकने को मजबूर हो जाये. जब तक इस मंशा के साथ काम करने वाले लोगों को घाटी के लोग अलग थलग नहीं करेंगें तब तक उनकी धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों में कोई बड़ा सुधार नहीं होने वाला है. महबूबा मुफ़्ती के रूप में राज्य के पास अब ऐसी नेता हैं जो राज्य के समग्र विकास और परिवर्तन के लिए सही दिशा में काम करने की क्षमता रखती हैं तो अब कश्मीरियों के पास उनके साथ आगे बढ़कर घाटी को झूठे प्रचार से बाहर निकलने का अवसर भी है जो सम्भवतः समय चूक जाने पर दूसरी बार नहीं मिलने वाला है.                                           
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बुधवार, 6 अप्रैल 2016

श्रीनगर एनआईटी और राजनीति

                                                   संवेदनशील मुद्दों पर देश भर में सुरक्षा बलों के साथ विभिन्न दलों की सरकारों का रवैया किस तरह का रहा करता है यह अपने आप में बहुत ही बड़े विवाद का विषय है क्योंकि जब भी कहीं भी कोई विवाद होता है तो देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से लेकर महाविद्यालयों तक में विभिन्न दलों के छात्र संगठनों से जुड़े हुए लोगों द्वारा हर तरह की राजनीति की जाती है. श्रीनगर में एनआईटी में जिस तरह से एक मैच में भारत की हार पर स्थानीय छात्रों की तरफ से खुशियां मनाई गईं उसका किसी भी स्तर पर समर्थन नहीं किया जा सकता है पर इस मसले को जिस तरह से कश्मीरी बनाम गैर कश्मीरी का रुख दिया जा रहा है वह अपने आप में संस्थान की गरिमा को चोट पहुँचाने वाला ही है. कश्मीर घाटी में सदैव से ही भारत विरोधी तत्व सक्रिय रहा करते हैं और वे विभिन्न अवसरों पर पाकिस्तान और अब आईएस का झंडा लहराने से भी नहीं चूकते हैं जो कि उनकी भारत विरोधी मानसिकता को ही दिखाता है ऐसे में भारत के किसी अन्य हिस्से से गए हुए छात्र वहां का माहौल समझ नहीं पाते हैं और अपनी भावनाओं को उसी तरह से व्यक्त करते हैं जैसा वे अपने घरों पर किया करते हैं जिसका परिणाम इस तरह से सामने आता है और शिक्षा संस्थाओं में भी इस स्तर की राजनीति शुरू हो जाती है.
                             अब इस मामले में नए तथ्य सामने आने और जम्मू कश्मीर पुलिस द्वारा इन छात्रों की बर्बर पिटाई के बाद मामला और भी विभाजित दिखाई देने लगा है क्योंकि अब गैर कश्मीरी छात्र वहां से स्थानीय पुलिस को हटाकर केंद्रीय सुरक्षा बलों को तैनात किये जाने की मांग करा रहे हैं. पीडीपी-भाजपा की नयी नयी बनी सरकार के लिए यह सब एक बड़ा झटका जैसा ही है क्योंकि पीडीपी कश्मीरी हितों को सर्वोपरि रखती है तथा भाजपा के लिए राष्ट्रवाद, भारत माता की जय और तिरंगा फहराने की राजनीति पूरे देश में बहुत महत्वपूर्ण है. आज जब भारत माता की जय के मुद्दे पर लगातार विवादित बयान दिए जा रहे हैं तो इस परिदृश्य में सरकार और भाजपा के पास सीमित विकल्प ही शेष बचते हैं और यदि विपक्षी दल इस मुद्दे पर मोदी सरकार और भाजपा पर हमलावर होते हैं तो उनके लिए असम और बंगाल के चुनावों में जनता को जवाब देना मुश्किल होने वाला है क्योंकि श्रीनगर में इस मारपीट के शिकार छात्रों में पूर्वोत्तर के बहुत सारे छात्र भी हैं. इस मसले को राजनैतिक लाभ हानि के स्थान पर शांति के साथ सुलझाने की आवश्यकता है जिससे एनआईटी में पूरे देश के छात्र अगले वर्षों में भी प्रवेश के लिए आते रहें.
                          महबूबा मुफ़्ती ज़मीन से जुडी हुई नेता हैं और इस तरह एक मुद्दों से उनका बहुत बार सामना होता रहा है पर इस बार इस प्रकरण में मामला जहाँ तक बिगड़ गया है उसके बाद उनके लिए संस्थान की गरिमा बचाए रखने के लिए संघर्ष करने जैसी स्थिति भी उत्पन्न हो गयी है. सरकार की मुखिया होने के नाते उनकी तरफ से परिसर का दौरा बहुत आवश्यक हो गया है और उनकी तरफ से यह भी सुनिश्चित किये जाने की आवश्यकता है कि माहौल जल्द ही ठीक हो जिससे एचआरडी मिनिस्ट्री या होम मिनिस्ट्री की तरफ से कोई मंत्री वहां का दौरा कर सके. मोदी सरकार के लिए गृह राज्य मंत्री किरण रिजुजु इसके लिए सर्वोत्तम व्यक्ति साबित हो सकते हैं क्योंकि वे पूर्वोत्तर से आते हैं और घाटी में उनको लेकर कोई पूर्वाग्रह भी नहीं दिखाई देगा. स्मृति ईरानी के वास्तव में लाभप्रद दौरे को करवाने के लिए केंद्र राज्य दोनों को ही बहुत प्रयास करने होंगें क्योंकि हैदराबाद और जेएनयू के बाद घाटी में उनका विरोध होना अवश्यम्भावी है. इस प्रकरण को अनावश्यक रूप से उछालने के स्थान पर पीडीपी और भाजपा को कोशिश करनी चाहिए तथा विवादित बयान देने वाले भाजपाई और संघी नेताओं पर रोक लगाने की कोशिश भी करनी चाहिए क्योंकि पढ़ने गए छात्रों पर किसी भी तरह का संकट इनके बयानों के कारण नहीं आना चाहिए. फिलहाल यह मुद्दा जम्मू-कश्मीर और केंद्र सरकार के लिए एक परीक्षा के तौर पर सामने आ गया है और इसमें दोनों के उत्तीर्ण होने के आवश्यकता भी है क्योंकि तभी मामला शांत हो सकता है.      
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शुक्रवार, 25 मार्च 2016

महबूबा की नयी पारी

                                                             लगभग ढाई महीने की लंबी निरर्थक सी लगने वाली लड़ाई के बाद जिस तरह से जम्मू कश्मीर में एक बार फिर से पीडीपी-भाजपा की गठबंधन सरकार सत्ता में आने जा रही है उससे यही लगता है कि मुफ़्ती मोहम्मद सईद के समय में किये गए समझौते के प्रारूप में बिना किसी बड़े बदलाव के ही यह राजनैतिक कवायद शुरू होकर अपने परिणाम तक पहुँच रही है. अपनी पाकिस्तान से लगती भौगोलिक स्थिति, स्थानीय निवासियों के बीच आसानी से घुल मिल जाने वाले आतंकियों और घाटी में कुछ प्रतिशत जनता द्वारा अलगावादियों को हर तरह का समर्थन दिए जाने के चलते ही महबूबा के लिए सरकार चला पाना आसान नहीं होने वाला है. वैसे तो पूरे देश में ही खंडित जनादेश आने पर एक दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में ताल ठोंक चुके विभिन्न दल साथ में खड़े होकर किसी भी तरह से सरकार बनाने के प्रयास करते हुए दिखाई देते हैं पर कई बार इस स्थिति के बीच ही कुछ ऐसे बेमेल गठबन्धन भी हो जाते हैं जिनसे पार पाना आसान नहीं होता है. दोबारा बनने वाली इस सरकार को चलाने के लिए अब बड़ा दबाव पीडीपी पर ही आने वाला है क्योंकि भाजपा जम्मू क्षेत्र में अपना अधिकतम प्रदर्शन कर चुकी है और उससे अधिक उसे मिलने वाला भी नहीं है और पीडीपी इस गठबंधन से बहुत कुछ खो सकती है.
                               मुफ़्ती मोहम्मद सईद पुरानी पीढ़ी के नेता थे और लगभग हर दल में उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग भी होते थे पर महबूबा मुफ़्ती की अधिकांश राजनीति केवल घाटी से ही सम्बंधित रही है और उन्हें अलगाववादियों के प्रति नरम रुख रखने के लिए भी जाना जाता है. इस तरह की परिस्थितियों में भाजपा के साथ उनका राजनैतिक सम्बन्ध कहाँ तक चल पाएगा यह तो समय ही बताएगा पर जम्मू कश्मीर में राजनैतिक प्रक्रिया को दोबारा से चालू कर चुनी हुई सरकार के हाथों में राज्य को सौंपना अच्छी खबर है क्योंकि केंद्र सरकार के हाथों में राजनैतिक शक्ति रहने पर अलगाववादी अपनी हरकतों से घाटी में यह सन्देश देने की कोशिश करने लगते हैं कि केंद्र सरकार ही घाटी के लोगों के हितों को नुकसान पहुँचाने का काम करने में लगी हुई है. जब पीडीपी भी सरकार का हिस्सा होगी तो इस पूरी कवायद को झूठ के पंख नहीं मिल पाएंगें और अलगाववादियों की हर बात को जनता तक पहुँचने में समय भी लगेगा क्योंकि तब बीच में पीडीपी की राजनैतिक इकाइयां भी अपना काम करने में लग जाएंगीं.
                              महबूबा का सीएम बनना राज्य के लिए एक बड़े बदलाव को लेकर भी आने वाला है क्योंकि इस कदम से जहाँ वे अपने को सरकार चलाने में सही तरह से साबित भी कर सकती है और इसमें पूरी तरह से विफल भी हो सकती हैं. भाजपा और पीडीपी दोनों को ही अपने उकसावे वाले बयान देने के लिए आगे रहने वाले नेताओं को रोकना ही होगा क्योंकि पूरी राजनैतिक प्रक्रिया को दोनों ही दलों में मौजूद इस तरह की अति वाली मानसिकता से बहुत नुकसान पहुँच सकता है. जम्मू कश्मीर और देश के हित के लिए इस सरकार का कार्यकाल पूरा होना बहुत आवश्यक भी है क्योंकि उसके माध्यम से ही जनता में विश्वास पैदा किया जा सकता है. महबूबा खुद ज़मीन से जुडी हुई नेता हैं तो उन्हें अपनी पार्टी के उन तत्वों पर लगाम कसनी होगी जो खुलेआम अलगाववादियों का समर्थन करने में लगे रहते हैं यदि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा चलायी जा रही विभिन्न पुनर्वास प्रक्रियाओं को सही दिशा में आगे बढ़ाया जाता है तो इससे युवाओं में केंद्र सरकार के प्रति झूठे आक्रोश को बढ़ने से रोका जा सकेगा. साथ ही पीडीपी को इस बात का विशेष ख़याल रखना होगा कि जहाँ भी युवाओं पर अलगाववादियों का प्रभाव अधिक है वहां खुद महबूबा को अतिरिक्त संवाद बनाए जाने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि सेना द्वारा सुरक्षा सम्बन्धी किसी भी मामले में हस्तक्षेप करने की स्थिति में युवाओं को उससे सहयोग का महत्त्व समझाना होगा और सेना की तरफ से चलने वाली कार्यवाहियों में स्थानीय जनता को स्वेच्छा से सहयोग करने के लिए तैयार करना होगा वर्ना किसी भी मुद्दे पर घाटी और जम्मू में अपने वोटों को सँभालने के लिए दोनों दल कभी भी पुरानी स्थिति में लौट सकते हैं जो पूरे राज्य के लिए घातक ही साबित होगा.     
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रविवार, 7 फ़रवरी 2016

कश्मीर-सौदेबाज़ी और सरकार

                                                   मुफ़्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद एक माह पूरा होने पर भी अभी तक जम्मू कश्मीर में नयी सरकार के गठन का रास्ता पूरी तरह से खुलता हुआ नज़र नहीं आ रहा है जो कि अभी तक सत्ता संभाल रहे पीडीपी-भाजपा गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रहा है. लम्बे समय से अशांत रहने वाले इस राज्य में अब जब स्थितियां काफी हद तक नियंत्रण में हैं तो इस परिस्थिति में वहां इस तरह से चुनी हुई सरकार के स्थान पर केंद्र का अप्रत्यक्ष दखल के चलते राज्य की जनता को एक बार फिर से अलगाववादी लोकतंत्र के खिलाफ भड़काने का काम कर सकते हैं क्योंकि अभी तक जिस तरह से राज्य में विभिन्न प्रमुख दलों के साथ राष्ट्रीय दलों ने अपनी भूमिका का निर्वाह किया है उससे भी राज्य की परिस्थितियों को सामान्य करने में महत्वपूर्ण योगदान मिला है. राजनैतिक रूप से चुनी हुई सरकार के होने पर जहाँ राज्य में सक्रिय अलगाववादी केंद्र और सेना पर आसानी से प्रतिबन्ध लगाने के झूठे आरोप नहीं लगा पाते हैं वहीं सीधे राज्यपाल शासन होने के कारण वे राजनेताओं को किनारे किये जाने और दिल्ली पर मनमानी करने के आरोप लगाने से भी नहीं चूकने वाले हैं.
                                     किसी भी बहु-दलीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में खंडित जनादेश का आने कोई नयी बात नहीं है पर जिस तरह से कई महत्वपूर्ण राज्यों और केंद्र में कई दशकों से साझा सरकारों का दौर चलता रहा है और उसमे दलीय हितों के चलते कई बार दरारें भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं तो इस परिस्थिति से निपटने के लिए क्या अब देश को नए सिरे से सोचने की आवश्यकता नहीं है ? इस तरह की परिस्थिति में सभी दलों की एक राज्य स्तरीय सरकार बनाये जाने के विकल्प पर सोचने की बहुत आवश्यकता आ गयी है क्योंकि चुनाव के बाद परिस्थितियां बदल जाएंगीं ऐसा कोई भी नहीं कह सकता है तो जिन लोगों को जिस रूप से स्थानीय कारणों के चलते विधानसभाओं में जाने का अवसर मिला है उनके सभी के साथ मिलकर एक साझा कार्यक्रम बनाकर सरकार के गठन के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए. इससे जहाँ असमय चुनावों से बचा जा सकेगा वहीं देश के संसाधनों को बचाया जा सकेगा जो कि चुनावों में लगाने पड़ते हैं. इस बार पीडीपी और भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि दोनों के वोट बैंक बिलकुल विपरीत ध्रुवों से आते हैं और जब एक अपने हितों की बात करता है तो दूसरे के हित उससे स्पष्ट रूप से टकराने लगते हैं.
                                    वर्तमान परिस्थिति में यदि दोनों दलों के बीच कोई सामंजस्य नहीं बन पाता है तो यह राज्य के लिए अच्छा साबित नहीं होने वाला है क्योंकि भाजपा से सम्बन्ध जोड़कर पीडीपी ने निश्चित रूप से अपने वोटबैंक को नाराज़ किया है साथ ही भाजपा भी जम्मू क्षेत्र में अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने के लिए आश्वस्त नहीं दिखाई दे रही है संभवतः यही कारण है कि वह भी अगले पांच वर्षों तक सरकार चलने की संभावनाओं को लगातार टटोलने का काम करने में लगी हुई है. मुफ़्ती मोहम्मद सईद पुरानी पीढ़ी के नेता थे जिन्होंने देश की मुख्य राजनीतिक धारा के साथ भी लम्बे समय तक काम किया था जिस कारण उनके सोचने और खतरे उठाने की क्षमता का महबूबा किसी भी स्तर पर मुक़ाबला नहीं कर सकती हैं और यही तथ्य दोनों दलों के १० महीने पुराने गठबंधन को आगे चलाने के लिए रोड़े का काम कर रहा है. कश्मीर के हितों पर बात होनी चाहिए पर साथ ही जम्मू और लद्दाख के लोग जिस तरह से कश्मीर घाटी के नेताओं के नेतृत्व में बनने वाली किसी भी सरकार पर अपने क्षेत्रों की उपेक्षा के आरोप लगाते हैं आज उनसे भी निपटने की आवश्यकता है. महबूबा भाजपा पर दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाना चाहती हैं और इस स्थिति में बात आगे न बढ़ने पर वे कांग्रेस के साथ भी जा सकती है यह बात भाजपा भी समझ रही है जिसके बाद राज्य की जनता को केंद्र से मिलने वाली सहायता और सहयोग में कमी आ सकती है यह बात भी सभी जान रहे हैं. फिलहाल सभी दलों कि यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वे वर्तमान में चल रहे गतिरोध को तोड़ने के लिए नए सिरे से खुले मन से सोचने का काम शुरू करें.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

कश्मीरी पंडितों के मानवाधिकार

                                                                     देश में जहाँ हर मुद्दे पर राजनीति की जाती है वहीं इस राजनीति के चलते प्रभावित होने वाले आम नागरिकों के बारे में सोचने का काम किसी भी राजनेता की इच्छा शक्ति के आगे बस घुटने टेकता हुआ ही दिखाई देता है. आज भी कश्मीर घाटी में जिस जिस तरह का माहौल बन रहा है उसको देखते हुए मोदी सरकार से कश्मीरी पंडितों द्वारा की जाने वाली आशाएं भी धूमिल होती नज़र आ रही हैं. कश्मीर केवल राजनैतिक मामला नहीं वरन अलगाववादियों के माध्यम से घाटी को कभी कश्मीर की पहचान रहे कश्मीरी पंडितों से खाली करवाने की एक सोची समझी साज़िश थी जिसमें केंद्र और राज्य स्तर के सभी राजनैतिक दलों ने केवल वायदे करने के स्थान पर इनके लिए कुछ भी ठोस नहीं किया है. घाटी में अलग से टाउनशिप बनाकर इनको बसाने की योजना इस लिए भी कारगर नहीं हो सकती है क्योंकि अंत में इन कश्मीरी पंडितों को अपनी आजीविका के लिए इन जगहों से बाहर निकलने की आवश्यकता भी पड़ने वाली है तो उस स्थिति में कोई भी सरकार हर कश्मीरी पंडित को आखिर किस तरह से सुरक्षा प्रदान कर पायेगी ?
                    अपनी जड़ों और घरों से दूर पैदा हुई एक नयी पीढ़ी और कश्मीरी पंडितों की घाटी छोड़ने वाली पीढ़ी ने किस तरह से अपने हज़ारों वर्षों से चले आ रहे इस प्रयास को किस तरह से चौथाई सदी में कैसे बिखरते हुए देखा है यह सभी जानते हैं पर आज भी इस मुद्दे पर केवल लच्छेदार बातें करने के स्थान पर कोई ठोस प्रगति नहीं की जा सकी है. आज भी कश्मीर के अलगाववादी, राजनेता यह कहने से नहीं चूकते हैं कि इन पंडितों का घाटी में स्वागत है पर इनकी बोलती उस समय क्यों बंद थी जब इन पंडितों को घरों से बेघर किया जा रहा था ? केंद्र और राज्य सरकार को इस बारे में कुछ ठोस करने की आवश्यकता भी है क्योंकि घाटी में जब तक सभी के रहने लायक माहौल नहीं बनता है तब तक कोई इतने असुरक्षित माहौल में आखिर किस तरह से बसने के बारे में सोच भी सकता है. जिन पड़ोसियों से इन पंडितों का पीढ़ियों से लगाव था उनमें से अधिकांश ने उस समय इनके इस पलायन पर चुप्पी साधे रखी और किसी भी परिस्थिति में उनका कोई साथ नहीं दिया जिसका दुष्परिणाम आज उनके सामने है कि आतंकी उनके जीवन को आज भी खतरों में डालने से नहीं चूकते हैं और नयी पीढ़ी भी चाहकर इस दुष्चक्र से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पा रही है.
                               पाकिस्तान से आने वाली एक खबर मोदी सरकार को इसी बड़े निर्णय के लिए आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है क्योंकि आज़ादी के समय से ही गिलगिट-बाल्टिस्तान एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में जाना जाता है और अब पाकिस्तान की नवाज़ सरकार संविधान में संशोधन करके उनको अपना एक पूर्ण राज्य बनाये जाने की तरफ बढ़ना चाहती है क्योंकि वहां पर चीन द्वारा किये जा रहे निवेश की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान को कुछ कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. यदि पाकिस्तान इस क्षेत्र को बाकायदा अपना एक राज्य बनाने की तरफ पहल करता है तो मोदी सरकार को भी एक बड़ा राजनैतिक कदम उठाने का मौका मिल सकता है और वह पाकिस्तान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाने के लिए जम्मू कश्मीर को धारा ३७० के अंतर्गत मिलने वाले विशेष दर्ज़े का प्रावधान को समाप्त करने के बारे में भी सोच सकती है. जब पाक अपनी बात पर नहीं टिका रहेगा तो इस स्थिति में भारत भी अपने यहाँ की स्थिति में बदलाव कर सकता है जो कि घाटी में भले ही कुछ वर्षों के लिए अराजकता बढ़ाने का काम कर सकता है पर ३७० खत्म होने के साथ पूरे भारत की निगाहें जम्मू कश्मीर की तरफ घूम जाने वाली हैं. पाकिस्तान ने ही इन पंडितों का घाटी में जीना दुश्वार किया था तो हो सकता है उसका कोई ऐसा कदम इनके लिए एक बार फिर से नए अवसरों के रास्तों को खोल दे.   
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सोमवार, 11 जनवरी 2016

कश्मीर राजनैतिक संकट की तरफ ?

                                                      जम्मू कश्मीर के सीएम मुफ़्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद वहां की राजनीति पर एक बार फिर से अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं क्योंकि मुफ़्ती के नाम पर भाजपा में जिस हद तक आम सहमति थी वह महबूबा के नाम पर नहीं बन पा रही है जिसके चलते भी पीडीपी और भाजपा गठबंधन के भविष्य पर इस बात का दुष्प्रभाव पड़ने लगा है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के शोक प्रकट करने के लिए मुफ़्ती के घर तक जाने के बाद इस बात के कयास लगाये जाने लगे हैं कि कहीं यह आने वाली नयी राजनीति की आहट तो नहीं है ? अभी तक मुफ्ती के नेतृत्व में गठबंधन सरकार का प्रदर्शन कमोबेश ठीक ही कहा जा सकता है क्योंकि इतने अशांत राज्य में सब कुछ ठीक कर पाना इतना आसान भी नहीं होने वाला है. ऐसी परिस्थिति का लाभ उठकर देश में राजनीति करने को सदैव से ही एक परंपरा के रूप में निभाया जाता है और आज यदि कांग्रेस भी उसी राह पर चल रही है तो यह देखने सुनने में कुछ अजीब तो नहीं है पर जम्मू कश्मीर के भविष्य के लिए केंद्र सरकार से नाता तोड़कर महबूबा के लिए सीएम बनना भी आसान नहीं रहने वाला है.
                                                       यह राज्य और देश दोनों के लिए ही एक महत्वपूर्ण समय है क्योंकि लम्बे समय के बाद जिस तरह से वहां पर सुरक्षा बलों को आतंकियों के पाँव उखाड़ने और सीमा पार से घुसपैठ को रोकने में सफलता मिली है उसे देखते हुए राज्य में किसी भी तर का राजनैतिक शून्य नहीं बनाया जाना चाहिए और इसकी ज़िम्मेदारी कश्मीरी नेताओं से अधिक दिल्ली में बैठे भाजपा और कांग्रेस के नेताओं पर आती है. राज्य में राजनैतिक गतिविधियाँ सही तरह से चलनी चाहिए इस बात पर किसी को भी आपत्ति नहीं है तो पूरे मामले की गंभीरता को समझते हुए इस पर सभी को कश्मीर और देश के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए. यह भी सही है कि मुफ़्ती के साथ भाजपा ने जिन शर्तों पर काम शुरू किया था उनके न रहने के बाद शर्तों को पुनर्निर्धारित करने का भी समय आ गया है और इस मसले पर संवादहीनता से काम नहीं चलने वाला है. भाजपा और पीडीपी दोनों दलों को केवल उन शर्तों के बारे में ही सोचना चाहिए जिनसे कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं. भाजपा के विभिन्न नेताओं कि तरफ से जिस तरह की बयानबाज़ी की जाती है उसे देखते हुए आज यही लगता है कि महबूबा उस पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से कोई ठोस आश्वासन भी चाहती हैं.
                                                 दोनों ही पक्षों को सरकार के गठन के लिए नए सिरे से सोचने के स्थान पर शर्तों को आज की परिस्थिति के अनुसार संशोधित करना ही सही रहेगा क्योंकि घाटी में पीडीपी को अपने वोटर्स को जवाब देना है जिसके लिए उसे उनकी फ़िक्र भी हो रही है पर भाजपा इस मुद्दे पर अपने जम्मू के वोटर्स को सँभालने के चक्कर में कुछ भी बोलने वाले नेताओं के साथ कठोरता से पेश नहीं आ सकती है. इस परिस्थिति में दोनों दलों के सामने अपने वोट बैंक को सँभालने की चुनौती बढ़ती ही जा रही है जिससे भी राजनैतिक अस्थिरता देखी जा रही है. महबूबा के सामने अब राज्य की कमान सँभालने के साथ अपने को सिद्ध करने का समय भी आ गया है जिसके चलते अब वे किसी भी परिस्थिति में अपने वोटर्स को नाराज़ नहीं कर सकती हैं. इस मुद्दे पर कांग्रेस के बेहतर रणनीतिकार गुलाम नबी आज़ाद के पास करने के लिए बहुत कुछ है इसलिए कांग्रेस की तरफ से महबूबा को चुनाव के बाद दिए गए समर्थन के पत्ते फिर से चल दिए गए हैं. यह समय अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को किनारे रखकर कश्मीर के विषय में सोचने का है क्योंकि अपनी राजनीति को साधने के लिए किसी भी स्थिति में घाटी के साथ कोई खिलवाड़ कर पिछले दो दशकों में ली गयी बढ़त को समाप्त करना देशहित में नहीं होगा.   
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रविवार, 3 जनवरी 2016

पाकिस्तानी आतंक और भारतीय राजनीति


                                                              आज़ादी के बाद से ही जिस तरह से पाकिस्तान की तरफ से भारत को अस्थिर करने की एक स्थायी नीति पर काम किया जा रहा है वहीं उसके मुकाबले भारत की पाकिस्तान से सम्बंधित नीति में लगातार राजनीति के चलते गंभीर बदलाव देखे जाते रहे हैं जिसका परिणाम आज देश के सामने है. पाकिस्तान में जहाँ १९४७ के कबाइली से लगाकर आज तक सेना, राजनेता, धार्मिक नेता, जिहादी और आतंकवादियों में भारत के प्रति एक नीति स्पष्ट रूप से देखी जाती है वहीं हमारे यहाँ इसे केवल सत्ता और विपक्ष की राजनीति से जोड़कर देखा जाता है जिससे भी आज़ादी कितने वर्षों बाद भी राजनैतिक रूप से भारत इस मामले में सदैव ही पाकिस्तान से पिछड़ जाता है. भाजपा की विपक्ष में रहते हुए बेहद आक्रामक पाक नीति सामने आती है पर जब उसे सत्ता मिलती है तो उसके शीर्ष नेता अपने अतीत के बयानों और नीतियों को भूलकर केवल पाकिस्तानी नेताओं के साथ गलबहियां करते हुए ही नज़र आते हैं. भारत में राजनैतिक दलों के स्थान पर सत्ता की लचर पाकिस्तान नीति है जो सत्ता पक्ष को चुप करा विपक्ष में बैठे हुए नेताओं को सरकार पर हमला करने का अवसर देने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर पाती है.
                                 पिछले १० वर्षों में इस तरह के हमलों के समय जिस तरह से सत्ता में होने के कारण कांग्रेसी नेता सधे हुए शब्दों में बयान दिया करते थे आज वह स्थिति भाजपा के सामने आ चुकी है और जिस तरह की आग भाजपा वाले विपक्ष में रहकर उगला करते थे अभी वहां तक पहुँचने में कोंग्रेसियों को बहुत समय लगने वाला है. इस परिस्थिति में अब सरकार के पास करने के लिए क्या होता है और क्या अब भी हमारी संसद और नेता इस आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से बाहर निकल कर पाकिस्तान पर कुछ ठोस नीति बनाये जाने के बारे में सोचना भी चाहते हैं ? आज भाजपा के नेता आतंक के मुद्दे पर राजनीति न करने की सलाह देते हुए नज़र आ रहे हैं पर वे अपने उस समय को भूल जाते हैं जब ऐसे किसी भी मुद्दे पर वे कांग्रेस नीत सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगाने से नहीं चूकते थे ? यदि भाजपा तब सही थी तो इसका मतलब यही है कि आज भाजपा मुस्लिम तुष्टिकरण में आकंठ डूबी हुई है और कांग्रेस पूरी तरह से राष्ट्रवादी रुख पर चल रही है ? महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश के नेताओं का यह मतिभ्रम आखिर हमें और देश को कहाँ ले जाने वाला है इसका उत्तर किसी के पास भी नहीं है.
                 आतंक का कोई धर्म नहीं होता पर आज के वैश्विक परिवेश में जिस तरह से विभिन्न देशों के चंद महत्वाकांक्षी लोगों द्वारा कम समय में अपने प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए इस्लाम का सहारा लिया जा रहा है उससे अधिकतर खूंखार आतंकी संगठन मुस्लिम ही दिखाई दे रहे हैं. आतंक का जो भी वैश्विक स्वरुप है वह भारत के नियंत्रण से बाहर ही है पर आज भी पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के सामने मजबूर होते पाकिस्तानी नेता सदैव ही रबर स्टाम्प से अधिक कुछ भी नहीं होते हैं. इस तरह के हमले की पटकथा तो २५ दिसंबर को मोदी की लाहौर यात्रा के दौरान ही लिख दी गयी थी क्योंकि यदि भारत पाक के बीच विवाद समाप्त होता है तो दुनिया भर से कश्मीर और जिहाद के नाम पर इकठ्ठा किये जा रहे पैसों पर रोक लग जाएगी और इन कथित धार्मिक, आतंकी और सेना के लिए जिहाद के लिए पैसे मिलने बंद हो जायेंगे. पाक अपनी नीति को समय समय पर भारत के साथ राजनैतिक स्तर पर भी ज़िंदा रखने की कोशिश करता रहता है जिससे वह विश्व को सन्देश दे सके कि वह क्षेत्र में शांति चाहता है और भारत के सत्ता प्रतिष्ठान स्पष्ट नीति के अभाव में केवल बातचीत को पटरी पर रखने की बातें करते हुए ही नज़र आते रहते हैं.  मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

जम्मू-कश्मीर और ग्राम सुरक्षा समितियां

                                           १९८९ में कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों का एक सोची समझी रणनीति के तहत सफाया करने का पाकिस्तानी और हुर्रियत समेत कश्मीर के अलगावादियों का अभियान घाटी में उनके हिसाब से लगभग सफल ही रहा था जिसमें उन्होंने निर्दोष कश्मीरी पंडितों के खुले नरसंहार का मूक समर्थन किया था. इसके बाद पीर पंजाल के दूर दराज़ के क्षेत्रों में बसे हुए क्षेत्रों में ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए तैनात किये गए जवानों के अतिरिक्त एक विशेष योजना के अंतर्गत विशेष प्रशिक्षण और हथियार दिए गए थे जिसके बाद इस क्षेत्र में इन लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकी थी. आज इन ३००० ग्राम सुरक्षा समितियों में लगभग २४६०२ लोग एसपीओ के रूप में जुड़े हुए हैं जो आतंकियों के आने जाने समेत उनसे सीधे तौर पर मुक़ाबला करने और सुरक्षा बलों को महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए काम किया करते हैं. इस सप्ताह इन लोगों द्वारा तीन लोगों को मारे जाने के बाद घाटी में अलगाववादी राजनीति ने फिर से अपने सुर अलापने शुरू कर दिए हैं. यह सभी जानते हैं कि इन अलगाववादियों को कोई व्यापक समर्थन नहीं है पर खुद को नज़रों में आने से बचाने के लिये आम कश्मीरी इनका विरोध न कर मूक समर्थन में खड़ा नज़र आता है.
                              इस बार संभवतः गलत पहचान के कारण या जानबूझ कर ही इन लोगों द्वारा की गई गोलीबारी में एक बच्चे समेत तीन लोगों के मारे जाने के बाद आतंक समर्थक अलगाववादी भी इस मामले पर राजनीति करने लगे हैं और वे बहुत बेशर्मी के साथ यह भी कहते हैं कि इन समितियों द्वारा जम्मू क्षेत्र में एक विशेष अभियान के तहत मुसलमानों का सफाया किया जा रहा है. ये लोग यह भूल जाते हैं कि किस तरह से शांति पूर्वक घाटी के विकास में अपना योगदान दे रहे इनके पडोसी कश्मीरी पंडितों के साथ कितना अत्याचार किया गया था तब इनके पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं था क्योंकि तब वे भी घाटी को हिन्दू-सिख मुक्त करने के पाकिस्तान के अभियान का एक हिस्सा थे और किसी भी कश्मीरी धार्मिक नेता या हुर्रियत समेत अन्य किसी ने भी उन घटनाओं का खुला विरोध नहीं किया था ? आज जब जम्मू क्षेत्र में उनके हिसाब से इस तरह की घटना मुसलमानों के खिलाफ हुई है तो वे घाटी को बंद करने का आह्वाहन करने में लगे हुए हैं. क्या वे १९८९ में यह भूल गए थे कि जिन कश्मीर पंडितों को उन्होंने बेरहमी से मारने और अत्याचार करने पर चुप्पी साध रखी थी आज कश्मीर उनके बिना कैसा है ?
                        इस मामले में आम तौर पर सुरक्षा बलों और सुरक्षा समितियों पर ही अधिक दबाव रहा करता है क्योंकि जिस तरह से कश्मीरी मुसलमानों के हुर्रियत जैसे समूहों के नेताओं को अपनी सुविधा के अनुसार ही मानवाधिकार याद आते हैं वह अब नहीं चल सकता है क्योंकि आज उनके हर कदम पर दुनिया भर की नज़र भी रहा करती है. सद्भाव और सुरक्षा एक तरफा नहीं चल सकते हैं अच्छा होता कि हुर्रियत विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों को पूरी सुरक्षा और सम्मान से घाटी में लाने के लिए भी कभी घाटी में बंद का आह्वाहन करती जिससे इन ठोकर खा रहे कश्मीरी पंडितों को भी लगता कि घाटी में आज भी उन्हें याद किया जाता है. सुरक्षा बलों और ग्राम सुरक्षा समितियों को अपने कार्यवाही में विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक किसी भी गलती की गुंजाईश रहेगी हुर्रियत अपनी घटिया राजनीति से बाज़ नहीं आने वाली है. आज यदि कश्मीर में हुर्रियत के नेता इतना बोल पाते हैं तो वह भी भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती ही है क्योंकि उसके बिना किसी भी स्तर पर उनको इतनी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं मिल सकती थी. क्या पाकिस्तान या किसी अन्य इस्लामी देश में कोई इस तरह से सत्ता के खिलाफ इतना बोलकर भी सरकारी सुरक्षा का अधिकारी हो सकता है आज उनके लिए यह विचार करने का समय है. 
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शनिवार, 19 दिसंबर 2015

पुलिस अधिकारियों की सालाना कॉन्फरेंस

                                                                            देश भर के आला पुलिस अधिकारियों की सालाना कॉन्फरेंस इस बार गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्र में आयोजित की गयी है जिसमें सभी राज्यों के पुलिस प्रमुखों समेत वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी भाग लिया करते हैं. इस कॉन्फरेंस को आज़ादी के बाद शुरू किया गया था जिसका उद्देश्य देश भर की पुलिस के सामने आने वाली चुनौतियों को एक मंच पर साझा करते हुए उनसे निपटने और देश में शांति बनाये रखना था. इस बार भी यह सम्मलेन शुरू हो चुका है और पीएम, गृह मंत्री के साथ अन्य विशिष्ट लोग भी इसमें मंथन करने वाले हैं सम्मलेन का उद्घाटन भाषण देते हुए जब केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह इसके केंद्र में आतंकवाद और जम्म-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर पर ध्यान होने की बात करते हैं तो उनकी सरकार का खोखलापन भी दिखाई दे जाता है क्योंकि जिस जम्मू-कश्मीर पर वे चर्चा करना चाहते हैं वहां से पीडीपी-भाजपा सरकार ने अपने डीजीपी के. राजिंद्रन और आईजी अब्दुल गनी मीर को पहले स्वीकृति देने के बाद भाग लेने के लिए ही नहीं भेजा है और इस मामले पर जम्मू-कश्मीर सरकार का क्या रुख है यह भी आधिकारिक तौर पर अभी तक उसकी तरफ से स्पष्ट नहीं किया गया है.
                             पूरी दुनिया जानती है कि भारत में आतंक से सबसे अधिक प्रभावित राज्य जम्मू-कश्मीर ही है पर जब अपनी वार्षिक कॉन्फरेंस में जब देश की पुलिस के शीर्ष अधिकारी आतंकवाद पर चर्चा करने के लिए बैठते हैं तो उसमें उस राज्य के किसी भी शीर्ष अधिकारी की शिरकत दिखाई ही नहीं देती है तो उस परिस्थिति में क्या जम्मू-कश्मीर के हालात और आतंकवाद पर सार्थक चर्चा संभव भी है यह तो केंद्र की वैश्विक स्तर पर आतंवाद पर हमला करने वाली मोदी सरकार को सोचना ही चाहिए था ? यदि जम्मू-कश्मीर में किसी भी अन्य दल की सरकार होती तो क्या केंद्रीय गृह मंत्री और पीएम इस तरह से इस मसले पर चुप्पी लगाते और क्या टीवी चॅनेल्स पर हल्ला मचाने वाले भाजपाई प्रवक्ता इस मुद्दे पर इसी तरह से चुप रह जाते ? मुफ़्ती के नेतृत्व में भाजपा की साझा सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता के साथ सोचना भी चाहिए था क्योंकि कश्मीर में हालत चाहे जैसे भी हों पर क्या इस तरह से स्थानीय कारणों के चलते इतनी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कॉन्फरेंस से राज्य के प्रतिनिधित्व को अनदेखा किया जा सकता है और क्या राष्ट्रवादी भाजपा का वर्तमान संस्करण इसे सही भी मानता है ?
                        इसी कॉन्फरेंस में गृह मंत्री यह बयान देते हैं कि जम्मू-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर में हालात में काफी सुधार आया है और दूसरी तरफ राज्य सरकार बिना कारण बताये इतनी महत्वपूर्ण बैठक में अपने पुलिस अधिकारियों को अंतिम समय पर मना कर देती है तो दोनों में से कौन सही है यह बता पाना बहुत ही मुश्किल है. यदि जम्मू-कश्मीर के हालत पहले से अच्छे हो गए हैं तो के. राजिंद्रन गुजरात क्यों नहीं भेजे गए और यदि वहां हालात इतने ख़राब हैं कि राज्य सरकार अपने पुलिस प्रमुख के साथ कुछ आला अधिकारियों को केवल तीन दिनों के लिए राज्य से बाहर भी नहीं भेज सकते हैं तो किसको सही माना जाये ? यदि वास्तव में वहां के हालात इतने ख़राब हैं गृह मंत्री किस दम पर स्थिति सुधारने के दावे करने में लगे हुए हैं या यह भी संभव है कि पीडीपी-भाजपा गठबंधन में कहीं न कहीं कुछ ऐसा भी चल रहा है जो सब सामने नहीं आ पा रहा है और संभवतः मोदी को दबाव में रखने के लिए ही मुफ़्ती ने अंतिम समय में इस तरह का निर्णय लिया है. जम्मू-कश्मीर में केवल सत्ता में साझीदार बनने के लिए जिस तरह से भाजपा ने अपने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान की अनदेखी की वह आज किसी से भी छिपी नहीं है और अब भाजपा संभवतः उसी निर्णय का भुगतान करने में लगी हुई है.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

दिल्ली-इस्लामाबाद वाया उफ़ा-बैंकॉक

                                                                            विपक्ष में रहते हुए और पिछले आम चुनावों में पाकिस्तान को सीख सिखाने के लम्बे चौड़े दावे करने वाले पीएम मोदी ने जिस तरह से अपने शपथ ग्रहण में ही नवाज़ शरीफ को दिल्ली बुलाया था उससे लगने लगा था कि संभवतः पाक की तरफ से इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल भी की जा सकती है पर समय बीतने के साथ जिस तरह से दोनों देशों के बीच कश्मीर में उग्रवादियों को लेकर तनातनी शुरू हुई उसने फिर से संबंधों को उसी स्तर पर पहुंचा दिया जहाँ वे २६/११ से पहले हुआ करते थे. अभी तक संघ-भाजपा और उग्र हिंदुत्व का समर्थन करने वाले समूहों को भाजपा की पाक के प्रति नीति और चुनावों तक मोदी की बयानबाज़ी के चलते यह उम्मीद थी कि अब पाकिस्तान के साथ खुलकर हर मुद्दे पर बात होगी पर जिस तरह से पिछले डेढ़ वर्षों में जिस तरह से मोदी सरकार का रवैया पाकिस्तान के प्रति दिखाई दे रहा है उससे यही लगता है कि भाजपा के पाक से सम्बंधित रणनीतिकारों की समझ में यह नहीं आ रहा है कि इस देश से किस तरह से निपटा जाये तो यह उनकी इस विषय पर समझ को ही दर्शाता है.
                                           अभी तक पाकिस्तान को सबक सिखाने वाले और एक के बदले दस सर काटने जैसे बयानवीर नेताओं के बिना किसी ठोस आश्वासन के ही इस तरह से पाक से बात करने से खुद संघ और भाजपा समर्थकों की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है और वर्तमान परिस्थिति में वे कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं है. जिस तरह से संसद का सत्र चल रहा है तो इस परिस्थिति में सरकार के लिए इन मुद्दों का जवाब सदन में भी देना मुश्किल हो सकता है क्योंकि मोदी सरकार जिस नीति के तहत पाक से गुपचुप तरीके से बात करने में लगी हुई है उससे कहीं न कहीं संदेह भी होता है. मोदी जैसे कड़े निर्णय लेने वाले नेता की इस तरह से भ्रम की स्थिति दर्शाने से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति ही कमज़ोर होती है क्योंकि २००८ में जब २६/११ के बाद मनमोहन सरकार ने द्विपक्षीय संबंधों पर बातचीत रोक दी थी तो उस समय भाजपा ने भी यही मांग की थी और मनमोहन सरकार पर देश को असुरक्षित करने का आरोप भी लाया था पर आज खुद अंतर्राष्ट्रीय दबाव के सामने झुकते हुए मोदी उससे भी आगे जाने का काम करने में लगे हुए हैं ऐसी स्थिति में भाजपा के उग्र समर्थकों की समझ में नहीं आ रहा है कि वे अपने नेता के इस कदम का जनता के सामने किस तरह से बचाव करें ?
                                          यदि पाक से सभी मुद्दों पर बातचीत होती है तो यह अच्छा ही है और संप्रग सरकार भी यही करना चाहती थी पर भाजपा उस पर पाक एक सामने टेकने के आरोप लगाने में नहीं चूकती थी. उफ़ा में जिस तरह से उग्रवाद को केंद्र में रखकर बात करने का फैसला दोनों विदेश सचिवों के संयुक्त बयान में था बैंकॉक की सहमति में वह अचानक से गायब हो गया है उस समय कश्मीर किसी भी तरह से बातचीत का हिस्सा भी नहीं था पर आज वह भी मुद्दों में शामिल हो चुका है इससे यही लगता है कि मोदी सरकार पाक से रिश्ते सुधारने के लिए एक बार फिर से वही गलती करने जा रही है जैसी वाजपई सरकार ने पाक के साथ रिश्ते सुधारने की धुन में करते हुए यह ध्यान ही रखा कि पाक के लोकतंत्र के लोग सेना की कठपुतली से अधिक कुछ भी नहीं होते हैं और उनसे बातचीत कब बीच रास्ते में ही दम तोड़ जाये इसका भी भरोसा नहीं होता है. कारगिल के सबक से लगता है कि भाजपा और संघ ने कुछ भी नहीं सीखा था तभी वे बिना खुला एजेंडा तय किये एक बार फिर से गुपचुप एजेंडे के तहत पाक से बात करने के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं. पाक से रिश्ते सुधरने चाहिए इस पर पूरी दुनिया एकमत है पर क्या संबंधों का सुधार इस तरह से गुप्त एजेंडे के अंतर्गत किया जाना भारत के दृष्टिकोण से सही है यह आज समझने की सबसे अधिक आवश्यकता भी है.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...