मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 20 April 2014

चुनाव आचार संहिता और सरकार

                                                     देश में आम चुनाव के चलते जिस तरह से सभी सरकारी काम एकदम से ठप से पड़ जाते हैं और कई बार महत्वपूर्ण प्रशासनिक कामों के करने में भी सरकारों को दिक्कत का सामना करना पड़ता है उस स्थिति में आखिर देश की व्यवस्था कैसे चलायी जाए यह प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है. नौसेना में हादसों के बाद जिस तरह से प्रमुख के इस्तीफे के बाद से वहां पर कोई तैनाती नहीं हुई थी उस पर नियुक्ति के बाद और लोकपाल की नियुक्ति को लेकर जिस तरह से भाजपा ने चुनाव आयोग का दरवाज़ा खटखटाया है उस स्थिति पर विचार करने की आवश्यकता है। देश में सामान्य प्रशासनिक काम चलते ही रहने चाहिए इस बात से सभी राजनैतिक दल सहमत तो हैं पर आवश्यकता पड़ने पर वे इस बात को भूल जाते हैं कि इतने महत्वपूर्ण पदों को खाली नहीं रखा जा सकता है. लोकपाल पर तो पहली बार ही काम हो रहा है पर यदि नौसेना प्रमुख की नियुक्ति को देखा जाये तो आने वाले समय में कुछ ठोस भी सामने आ सकता है और भविष्य के लिए एक मार्ग निर्धारित किया जा सकता है।
                                                                       सेना और सुरक्षा बलों से जुड़े हुए महत्वपूर्ण पदों के लिए अब देश में एक नीति बनाने की आवश्यकता है क्योंकि किसी भी परिस्थिति में इन पदों पर नियुक्तियां किया जाना देश के सैनिकों के मनोबल को बनाये रखने के लिए आवश्यक भी होता है।  अच्छा ही कि पुरानी बातों को भूलकर अब कुछ ऐसा भी किया जाये जिससे इस तरह की परिस्थिति में पहले से ही निर्धारित पैनल में से अधिकारियों को चुनने के लिए व्यवस्था बन सके और चुनावी माहौल में महत्वपूर्ण नियुक्ति को करने से पहले सरकार नेता प्रतिपक्ष को बुलाकर उनकी भी सहमति लेकर ही आएगे बढ़ने की कोशिश करे। यह लोकतंत्र की आवश्यक परिणीति होनी चाहिए पर अपने काम को निकालने में माहिर नेता चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों सरकार को घेरने से पीछे नहीं हटते हैं और अनावश्यक राजनीति को आगे कर महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी देश के परस्पर विरोधी रुख को ही दुनिया के सामने स्पष्ट किया करते हैं।  सरकार पर भाजपा यह आरोप लगाती है कि वह महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति तक नहीं कर पाती है और जब कोई नियुक्ति की जाती है तो उसका इस तरह से विरोध किया जान किस तरह से उचित कहा जा सकता है ?
                                                                        लोकपाल को नौसेना प्रमुख की नियुक्ति के समकक्ष नहीं रखा जा सकता है क्योंकि देश में पहली बार लोकपाल की नियुक्ति की जा रही है फिर भी जिस तरह से इसके साथ ही नौसेना प्रमुख की नियुक्ति को भी जोड़ा गया वह भाजपा की मंशा को ही दिखाता है क्योंकि एक तरफ वह सरकार पर निर्णय लेने में कमज़ोर होने का आरोप लगाती रही है वहीं दूसरी तरफ सेना से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे पर इस तरह की राजनीति करने से भी नहीं चूकती है ? सेना की नियुक्ति के मसले पर सरकार को भी अपनी सीमायें पता हैं इसलिए उसने केवल वरिष्ठता में दूसरे स्थान पर आने वाले धवन को नियुक्त कर दिया है क्योंकि उनसे वरिष्ठ व्यक्ति की कमान में ही सबसे अधिक दुर्घटनाएं नौसेना में हुई हैं इसलिए उनके नाम पर विचार भी नहीं किया गया है। इस तरह के मसलों पर सरकार को  अपनी मंशा साफ़ रखते हुए ही यह सब करना चाहिए और विपक्ष के नेता को भी विश्वास में लेना चाहिए था पर भाजपा में जिस तरह के मतभेद चल रहे हैं उनको देखते हुए यदि सरकार सुषमा स्वराज से बात करती भी तो क्या मोदी खेमा इसे आसानी से हज़म कर पाता संभवतः इसी मसले से बचने के लिए सरकार ने अपने आप ही फैसला कर लिया हो ? राजनीति को आवश्यक प्रशासनिक कामों से चुनाव के समय भी दूर रखने की कोशिश सभी दलों को करनी चाहिए जिससे देश की रफ़्तार पर कोई असर न पड़ने पाये।    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

No comments:

Post a Comment