मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 12 जनवरी 2019

सीबीआई विवाद और न्याय

                                   आज सिर्फ अपनी साख बचाने के लिए जिस तरह से मोदी सरकार ने सीबीआई वाले मामले में अनावश्यक दखलंदाज़ी की इससे यही पता चलता है कि इस सरकार के लिए संस्थाओं की साख कोई मायने नहीं रखती है क्योंकि जब सीबीआई का झगड़ा सतह पर आकर पूरे देश के लिए चिंता का विषय बना हुआ है उस समय सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी किनारे करते हुए सरकार द्वारा एक दिन पहले ही पद पर पुनर्स्थापित किए गए अलोक वर्मा को इस तरह से हटाना किस संकेत की तरफ ले जाता है ? आज जो भी समस्या है उसके लिए कहीं न कहीं सरकार के स्तर पर बरती गयी हद दर्ज़े की लापरवाही भी है जिसके चलते पूरे देश के सामने सरकार अपने तोते की गर्दन उमेठती हुई दिखाई दे रही है और अपने साथ देश के सर्वोच्च संस्थाओं की गरिमा को भी धूल में मिलाने में लगी हुई है जिसका दूरगामी परिणाम आने वाले समय में दिखाई देने वाला है क्योंकि अभी तक मोदी से सहमत लोग भी इस मामले में वर्मा के साथ हुए अन्याय को स्वीकार करने लगे हैं.
                     अस्थाना की शिकायत पर जस्टिस पटनायक की सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट में आलोक वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को किसी भी स्तर पर सही नहीं पाया गया है और इस बात के बारे में खुद जस्टिस पटनायक ने इंडियन एक्सप्रेस से जो कुछ कहा है वह अपने आप में चिंताजनक ही लगता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पद पर स्थापित किये गए आलोक वर्मा की बात सुने बिना ही उनको एकतरफा तरीके से पद से हटा दिया गया अब मोदी सरकार इस निर्णय को किस तरह से सही ठहरा पायेगी यह देखने की बात होगी। हो सकता है कि आलोक वर्मा की तरफ से सेवा के दौरान कुछ अनियमितताएं भी की गई हों पर उनका पक्ष सुने बिना ही इस तरह से निर्णय करना क्या सरकार और चयन समिति के हल्केपन को नहीं दिखाता है ? यह अधिक चिंतनीय इसलिए भी हो जाता है कि इस समिति में सुप्रीम कोर्ट का प्रतिनिधित्व भी था जिसके बाद भी बिना पक्ष सुने इस तरह का निर्णय किया गया।
                     संवैधानिक मामलों के जानकारों के साथ विपक्ष भी मोदी सरकार पर देश के संवैधानिक ढांचे परम्पराओं और मूल्यों से खिलवाड़ करने के आरोप २०१४ से लगा रहे हैं फिर भी मोदी सरकार इन सारे आरोपों की अनदेखी करती चली आयी है और अब इस मामले को कांग्रेस द्वारा जिस तरह से राफेल खरीद से जोड़ना शुरू कर दिया गया है उसको देखते हुए आने वाले समय में मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ने ही वाली हैं. अच्छा होता कि एक बार में निर्णय लेने के स्थान पर अलोक वर्मा को भी अपना पक्ष समिति के सामने भी रखने का मौका दिया जाता और उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाता पर सरकार की हड़बड़ी ने पूरे माहौल में संदेह पैदा करने की गुंजाइश छोड़ दी है. कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने समिति के निर्णय से असहमति जताकर यह सन्देश देने में भी सफलता पाई है कि इस मामले का राफेल खरीद से जुड़ाव हो सकता है और आगामी चुनावों में यह कांग्रेस के लिए एक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाने वाला है.       
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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

धर्म और राजनीति की राह


                                             २० वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले पर कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने जिस तरह से देश की संसद और विधायिका को आड़े हाथों लेते हुए धर्म के राजनीति में दुरुयोग से जुड़े मामलों पर सवालों की लंबी सूची सामने रखी है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में मोदी सरकार के लिए यह मुद्दा एक समस्या बनकर सामने आने वाला है. हालाँकि दो वर्षों से कुछ अधिक समय से सत्ता संभल रही मोदी सरकार ने भी इस मुद्दे पर अभी तक कुछ नहीं कहा है पर कोर्ट ने जिस तरह से पिछले २० वर्षों की सभी सरकारों पर प्रश्नचिन्ह लगाया है उसमे देश का हर राजनैतिक दल अपने आप ही शामिल हो गया है क्योंकि इस दौरान संयुक्त मोर्चे से लगाकर एनडीए, यूपीए और फिर एनडीए का शासन देश पर रहा है जिससे यही साबित होता है कि लगभग हर राजनैतिक दल या उसके प्रत्याशी अपने लाभ के लिए समय समय पर वर्तमान कानून में कुछ कमी होने के कारण राजनीति में धर्म का दुरूपयोग करने को सही ही मानते हैं. भले ही संविधान की कसमें खाने वाले नेता कुछ भी कहें पर उनके दिलों में क्या बसता है यह सुप्रीम कोर्ट की कठोर टिप्पणियों और सवालों से सामने आ ही गया है. क्या आज हमारे देश के नेताओं को इस बात की आदत हो गयी है कि किसी भी विवादित मुद्दे को तब तक खींचा जाये जब तक कोई कोर्ट जाकर उसके बारे में स्पष्ट आदेश न ले आये और नेता इस बात का रोना रो सकें कि वे तो नहीं चाहते थे पर कोर्ट का आदेश है तो करना पड़ रहा है ? 
        स्पष्ट रूप से यह बात सबके सामने आ चुकी है कि कोर्ट ने ऐसे ही कठोर बातें नहीं कही हैं क्योंकि देश के संविधान की रक्षा करना और समय समय पर आवश्यकता के अनुरूप संविधान में परिवर्तन करने का अधिकार केवल विधायिका को मिला हुआ है जिससे संविधान को समय के अनुरूप और जीवंत बनाये रखा जा सके पर पिछले कुछ दशकों से यह बात अधिक दिखाई दे रही है कि संसद में बैठे नेता विवादित मुद्दों पर स्पष्ट रूप से अपनी इस संविधान प्रदत्त ज़िम्मेदारी से भागते हुए दिखाई देते हैं और दुर्भाग्य की बात यह है कि राष्टीय दलों के साथ प्रभावी क्षेत्रीय दल भी इस मामले में चुप्पी लगाकर बैठ जाते हैं जिससे यही सन्देश सामने आता है कि हर दल कहीं न कहीं से अपनी सुविधा के अनुसार धर्म और राजनीति का दुरूपयोग करने को बुरा नहीं मानता है जिसका दुष्प्रभाव कई बार सामाजिक विभाजन के तौर पर सामने आता है. अब चूंकि यह विभाजन समय और स्थान के अनुरूप राजनेताओं को अपनी राजनीति को मज़बूत करने का काम भी करता है तो किसी भी दल को इस बात में कोई दिलचस्पी ही नहीं होती है कि इस प्रक्रिया पर कोई रोक लगायी जाए.
               सुप्रीम कोर्ट की तरफ से किये गए सवालों और टिप्पणियों के बाद यह लग रहा है कि उसकी तरफ से सरकार के जवाब को सुनने के बाद इस मामले पर कोई कठोर निर्णय भी दिया जा सकता है जो कहीं से भी फतवे और मंदिर के नाम पर राजनीति करने वाले देश के राजनैतिक दलों को रास नहीं आने वाला है पर जब संविधान का एक स्तम्भ अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन में इतना लाचार हो जाये कि वह संविधान से ऊपर केवल अपनी राजनैतिक संभावनाओं पर ही विचार करने तक सीमित हो जाये तो उस परिस्थिति में संविधान के दूसरे स्तम्भ पर अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन की ज़िम्मेदारी तो आ ही जाती है. सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जिस तरह से कठोर रुख अपनाया गया है उसके बाद यह भी आवश्यक लगता है कि संसद इस तरह दीर्घावधि से लंबित मामलों में भी अपनी ज़िम्मेदारी को सही तरह से समझना शुरू करे क्योंकि यदि कोर्ट की तरफ से इस पर कोई स्पष्ट आदेश आता है तो उससे राजनैतिक दलों को ही सबसे अधिक परेशानी होने वाली है. संसद की कार्य मंत्रणा समिति को भी इस बारे में ध्यान देना चाहिए जिससे आने वाले समय में संविधान की मूल भावना के अनुरूप काम करने में सभी को सहायता मिले और संविधान की सर्वोच्चता सिद्ध भी हो.       मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 17 अप्रैल 2016

न्यायाधीशों की कमी और न्याय

                                                               देश की आबादी के अनुरूप हर क्षेत्र में संसाधनों की कमी से जूझने के बीच एक नयी तरह की समस्या भी सामने आ रही है जो देश के पहले से ही धीमी न्यायिक प्रक्रिया पर और भी ग्रहण लगाने का काम करने वाली है. यह बात सर्व विदित है कि अभियोजन से लगाकर न्याययिक प्रक्रिया पूरी होने के बीच में जो सबसे बड़ी बाधा आती है यह कहीं न कहीं से न्यायालयों और जजों की संख्या पर ही टिक जाती है क्योंकि जब तक देश की आबादी के अनुसार न्यायालयों की संख्या और जजों की नियुक्ति के लक्ष्य को पाने में हम सफल नहीं होते हों तब तक किसी भी स्तर पर त्वरित न्याय को आसान नहीं किया जा सकता है. आज हर क्षेत्र में सभी लोग देश की न्यायिक प्रक्रिया पर तो आसानी से ऊँगली उठा देते हैं पर इस बात पर कोई भी विचार नहीं करना चाहता है कि इस पूरी परिस्थिति के लिए केवल न्यायालय ही दोषी नहीं हैं क्योंकि उनके पास काम का इतना अधिक बोझ है कि वे चाहकर भी इस पूरी प्रक्रिया को तेज़ नहीं कर सकते हैं और जब तक इस समस्या को सुलझाने के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास नहीं किये जाएंगें तब तक यह बैकलॉग बढ़ता ही जाना है.
                                         यदि आज की परिस्थिति पर गौर किया जाये तो निचली अदालतों में ४६००, हाई कोर्ट्स में ४६२ तथा सुप्रीम कोर्ट में ६ पद खाली हैं जिससे स्थिति का आंकलन भी किया जा सकता है. कोलेजियम विवाद और जजों की नियुक्तियों में पेंच फंसने के बाद ऊपरी अदालतों में और भी समस्या उत्पन्न हो गई है क्योंकि वहां पर नियुक्ति कर पाना अब उतना आसान नहीं रह गया है जिसका दुष्परिणाम सभी के सामने है. जजों और अदालतों पर काम का इतना बोझ बन चुका है कि अब इस समस्या से निपटने के लिए नए सिरे से सोचने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक जजों और अदालतों की संख्या को आबादी के अनुरूप नहीं किया जायेगा तब तक मौजूदा ढांचे से त्वरित न्याय की आशा कैसे की जा सकती है ? जब अन्य क्षेत्रों में आबादी के अनुसार संसाधनों को लगातार बढ़ाये जाने की नीति पर काम किया जा रहा है तो न्याय प्रक्रिया को उससे अलग कैसे रखा जा सकता है और इस समस्या का समाधान भी एक नयी नीति के तहत ही निकाला जा सकता है जिसमें छोटे विवादों को तहसील स्तर पर ही समुचित समाधान के साथ समाप्त करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए तथा पंचायत स्तर के विवादों को वहीं पर सुलझाने की कारगर नीति भी बनायीं जानी चाहिए.
                                    यदि हाई कोर्ट्स पर लॉ कमीशन की रिपोर्ट देखी जाये तो हाई कोर्ट को ब्रेकइवन तक लाने के लिए ५६ और बैकलॉग को समाप्त करने के लिए ९४२ जजों की आवश्यकता पड़ने वाली है तो इस स्थिति में न्यायिक प्रक्रिया का हाल समझा भी जा सकता है. पैनल ने पाया कि यदि केवल बिहार में तीन साल का बैकलॉग ख़त्म करना है तो १६२४ अतिरिक्त जजों की आवश्यकता पड़ने वाली है जो कि आज की परिस्थिति के अनुसार बहुत ही कम लगती है. ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए देश भर में उन जिलों को चिन्हित किया जा सकता है जहाँ लंबित मुक़दमों की संख्या कम है और वहां पडोसी जिलों से विशेष रूप से गठित अदालतों के लिए कुछ करने की आवश्यकता है जिससे इन जिलों में तो लक्ष्य को पाया जा सके और फिर पडोसी जिलों के जजों को अन्य जिलों में नियमित सुनवाई के लिए लगाया जाना चाहिए. इस अस्थायी व्यवस्था से जहाँ कुछ जिलों में स्थिति को सुधारने की तरफ कदम बढ़ाया जा सकता है वहीं आने वाले समय में और अधिक जिलों में त्वरित न्याय को देने में सफलता भी मिल सकती है. तहसीलों में विशेष अदालतों में छोटे विवादों को निपटाने की कोशिशें तो नियमिति रुप से शुरू ही की जा सकती हैं जिनसे अदालतों का अनावश्यक बोझ कम करने में मदद भी मिल सकती है.   
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शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

कलिजियम - जज और न्याय

                                                              मोदी सरकार के अस्तित्व में आने के बाद जिस तेज़ी से सभी राजनैतिक दलों ने न्यायाधीशों की नियुक्ति में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज़ कराने के लिए नयी एनजेएसी व्यवस्था को अपनाने के लिए संसद में जल्दबाज़ी दिखाई थी वह आज देश के आम नागरिकों को बहुत भारी पड़ रही है. इस व्यवस्था को कोर्ट में चुनौती दिए जाने और उसके अनुपालन पर पूरी तरह से रोक लगाते हुए सभी पक्षों और जनता की राय मांगने से सम्बंधित बातों को शुरू करने से पूरे देश के उच्च न्यायालयों में जजों की पहले से ही कम संख्या पर और भी बुरा प्रभाव पड़ने लगा है. लाखों मुकदमों के बोझ से दबे हुए राज्यों के उच्च न्यायलय अब जजों की ४०% कमी से जूझ रहे हैं जिससे न्याय मिलने में और भी देरी हो रही है. इस मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस केहर सिंह की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार की इस मांग पर अपनी राय देते हुए आदेश दे दिया है कि वर्तमान कलिजियम प्रणाली से जजों की नियुक्ति को जारी रखा जा सकता है जिससे न्यायालयों के काम काज पर बुरा असर न पड़े और साथ ही उसने सुनवाई पर अपने निर्णय को सुरक्षित भी कर दिया है.
                    इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले समय में कलिजियम सिस्टम से होने वाली नियुक्तियों में उतनी पारदर्शिता नहीं होती थी जितनी एक परिपक्व लोकतंत्र में होनी चाहिए पर सरकार ने भी इस महत्वपूर्ण मसले पर केवल कानून में बदलाव कर जिस तरह से जजों की नियुक्ति में विधायिका के दखल को शुरू करने की कोशिश की थी उसका भी समर्थन नहीं किया जा सकता है. कोई भी व्यवस्था अपने आप में पूरी तरह से निरापद नहीं होती है और जब भी किसी व्यवस्था की कमियों को दूर करना हो तो उस व्यवस्था से जुड़े हुए विशेषज्ञों और कानून का अध्ययन करने के साथ ही व्यापक विचार विमर्श के साथ ही परिवर्तन के बारे में आगे बढ़ने की कोशिशें करने चाहिए जिससे नयी व्यवस्था को अविलम्ब लागू किया जा सके और उसमें किसी भी तरह की कानूनी अड़चने बाद में न आने पाएं. मोदी सरकार ने इस कदम को जिस उत्साह के साथ किया और देश के लगभग सभी दलों ने उसका आँखें बंद कर साथ दिया उससे यही लगता है कि देश की राजनैतिक शक्ति कहीं न कहीं से देश की न्यायपालिका के लिए पूर्ण नियंत्रण की बातें सोचने में लगी हुई है ?
                          देश के लोगों की नज़रों में आज भी न्यायपालिका का बहुत सम्मान है और संभवतः कानून में इतने बड़े परिवर्तन के बाद जिस तरह से इस मसले को चुनौती मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट में इस पर सुनवाई हुई उससे यही लगता है कि जजों ने भी जनता की उस भावना को समझा जिसके अंतर्गत देश का मानस जजों पर किसी भी तरह का राजनैतिक नियंत्रण स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है. अब जब इस मुद्दे पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और संविधान पीठ के सामने बहुत सारे सुझाव भी आ चुके हैं तो अब सरकार को कोर्ट के अंतिम आदेश की प्रतीक्षा करनी चाहिए और उसके अनुरुप ही नए तंत्र का निर्माण करना चाहिए. कोर्ट के आदेश के आने तक अब सरकार के पास यह स्वतंत्रता आ चुकी है कि वह अपने स्तर से देश के उच्च न्यायालयों समेत सर्वोच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति के बारे में आगे बढे क्योंकि जब तक नयी व्यवस्था नहीं आती है और इन स्थानों पर जजों की नियुक्ति करना अवश्यम्भावी भी है तो इस मुद्दे पर तुरंत आगे बढ़ने के बारे में सोचना भी चाहिए. अब समय आ चुका है कि सरकार और संसद में बैठे हुए सभी नेता इस बात को अच्छी तरह से समझ लें कि संविधान ने उनको जो काम करने का अधिकार दिया है वे उसे ही पूरी तन्मयता के साथ कर लें अन्यथा देश के संवैधिनिक ढांचे को कमज़ोर करने की उनकी कोई भी कोशिश कहीं से भी उनके हित में नहीं होगी.   
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रविवार, 18 अक्टूबर 2015

जजों की नियुक्ति का अधिकार

                                               सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार के उस प्रयास को रद्द करने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि आने वाले समय में देश की अदालतों को जजों की उतनी संख्या नहीं मिलने वाली है जितने जज उन्हें चाहिए क्योंकि अब यह स्पष्ट नहीं है कि वर्तमान में देश में किस प्रक्रिया के तहत नए जजों की नियुक्ति की जाएगी। केंद्र सरकार ने जजों के कोलेजियम सिस्टम के स्थान पर नयी व्यवस्था को अपनाने के लिए जिस तरह से यह मामला कोर्ट के हाथों से निकाल कर उसमें राजनेताओं के दखल की पृष्ठभूमि तैयार की थी उसके चलते ही न्यायिक सक्रियता के कारण समस्याएं झेल रहे लगभग सभी राजनैतिक दलों ने उसका भरपूर समर्थन किया था और वह कानून भी बन गया था पर अब वह पूरी प्रक्रिया ही निरस्त हो चुकी है और उससे बचने के लिए अब सरकार के पास सीमित विकल्प ही बचे हुए हैं. इस पूरी व्यवस्था को सुधारने के सरकार के प्रयास को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बहुत बड़ा झटका दे दिया है.
                         यह सही है कि देश में पिछले दशकों में हर क्षेत्र में राजनेताओं का अनावश्यक दखल बढ़ता ही जा रहा है उससे निपटने के लिए ही कोर्ट ने संभवतः सरकारों की अपने पसंद के जजों की नियुक्ति से रोकने के लिए इस तरह का निर्णय भी सुनाया है. क्या देश को लम्बे समय तक काम करने वाले किसी ऐसे तंत्र की आवश्यकता नहीं है जो निरापद रूप से काम भी कर सके और सुप्रीम कोर्ट /हाई कोर्ट के साथ ही जनपद स्तर की अदालतों के लिए भी जजों की उपलब्धता सुनिश्चित कर सके ? जब देश में बहुत सारी अन्य सेवाओं के लिए एक अखिल सेवा का कैडर बनाया गया है तो क्या समय की यह मांग नहीं है कि अब न्यायिक सेवाओं के लिए कुछ ऐसे प्रयास भी किये जाएँ या इस मॉडल पर सोचने का काम शुरू किया जाये ? इस पूरी व्यवस्था को आमूल-चूल रूप में अचानक से नहीं बदला जा सकता है इसलिए इसके लिए एक अखिल भारतीय स्तर की सेवा का गठन करते हुए अगले दशक से उसको लागू करने के बारे में भी सोचा जा सकता है.
                        वर्तमान में किसी भी व्यवस्था को एकदम से सुधारने के स्थान पर उसके लिए सही मंच बनाकर प्रयास करने की आवश्यकता भी है. नया सिस्टम किस तरह से काम करने वाला है यह देखना भी आवश्यक है क्योंकि जब तक नए सिस्टम की कमियों को भी खुले तौर पर सुधारने के लिए न्यायपालिका और सरकार सामंजस्य नहीं कर पाएंगीं तब तक इस तरह की रस्साकशी चलती ही रहने वाली है. नया तंत्र जब तक पूरी तरह से काम करना शुरू नहीं करता है तब तक कम से कम इसी व्यवस्था को चलाते हुए जजों की संख्या को बढ़ाने के बारे में सोचा जाना चाहिए। व्यवस्था में इस तरह का बड़ा परिवर्तन लोगों पर भारी न पड़े इस बात का भी ध्यान रखने की आवश्यकता भी है क्योंकि आज जितनी संख्या में मुक़दमें कोर्टों के सामने हैं उन्हें जजों की कमी के साथ नहीं निपटाया जा सकता है. इसलिए आने वाले समय में जो भी व्यवस्था बने पर उसे पहले पुराने सिस्टम से कुछ प्रतिशत में नए जजों की नियुक्ति के बारे में भी काम किया जाना चाहिए। कांग्रेस द्वारा इस मुद्दे पर सरकार का और साथ न देने की घोषणा के बाद अब सरकार के लिए मामला संसद में और भी मुश्किल होने वाला है.

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शनिवार, 19 सितंबर 2015

जांचों की राजनीति

                                                 आज़ादी के समय देश संभाल रहे नेताओं ने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आने वाले समय में देश की राजनीति कुछ इस तरह से बदलाव का शिकार होगी कि बेहद महत्वपूर्ण मामलों को भी केवल दलगत राजनीति और चुनावी लाभ की गणित बैठाये जाने के लिए ही इस्तेमाल किया जाने लगेगा. इस तरह की जांचों में सदैव ही सत्ताधारी दल के नेताओं के पास करने के लिए बहुत कुछ होता है और वे बड़े पैमाने पर ऐसा करते देखे भी जा सकते हैं जो कि भारतीय लोकतंत्र के लिए बहुत ही गंभीर मुद्दा बनना चाहिए पर इसकी चर्चा करने के स्थान पर विपक्षी दल केवल आरोप लगाने और सत्ताधारी दल कानून का अनुपालन करने की बात कहकर ही अपने हितों को साधने का काम करते रहते हैं. प्रवर्तन निदेशालय द्वारा एक बार फिर से बिहार के महत्वपूर्ण चुनावों से पहले जिस तरह से गांधी परिवार को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से निशाने पर लिया है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इस तरह के किसी भी मामले में सत्ताधारी दल जांचों को अपने हिसाब से उसी तरह से मोड़ता रहता है जिससे उसे अपने विपक्षियों पर हमला करने की छूट मिल जाये.
                               बिहार चुनावों की सरगर्मी बढ़ने के साथ जिस तरह से एक बार फिर मोदी सरकार सोनिया-राहुल और रॉबर्ट पर निशाना लगाने की कोशिशें शुरू कर चुकी है वह भारतीय राजनीति के एक काले चेहरे से अधिक कुछ भी नहीं कहा जा सकता है. यह देखना इस लिए भी दिलचस्प है क्योंकि मोदी या भाजपा के पास सीधे बिहार के सीएम नितीश कुमार पर हमला करने लायक पर्याप्त मसाला नहीं है और उस स्तर का हमला करने में नितीश खुद भी माहिर हैं जैसा मोदी अपनी चुनावी सभाओं में किया करते हैं तो मोदी कांग्रेस और सोनिया राहुल के माध्यम से महा गठबंधन पर हमले करने की अपनी रणनीति पर पूरी तरह से काम करने में लगे हुए हैं. संख्या बल पर मज़बूत इस मोदी सरकार से इस तरह की हरकतों की अपेक्षा किसी ने भी नहीं की थी क्योंकि यदि किसी मामले में गांधी-वाड्रा परिवार के किसी सदस्य को दोषी पाये जाने की संभावनाएं हैं तो उसकी निष्पक्ष रूप से जांच भी होनी चाहिए जिससे दोषियों को सजा भी दिलवाई जा सके पर विगत एक वर्ष से हर महत्वपूर्ण चुनाव से पहले जिस तरह से मोदी सरकार कांग्रेस और गांधी परिवार पर हमले किया करती है उससे यही लगता है कि आज भी कहीं न कहीं से मोदी को लगता है कि आने वाले वर्षों की राजनीति में अपनी अखिल भारतीय पहचान के कारण कांग्रेस ही उनकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनने वाली है.
                                   बिहार चुनाव निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं और अभी तक किसी को भी कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि इसके क्या परिणाम निकलेंगें पर हर दल अपने अनुसार अपने किले को मज़बूत करने में लगा हुआ है. कांग्रेस पर इस तरह के आरोप सदैव ही लगते रहे हैं कि वह जाँच एजेंसियों का दुरूपयोग किया करती थी तो यदि आज केंद्र में मोदी सरकार ने भी वही राह पकड़ी हुई है तो वह इस मामले में कांग्रेस से अलग कैसे हो सकती है ? यादव सिंह मामले में सीबीआई की जाँच का दबाव बनाकर किस तरह से मुलायम सिंह को बिहार गठबंधन से बाहर निकलवाने का काम मोदी सरकार ने किया है यह सभी को पता है और आने वाले समय में यूपी के चुनावों तक यह जाँच किस तरह से खुद मुलायम को झुलसाएगी यह भी देखना दिलचस्प होने वाला है. देश में जांचों के नाम पर इस तरह की राजनीति नहीं होनी चाहिए और दोषियों को कानून के अनुसार दण्डित भी किया जाना पर केवल जाँच को राजनैतिक और रणनीतिक हथियार बनाये जाने से देश का कुछ भी भला नहीं हो सकता है और सत्ता से नज़दीकियां बढाकर कोई भी अपने हितों को सुरक्षित भी रख सकता है.                        
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मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

नेता,नैतिकता और बिहार का सन्दर्भ

                                               बिहार में जिस तरह से रोज़ ही नयी राजनैतिक गतिविधियाँ दिखाई व सुनाई दे रही हैं उनसे यही लगता है कि जब तक मांझी सीएम के तौर पर वहां बैठे हुए हैं तो इस सब से पार पाना किसी के भी बस में नहीं रहा गया है. आमतौर पर राजनीति में नेताओं द्वारा नैतिकता की लम्बी चौड़ी कहानियां सदैव ही सुनाई जाती रहती हैं पर जब धरातल पर कुछ करने का समय आता है तो उनको जैसे मति भ्रम हो जाता है और वे अपने द्वारा ही दिए गए इन उपदेशों को अपनी सुविधा के लिए पूरी तरह से भूल जाया करते हैं. आज जब मांझी पर इस बात के लिए प्रश्चिन्ह लग चुका है कि सदन का विश्वास उन्हें हासिल भी है या नहीं तो इस स्थिति में उनके द्वारा बड़े नीतिगत फैसले आखिर किस हक़ से लिए जा रहे हैं ? इस तरह के विलक्षण मामलों में क्या अब कोई ऐसी नैतिकता की नियामवली नहीं होनी चाहिए जिस पर चलना नेताओं के लिए एक आदर्श स्थिति मानी जाये क्योंकि एस आर बोम्मई और कल्याण सिंह के इसी तरह के विवादों में यह लगभग तय ही हो चुका है कि इन परिस्थितियों में क्या किया जाना चाहिए.
                                                                  इस तरह के मामलों में हमारे नेता देश के सामने क्या आदर्श प्रस्तुत कर पाते हैं यही चिंता का विषय है क्योंकि जब भी कोई ऐसा संकट सामने आता है तो कोर्ट के माध्यम से ही नेता एक दूसरे को नीचा दिखाने के बारे में सोचते रहते हैं तथा विधायिका की ज़िम्मेदारी पता नहीं कहाँ विलुप्त हो जाती है और उसकी जगह सत्ता लोलुप नेताओं की पूरी फ़ौज़ ही दिखाई देने लगती है. बिहार मामले में कोर्ट ने पहले नितीश को कोई बड़ी राहत नहीं दी पर अब जब माझी द्वारा बड़े नीतिगत पर राजनैतिक रूप से एक दांव के रूप में बड़े निर्णय लिए जाने लगे तो कोर्ट ने उन पर केवल दैनिक फैसलों तक सीमित रखने के बारे में स्पष्ट आदेश जारी कर दिया है. ऐसे मामलों में क्या राज्यपाल को केंद्र में बैठे हुए दल की महत्वकांक्षाओं की पूर्ति का साधन ही बनाया जाना चाहिए वह भी तब जब बिहार के पास लम्बे राजनैतिक और कानूनी जीवन वाले केसरीनाथ त्रिपाठी के रूप में एक बेहद कारगर राज्यपाल मौजूद हों ? केंद्र को इस तरह के किसी भी मामले में पूरी तरह से स्पष्ट दखल देकर देश के लोकतंत्र को सर्वोपरि रखने की कोशिश करनी चाहिए भले ही उसमें केंद्र या राज्य में किसी भी दल की सरकारें क्यों न हों.
                           एक तरफ बिहार में पिछड़ापन एक बड़ा मुद्दा होता है और जब उसके विकास के लिए काम किये जाने वाला बजट सत्र आहूत किया जा चुका हो तो उससे पहले इस तरह की अनिश्चितता का क्या मतलब बनता है ? आज भाजपा मांझी को केवल नितीश के सामने एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करने में लगी हुई है जबकि वह यह बड़ी बात भूल जाती है कि जब राज्य का पूर्ण बजट बनाया जाना है तो आने वाले समय में इस तरह की अनिश्चितता राज्य को कितनी भारी पड़ सकती है फिर भी उसकी प्राथमिकता केवल नितीश को परेशान करने तक ही सीमित है. यह वही नितीश हैं जनके साथ चुनाव लड़कर उसने दोबार सत्ता का सुख बिहार में भोगा है और आने वाले समय में यदि चुनावों के बाद भाजपा बिहार में सरकार बनाने में सफल हो जाती है तो भी उसे नितीश की इन बेहतर योजनाओं की मांझी के लोकलुभावन वायदों से अधिक सहायता मिलने वाली है. यह देश का दुर्भाग्य ही है कि हमारे नेता और राजनैतिक दल सदैव ही इस तरह की राजनीति के खिलाफ तो होते हैं पर समय मिलने पर वे अपने को सबसे घटिया राजनीति का पैरोकार साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं और देश का इसी तरह से नुक्सान होता रहता है पर उनके दलों की सरकारें बची रह जाती हैं.    
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सोमवार, 1 दिसंबर 2014

रोहतक छेड़छाड़- समाज और पंचायत

                                                                              रोहतक में एक बस में हुई छेड़छाड़ और उसके बाद लड़कियों द्वारा किये गए तीव्र प्रतिरोध के बाद जिस तरह से कानून को ताक पर रखने की कोशिशें शुरू की जा चुकी हैं उनका कोई मतलब नहीं बनता है. आम तौर पर किसी जगह इस तरह की घटना होने पर जन सामान्य इसमें उलझना नहीं चाहता है तथा कुल मिलकर लड़कियों को ही समझाने के प्रयास शुरू कर दिए जाते हैं उससे समाज में लड़कों के गलत बर्ताव के प्रति भी सहानुभूति रखने की मानसिकता का ही पता चलता है. अभी तक जिस तरह से इन लड़कियों ने अपने दम पर इन लड़कों से निपटने की कोशिश की थी अगर उसका विडिओ न बन जाता तो मामला सबके सामने नहीं आने पाता और लड़कों को बचाने में लगा हुआ समाज इस बात को आसानी से छिपा भी ले जाता पर इन लड़कियों के साथ ही इन अन्य महिला को छेड़ने के कारण उसने लड़कियों की हिम्मत भरी कोशिश को अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया जिससे मामला खुल गया और लड़कों की पहचान भी हो सकी.
                                                  इस घटना में आरोपियों की पहचान सामने आने के बाद जिस तरह से पंचायत का दखल इसमें बढ़ता ही जा रहा है और समाज के कमज़ोर वर्ग से आने वाली लड़कियों पर सामाजिक दबाव बनाया जा रहा है उसके बाद पुलिस का इसमें कितना रोल बचता है यह तो समय आने पर ही पता चल पायेगा पर महिलाओं पर पाबन्दी लगाने वाले समाज ने एक बार फिर से यह साबित कर ही दिया है कि उसके लिए आज भी जातीय बंधन उतने ही महत्वपूर्ण हैं. यदि मामला यहाँ पर उल्टा होता और लड़के समाज के कमज़ोर वर्ग के होते तथा लड़कियां उच्च वर्ग से होतीं तब भी क्या पंचायत इस तरह से ही अपने फैसले लेने की कोशिश कर पाती ? शायद नहीं क्योंकि तब उन्हें यह उनकी इज़्ज़त से जुड़ा हुआ मसला लगने लगता जिसमें शामिल लोगों को हर स्तर पर सजा दिलवाने की हर संभव कोशिश भी की जाती. समाज के इस दोहरे चरित्र के चलते ही आज इस तरह की घटनाओं के बारे में कोई कठोर कार्यवाही कर पाने में पूरा समाज ही फेल ही जाता है.
                                                            इन अभद्र लड़कों के परिवार वाले अब जिस तरह से लड़की के पिता पर दबाव बना रहे हैं तो क्या उन्हें पहले अपने लड़कों के व्यवहार के लिए खुद को ज़िम्मेदार नहीं मानना चाहिए ? एक सूचना के अनुसार को इन लड़कों का सेना में चयन हो चुका है और जल्दी ही ये वहां पर ज्वाइन भी करने वाले हैं और यदि इन पर यह आरोप लगा तो सेना में इनकी नियुक्ति पर भी ग्रहण लग जायेगा सिर्फ इस बात को लेकर ही अब जिस तरह का दबाव बनाया जा रहा है क्या उससे इन या इस तरह की मानसिकता वाले लड़कों को सुधारा जा सकता है ? आज देश के लिए जीने मरने की कसमें खाने को तैयार होने की कगार पर खड़े इस तरह की मानसिकता वाले लड़के यदि सेना में पहुँच जाते हैं तो इनके द्वारा अपनी पोस्टिंग के दौरान कहीं न कहीं सेना को भी शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है. सेना के लिए जिस अनुशासन की आवश्यकता होती है उसके पहले मानदंड में तो यह लड़के पूरी तरह से असफल ही हो चुके हैं अब लड़की के परिवार वाले भले ही इन्हें माफ़ कर दें पर सेना को इनके चयन को निरस्त किये जाने के बारे में स्पष्ट रूप से घोषणा कर ही देनी चाहिए.        
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मंगलवार, 4 नवंबर 2014

१९८४ के दंगे और राजनीति

                                                                             इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जिस तरह से दिल्ली और देश के अन्य स्थानों पर सिखों पर हमले किये गए उसमें देश की सबसे जीवंत कौम पर बहुत ही बुरा असर पड़ा था और आज तक विभिन्न राजनैतिक लाभ लेने के कारणों से इस मुद्दे पर राजनीति किये जाने की कोशिशें बंद नहीं हो पायी हैं. ताज़ा मामले में जिस तरह से इस वर्ष ३० अक्टूबर को ही मोदी सरकार की तरफ से यह कहा गया कि हर दंगा पीड़ित को पांच लाख रूपये दिए जायेंगें उसका व्यापक रूप से स्वागत ही किया गया था क्योंकि किसी की भी कमी को रुपयों से तो पूरा नहीं किया जा सकता है फिर भी यदि पीड़ित और प्रभावी परिवार को कुछ आर्थिक सहायता मिल जाये तो वे अपने समाप्त हुए कारोबार को दोबारा शुरू करने की फिर से कोशिश तो शुरू कर ही सकते हैं पर इस मामले में सब कुछ इतना लम्बा और उबाऊ हो चुका है कि किसी भी परिस्थिति में अब वह मरहम का काम नहीं कर सकता है.
                                                                  ३० अक्टूबर को सरकार द्वारा की गयी घोषणा में वैसे तो कोई कमी और बुराई तो नहीं थी पर जिस तरह से दिल्ली की तीन सीटों और जम्मू कश्मीर, झारखण्ड विधान सभाओं के चुनाव के चलते आचार संहिता लागू हो चुकी थी तो इस तरह की घोषणा करने का मतलब पूरी तरह से राजनैतिक ही था. सरकार की तरफ से इस तरह कि संकेत मिलने के बाद चुनाव आयोग ने स्पष्टीकरण मांग लिया तो गृह मंत्रालय की तरफ से यह कहा गया कि इस मामले में केवल विचार चल रहा है और किसी भी तरह की घोषणा या अधिसूचना जारी नहीं की गयी है. इस तरह के जवाब से कानूनी तौर पर तो सरकार का बचाव हो गया है पर उसकी मंशा भी साफ़ ज़ाहिर हो गयी है कि उसने केवल चुनावी लाभ लेने के लिए ही इस तरह कि घोषणा की है. चुनाव आयोग की सक्रियता और सरकार को गलत टाइमिंग के कारण सिखों की इस समस्या को एक बार फिर से राजनीति में घसीट लिया गया है.
                                                                कांग्रेस के लिए यह मुद्दा सदैव ही संवेदनशील रहा है क्योंकि उस समय से आज तक उसके नेताओं पर दंगें भड़काने और दंगाइयों का साथ देने के आरोप लगते रहे है और दुर्भाग्य की बात यह भी है कि सबूतों के अभाव में अधिकांश लोग बचते ही जा रहे हैं. इस तरह के मामलों में साफ़ मंशा के साथ काम करने की आवश्यकता होती है कांग्रेस की दुविधा और कमज़ोर इच्छा शक्ति के कारण आज तक इस पर कुछ ठोस नहीं हो पाया है. इस स्थिति को सुधारने के स्थान पर भाजपा ने भी इस मुद्दे पर राजनीति को ही हवा दी है जिसे उचित नहीं कहा जा सकता है. भारत सरकार इन पीड़ितों के लिए जो कुछ भी कर सकती है या फिर करने की इच्छा रखती है उसे यह सब बिना किसी राजनीति के एक मज़बूत नीति के माध्यम से उसे लागू कर मामले को अब ख़त्म करने की तरफ बढ़ाना चाहिए जिससे पीड़ितों के घावों को बार बार कुरेदे जाने से बचा जा सके और उनकी वास्तविक सहायता भी की जा सके.     
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मंगलवार, 22 जुलाई 2014

काटजू का विवाद

                                                                  देश में कोई कितना स्वतंत्र है इस बात की पुष्टि वर्तमान में जस्टिस काटजू द्वारा उत्पन्न किये गए नए तरह के विवाद से स्पष्ट हो गयी है ऐसा नहीं है कि जस्टिस काटजू अपने आप में विवादों से दूर रहने वाले लोगों की श्रेणी में आते हैं फिर भी उनके द्वारा जिस तरह से खुलेआम जजों की नियुक्ति में राजनैतिक दबाव की बात कही गयी है व देश के लिए अवश्य ही चिंतनीय है. अभी तक जिस तरह से यह मान जाता है कि न्यायिक कार्यों में सरकार का दखल कम ही रहा करता है देखने में तो वह वैसा ही लगता है पर जिस तरह से परदे के पीछे लॉबिंग का खेल चलता है वह सभी जानते हैं. देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्तियों के लिए अब इस तरह से जजों कि नियुक्तियों के लिए स्पष्ट नियम बनाये जाने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है क्योंकि किसी एक विवाद को दूर रखते हुए भी यदि पूरी चयन प्रक्रिया पर गौर किया जाये तो वह निश्चित तौर पर सही तो है पर उसमें दबाव के होने से इंकार नहीं किया जा सकता है.
                                                    जस्टिस काटजू उस बयान के बाद जिस तरह से एक टीवी शो से तीखे सवाल पूछे जाने पर खुद को उससे अलग करते हुए बाहर आ गए इससे क्या पता चलता है क्योंकि यदि उनके पास कुछ ठोस है तो उन्हें उसे देश के सामने लाने की पूरी कोशिश करनी चाहिए और सरकार को इस मामले की जांच में पूरा सहयोग भी करना चाहिए. पूर्व कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने भी यह माना है कि उस जज को लेकर दबाव था पर नियुक्ति में सरकार को कोई हाथ नहीं था और पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट की कमेटी के सुपुर्द कर दिया गया था. पूर्व प्रधान न्यायाधीश के जी बालाकृष्णन ने भी इस मुद्दे पर हैरानी जताई है और कहा है कि किसी भी न्यायाधीश के सेवा के दौरान प्रदर्शन को देखने की ज़िम्मेदारी तो सम्बंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य की होती है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन जज के राजनैतिक संबंधों के बारे में पता चलते ही उन्हें आंध्र प्रदेश स्थानांतरित कर दिया गया था.
                                                     अब जब पूरे विवाद में अजीब तरह की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है तो अब सरकार को पुराने रेकॉर्ड देखकर इस पर कुछ करना चाहिए और नियमों में इस तरह का बदलाव करना चाहिए जिससे आने वाले समय में इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगायी जा सके. आज देश के हाई कोर्टों और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकीलों को न्यायाधीश बनाये जाने की प्रक्रिया चलती ही रहती है और जिस राज्य में जिस दल की सरकार होती है वह अपने लोगों को इन पदों पर बैठाती ही रहती है इसमें कोई नयी बात नहीं है. हर राज्य और केंद्र में सरकार बदलने पर जिस तरह से सरकारी अधिवक्ताओं और महाधिवक्ताओं को बदला जाता है उससे क्या उनकी राजनैतिक निष्ठाओं की पूर्ति नहीं होती है ? क्या अब देश में अखिल भारतीय स्तर पर इन सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए भी एक प्रवेश प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए जिससे आने जाने वाली सरकारें किसी भी व्यक्ति को अपने मन से इन पदों पर न बैठा सकें और प्रशासनिक/ पुलिस अधिकारियों की तरह उनको केवल उन लोगों में से ही किसी को चुनने की आज़ादी होनी चाहिए.     
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बुधवार, 2 जुलाई 2014

जजों की नियुक्तियां और नियम

                                                    सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम की नियुक्ति के मामले में मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने जिस तरह से सरकार के रुख से नाराज़गी दिखाई है वह देश को एक बार फिर से सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर कब तक महत्वपूर्ण पदों के लिए इस तरह की अनावश्यक राजनीति और बातें सामने आती रहेंगीं ? लोढ़ा ने जिस तरह से सरकार की आलोचना की ठीक उसी तरह से उन्होंने सुब्रह्मण्यम के सीधे बयान जारी करने को भी पूरी तरह से गलत बताया है और यह भी कहा कि गोपाल को कम से कम उनके विदेश से वापस लौटने तक प्रतीक्षा तो करनी ही चाहिए थी. न्यायपालिका और विधायिका में पहले भी बहुत सारे मसलों पर मतभिन्नता रहा करती है पर उसका मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि सरकार और न्यायपालिका के बीच के विवाद इस तरह से सबके सामने आये और इसके पीछे चलने वाली राजनीति को महत्व दिया जाये. सुब्रह्मण्यम के पास वरिष्ठता और अनुभव का सामंजस्य था जिसे देखते हुए ही उन्हें इस पैनल में शामिल भी किया गया था.
                                             न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अभी तक जिस तरह से कोर्ट और सरकार अघोषित तरीके से एक नीति पर ही चलती रहती हैं उसका अनुपालन किया जाना भी आवश्यक है और यदि सरकार को ऐसा लगता है कि इस नीति में कुछ गड़बड़ होती है तो अब इसके लिए नीति में आमूलचूल परिवर्तन करने की तरफ सोचना भी चाहिए. देश को शीर्ष स्तर पर इस तरह का नाटक कभी भी अच्छा नहीं लगता है भले ही वह किसी भी दल की सरकार क्यों न हो यह मुद्दा देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ होता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इससे हमारी छवि धूमिल हुआ करती है तो अब इससे निजात पाने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता भी सामने आ गयी है. गोपाल सुब्रह्मण्यम के सोहराबुद्दीन मामले में पैरवी किये जाने के कारण ही राजग सरकार उन्हें सुप्रीम कोर्ट में जज के रूप में नहीं देखना चाहती थी जिस कारण से ऐसी परिस्थितिया बनायीं गयीं कि उन्होंने इस मामले से खुद पूरी तरह से अलग ही कर लिया.
                                             कहने के लिए तो देश में सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्र है पर इस घटना से सभी को यह पता चल गया है कि देश के राजनैतिक तंत्र ने न्यायिक नियुक्तियों पर भी इतना कड़ा बंधन लगा रखा है कि बिना उसकी अनुमति के कुछ भी नहीं किया जा सकता है. एक वरिष्ठ और काफी हद तक प्रभावशाली ढंग से अपनी बात को रखने वाले व्यक्ति को जज बनने से रोककर केंद्र सरकार को क्या हासिल हुआ है यह तो उसे ही पता होगा पर देश ने आने वाले समय के एक बेहतरीन जज को खो दिया है वर्ना इस मामले में लोढ़ा इस तरह से चिंता प्रगट नहीं करते और खुलेआम सरकार की इस तरह से आलोचना नहीं करते. देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है और किसी पर भी कोई दबाव नहीं है पर राजनैतिक विरासत को दूर रखते हुए महत्वपूर्ण नियुक्तियों को राजनीति से दूर रखा जा सके तो यह देश के लिए बहुत अच्छा होगा. यह बात किसी एक दल के लिए बल्कि सभी दलों पर लागू होती है और इस तरह की नियुक्तियों के लिए पैनल बनाकर उस पर निर्णय लेने का अधिकार सरकार के बजाय सुप्रीम कोर्ट पर ही होना चाहिए.               
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बुधवार, 9 अप्रैल 2014

चुनाव आयोग और ममता

                                  पहले जिस तरह से हर बात में आप के नेता अरविन्द केजरीवाल कानून और संविधान में कमी की बात करके अपनी बात को सही साबित करने की कोशिशें करते रहते थे कुछ इसी तरह की बात चुनाव आयोग के सन्दर्भ में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने भी कही हैं. यह सही है कि चुनावी माहौल में जिस तरह से पूरा प्रशासन सीधे केंद्रीय चुनाव आयोग के नियंत्रण में आ जाता है उसके बाद केंद्र और राज्यों में बैठे नेताओं की भूमिका केवल आवश्यक विधायी कार्यों को चलाते रहने तक ही सीमित हो जाती है पर ममता ने जिस तरह से अपने यहाँ पर चुनाव आयोग द्वारा सात अधिकारियों के तबादले को बड़ा राजनैतिक और प्रशासनिक मुद्दा बनाने का प्रयास किया उसका कोई औचित्य भी नहीं था. फायर ब्रांड नेता ममता बनर्जी के साथ निश्चित तौर पर बंगाल की जनता मज़बूती के साथ खड़ी है पर उसका मतलब यह तो नहीं निकला जा सकता है कि कहीं से भी कुछ भी अनर्गल प्रलाप कर वे आयोग को कटघरे में खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दें ?
                                    अधिकारियों के मसले पर चुनाव आयोग का आम तौर पर एक जैसा ही रवैया पूरे देश में रहता है कि जब भी किसी अधिकारी के लिए क्षेत्र विशेष से शिकायत की जाती है तो आयोग तीन सुझावों वाले नामों में से किसी एक नाम पर अपनी सहमति दे देता है और राज्य सरकारें भी इसका पूरी तरह से अनुपालन किया करती हैं. बहुत बार इस प्रक्रिया में आयोग कई ऐसे अधिकारियों को भी स्थानांतरित कर देता है जो कर्मठ और संवेदनशील होते हैं आयोग किसी भी तरह के विवाद में पड़ने के स्थान पर अपने स्तर से सामान्य बदलाव कर देने की नीति का ही सदैव अनुपालन किया करता है. ममता जैसे ज़मीन से जुडी हुई नेता ने जिस तरह से चुनाव आयोग पर कॉंग्रेस और भाजपा के दबाव में काम करने की बातें की उनका कोई मतलब भी नहीं निकलता है क्योंकि चुनाव आयोग लगभग ४५ दिनों में ही किसी अधिकारी के बारे में सब कुछ कैसे जान सकता है ? क्या चुनावों को और भी पारदर्शी और निष्पक्ष बनाये जाने के लिए पूरे देश के प्रशासनिक अधिकारियों के बारे में चुनाव आयोग को सब कुछ लगातार पूरे वर्ष नहीं बताना चाहिए जिससे अधिकारियों के राजनैतिक हितों को वह भी समझ सके और केंद्रीय और राज्यों के चुनाव आयोगों में एक राजनैतिक प्रशासनिक सेल भी बनाई जानी चाहिए ?
                                     आज देश में किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति पर नेताओं द्वारा इस तरह के आरोप लगाया जाना सामान्य बात हो चुकी है क्योंकि अब देश में जो पीढ़ी राज कर रही है वह कहीं से यह भी मानती है कि भारतीय संविधान में बहुत सारी कमियां हैं और उनको दुरुस्त किया जाना बहुत आवश्यक है. कमियों को ठीक किया जाये इससे किसी को भी कोई आपत्ति नहीं है पर अनावश्यक रूप से केवल अपने को बड़ा दिखाने के लिए ही इस तरह की हरकतों पर रोक तो लगनी ही चाहिए वरना किसी दिन कोई नेता राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट पर भी उँगलियाँ उठाने से नहीं चूकेगा. ममता ने अपनी कम जानकारी के चलते यह बात आवेश में कह दी थी पर जब उन्हें वास्तविकता का ज्ञान हुआ तो उन्होंने अपने कदम पीछे खींचने में ही अपनी भलाई समझी जिससे एक अनावश्यक मुद्दा आगे बढ़ने से बच गया. चुनाव आयोग ने जिस तरह से स्प्ष्ट कर दिया था कि उनकी बात न मानने पर राज्य में चुनाव रद्द भी किये जा सकते हैं तो उसके बाद ममता के पास और कोई चारा भी नहीं था. अच्छा हो कि ममता या कोई अन्य नेता अपनी समस्या को इतना बड़ा न कर दें कि उससे निकलें के मार्ग दिखायी देने बंद हो जाएँ.   
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गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

भ्रष्टाचार, कानून सरकार और न्यायपालिका

                                                   एक ही समय पर जिस तरह से कानून मंत्री कपिल सिब्बल के न्यायापालिका में भ्रष्टाचार पर बंद कमरे में होने वाली सुनवाई और नीतिगत मामलों में किसी न्यायाधीश द्वारा अपने विवेक के इस्तेमाल से दिए जाने वाले फैसलों और प्रधान न्यायाधीश पी सदाशिवन द्वारा उसका जवाब देने से एक बार फिर से यही लगता है कि नीतिगत मामलों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर अभी भी न्यायपालिका और विधायिका में और अधिक सामंजस्य बनाये रखने की आवश्यकता है. जिस तरह से कपिल सिब्बल ने यह कहा कि एक तरफ कोर्ट सरकारी अधिकारियों के खिलाफ तो सीधे केस दर्ज़ करने की बात करती है पर अपने न्यायाधीशों के खिलाफ आरोपों की बंद कमरों में सुनवाई करती है वह तरीका सही नहीं है तो उन्हें जवाब मिल गया कि सभी कार्यवाही कानून सम्मत तरीके से ही की जाती है और किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ आरोप लगते ही तीन सदस्यीय समिति को पूरा मामला सौंप दिया जाता है जो पूरे मामले की जांच करने के बाद ही अपनी राय देती है और आरोपों की सच्चाई सामने आ जाती है.
                                                  यहाँ पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तेज़ी बदलते वैश्विक परिवेश में आखिर वे कौन सी नीतियां या तंत्र होना चाहिए जो सरकार के नीतिगत मामलों में न्यायपालिका को भी शामिल कर सके क्योंकि सिब्बल का यह कहना बिलकुल सही है कि किसी भी नीति को बनाने में एक साल से अधिक का समय लगता है और न्यायपालिका एक क्षण में उसको पलट देती हैं तो ऐसी स्थिति में देश के समग्र विकास के बारे में नीतियां कैसे बनायीं जा सकती हैं ? सिब्बल ने इन नीतियों का अनुचित लाभ उठाने वालों के खिलाफ कार्यवाही को सही बताते हुए यह भी कहा कि इसमें शामिल पूरी प्रक्रिया को ही रद्द किये जाने से देश के विकास पर कुप्रभाव तो पड़ना ही है. संप्रग की इस सरकार के अंतिम चरण में यह एक महत्वपूर्ण बात सामने आयी है और इससे न्यायपालिका भी असहमति नहीं दिखा सकती है क्योंकि आज की व्यवस्था में कार्यपालिका अपनी नयी नीतियों के निर्धारण में किसी भी स्तर पर न्यायपालिका को शामिल नहीं करती है जिससे बड़े नीतिगत मुद्दों अपर टकराव जैसी स्थिति आ जाती है.
                                                   सबसे कठिन समस्या यही है कि पिछले कुछ दशकों से संसद का समय काम करने के स्थान पर अराजकता फ़ैलाने में ही अधिक जाने लगा है जिसके सीधा असर यह भी पड़ता है कि नीतिगत मुद्दों पर ससंदीय समितियों से बाहर जिन मुद्दों पर सदन में गम्भीर चर्चाएं हुआ करती थीं अब उनके स्थान पर केवल बिल लाना और उसे ध्वनिमत या बहुमत किसी भी तरह से पारित करवाना ही सरकार का काम हो गया है और साथ ही विपक्ष भी किसी भी नयी नीति का अलग से समर्थन तो करता है पर सदन में वह किसी भी तरह से उसका श्रेय सरकार को नहीं देना चाहता है क्योंकि तब दल विशेष को उन परिवर्तनों का लाभ मिल सकता है. क्या देश के राजनैतिक दल इस बात को समझने का प्रयास करेंगें कि उनकी हर बात पर जनता की नज़रें रहा करती हैं और देश के लिए लाभकारी नीतियां बनाने की ज़िम्मेदारी हर उस दल की हो जाती है जिसके सांसद सदन के लिए चुन लिए जाते हैं इसको दलगत भावना से आगे जाकर देखने की ज़रुरत है और भविष्य में कुछ ऐसा भी किया जाना चाहिए जिससे नयी नीतियों को बनाने या बन जाने के बाद उसके लाभ हानि के बारे में न्यायपालिका को लगातार सूचित किये जाने की मज़बूत व्यवस्था भी हो सके जिससे नयी नीतियां बनने की प्रक्रिया धीमी न हो और देश का विकास भी होता रहे.   
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शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

आतंकियों के मुक़दमे और राजनीति

                                           देश में इस्लामी चरमपंथियों के प्रभाव या बहकावे में आकर उनका समर्थन करने या उनके लिए स्लीपिंग से एक्टिव मॉड्यूल बनने तक में शामिल रहे मुस्लिम युवकों को लेकर जिस तरह से यूपी की सपा सरकार ने एक तरफ़ा राजनीति करनी शुरू की थी इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते समय यह स्पष्ट रूप से कह कर कानून का पक्ष रखा है कि केवल यूपी सरकार ही इन मुक़दमों को वापस नहीं ले सकती है क्योंकि इनमें से कई अभियुक्तों के ख़िलाफ़ केंद्रीय धाराओं के मुक़दमें भी दर्ज़ हैं. इससे यूपी सरकार को जहाँ एक तरफ संवैधानिक और कानूनी जानकारी के बारे में विचार किए शुरू की गयी प्रक्रिया की वास्तविकता समझ आ गयी है वहीं अपने को मुसलमानों का हितैषी साबित करे में एक बार फिर से शुरू की गयी सपा की राजनाति उस पर कानूनी रूप से बहुत भारी पड़ गयी है. सरकार बनने के लगभग २० महीने पूरे होने के बाद भी यदि सपा सरकार इस तरह से काम करती रही तो यह उसके लिए बड़ा सबक भी लेकर आ सकती है क्योंकि इन मुक़दमों को इस तरह वापस नहीं किया जा सकता है यह क्या प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी वकील को भी नहीं पता है ?
                                           यह बिलकुल सही है कि इस तरह के आतंकी हमलों में जिस तरह से संदेह के आधार पर पुलिस लोगों को हिरासत में लेकर अपने को यह दर्शाने का प्रयास करती है कि उसके पास विवेचना करके आतंकियों को जल्दी से जल्दी पकड़ने की महारत है वहीं उससे वे विवेचना से जुड़ी वे मूलभूत समस्याएं कहीं पीछे छूट जाती है जिनका अभियोग को चलने के समय होना कानूनी तौर पर आवश्यक होता है. देश का कानून किसी को भी संदिग्ध परिस्थितियों में काम करने पर हिरासत में लेने का अधिकार देता है पर इस तरह के अधिकतर मामलों में जितनी तेज़ी से गिरफ्तारियां होती हैं उतनी तेज़ी से विवेचना कभी भी आगे नहीं बढ़ पाती है और इन मुक़दमों के भी सामान्य मुक़दमों की तरह चलाये जाने के कारण उससे अन्य तरह की समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं. अच्छा हो कि आतंकियों के बढ़ते दुस्साहस से निपटने के लिए विशेष आतंकी कोर्ट हर राज्य में बनायीं जाएँ और विवेचना से लेकर अभियोग तक के लिए एक समय सीमा में रहकर काम किया जाये जिससे आतंकियों को सजा मिल सके और यदि किसी संदिग्ध को ग़लती से हिरासत में लिया गया है तो उसे समय रहते सम्मान के साथ जीने का हक़ भी दिया जाये.
                                        पर इस मामले में आज कानून जिस तरह से अपना काम करता है वह किसी से भी छिपा नहीं है जिससे कई बार समाज में रहने वाले इन आतंकियों के कारण बहुत से उनके साथ के वे लोग भी लपेट में आ जाते हैं जिनका इससे कोई मतलब नहीं होता है ? अब समय आ गया है कि इस मामले में कोर्ट ही सरकारों को स्पष्ट निर्देश देकर आतंकियों से सम्बन्धित मुक़दमों को प्राथमिकता के आधार पर और अलग से चलाने को कहे जिससे यदि किसी की संलिप्तता किसी घटना में है तो उसे कानून सज़ा दे सके और इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर किसी भी राजनैतिक दल को किसी भी तरह की घटिया राजनीति को करने से भी रोका जाये. यदि सपा सरकार इस मामले में इतना ही संवेदनशील है तो उसे इन मुक़दमों की त्वरित सुनवाई के लिए ठोस प्रयास करने चाहिए थे जिससे निर्दोषों को कोर्ट सबूतों के अभाव में स्वयं ही सम्मान सहित छोड़ देता पर इसके स्थान पर उसे वह राजनीति पसंद आयी जिसमें उसने वोट लुभाने को प्राथमिकता दी. आज जिस तरह की राजनीति नेता करने लगते हैं उसमे कई बार कानून के प्रभावी अनुपालन से जो लोग निर्दोष छूट सकते हैं वे भी अनावश्यक रूप से जेलों में अपने दिन काटने को मजबूर हो जाते हैं और दुःख की बात यह है कि उनकी सुनवाई करने को कोई भी आगे नहीं आता है ? 
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मंगलवार, 17 सितंबर 2013

पीएम का दौरा और सुरक्षा

                       मुज़फ्फरनगर के हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में स्थापित राहत शिविरों के दौरे के बाद पीएम मनमोहन सिंह ने यूपी सरकार से स्पष्ट रूप से यह आशा की कि वह आने वाले समय में किसी भी तरह की हिंसा पर रोक लगाने के लिए कड़े क़दम उठाएगी और साथ ही जो लोग अपने घरों से विस्थापित हुए हैं उन्हें वापस अपने घरों तक पहुँचाने का काम भी करेगी. वैसे तो सूबे के सीएम के दौरे के पहले से ही स्थितियां सुधरने की राह पर जा रही हैं फिर भी मनमोहन के दौरे से जहाँ दंगा पीड़ितों को इस बात का विश्वास हुआ है कि अब सुरक्षा के मामले में कोई कोताही नहीं बरती जाएगी. यहाँ पर एक बात यह भी ध्यान में रखनी चाहिए कि जो भी इस हिंसा-प्रतिहिंसा में प्रभावित हुए हैं उनको धर्म और जाति के चश्मे से ऊपर उठकर इंसानियत के रूप में ही देखा जाना चाहिए क्योंकि अभी तक जिस तरह के बयान आ रहे थे उससे यही लगता था कि जाटों को यहाँ पर समस्या का मुख्य कारण माना जा रहा है जिसे मुलायम ने भी अपने बयान में इशारे में ही स्वीकार भी किया था ?
                       इस हिंसा के लिए यदि सरकार केवल जाटों पर ही उंगली उठाने का काम करती है तो उससे जाटों में अनावश्यक रूप से नफ़रत भरी रहेगी जो इन विस्थापितों को अपने घरों में लौटने नहीं देगी जिससे इस पूरे क्षेत्र की सामजिक और आर्थिक परिस्थितियों पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा क्योंकि यहाँ अधिकांश जाट बड़े कृषक हैं और मुसलमान उनके खेतों पर काम करने वाले मजदूरों के रूप में हैं. यदि सुरक्षा परिदृश्य नहीं सुधरता है तो इससे सबसे बड़ी समस्या दोनों के लिए ही आने वाली है क्योंकि जहाँ एक तरफ़ खेतों में काम करने के लिए किसानों को मजदूर चाहिए वहीं दूसरी तरह मजदूरों को भी काम चाहिए पर कोई भी अपनी जान को जोख़िम में डालकर इस तरह से किसी भी परिस्थिति में काम क्यों करना चाहेगा ? इस पूरी हिंसा के राजनैतिक नफे नुक्सान का तो नेता लोग हिसाब लगा ही रहे हैं पर आर्थिक प्रभावों के बारे में स्थानीय लोग संभवतः सोचना नहीं चाह रहे हैं क्योंकि प्रशासन की नाकामी ने दोनों ही पक्षों को बहुत गंभीर घाव दिए हैं.
                         किसी भी हिंसा प्रभावित क्षेत्र में पीएम के दौरे के बाद भी परिस्थितियों को सुधारने का ज़िम्मा तो राज्य सरकार पर ही है और मनमोहन ने इस बात के संकेत भी दिए हैं कि राज्य सरकार को इस दिशा में प्रयास करने चाहिए जिससे लोगों में सुरक्षा की भावना बढ़े और वे अपने घरों को वापस लौट सकें. केवल इन विस्थापितों की वापसी से ही काम पूरा नहीं होने वाला है क्योंकि जब तक स्थानीय लोगों में विश्वास की भावना नहीं पनपेगी तब तक सरकारी स्तर पर किये गए कोई भी प्रयास सफल नहीं हो पाएंगे आम लोगों को जिनके साथ रोज़ ही रहना है और जिनके सुख दुख में शामिल होना है यदि वे ही एक दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखते रहेंगें तो परिदृश्य को सुधारने का कोई भी प्रयास सफल नहीं हो पायेगा. ग्रामीणों में सुरक्षा का भाव जगाने के लिए अब पुलिस प्रशासन को स्थानीय स्तर पर सुरक्षा समितियों को बनाकर उनकी नियमित बैठकों पर गंभीरता से सोचना होगा क्योंकि प्रशासन एक बार लोगों को उनके घरों तक सुरक्षा में पहुंचा सकता है पर उनकी वास्तविक सुरक्षा तो स्थानीय लोगों के माध्यम से ही संभव हो पायेगी. पीएम के दौरे के बाद आशा की जानी चाहिए कि सुरक्षा और विश्वास बहाली का क्रम तेज़ी से आगे बढेगा.     
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शनिवार, 1 जून 2013

विजय कुमारी के १९ साल

                                   अलीगढ़ की विजय कुमारी को अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण १९ वर्ष जेल में सिर्फ इसलिए बिताने पड़े क्योंकि कोर्ट द्वारा ज़मानत मिल जाने के बाद भी उसके पास ५ हज़ार रूपये जमानत राशि के रूप में उपलब्ध नहीं थे इस घटना ने जहाँ के तरफ हमारी रोज़ ही मज़बूत और सक्रिय होती न्याय व्यवस्था पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है वहीं सरकारों और जेल विभाग के काम करने के तरीके पर भी ध्यान आकृष्ट किया है. पूरे मामले के इलाहाबाद हाई कोर्ट के संज्ञान में आने के बाद जहाँ कोर्ट ने प्रदेश सरकार से इस तरह के कैदियों का पूरा ब्यौरा तलब किया है जिससे उसे यह पता चल सके कि केवल धन उपलब्ध न हो पाने के कारण आख़िर कितने लोग प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद हैं और उनकी स्थिति और मुक़दमें की स्थिति देखने के बाद उस पर कुछ निर्णय भी लिया जा सके ? कोर्ट का काम केवल कानून के अनुसार सज़ा सुनाना और जुर्माना तय करना है पर इस मामले में जिस तरह से सरकारी रवैये और जेल विभाग की भूमिका सामने आई है वह पूरी तरह से मानवता के ही ख़िलाफ़ ही है.
                                       देश में न्यायालयों पर पहले से ही काम का बहुत दबाव है और जब तक कानूनी प्रक्रिया को पूरी तरह से सुधारने के प्रयास नहीं किये जाएंगें तब तक हर व्यक्ति को समय से न्याय नहीं मिल पायेगा सबसे दुःख की बात तो यह है कि पूरे देश में हर जगह कोर्ट की कमी का रोना रोया जाता है पर जब कुछ करने की बात होती है तो सरकारें कहीं से भी कुछ करती नहीं दिखाई देती हैं. आबादी के अनुसार जब तक न्यायालयों का गठन नहीं किया जायेगा तब तक किसी भी तरह से मानवीय मूल्यों की रक्षा कर पाना किसी भी कोर्ट के बस में नहीं है क्योंकि देश में न्याय विभाग का जो ढांचा आज़ादी के समय था आज भी कमोबेश हम उसी से काम चला रहे हैं. यह अच्छा ही हुआ कि कोर्ट ने इस मामले के साथ ही पूरे प्रदेश की स्थिति के बारे में जानकारी मांग ली है क्योंकि इससे उन लोगों को कम से कम जेल से बाहर निकलने में सहायता मिल सकती है जो केवल ज़मानत राशि न होने के कारण ही जेल में बंद हैं. सरकारें तो अपनी इस तरह की जिम्मेदारियों से हमेशा ही दूर भागती रहती हैं और उन्हें न्याय के दबाव में लाने के लिए अभी तक कोई अन्य उपाय किया भी नहीं जा सका है.
                                       देश में केंद्र और राज्य स्तर पर कानूनी अधिकार प्राप्त मानवाधिकार आयोग हमेशा से ही अस्तित्व में रहे हैं पर इस तरह के मामलों में आज तक इन्होने कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया यह भी सोचने का विषय है क्योंकि केवल आर्थिक आधार पर एक गर्भवती महिला ने अपनी जिंदगी के १९ साल गँवा दिए और साथ ही इस महिला के ससुराल वालों पर भी मुक़दमा दर्ज किया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने उसे छुड़ाने के लिए आवश्यक धनराशि की व्यवस्था करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और उसे जेल में ही रहने दिया. इन लोगों के ख़िलाफ़ भी कोर्ट को अपराधिक मुक़दमा चलाना ही चाहिए क्योंकि इस मामले में वे भी कम दोषी नहीं हैं ? देश में आयोगों के बावजूद भी इस तरह की घटनाएँ होती ही रहती हैं तो इस समस्या से निपटने के लिए जेलों में बंद लोगों के लिए प्रति वर्ष इस तरह के सघन अभियान पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए जिससे आने वाले वर्षों में कोई इस तरह से केवल धन की कमी के कारण जेल की सलाखों के पीछे अपनी जिंदगी काटने के लिए मजबूर न हो जाए और जिस न्याय की अपेक्षा संविधान द्वारा की गयी है हम उसे आम लोगों तक पहुंचा पाने में सफल हो सकें.                  
  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 11 मई 2013

आतंक का धार्मिक चेहरा ?

                                           यूपी में धर्म की राजनीति करने में लगी हुई सपा के लिए लखनऊ की विशेष अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कल्पना मिश्रा ने अखिलेश सरकार की आतंकी घटनाओं में लिप्त और जेल में बंद आरोपियों के ख़िलाफ़ दर्ज़ किये गए मुक़दमों की वापसी के लिए दायर की गयी अर्ज़ी को खारिज़ कर दिया है उससे यही लगता है कि इस मसले में राज्य सरकार की मंशा अवश्य ही दोषियों को बचाने की रही है. जब मामला कोर्ट में विचाराधीन है और उसमें इतनी प्रगति हो चुकी है कि अंतिम साक्ष्य के रूप में केवल विवेचक की गवाही ही शेष है तो इस तरह से केवल राजनैतिक लाभ उठाने के लिए किए गए इस प्रयास को उचित कैसे ठहराया जा सकता है. कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस तरह से मात्र राज्य सरकार की मंशा के कारण ही मुक़दमा वापस लेने की अर्ज़ी दी गयी है वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं भी है. इस मामले में शुरू में जैसा लगा रहा था कि अखिलेश आसानी से ये मुक़दमे वापस ले सकेंगें पर अब यह मामला और बड़ी अदालतों तक भी खिंच सकता है और इसमें हर जगह राज्य सरकार को मुंह की ही खानी पड़ेगी फिर भी अपने को मुसलमानों के नेता और पार्टी के रूप में स्थापित करने के लिए सपा इसे और भी आगे बढ़ने से नहीं चूकने वाली है.
                                          इस मामले में यदि राज्य सरकार को यह लगता है कि निर्दोष फँस रहे हैं तो वह इनके ख़िलाफ़ दायर किये गए मुक़दमों की तेज़ी से सुनवाई के लिए कोर्ट से अनुरोध कर सकती है और चूंकि राज्य से जुड़ा हुआ मामला है तो वह विवेचक को भी यह आदेश दे सकती है कि पूरे मामले में साक्ष्य आदि इकठ्ठा करने की प्रक्रिया को तेज़ी से और समयबद्ध तरीके से निपटाया जाए जिससे यदि किसी निर्दोष पर आरोप लग गए हैं तो कोर्ट उन्हें साक्ष्यों के आधार पर बरी कर सके ? केवल चुनावी लाभ के लिए इस तरह की हरकतें करने से कोई भी लाभ सपा को नहीं मिलने वाला है क्योंकि जब इसी तरह कभी किसी धार्मिक उन्मादी के शिकार उनके अपने या खुद वे हो जायेंगें तो इनके प्रति सारी सहानुभूति स्वतः ही ख़त्म हो जाएगी. सरकार को इस तरह की बेतुकी मंशा जताने और मुस्लिम युवाओं पर इन्हें झूठे आरोप साबित करने के स्थान पर मामलों के निपटारे में तेज़ी लानी चाहिए थी पर केवल मुस्लिम वोटों को हथियाने की राजनीति में कम से कम इस बार तो सपा को कोर्ट में पराजय ही मिली है पर उसके कुछ वोट भी पक्के हो गए हैं.
                              कोर्ट ने अपने आदेश में जिस तरह से पूरे मामले की समीक्षा करते हुए राज्य सरकार से यह भी पूछा है कि आतंकियों जिनके विरुद्ध काफी साक्ष्य मौजूद हैं उनको छोड़े से किस तरह से सामाजिक सद्भाव में बढ़ोत्तरी होगी और यह भी कहा है कि आतंकी का कोई धर्म नहीं होता उसका मक़सद केवल समाज में भय का माहौल पैदा करना होता है. केवल राज्य सरकार के कह देने से इस तरह के किसी भी गंभीर मामले में आरोपियों को नहीं छोड़ा जा सकता है क्योंकि जब तक उनके विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य हैं उन्हें कानूनन सज़ा भगतनी ही होगी. यदि न्यायालय केवल अर्ज़ी खारिज़ ही करता तो भी राज्य सरकार के लिए कम परेशानी होती पर जिस तरह से आदेश में कड़ी टिप्पड़ियाँ भी की गयी हैं उनके बाद तो अब सरकार के लिए अपनी न्याय दिलाने के लिए प्रयासरत रहने वाली छवि के बारे में फिर से सोचना पड़ेगा. अच्छा ही होगा कि सरकार तेज़ी से इन मुक़दमों को आगे बढ़ाये जिससे उनके अनुसार निर्दोषों को जेल में रहने से बचाया जा सके और दोषियों को कड़ी सजा दी जा सके. आख़िर क्या कारण है कि सरकारें मुस्लिम युवाओं में कट्टरपंथ की तरफ झुकाव को रोक पाने में नाकाम हो रही हैं और केवल मुसलमानों के तात्कालिक कल्याण की योजनाओं में ही उलझी हुई हैं ? देश में यह समस्या तब तक नहीं ख़त्म होगी जब तक मुसलमान अपने को वोट बैंक के रूप में संजोये रखेंगें और नेता उनका शोषण करने में पीछे नहीं रहेंगें.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 2 मई 2013

न्याय पर संदेह

                          पिछले दो दिनों में देश की विभिन्न अदालतों ने जिस तरह से विभिन्न मुद्दों पर अपनी राय ज़ाहिर की है उनसे सहमत और असहमत होने का एक और दौर शुरू होने वाला है क्योंकि एक तरफ जहाँ कोर्ट ने कोयला घोटाले की जांच रिपोर्ट को सीबीआई द्वारा सरकार से साझा किये जाने पर कड़ी टिप्पणी की वहीं दूसरी तरफ़ ८४ के सिख विरोधी दंगों के कारण अदालतों में चक्कर काट रहे कांग्रेसी नेता सज्जन कुमार को इस मामले में बरी कर दिया गया, अभी इसके परिणामों पर मंथन चल ही रहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने एफ़डीआई पर विदेशी पूँजी निवेश को चुनौती देने वाली एक याचिका को आधारहीन बताते हुए निरस्त भी कर दिया है. देश में जिस तरह से हर मामले में राजनीति किये जाने को ही प्राथमिकता के आधार पर लिया जाने लगा है उस स्थिति में हर व्यति इन निर्णयों की व्याख्या अपने हिसाब से करना चाहेगा पर कोर्ट पर समय समय पर छाती ठोंककर विश्वास जताने वाले हमारे राजनैतिक तंत्र के लोगों को यहाँ पर अपनी मनमानी कर लाभ उठाने वाले निर्णयों के न आ पाने से निराशा अवश्य ही होगी क्योंकि ये सभी मुद्दे लम्बे समय से राजनीति के केंद्र में बने रहे हैं.
                                   देश की किसी भी कोर्ट को केवल दलीलें सुनने के बाद कानून के अनुसार निर्णय सुनाने की छूट संविधान द्वारा मिली हुई है पर इसके साथ ही न्याय के आसन पर बैठे हुए व्यक्तियों से यह भी अपेक्षा की गयी है कि वह समाज के हित में अपनी तरफ़ से टिप्पणियों के माध्यम से अपनी बात को स्पष्ट भी कर सकते हैं. कोयला घोटाले से जहाँ सरकार को घेरने में विपक्षियों को मदद मिलने वाली है वहीं बहु-चर्चित सज्जन कुमार केस में अधिकांश लोगों को यही लग रहा है कि न्याय नहीं हुआ है. दिल्ली के सिख विरोधी दंगे स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे बुरा दौर कहे जा सकते हैं क्योंकि उससे पहले देश के राजनैतिक तंत्र द्वारा धार्मिक आधार पर राजनीति करने की जो ग़लती की गई उसी की प्रतिक्रिया स्वरुप पंजाब में खून की नदियाँ बह निकलीं और उनकी आंच ने पूरे देश में सिख विरोधी लहर को हवा दे दी थी. अब जो कुछ भी हो चुका है उसमें इस तरह से सड़कों पर गुस्सा दिखाने से कुछ भी हासिल नहीं होगा क्योंकि सज्जन कुमार के खिलाफ अपील करने के लिए अभी देश कि बड़ी अदालतों के मार्ग खुले हुए हैं. यह एक ऐसा मसला है कि जिस पर नेताओं को राजनीति करने से बचना चाहिए क्योंकि वर्षों के खून खराबे और निर्दोषों की लाशों की राजनीति पंजाब बहुत लम्बे समय तक झेल चुका है.
                                 खुदरा क्षेत्र में विदेशी पूँजी निवेश का जिस तरह से केवल राजनैतिक कारणों से ही विरोध किया जा रहा है उस परिस्थिति में कोर्ट ने बिलकुल सही निर्णय दिया है कि जो मॉडल पूरी दुनिया में अपना कर आगे बढ़ा जा सकता है उस पर भारत में क्यों न प्रयास किये जाएँ ? कोर्ट के इस निर्णय के बाद बेशक सरकार को इस मसले पर राहत का अनुभव होगा पर साथ ही नेताओं के पास कुछ बोलने के अवसर भी आएंगें. क्या आज यह स्थिति है कि बात बात पर कोर्ट के निर्णयों को स्वीकार करने में अपना भाग्य समझने वाले नेता इन मसलों पर कुछ नहीं बोलेंगें और इनको भी शिरोधार्य करेंगें या फिर दबे मन से स्वीकार कर किसी और माध्यम से कोर्ट में पहुंचकर अपने विरोध को दूसरी तरह से दिखाने का प्रयास करेंगें ? कोर्ट के निर्णय साक्ष्यों पर निर्भर किया करते हैं और जब तक इन निर्णयों को खुले मन से केवल देश हित में ही स्वीकार किया जायेगा तब तक ही देश का भला हो सकेगा वरना जिस तरह से हर मसले पर केवल विरोध की राजनीति करने की हमारे राजनैतिक तंत्र को आदत बन चुकी है उस स्थिति में यहाँ पर भी इन निर्णयों का अपने हिसाब से लाभ उठाना का प्रयास ही किया जायेगा.         
       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 19 नवंबर 2011

भट्टा पारसौल का सच

             मई माह में भूमि अधिग्रहण का विरोध करने पर उच्चाधिकारियों के कहने पर बड़ों को प्रसन्न करने और आन्दोलन को कुचलने के लिए पुलिस ने जिस तरह से कोहराम मचाया और महिलाओं / बुज़ुर्गों के साथ बदसलूकी की उसकी कोई मिसाल नहीं मिल सकती इस तरह का घृणित कृत्य करने के बाद भी लखनऊ में बैठे प्रशासनिक और आला पुलिस अधिकारी जिस तरह से लगातार झूठ बोलते रहे उसकी भी कोई सानी नहीं मिल सकती है. बड़ों के मौखिक आदेश के अनुपालन में पुलिस ने बर्बरता की सारी सीमायें तोड़ दीं और लोगों को अपने घरों से भागने को मजबूर किया गया. अब जब सीजेएम कोर्ट ने दनकौर पुलिस को यह आदेश दे दिया है कि वह एक डीएसपी, एक इंस्पेक्टर, तीन थानाध्यक्षों समेत २०/२५ पुलिस वालों पर गंभीर धाराएँ लगाये तो राज्य सरकार के पास कहने के लिए क्या बचता है ? इस मामले में केवल स्थानीय पुलिस को दोषी नहीं माना जा सकता है क्योंकि उन्होंने जो कुछ भी किया वह लखनऊ से आये आदेशों के बाद ही किया गया जो कि केवल सरकार की मुखिया को प्रसन्न करने का एक उपक्रम ही था.
   इस मामले में जब राहुल गाँधी ने गाँव का दौरा करने के बाद मसला मीडिया के सामने उछाला था तो लोगों ने उनका मज़ाक उड़ाया था साथ ही राज्य सरकार ने भी यह कहा था वहां पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था. सवाल यहाँ पर कुछ होने या न होने का नहीं वरन यह है कि क्या लोकतंत्र में पुलिस को इतनी छूट दी जा सकती है या फिर उसे इस तरह से किसी भी आन्दोलन को कुचलने के लिया कहा जा सकता है ?  उत्तराखंड की मांग कर रहे लोगों को दिल्ली जाने से इसी तरह मुलायम सरकार ने भी रामपुर में रोकने की कोशिशें की थीं जिसमें बाद में बहुत कुछ बवाल मचा था. इस तरह के किसी भी आन्दोलन से निपटने के लिए कुछ ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे कुछ अनैतिक होने पर बड़ों पर भी कार्यवाही की जा सके तभी इस तरह की घटनाएँ रुक पाएंगीं. अभी तक केवल राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए कुछ अधिकारी पार्टी के कार्यकर्ताओं जैसा व्यवहार करने लगते हैं जिससे नीचे के कर्मचारी या पुलिस कर्मी तो फँस जाते हैं पर आदेश जारी करने वाले बड़ों का कुछ नहीं बिगड़ता है. ऐसा नहीं है कि पुलिसकर्मी हमेशा ही बर्बर होते हैं पर जब उन्हें कुछ भी करने की छूट देकर किसी काम को रोकने के लिए कह दिया जाता है तो वे बर्बरता की सारी सीमायें पार कर जाते हैं क्योंकि उन्हें भी उसी सरकार और अधिकारियों के नीचे ही तो काम करना होता है जो अपने हितों के लिए उनका इस्तेमाल कर रहे होते हैं ?
   अब कोर्ट से इस तरह के आदेश आने के बाद लखनऊ में चुप्पी क्यों है ? जब अपना काम निकालना था तो इन पुलिकर्मियों का इस्तेमाल कर ही लिया गया और अब जब उनके फंसने का समय आया है तो राज्य सरकार संभवतः नियमों की याद करके अब कानून के सम्मान की बात बहुत बेशर्मी से ही करने जा रही है. ऐसे आन्दोलन कुचल कर नेता के सामने कुछ अंक हासिल करने वाले बड़बोले गृह विभाग के अधिकारी और अन्य बड़े कहाँ छिपे हुए हैं ? क्या कोई इस बात का जवाब देने के लिए लखनऊ में बचा है कि अब इन पुलिकर्मियों के भविष्य के बारे में कौन सोचेगा ? इस तरह की घटनाओं के बाद अब पुलिस के निचले स्तर के कर्मियों को ऐसे में क्या करना चाहिए यह भी क्या कोर्ट ही बताएगी ? अनुशासन के नाम पर इस पुलिस से जो कुछ भी कराया गया उसके बारे में अब कौन जवाब देगा ? शायद कोई नहीं और ये पुलिस कर्मी अपने भाग्य को कोसते हुए जेल में अपना समय बितायेंगें और उस घड़ी को कोसेंगें जब उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों के आदेश को इस हद तक मानने का काम किया था जो कि किसी भी स्तर पर अनुशासन की सीमाओं से बहुत परे था....   

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 15 अगस्त 2011

न्याय में विलम्ब

दिल्ली की एक अदालत ने एक जज महोदय ने अपने फैसले को सुनाने के बाद जिस तरह से यह भी स्वीकार किया कि निर्णय होने में हुई देरी की भी वे ज़िम्मेदारी लेते हैं उससे यही लगता है की आने वाले समय में हो सकता है की लोगों को त्वरित न्याय मिल सके. आज देश की अदालतों पर भारी बोझ है और उसके निपटारे के लिए उचित संख्या में कोर्ट और जज होने चाहिए तभी इस संख्या के बोझ को कम किया जा सकेगा. वैसे देखा जाये तो देश में जितने मुक़दमे हैं उतनी तेज़ी से उनको निपटने के लिए हमारा न्यायतंत्र सक्षम नहीं है क्योंकि वहां पर आवश्यक संसाधन ही उपलब्ध नहीं हैं. इस मामले में सरकारी स्तर पर जिस तरह से विचार चल रहा है उससे यही लगता है की आने वाले समय में शायद कुछ हद तक यह बोझ कम हो सके पर कोई भी व्यवस्था करने में सरकार को बहुत अधिक समय लगता है जिससे कहीं न कहीं से पूरा तंत्र चरमराता हुआ दिखाई देता है.
  देश में जो काम सबसे पहले किया जाना चाहिए वह यह की गाँवों में पहले जो सरपंच चुनने की व्यवस्था हुआ करती थी उसे मजबूती के साथ बहाल किया जाए जिससे कोई भी विवाद किसी भी तरह से किसी जनपद या तहसील स्तर के कोर्ट में पहुँचने से पहले ही सुलझ सकें और लोगों को स्थानीय स्तर पर ही उचित न्याय मिल सके. इसके बाद भी अगर किसी को लगता है की उसके साथ न्याय नहीं हुआ है तो वह अपनी अपील आगे की अदालत में करने के लिए स्वतंत्र है. ऐसा होने से जहाँ वर्षों तक चलने वाली दुश्मनी भी समाप्त हो जाएगी वहीं लोगों को न्याय भी मिल सकेगा. गाँवों में आज भी भू राजस्व से जुड़े बहुत सारे मामले ऐसे होते हैं की अगर उनकी सुनवाई ठीक से की जाये तो वे २ महीनों में ही निपट सकते हैं पर काम के बोझ और कुछ लोगों के निहित स्वार्थ के चलते यह सब संभव नहीं हो पाता है. 
अब समय आ गया है की देश इस बारे में कुछ सोचे क्योंकि जितनी अधिक देरी इस मसले में की जाएगी नए वादों के बोझ इन न्यायालयों पर बढ़ता ही जायेगा जिनसे निपटने के लिए हमारे पास आज ही पूरे संसाधन नहीं हैं. देश की जनता को सही समय से न्याय दिलाने के लिए इससे अधिक कुछ भी किये जाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जो लोग कुछ करना चाहते हैं वे कर ही लेंगें और काम को लटकाने का प्रयास तब भी किया जायेगा. किसी भी मुक़दमे में कमज़ोर पक्ष ही अधिक जोर लगता है क्योंकि उसे सच्चाई का पूरा पता होता है और वो यह भी जनता है की कमज़ोर पैरवी से फैसला उनके ख़िलाफ़ भी जा सकता है ऐसे में कई बार कहीं न कहीं से कुछ ऐसा हो ही जाता है जो न्याय पर से लोगों का भरोसा उठता है पर ऐसा भी नहीं है की सब कुछ ही ठीक नहीं है आज भी देश की जनता को न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...