मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 18 October 2015

जजों की नियुक्ति का अधिकार

                                               सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार के उस प्रयास को रद्द करने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि आने वाले समय में देश की अदालतों को जजों की उतनी संख्या नहीं मिलने वाली है जितने जज उन्हें चाहिए क्योंकि अब यह स्पष्ट नहीं है कि वर्तमान में देश में किस प्रक्रिया के तहत नए जजों की नियुक्ति की जाएगी। केंद्र सरकार ने जजों के कोलेजियम सिस्टम के स्थान पर नयी व्यवस्था को अपनाने के लिए जिस तरह से यह मामला कोर्ट के हाथों से निकाल कर उसमें राजनेताओं के दखल की पृष्ठभूमि तैयार की थी उसके चलते ही न्यायिक सक्रियता के कारण समस्याएं झेल रहे लगभग सभी राजनैतिक दलों ने उसका भरपूर समर्थन किया था और वह कानून भी बन गया था पर अब वह पूरी प्रक्रिया ही निरस्त हो चुकी है और उससे बचने के लिए अब सरकार के पास सीमित विकल्प ही बचे हुए हैं. इस पूरी व्यवस्था को सुधारने के सरकार के प्रयास को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बहुत बड़ा झटका दे दिया है.
                         यह सही है कि देश में पिछले दशकों में हर क्षेत्र में राजनेताओं का अनावश्यक दखल बढ़ता ही जा रहा है उससे निपटने के लिए ही कोर्ट ने संभवतः सरकारों की अपने पसंद के जजों की नियुक्ति से रोकने के लिए इस तरह का निर्णय भी सुनाया है. क्या देश को लम्बे समय तक काम करने वाले किसी ऐसे तंत्र की आवश्यकता नहीं है जो निरापद रूप से काम भी कर सके और सुप्रीम कोर्ट /हाई कोर्ट के साथ ही जनपद स्तर की अदालतों के लिए भी जजों की उपलब्धता सुनिश्चित कर सके ? जब देश में बहुत सारी अन्य सेवाओं के लिए एक अखिल सेवा का कैडर बनाया गया है तो क्या समय की यह मांग नहीं है कि अब न्यायिक सेवाओं के लिए कुछ ऐसे प्रयास भी किये जाएँ या इस मॉडल पर सोचने का काम शुरू किया जाये ? इस पूरी व्यवस्था को आमूल-चूल रूप में अचानक से नहीं बदला जा सकता है इसलिए इसके लिए एक अखिल भारतीय स्तर की सेवा का गठन करते हुए अगले दशक से उसको लागू करने के बारे में भी सोचा जा सकता है.
                        वर्तमान में किसी भी व्यवस्था को एकदम से सुधारने के स्थान पर उसके लिए सही मंच बनाकर प्रयास करने की आवश्यकता भी है. नया सिस्टम किस तरह से काम करने वाला है यह देखना भी आवश्यक है क्योंकि जब तक नए सिस्टम की कमियों को भी खुले तौर पर सुधारने के लिए न्यायपालिका और सरकार सामंजस्य नहीं कर पाएंगीं तब तक इस तरह की रस्साकशी चलती ही रहने वाली है. नया तंत्र जब तक पूरी तरह से काम करना शुरू नहीं करता है तब तक कम से कम इसी व्यवस्था को चलाते हुए जजों की संख्या को बढ़ाने के बारे में सोचा जाना चाहिए। व्यवस्था में इस तरह का बड़ा परिवर्तन लोगों पर भारी न पड़े इस बात का भी ध्यान रखने की आवश्यकता भी है क्योंकि आज जितनी संख्या में मुक़दमें कोर्टों के सामने हैं उन्हें जजों की कमी के साथ नहीं निपटाया जा सकता है. इसलिए आने वाले समय में जो भी व्यवस्था बने पर उसे पहले पुराने सिस्टम से कुछ प्रतिशत में नए जजों की नियुक्ति के बारे में भी काम किया जाना चाहिए। कांग्रेस द्वारा इस मुद्दे पर सरकार का और साथ न देने की घोषणा के बाद अब सरकार के लिए मामला संसद में और भी मुश्किल होने वाला है.

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