मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 1 June 2013

विजय कुमारी के १९ साल

                                   अलीगढ़ की विजय कुमारी को अपनी जिंदगी के महत्वपूर्ण १९ वर्ष जेल में सिर्फ इसलिए बिताने पड़े क्योंकि कोर्ट द्वारा ज़मानत मिल जाने के बाद भी उसके पास ५ हज़ार रूपये जमानत राशि के रूप में उपलब्ध नहीं थे इस घटना ने जहाँ के तरफ हमारी रोज़ ही मज़बूत और सक्रिय होती न्याय व्यवस्था पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है वहीं सरकारों और जेल विभाग के काम करने के तरीके पर भी ध्यान आकृष्ट किया है. पूरे मामले के इलाहाबाद हाई कोर्ट के संज्ञान में आने के बाद जहाँ कोर्ट ने प्रदेश सरकार से इस तरह के कैदियों का पूरा ब्यौरा तलब किया है जिससे उसे यह पता चल सके कि केवल धन उपलब्ध न हो पाने के कारण आख़िर कितने लोग प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद हैं और उनकी स्थिति और मुक़दमें की स्थिति देखने के बाद उस पर कुछ निर्णय भी लिया जा सके ? कोर्ट का काम केवल कानून के अनुसार सज़ा सुनाना और जुर्माना तय करना है पर इस मामले में जिस तरह से सरकारी रवैये और जेल विभाग की भूमिका सामने आई है वह पूरी तरह से मानवता के ही ख़िलाफ़ ही है.
                                       देश में न्यायालयों पर पहले से ही काम का बहुत दबाव है और जब तक कानूनी प्रक्रिया को पूरी तरह से सुधारने के प्रयास नहीं किये जाएंगें तब तक हर व्यक्ति को समय से न्याय नहीं मिल पायेगा सबसे दुःख की बात तो यह है कि पूरे देश में हर जगह कोर्ट की कमी का रोना रोया जाता है पर जब कुछ करने की बात होती है तो सरकारें कहीं से भी कुछ करती नहीं दिखाई देती हैं. आबादी के अनुसार जब तक न्यायालयों का गठन नहीं किया जायेगा तब तक किसी भी तरह से मानवीय मूल्यों की रक्षा कर पाना किसी भी कोर्ट के बस में नहीं है क्योंकि देश में न्याय विभाग का जो ढांचा आज़ादी के समय था आज भी कमोबेश हम उसी से काम चला रहे हैं. यह अच्छा ही हुआ कि कोर्ट ने इस मामले के साथ ही पूरे प्रदेश की स्थिति के बारे में जानकारी मांग ली है क्योंकि इससे उन लोगों को कम से कम जेल से बाहर निकलने में सहायता मिल सकती है जो केवल ज़मानत राशि न होने के कारण ही जेल में बंद हैं. सरकारें तो अपनी इस तरह की जिम्मेदारियों से हमेशा ही दूर भागती रहती हैं और उन्हें न्याय के दबाव में लाने के लिए अभी तक कोई अन्य उपाय किया भी नहीं जा सका है.
                                       देश में केंद्र और राज्य स्तर पर कानूनी अधिकार प्राप्त मानवाधिकार आयोग हमेशा से ही अस्तित्व में रहे हैं पर इस तरह के मामलों में आज तक इन्होने कोई संज्ञान क्यों नहीं लिया यह भी सोचने का विषय है क्योंकि केवल आर्थिक आधार पर एक गर्भवती महिला ने अपनी जिंदगी के १९ साल गँवा दिए और साथ ही इस महिला के ससुराल वालों पर भी मुक़दमा दर्ज किया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने उसे छुड़ाने के लिए आवश्यक धनराशि की व्यवस्था करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और उसे जेल में ही रहने दिया. इन लोगों के ख़िलाफ़ भी कोर्ट को अपराधिक मुक़दमा चलाना ही चाहिए क्योंकि इस मामले में वे भी कम दोषी नहीं हैं ? देश में आयोगों के बावजूद भी इस तरह की घटनाएँ होती ही रहती हैं तो इस समस्या से निपटने के लिए जेलों में बंद लोगों के लिए प्रति वर्ष इस तरह के सघन अभियान पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए जिससे आने वाले वर्षों में कोई इस तरह से केवल धन की कमी के कारण जेल की सलाखों के पीछे अपनी जिंदगी काटने के लिए मजबूर न हो जाए और जिस न्याय की अपेक्षा संविधान द्वारा की गयी है हम उसे आम लोगों तक पहुंचा पाने में सफल हो सकें.                  
  
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