मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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मंगलवार, 4 नवंबर 2014

१९८४ के दंगे और राजनीति

                                                                             इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जिस तरह से दिल्ली और देश के अन्य स्थानों पर सिखों पर हमले किये गए उसमें देश की सबसे जीवंत कौम पर बहुत ही बुरा असर पड़ा था और आज तक विभिन्न राजनैतिक लाभ लेने के कारणों से इस मुद्दे पर राजनीति किये जाने की कोशिशें बंद नहीं हो पायी हैं. ताज़ा मामले में जिस तरह से इस वर्ष ३० अक्टूबर को ही मोदी सरकार की तरफ से यह कहा गया कि हर दंगा पीड़ित को पांच लाख रूपये दिए जायेंगें उसका व्यापक रूप से स्वागत ही किया गया था क्योंकि किसी की भी कमी को रुपयों से तो पूरा नहीं किया जा सकता है फिर भी यदि पीड़ित और प्रभावी परिवार को कुछ आर्थिक सहायता मिल जाये तो वे अपने समाप्त हुए कारोबार को दोबारा शुरू करने की फिर से कोशिश तो शुरू कर ही सकते हैं पर इस मामले में सब कुछ इतना लम्बा और उबाऊ हो चुका है कि किसी भी परिस्थिति में अब वह मरहम का काम नहीं कर सकता है.
                                                                  ३० अक्टूबर को सरकार द्वारा की गयी घोषणा में वैसे तो कोई कमी और बुराई तो नहीं थी पर जिस तरह से दिल्ली की तीन सीटों और जम्मू कश्मीर, झारखण्ड विधान सभाओं के चुनाव के चलते आचार संहिता लागू हो चुकी थी तो इस तरह की घोषणा करने का मतलब पूरी तरह से राजनैतिक ही था. सरकार की तरफ से इस तरह कि संकेत मिलने के बाद चुनाव आयोग ने स्पष्टीकरण मांग लिया तो गृह मंत्रालय की तरफ से यह कहा गया कि इस मामले में केवल विचार चल रहा है और किसी भी तरह की घोषणा या अधिसूचना जारी नहीं की गयी है. इस तरह के जवाब से कानूनी तौर पर तो सरकार का बचाव हो गया है पर उसकी मंशा भी साफ़ ज़ाहिर हो गयी है कि उसने केवल चुनावी लाभ लेने के लिए ही इस तरह कि घोषणा की है. चुनाव आयोग की सक्रियता और सरकार को गलत टाइमिंग के कारण सिखों की इस समस्या को एक बार फिर से राजनीति में घसीट लिया गया है.
                                                                कांग्रेस के लिए यह मुद्दा सदैव ही संवेदनशील रहा है क्योंकि उस समय से आज तक उसके नेताओं पर दंगें भड़काने और दंगाइयों का साथ देने के आरोप लगते रहे है और दुर्भाग्य की बात यह भी है कि सबूतों के अभाव में अधिकांश लोग बचते ही जा रहे हैं. इस तरह के मामलों में साफ़ मंशा के साथ काम करने की आवश्यकता होती है कांग्रेस की दुविधा और कमज़ोर इच्छा शक्ति के कारण आज तक इस पर कुछ ठोस नहीं हो पाया है. इस स्थिति को सुधारने के स्थान पर भाजपा ने भी इस मुद्दे पर राजनीति को ही हवा दी है जिसे उचित नहीं कहा जा सकता है. भारत सरकार इन पीड़ितों के लिए जो कुछ भी कर सकती है या फिर करने की इच्छा रखती है उसे यह सब बिना किसी राजनीति के एक मज़बूत नीति के माध्यम से उसे लागू कर मामले को अब ख़त्म करने की तरफ बढ़ाना चाहिए जिससे पीड़ितों के घावों को बार बार कुरेदे जाने से बचा जा सके और उनकी वास्तविक सहायता भी की जा सके.     
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रविवार, 13 जुलाई 2014

पीएम की सुरक्षा और राजनीति

                                             अहमदाबाद में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे के मांगलिक कार्यों की तैयारियों के सम्बन्ध में जिस तरह से अख़बारों में ये सुर्खियां बनायीं जा रही हैं कि पीएम के वहां जाने के कार्यक्रम के चलते राजमार्ग का डिवाइडर तोड़ दिया गया है जो कि राजमार्ग प्रधिकरण के खिलाफ है उनका कोई मतलब नहीं बनता है क्योंकि अब देश के पीएम के रूप में नरेंद्र मोदी जहाँ कहीं भी जायेंगें तो उनकी सुरक्षा के मानकों को पूरा करने के लिए जो कुछ भी आवश्यक होगा उसे एसपीजी द्वारा अवश्य ही किया जाएगा. भारतीय पीएम के लिए जिस तरह से राष्ट्र प्रमुख होने के कारण सुरक्षा सम्बन्धी चिंताएं सदैव ही बनी रहती है उसमें अब किसी भी तरह की राजनीति नहीं की जानी चाहिए. किसी भी भीड़ भरे स्थान पर पीएम के आने जाने पर वैसे तो अघोषित रूप से रोक ही है पर आवश्यकता पड़ने पर आयोजित भी किये जाते रहते हैं जिससे उनके व्यक्तिगत सार्वजनिक जीवन को भी स्वतंत्र रखा जा सके.
                                            देश के पीएम की सुरक्षा के लिये कई बार दिल्ली में ही बड़े परिवर्तन किये जाते रहे हैं। लालकिले के आसपास जिस तरह से प्रतिवर्ष सड़कों को यातायात की आवश्यकतों के अनुरूप सुधारने की कोशिश की जाती है इस तरह से तो सड़कों में अस्थायी परिवर्तन को वहां पर भी अनुचित बताया जा सकता है. देश के अति महत्वपूर्ण लोग जिस स्थान पर एकत्रित हो रहे हों यदि वहां पर सुरक्षा के मद्दे नज़र इस तरह के बदलाव किये जाते है तो सुरक्षा सम्बन्धी कार्य की तरह मानकर इन पर समाचार नहीं बनाने चाहिए। देश में कुछ नया कर गुजरने की पत्रकारिता के चलते जिस तरह से हर मामले में खबर बनाने का जो चलन आज शुरू हो चुका है उससे अब पत्रकारों को दूरी बनाये जाने की आवश्यकता भी है. देश के पीएम की सुरक्षा के लिए पहले भी इस तरह के परिवर्तन किये जाते रहे हैं और इसके लिए अब आने वाले समय में इस तरह की खबरों का प्रकाशन बंद किया जाना चाहिए।
                                             मीडिया के सामने एक सबसे बड़ी दिक्कत यह भी है कि आज संभवतः वह नरेंद्र मोदी को गुजरात के सीएम से आगे कुछ नहीं मान पा रहा है और वैसे भी कई प्रदेशों में सुरक्षा सम्बन्धी चिंताओं के चलते सीएम की सुरक्षा भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। अब समय आ चुका है कि मीडिया अधिक ज़िम्मेदारी के साथ काम करे और पीएम की नीतियों का गुण दोष के आधार पर समर्थन या विरोध करे जिससे जनता को सरकार की नीतियों के बारे में सही जानकारी मिल सके. अभी तक जिस तरह से मीडिया का रुख सामान्य समय में आम तौर पर सरकारों के प्रति उदासीन सा ही रहा करता है अब उससे भी आगे बढ़ने की बहुत आवश्यकता है. अच्छा हो कि देश का मीडिया अब और भी अधिक जागरूक और ज़िम्मेदार हो तथा आने वाले समय में सरकार का सही आंकलन करे और इस तरह के छोटे मुद्दों पर सनसनीखेज रिपोर्टिंग बंद करे.

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बुधवार, 28 अगस्त 2013

संत होना और संत बनना

                             एक बार फिर से कथावाचक आसाराम पर एक लड़की ने अपने साथ यौन दुराचार के आरोप लगाये हैं और वे विवादों के घेरे में आ चुके हैं जबकि वे अपने को संत आसाराम और बापू कहलाना पसंद करते हैं. देश में जिस तरह से आम लोगों का संतों, ओझाओं और बाबाओं पर विश्वास बढ़ता जा रहा है उस परिस्थिति में इस तरह की घटनाएँ बहुत ही आम हो चुकी हैं क्योंकि जो भी व्यक्ति अपने परिवार की समस्या को लेकर इन कथित पाखंडियों के स्थान पर जाता है वह कहीं न कहीं से इनके मकड्जाल में उलझता भी जाता है और फिर उससे बाहर निकलने का कोई आसान रास्ता भी नहीं होता है जिस पर चलकर आम लोग इनके चंगुल से बच सकें ? हर व्यक्ति के सामने अपने परेशानियाँ और उलझनें होती हैं और उनसे बचने के लिए या सांसारिक समस्याओं से निपटने के लिए गुरु बनाने की भारतीय परंपरा सदियों से चली आ रही है पर आज के समय में जिस तरह से साधू और संतों के वेश में कुंठित लोग अपने कुंठाओं को निकालने का प्रयास करने लगे हैं वह समाज के लिए बहुत घातक है. इस सबसे बचने के लिए किसी के पास भी कोई समाधान हो ऐसा नहीं कहा जा सकता है.
                             देश में साधु संत और कथावाचकों का आज के बड़ा समूह बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि भौतिक युग की अपनी परेशानियों को कम करने के लिए और धर्म अनुरूप जीवन यापन न करने से मनुष्य के मस्तिष्क में जो उथल पुथल मची रहती है वह बड़ी मुश्किल से इन स्थानों पर जाने से ही कुछ हद तक शांत होती है. भारतीय संविधान ने देश में हर तरह के लोगों को पूरी छूट दे रखी है कि उससे अपने लिए चाहे जो भी मार्ग चुन लें और उसके अनुसार काम करते रहें पर आज इन कथित संतों और बाबाओं के लिए समस्या इस लिए भी आ रही है क्योंकि वे वास्तविक सातों के उस बड़े स्तर को भूलकर कुछ ऐसे कर्मों और चेष्टाओं में रूचि दिखाने लगे हैं जिनका कोई मतलब आज के समय में नहीं बनता है जिससे भोली भाली धर्म भीरु जनता भी आसानी से इनके बहकावे में आने लगी है फिर भी इसे रोकने का समाज के स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा पा रहा है. देश में कहीं न कहीं से इस तरह के आरोपों की बाते अक्सर ही सुनाई देती रहती हैं इसको रोकने की ज़िम्मेदारी केवल सरकार या प्रशासन पर कैसे डाली जा सकती है ?
                            चूंकि आरोप संतों के वेश में घूमने वाले और उनके जैसा आचरण करने वालों पर लग रहे हैं इसलिए आज यह सबसे अधिक आवश्यक है कि देश के उन प्रभावशाली संतों और धर्म प्रचारकों को इस बारे में कुछ सोचना चाहिए क्योंकि जब अखाडा परिषद् और अन्य समूहों के माध्यम से धार्मिक कार्यों में लगे हुए लोगों की पहचान की स्वीकृति दी जाती है तो संत समाज पर लगने वाले इस तरह के आरोपों के बारे में ही उन्हें ही सोचना होगा. आज संतों पर आरोप हैं तो उन्हें ही अपने में इस तरह के बदलाव लाने होंगें जिनसे उनके सम्मान में वृद्धि हो सके ? यदि संक्रमण के काल में संत चुप रहे तो आने वाले समय में उनके लिए और भी समस्या पैदा करने वाले लोग केवल वेश बदलकर पूरे संत समाज पर ऊँगली उठाने वालों को और अधिक अवसर देकर परेशानी में डालने का काम करते रहेंगें. जब कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में होता है तो उस पर पूरे समाज की नज़रें होती हैं इसलिए उन्हें ऐसी किसी भी हरक़त से अलग ही रहना चाहिए जिससे उन पर किसी को भी आरोप लगाने के अवसर मिल सकें ? आज आसाराम पर लगे इन आरोपों से कुछ लोग पूरे संत समाज पर ही दोषारोपण करने से बाज़ नहीं आ रहे हैं तो अब इससे बचने के लिए संतों को स्वयं ही आगे आकर पहल करनी होगी वर्ना उनकी मान मर्यादा पर आंच आती ही रहेगी.  
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सोमवार, 13 जून 2011

आन्दोलन की राजनीति

   अपनी अपनी ढपली और अपना अपना राग..... देश में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों में कुछ ऐसा ही दिखाई देने लगा है जिससे इस आन्दोलन की धार कुछ कम हो जाएगी और आने वाले समय में भ्रष्ट नेताओं को देश को लूटने के लिए कुछ और समय भी मिल जायेगा. अन्ना हजारे जैसे गाँधीवादी व्यक्ति के आन्दोलन से सरकार पर कुछ हद तक दबाव बना जिसके बाद सरकार ने भी लोकपाल बिल पर तेज़ी सकाम करने का मन बना लिया. अन्ना को मिले समर्थन के बारे में विचार करके ही बाबा रामदेव ने भी अपने को इस आन्दोलन में आगे करने के मकसद से दिल्ली के रामलीला मैदान पर अनशन शुरू किया. यह सही है कि योग गुरु ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश में अलख सी जगाई है अपर जिस तरह से उन्होंने सोचा था कि पूरा देश एकदम से उनके साथ आ जायेगा वैसा कुछ भी नहीं हुआ बल्कि इसी तरह के आन्दोलन के पुरोधा अन्ना ने भी बाबा से दूरी बना ली. बाबा से कहीं न कहीं इस पूरे मामले के राजनैतिक आंकलन में भारी भूल हो गयी जिस कारण से उन्हें यह दिन देखना पड़ा.
      अन्ना का काम केवल व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए ही हमेशा से होता रहा है क्योंकि उनके अन्दर गाँधी जी के विचार चलते रहते हैं पर बाबा ने जिस आक्रामकता के साथ अपने आन्दोलन को चलाया और बीच में ही उन्हें यह समझ में नहीं आया कि सरकार ने मांगें मान ली हैं तो फिर जिस बात के लिए अनशन चलाया जा रहा है उसे कैसे समाप्त किया जाये ? बाबा के मंच पर जिस तरह से भाजपा के लोगों का जमावड़ा हुआ उसने भी बाबा के प्रति देश कि सहानुभूति को कम कर दिया. देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि जिन लोगों को जहाँ होना चाहिए वे वहां पर न होकर दूसरे स्थानों पर दिखाई देते हैं. अन्ना का आन्दोलन स्वतः स्फूर्त था तो बाबा का पूरी तरह से प्रायोजित आन्दोलन. देश की जनता जब घाघ नेताओं की मंशा को भांप ली है तो वह बाबा के मन की कैसे नहीं जान पाती बस इसीलिए बाबा के साथ इस तरह से अन्याय होने पर भी देश में कुछ बहुत बड़ा नहीं हुआ. सार्वजनिक जीवन में अपने को बहुत ऊंचे आदर्शों के साथ प्रस्तुत करना होता है तभी जाकर सब ठीक हो पाता है. अन्ना ने यह सब बहुत दिनों की मेहनत के बाद हासिल किया है और उसे  बाबा कुछ दिनों में ही हासिल करना चाहते हैं. 
     केवल शिक्षा देने में कोई किसी भी तरह से दे सकता है पर जब किसी को समझाने और सार्वजनिक जीवन में लोगों के सामने अपने को साबित करने की बात होती है तो बहुत सामंजस्य की आवश्यकता होती है. इस पूरे प्रकरण में देश हार गया कोई अन्ना या रामदेव नहीं जीते बल्कि इस तरह के आयोजनों से देश के संसाधनों को लूटने वालों को और समय मिल गया ? इस बात का जवाब कौन देगा कि जब सरकार बहुत कुछ करने को राज़ी थी तब भी बाबा ने उसकी बात पर सहमति क्यों नहीं दिखाई ? और अब सरकार ख़ुद यह कह रही है कि जब उसने काले धन पर बाबा की बातें मान ली हैं तो फिर वे क्यों इस तरह के अनशन के लिए जिद पकड़े हुए थे ? आज आवश्यकता है कि इस मुद्दे पर जो लोग सरकार से बात कर रहे हैं वे करते रहें और सिविल सोसाइटी के लोगों को लोकपाल बिल बनाने के लिए नियमित बैठकों में जाना चाहिए क्योंकि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि ३० जून तक वो ड्राफ्ट बना लेगी अब यह हम पर है कि हम अपनी बात वहां रखने जाते हैं या नहीं ?      
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सोमवार, 31 जनवरी 2011

करमापा और पैसा...

                            जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत को अस्थिर करने के लिए चीन कभी भी कैसे भी कदम उठाने से नहीं चूकता है उसी कदम में ताज़ा प्रकरण करमापा लामा के रूप में देखा जा सकता है ? जिस तरह से अत्यधिक सुरक्षा वाली चीनी सीमा से पार होकर करमापा भारत आ गए थे तब भी कुछ लोगों को यह संदेह हुआ था कि आख़िर बिना चीन के सहयोग के कोई किस तरह से इधर आ सकता है ? अभी तक तो केवल यही चल रहा था कि पाक आतंकियों को इसी तरह से घुसपैठ करके भारत भेजता रहता था. करमापा को भारत ने जितना सम्मान दिया और अगर उसके बाद भी उन्होंने चीन के एजेंट की तरह ही काम किया होगा तो यह पूरे तिब्बत के लिए बहुत ही दुखद घटना होगी क्योंकि भारत ने अपना बहुत नुकसान हो जाने के बाद भी तिब्बत पर अपनी नीति से हटने से मना कर दिया था.
        भारत ने सदैव से ही अपने मेहमानों का खुले दिल से स्वागत किया है और इसमें हमारी तरफ़ से कोई कमी नहीं रखी जाती है. करमापा के तिब्बतियों के अध्यात्मिक गुरु होने के कारण भारत ने उन्हें भी पूरी सुविधाएँ और सहयोग प्रदान किया है पर जिस तरह से उनके यहाँ से करोड़ों रूपये की विदेशी मुद्रा की बरामदगी जारी है उससे कहीं न कहीं यह पैसा हवाला या अन्य माध्यमों से लाया लगता है उससे तो यही कहा जा सकता है कि कहीं न कहीं करमापा लामा की गतिविधियाँ संदिग्ध प्रतीत होने लगती हैं ? अब यह आवश्यक है कि इस मसले पर पूरी पारदर्शिता के साथ काम किया जाए क्योंकि यह मामला चीन से जुड़ा होने के कारण बहुत ही संवेदन शील हो चुका है और हिमाचल सरकार या केंद्र सरकार इसे केवल धार्मिक मुद्दा मानकर नहीं चल सकती है ? अब समय आ गया है कि इस तरह से चलने वाले किसी भी धार्मिक, सामाजिक या अन्य गतिविधियों के धन और दान पर पूरी नज़र रखने के लिए एक ठोस निगरानी तंत्र को विकसित किया जाए. भारतीय धर्म गुरु भी जिस तरह से पूरी दुनिया में घूमते रहते हैं उसके बाद उनके धन के लें दें पर निगरानी रखनी बहुत आवश्यक हो गयी है.
           यहाँ पर एक बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस प्रस्तावित कानून में सभी धर्मों को सामान रूप से शामिल किया जाए और यह आवश्यक किया जाए कि किसी भी स्थान पर किसी भी केंद्र को जितना भी धन कहीं से भी मिल रहा है उसका पूरा हिसाब रहा जाए ? किसी भी धर्म या किसी भी व्यक्ति को इसमें कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि जब कहीं पर भी अनावश्यक रूप से ढिलाई बरती जाती है तो ग़लत काम करने वाले उसी का इस्तेमाल करके अपना काम करने लग जाते हैं ? देश रहेगा तभी ये धर्म गुरु रह पायेंगें, सबसे ग़लत तो यह होता है कि कुछ धन के लालच में हमारे धर्म गुरु या अन्य केंद्र कानून से खेलने लगते हैं ? अब आवश्यकता है कि पूरी तरह से करमापा के सभी सूत्रों को जांचा परखा जाए क्योंकि कहीं से भी इनके किसी भी सूत्र से भारत को आने वाले समय में बहुत बड़ा ख़तरा हो सकता है ? कानून को अपना काम करने देना चाहिए और किसी को भी इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.    

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बुधवार, 24 मार्च 2010

भाजपा और स्वामी रामदेव

भाजपा ने जिस तरह से स्वामी रामदेव से अपील की है कि वे अपनी अलग पार्टी न बनायें उससे तो यही लगता है कि मानसिक स्तर पर भाजपा ने यह मान लिया है कि उसके पास एक सीमित वोट बैंक ही है और इस नयी पार्टी से केवल उसका ही नुकसान होने वाला है. गडकरी ने जिस तरह से यह कहा कि इस पार्टी से केवल भाजपा का नुकसान और कांग्रेस का फायदा होने वाला है वह कहीं न कहीं उनकी हताशा ही दर्शाती है. इस देश में किसी को भी राजनैतिक दल बनाए का पूरा अधिकार है और इस बात से किसी को भी वंचित नहीं किया जा सकता है. भाजपा क्यों भूल जाती है कि इस देश की जनता ने उसको उत्तर प्रदेश समेत ४ राज्यों की बागडोर सौंप दी थी पर उस थाती को संभल पाने में भाजपा असफल रही उसने लोगों की आकांक्षाओं को पल्लवित तो किया पर उनको वास्तविकता के धरातल पर नहीं उतारा जिसके कारण उसकी दुर्दशा हुई. गुजरात,मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश  राज्य के नेता इतने ताकतवर निकले कि उन्होंने अपने दम पर वहां की जनता की परेशानियों को दूर करने की कोशिशें की जिसके फलस्वरूप उन्हें दूसरा अवसर भी मिला. केंद्र में कांग्रेस को दूसरा अवसर इसी विकास परक दृष्टि के करण ही मिला.
          आज के समय में भाजपा को केवल अपने तंत्र को सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि जनता देख चुकी है कि सत्ता मिलने पर भाजपा कांग्रेस का बहुत बुरा संस्करण साबित हुई थी. पार्टी को दूसरों की पार्टी पर ध्यान देने के बजाय अपनी कमियों पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि जब तक इन बातों पर ध्यान नहीं दिया जायेगा और दूसरों की सफलता से जला जायेगा तब तक कुछ भी सही होने वाला नहीं है. स्वामी रामदेव ने कभी यह नहीं कहा कि कोई एक पार्टी अच्छी या दूसरी ख़राब है, वे सदैव ही यह कहते रहे हैं कि हर पार्टी में बहुत अच्छे और बहुत बुरे लोग हैं. पता नहीं भाजपा क्यों अपने को हिन्दू वोटों का ठेकेदार मानती है ? आज के समय में जनता इन मुद्दों पर ज्यादा नहीं सोचना चाहती है क्योंकि उसके लिए रोज़ी रोटी का संकट है. धर्म किसी का भी व्यक्तिगत मामला हो सकता है पर उसके सहारे कोई दुकान बहुत दिनों तक नहीं चल सकती है. अच्छा हो कि देश के राजनैतिक दल इस बात को समझने का प्रयास करें और साथ ही यह भी देखें कि बात देश के विकास की हो, समाज के विकास की हो, पिछड़ों के विकास की हो.... तभी नए राजनैतिक दल नहीं बनेंगे और कम से कम स्वामी रामदेव जैसा प्रभावशाली व्यक्ति यदि व्यवस्था से संतुष्ट होगा तो वह सत्ता से दूर ही रहेगा. देश में पहले भी चाणक्य ने दिशा देने का काम किया है और आज भी यह काम देश के संत देश के गुरु बनकर कर सकते हैं.     

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