मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 28 August 2013

संत होना और संत बनना

                             एक बार फिर से कथावाचक आसाराम पर एक लड़की ने अपने साथ यौन दुराचार के आरोप लगाये हैं और वे विवादों के घेरे में आ चुके हैं जबकि वे अपने को संत आसाराम और बापू कहलाना पसंद करते हैं. देश में जिस तरह से आम लोगों का संतों, ओझाओं और बाबाओं पर विश्वास बढ़ता जा रहा है उस परिस्थिति में इस तरह की घटनाएँ बहुत ही आम हो चुकी हैं क्योंकि जो भी व्यक्ति अपने परिवार की समस्या को लेकर इन कथित पाखंडियों के स्थान पर जाता है वह कहीं न कहीं से इनके मकड्जाल में उलझता भी जाता है और फिर उससे बाहर निकलने का कोई आसान रास्ता भी नहीं होता है जिस पर चलकर आम लोग इनके चंगुल से बच सकें ? हर व्यक्ति के सामने अपने परेशानियाँ और उलझनें होती हैं और उनसे बचने के लिए या सांसारिक समस्याओं से निपटने के लिए गुरु बनाने की भारतीय परंपरा सदियों से चली आ रही है पर आज के समय में जिस तरह से साधू और संतों के वेश में कुंठित लोग अपने कुंठाओं को निकालने का प्रयास करने लगे हैं वह समाज के लिए बहुत घातक है. इस सबसे बचने के लिए किसी के पास भी कोई समाधान हो ऐसा नहीं कहा जा सकता है.
                             देश में साधु संत और कथावाचकों का आज के बड़ा समूह बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि भौतिक युग की अपनी परेशानियों को कम करने के लिए और धर्म अनुरूप जीवन यापन न करने से मनुष्य के मस्तिष्क में जो उथल पुथल मची रहती है वह बड़ी मुश्किल से इन स्थानों पर जाने से ही कुछ हद तक शांत होती है. भारतीय संविधान ने देश में हर तरह के लोगों को पूरी छूट दे रखी है कि उससे अपने लिए चाहे जो भी मार्ग चुन लें और उसके अनुसार काम करते रहें पर आज इन कथित संतों और बाबाओं के लिए समस्या इस लिए भी आ रही है क्योंकि वे वास्तविक सातों के उस बड़े स्तर को भूलकर कुछ ऐसे कर्मों और चेष्टाओं में रूचि दिखाने लगे हैं जिनका कोई मतलब आज के समय में नहीं बनता है जिससे भोली भाली धर्म भीरु जनता भी आसानी से इनके बहकावे में आने लगी है फिर भी इसे रोकने का समाज के स्तर पर कोई प्रयास नहीं किया जा पा रहा है. देश में कहीं न कहीं से इस तरह के आरोपों की बाते अक्सर ही सुनाई देती रहती हैं इसको रोकने की ज़िम्मेदारी केवल सरकार या प्रशासन पर कैसे डाली जा सकती है ?
                            चूंकि आरोप संतों के वेश में घूमने वाले और उनके जैसा आचरण करने वालों पर लग रहे हैं इसलिए आज यह सबसे अधिक आवश्यक है कि देश के उन प्रभावशाली संतों और धर्म प्रचारकों को इस बारे में कुछ सोचना चाहिए क्योंकि जब अखाडा परिषद् और अन्य समूहों के माध्यम से धार्मिक कार्यों में लगे हुए लोगों की पहचान की स्वीकृति दी जाती है तो संत समाज पर लगने वाले इस तरह के आरोपों के बारे में ही उन्हें ही सोचना होगा. आज संतों पर आरोप हैं तो उन्हें ही अपने में इस तरह के बदलाव लाने होंगें जिनसे उनके सम्मान में वृद्धि हो सके ? यदि संक्रमण के काल में संत चुप रहे तो आने वाले समय में उनके लिए और भी समस्या पैदा करने वाले लोग केवल वेश बदलकर पूरे संत समाज पर ऊँगली उठाने वालों को और अधिक अवसर देकर परेशानी में डालने का काम करते रहेंगें. जब कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में होता है तो उस पर पूरे समाज की नज़रें होती हैं इसलिए उन्हें ऐसी किसी भी हरक़त से अलग ही रहना चाहिए जिससे उन पर किसी को भी आरोप लगाने के अवसर मिल सकें ? आज आसाराम पर लगे इन आरोपों से कुछ लोग पूरे संत समाज पर ही दोषारोपण करने से बाज़ नहीं आ रहे हैं तो अब इससे बचने के लिए संतों को स्वयं ही आगे आकर पहल करनी होगी वर्ना उनकी मान मर्यादा पर आंच आती ही रहेगी.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

2 comments:

  1. संत आशा राम बापू जैसे भ्रष्ट संतों के बारे में तुलसी दास क्या कहते हैं , देखिये ! नीचे की चौपाइयों में ........
    खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥
    = दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं, परन्तु उनका कभी भंग न होने वाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता I
    * लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥
    उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥
    = जो (वेषधारी) ठग हैं, उन्हें भी अच्छा (साधु का सा) वेष बनाए देखकर वेष के प्रताप से जगत पूजता है, परन्तु एक न एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं, अंत तक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ I
    * किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
    = बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे जगत में जाम्बवान्‌ और हनुमान्‌जी का हुआ।
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    तुलसी मानस में (बालकाण्ड छठवें दोहे के बाद )

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  2. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें,सादर !!

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