मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 11 May 2013

आतंक का धार्मिक चेहरा ?

                                           यूपी में धर्म की राजनीति करने में लगी हुई सपा के लिए लखनऊ की विशेष अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश कल्पना मिश्रा ने अखिलेश सरकार की आतंकी घटनाओं में लिप्त और जेल में बंद आरोपियों के ख़िलाफ़ दर्ज़ किये गए मुक़दमों की वापसी के लिए दायर की गयी अर्ज़ी को खारिज़ कर दिया है उससे यही लगता है कि इस मसले में राज्य सरकार की मंशा अवश्य ही दोषियों को बचाने की रही है. जब मामला कोर्ट में विचाराधीन है और उसमें इतनी प्रगति हो चुकी है कि अंतिम साक्ष्य के रूप में केवल विवेचक की गवाही ही शेष है तो इस तरह से केवल राजनैतिक लाभ उठाने के लिए किए गए इस प्रयास को उचित कैसे ठहराया जा सकता है. कोर्ट ने यह भी कहा कि जिस तरह से मात्र राज्य सरकार की मंशा के कारण ही मुक़दमा वापस लेने की अर्ज़ी दी गयी है वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं भी है. इस मामले में शुरू में जैसा लगा रहा था कि अखिलेश आसानी से ये मुक़दमे वापस ले सकेंगें पर अब यह मामला और बड़ी अदालतों तक भी खिंच सकता है और इसमें हर जगह राज्य सरकार को मुंह की ही खानी पड़ेगी फिर भी अपने को मुसलमानों के नेता और पार्टी के रूप में स्थापित करने के लिए सपा इसे और भी आगे बढ़ने से नहीं चूकने वाली है.
                                          इस मामले में यदि राज्य सरकार को यह लगता है कि निर्दोष फँस रहे हैं तो वह इनके ख़िलाफ़ दायर किये गए मुक़दमों की तेज़ी से सुनवाई के लिए कोर्ट से अनुरोध कर सकती है और चूंकि राज्य से जुड़ा हुआ मामला है तो वह विवेचक को भी यह आदेश दे सकती है कि पूरे मामले में साक्ष्य आदि इकठ्ठा करने की प्रक्रिया को तेज़ी से और समयबद्ध तरीके से निपटाया जाए जिससे यदि किसी निर्दोष पर आरोप लग गए हैं तो कोर्ट उन्हें साक्ष्यों के आधार पर बरी कर सके ? केवल चुनावी लाभ के लिए इस तरह की हरकतें करने से कोई भी लाभ सपा को नहीं मिलने वाला है क्योंकि जब इसी तरह कभी किसी धार्मिक उन्मादी के शिकार उनके अपने या खुद वे हो जायेंगें तो इनके प्रति सारी सहानुभूति स्वतः ही ख़त्म हो जाएगी. सरकार को इस तरह की बेतुकी मंशा जताने और मुस्लिम युवाओं पर इन्हें झूठे आरोप साबित करने के स्थान पर मामलों के निपटारे में तेज़ी लानी चाहिए थी पर केवल मुस्लिम वोटों को हथियाने की राजनीति में कम से कम इस बार तो सपा को कोर्ट में पराजय ही मिली है पर उसके कुछ वोट भी पक्के हो गए हैं.
                              कोर्ट ने अपने आदेश में जिस तरह से पूरे मामले की समीक्षा करते हुए राज्य सरकार से यह भी पूछा है कि आतंकियों जिनके विरुद्ध काफी साक्ष्य मौजूद हैं उनको छोड़े से किस तरह से सामाजिक सद्भाव में बढ़ोत्तरी होगी और यह भी कहा है कि आतंकी का कोई धर्म नहीं होता उसका मक़सद केवल समाज में भय का माहौल पैदा करना होता है. केवल राज्य सरकार के कह देने से इस तरह के किसी भी गंभीर मामले में आरोपियों को नहीं छोड़ा जा सकता है क्योंकि जब तक उनके विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य हैं उन्हें कानूनन सज़ा भगतनी ही होगी. यदि न्यायालय केवल अर्ज़ी खारिज़ ही करता तो भी राज्य सरकार के लिए कम परेशानी होती पर जिस तरह से आदेश में कड़ी टिप्पड़ियाँ भी की गयी हैं उनके बाद तो अब सरकार के लिए अपनी न्याय दिलाने के लिए प्रयासरत रहने वाली छवि के बारे में फिर से सोचना पड़ेगा. अच्छा ही होगा कि सरकार तेज़ी से इन मुक़दमों को आगे बढ़ाये जिससे उनके अनुसार निर्दोषों को जेल में रहने से बचाया जा सके और दोषियों को कड़ी सजा दी जा सके. आख़िर क्या कारण है कि सरकारें मुस्लिम युवाओं में कट्टरपंथ की तरफ झुकाव को रोक पाने में नाकाम हो रही हैं और केवल मुसलमानों के तात्कालिक कल्याण की योजनाओं में ही उलझी हुई हैं ? देश में यह समस्या तब तक नहीं ख़त्म होगी जब तक मुसलमान अपने को वोट बैंक के रूप में संजोये रखेंगें और नेता उनका शोषण करने में पीछे नहीं रहेंगें.    
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