मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 10 May 2013

जल स्रोत संकट और परंपरा

                     
                                            इन जल स्रोतों की विवाह पर आवश्यकता पड़ने के कारण भी इनकी उचित देखरेख भी होती रहती थी और साथ ही इनके अस्तित्व पर भी कोई संकट नहीं मंडराता था पर आज स्थिति पूरी तरह से बदल चुकी है हम एक कथित विकसित और शिक्षित समाज की तरफ़ बढ़ रहे हैं पर साथ ही उन परम्पराओं को भूलते भी जा रहे हैं जो हमारे सामाजिक परिवेश के लिए नितांत आवश्यक थीं ? आज आधुनिकता के फेर में उलझे लोगों को इन प्रतीकात्मक पूजाओं में ढोंग या थोथी परंपरा की भी सोच दिखाई दे सकती है पर धरातल पर समाज को बचाने के लिए जिस तरह से जल स्रोतों को बचाए रखने की यह एक अघोषित मुहिम ही थी तो उसके बाद हो जाने का असर आज साफ़ दिखाई दे रहा है. आज किसी भी गाँव, कस्बे जनपद मुख्यालय तो क्या बड़े शहर में भी कुंएं नहीं बचे हैं जिससे गर्मी में आग लग जाने की घटना के समय हमारी जनशक्ति तो होती है पर आग बुझाने के लिए पानी ही उपलब्ध नहीं होता है और हम सरकार को आराम से अव्यवस्था के लिए कोसते रहते है पर इन स्रोतों को ख़त्म करने में हमारे लालच ने ही अधिक काम किया है क्योंकि इनको ख़त्म करके हमने उन मार्गो पर अतिक्रमण कर किया है तो दमकल की गाड़ियों के आने जाने के लिए ही थीं ?
                                      हर बात में सरकार की तरफ़ ऊँगली उठा देने में माहिर हमारा समाज आख़िर कब अपनी ग़लतियों को मानेगा क्योंकि पहले के समय में हर मोहल्ले में कुएं होते थे और हर घर में रस्सी और बाल्टी तो आवश्यकता पड़ने पर मोहल्ले के लोग ही किसी बाहरी सहायता के आने से पहले ही आग पर काबू पा लिया करते थे पर आज यह स्थिति पूरी तरह से उलट चुकी है क्योंकि दुर्व्यवस्था के कारण जब नागरिकों को पीने का पानी ही उपलब्ध नहीं हो पा रहा है तो उस स्थति में आग बुझाने के लिए स्थानीय निकायों से पानी की आशा करना कहाँ तक उचित है ? समय इतना बीत चुका है कि पानी के स्रोतों पर अवैध कब्ज़ा हो चुका है और लोगों में इनके प्रति जागरूकता भी समाप्त ही हो चुकी है जिससे भी यह संकट अधिक बढ़ गया है. आज भी विभिन्न तरह की सरकारी योजनाओं पर काम करते समय सरकार को बचे हुए जल स्रोतों के संरक्षण के साथ इस तरह के जलस्रोतों को फिर से बनाने के बारे में सोचना ही नहीं चाहती है जिससे भी मसला और भी कठिन होता जाता है. फिलहाल तो विवाह के समय पूजने के लिए हैंडपंप ही बचे हैं और किसी तरह परम्पराओं का निर्वहन किया जा रहा है.     
                        प्राचीन काल से भारतीय समाज में अपने आस पास के परिवेश के प्रति श्रद्धा भाव और उसे सहेजने की जो परंपरा चली आ रही है वह तो आज भी केवल परंपरा के रूप में ही जारी है पर जिस तरह से इन परम्पराओं के पीछे छिपी दूरगामी सोच के बारे में हमने सोचना ही बंद कर दिया है वह हमारे लिए एक बड़ी समस्या लेकर सामने आ रहा है. भारतीय समाज में विवाह के अवसर पर कुंआं पूजने की परंपरा रही है जिसमें वर को बारात लेकर जाने से पहले परिवार के साथ पास के कुंएं तक जाना होता था और वहां पर एक रस्म के तौर पर कुओं की पूजा की जाती थी पर आज भूमि की बढ़ती क़ीमतों ने जिस तरह से इन लावारिस पड़े जल स्रोतों पर अनधिकृत कब्ज़ा करने की नियति को बढ़ावा दिया उसके परिणाम स्वरुप ही आज शहरों तो क्या गांवों तक में इनका अस्तित्व समाप्त होने की कगार पर पहुँच चुका है. इसका दुष्परिणाम के रूप में जहाँ आज विवाह के समय इस परंपरा को निर्वाह करने के लिए स्रोत ही नहीं हैं तो हैंडपंप और बाल्टियों की पूजा करके काम चलाया जा रहा है ?
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