मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 12 May 2013

सीबीआई और सरकार

                कोयला घोटाले पर जिस तरह से कोर्ट के स्पष्ट आदेश की अवहेलना कर सरकार के लोगों और अधिकारियों ने इस रिपोर्ट को देखने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया उसके बाद यह तो तय ही हो गया था कि यह खुलासा होने पर कोर्ट इस मसले को आसानी से नहीं छोड़ेगी. अब जब इसी क्रम में कानून मंत्री को अपना पद छोड़ना पड़ा है और कोर्ट ने सरकार से एक शपथपत्र के रूप में यह स्पष्ट करने का आदेश भी दिया है कि वह बताए कि अब इस जांच एजेंसी को स्वतंत्र करने और इसका दुरूपयोग रोकने के लिए वह क्या क़दम उठाने जा रही है ? इन परिस्थितियों में जब केंद्र के पास अब कोई चारा शेष नहीं रह गया है तो उसने मंत्रियों के समूह के माध्यम से इस पूरे मसले पर विचार कर अपनी राय कोर्ट को बताने का फैसला भी किया है. इन परिस्थितियों में जब केंद्र सरकार एक साथ कई मुद्दों पर बुरी तरह से घिरी हुई है तो आने वाले समय में उसके पास सही दिशा में क़दम उठाने का अलावा कोई चारा भी शेष नहीं रह गया है.
                           आज के समय में देश में जो यह घातक प्रक्रिया शुरू हो गयी है कि हर महत्वपूर्ण काम के लिए कोर्ट को विधायिका पर दबाव बनाना पड़ता है जिससे संविधान की भावना को ठेस भी पहुँचती है उसके बारे में देश के नेताओं और राजनैतिक तंत्र द्वारा कुछ भी नहीं सोचा जा रहा है जिससे कोर्ट के पास काम का बोझ भी बढ़ रहा है और इसके साथ सरकारों की विश्वसनीयता भी देश की जनता के साथ पूरी दुनिया में घटती नज़र आती है. आख़िर वे कौन से कारण हैं जिनकी वजह से देश में सामान्य विधायी काम इतना पंगु हो चुका है और जनता की अरबों रूपये की कमाई को विधायिका के नाम पर इस तरह से बर्बाद क्यों किया जा रहा है ? बात यहाँ पर किसी दल विशेष की नहीं है क्योंकि लोकतंत्र में कोई स्थायी सत्ता पक्ष या विपक्ष नहीं हुआ करता है और उस स्थिति में सरकार चलाने का मौका सभी दलों के हाथों में आता ही रहता है फिर भी जो दल विपक्ष में बैठकर नैतिकता की बातें करते नज़र आते हैं वे ही सत्ता की चाभी हाथ में आते हैं उस नैतिकता को ताक पर रखने से नहीं चूकते हैं ? यह सत्ता का प्रभाव होता है या देश के पूरे राजनैतिक तंत्र को हर तरह से बचाए रखने कि जुगत जो किसी भी दिशा में सही काम नहीं आर पाती है.
                         आज केवल कहने के लिए ही देश में सर्वोच्च स्थान प्राप्त संसद जिस तरह से मूर्छा का शिकार हुई पड़ी है उस स्थिति में किसी भी तरह के राजनैतिक नेतृत्व से कुछ विशेष परिवर्तन की आशा नहीं की जा सकती है और जब तक नेताओं के पास देश को चलाने के लिए मज़बूत संविधान के साथ दृढ़ इच्छा शक्ति नहीं आ पायेगी तब तक देश में सुधार कैसे लाया जा सकेगा ? देश के सामान्य विधायी कामों में भी जिस तरह से कुछ लोग कोर्ट को घसीट लेते हैं उस स्थिति में क्या आज की विधायिका को अपनी कमजोरी पर विचार करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनके हर फैसले पर कोर्ट की राय हमेशा ही सामने आती रहती है फिर भी नेताओं की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता है ? क्या देश के अधिकारी इतने लचर हो गए हैं कि वे देश की आज की परिस्थितियों के अनुसार कोई सही काम भी नहीं कर सकते हैं ? संसद में रखे जाने वाले प्रस्तावित कानूनों में आख़िर इतना दम क्यों नहीं दिखता जो लम्बे समय तक देश को आगे बढ़ाने का काम कर सके शायद अब सीबीआई पर केंद्र से स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद सरकार के काम करने के तरीके में कोई अंतर आए पर बिना उसके देश की जनता तो अपने को ठगा ही महसूस करती है.
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