मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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मंगलवार, 3 नवंबर 2015

यूपी पंचायत चुनाव के परिणाम

                                                                               ज़्यादा आबादी के चलते देश की राजनीति में सबसे अहम स्थान रखने वाले यूपी में हुए पंचायती चुनावों के पहले स्तर में जिस तरह से बसपा को छोड़कर सभी दलों का प्रदर्शन आशानुरूप नहीं रहा है उससे भले ही किसी भी तरह का संकेत माना जाये पर एक बात तो तय ही है कि आने वाले समय में सत्तारूढ़ सपा और २०१७ में यूपी में मोदी के दम पर सरकार बनाने की सोच के साथ आगे बढ़ रही भाजपा के लिए मायावती ने खतरे की घंटी बजा ही दी है और इससे संभवतः प्रदेश की सबसे मज़बूत कैडर आधारित पार्टी होने के कारण उसके लिए विधान सभा चुनावों में बहुत कुछ हासिल करने का भी अवसर खुल जायेगा. आज भाजपा पर इस बात का अधिक दबाव बन चुका है कि वह २०१४ के लोकसभा चुनावों में किये गए अपने प्रदर्शन के अनुरूप कुछ पा कर दिखाए और प्रदेश में सत्ता संभाले तो वहीं अखिलेश यादव पर इस बात की दारोमदारी है कि वे भी अपने अस्तित्व को बचाये रखने का काम कर सकें. सपा का भविष्य चौपट करने में जिस तरह से बड़े सपाई नेता ही लगे हुए हैं उसके चलते भी सरकार की छवि बहुत प्रभावित हो रही है.
                 इस चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जो सामने आया है उस पर संभवतः अभी तक किसी की भी नज़र नहीं पड़ी है क्योंकि इस बार प्रदेश के ग्रामीण इलाकों ने भी जातिगत मुद्दों से कुछ हद तक आगे बढ़ते हुए युवाओं पर जितना भरोसा जताया है वह प्रदेश के इतिहास में पहली बार ही हुआ है और अब बुजुर्गों को जिस तरह से जनता ने स्पष्ट रूप से आराम करने की सलाह सी ही दे दी है कि अब उनको सक्रिय राजनीति से हटकर युवाओं के लिए स्थान खाली करना होगा तो यह विधान सभा चुनावों के लिए भी एक स्पष्ट सन्देश के रूप में भी देखा जा रहा है. ४५ वर्ष तक के युवाओं ने जिस तरह से प्रदेश की ६५% सीटों को कब्ज़े में लिया है वह देखने योग्य है और इनमें भी यदि ३५ वर्ष की सीमा देखी जाये तो वह ५०% से भी अधिक हो जाती है इसे जनता और युवा होते प्रदेश की मंशा ही समझा जाना चाहिए जिससे वे अपनी राजनैतिक पारी को शुरू करने के लिए पूरी तरह से तैयार भी हो सकें. आज देश युवाओं के हाथों में जाने को तैयार है पर संभवतः स्थापित नेता लोग इस मामले में कुछ भी सीखने के लिए तत्पर दिखाई नहीं दे रहे हैं.
                राजनीति में उम्र दराज़ लोगों के सदैव ही सक्रिय रहने से जहाँ युवाओं के अवसर कम हो जाते हैं वहीं नयी प्रतिभाओं को बाहर निकाल पाना भी मुश्किल हो जाता है इसलिए इसे प्रदेश का मूड समझते हुए अगले चुनावों में जो भी लोग इस पर ध्यान दे पायेंगें उनके लिए ही आगे बढ़ना और जीत हासिल करना आसान रहने वाला है. राजनीति के इस स्थायी होते युवा मंच की अनदेखी कर पाना अब किसी के बस की बात नहीं है. यूपी के सीएम अखिलेश को यदि आज भी मुलायम सिंह सरकार चलने की खुली छूट दे सकें तो वह निश्चित तौर पर सपा की गिरती हुई छवि को सँभालने में कारगर साबित हो सकते हैं पर अपनी पुरानी कमज़ोरियों को अपनी सियासती विरासत के रूप में अखिलेश को सौंपने का मन बनाये मुलायम उन्हें सपा की वह कार्यशैली अपनाने के लिए बाध्य करते हुए नज़र आते हैं जो आम जनता में सपा की छवि को करारा धक्का देने का काम करती रहती है. अखिलेश के प्रयास बेहतर और आज के समय के अनुरूप हैं पर पार्टी के विशेष तरीके से काम करने के कारण आज उनके पास भी परिणाम देने की अच्छी स्थिति नहीं दिखाई देती है.    
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सोमवार, 1 दिसंबर 2014

रोहतक छेड़छाड़- समाज और पंचायत

                                                                              रोहतक में एक बस में हुई छेड़छाड़ और उसके बाद लड़कियों द्वारा किये गए तीव्र प्रतिरोध के बाद जिस तरह से कानून को ताक पर रखने की कोशिशें शुरू की जा चुकी हैं उनका कोई मतलब नहीं बनता है. आम तौर पर किसी जगह इस तरह की घटना होने पर जन सामान्य इसमें उलझना नहीं चाहता है तथा कुल मिलकर लड़कियों को ही समझाने के प्रयास शुरू कर दिए जाते हैं उससे समाज में लड़कों के गलत बर्ताव के प्रति भी सहानुभूति रखने की मानसिकता का ही पता चलता है. अभी तक जिस तरह से इन लड़कियों ने अपने दम पर इन लड़कों से निपटने की कोशिश की थी अगर उसका विडिओ न बन जाता तो मामला सबके सामने नहीं आने पाता और लड़कों को बचाने में लगा हुआ समाज इस बात को आसानी से छिपा भी ले जाता पर इन लड़कियों के साथ ही इन अन्य महिला को छेड़ने के कारण उसने लड़कियों की हिम्मत भरी कोशिश को अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया जिससे मामला खुल गया और लड़कों की पहचान भी हो सकी.
                                                  इस घटना में आरोपियों की पहचान सामने आने के बाद जिस तरह से पंचायत का दखल इसमें बढ़ता ही जा रहा है और समाज के कमज़ोर वर्ग से आने वाली लड़कियों पर सामाजिक दबाव बनाया जा रहा है उसके बाद पुलिस का इसमें कितना रोल बचता है यह तो समय आने पर ही पता चल पायेगा पर महिलाओं पर पाबन्दी लगाने वाले समाज ने एक बार फिर से यह साबित कर ही दिया है कि उसके लिए आज भी जातीय बंधन उतने ही महत्वपूर्ण हैं. यदि मामला यहाँ पर उल्टा होता और लड़के समाज के कमज़ोर वर्ग के होते तथा लड़कियां उच्च वर्ग से होतीं तब भी क्या पंचायत इस तरह से ही अपने फैसले लेने की कोशिश कर पाती ? शायद नहीं क्योंकि तब उन्हें यह उनकी इज़्ज़त से जुड़ा हुआ मसला लगने लगता जिसमें शामिल लोगों को हर स्तर पर सजा दिलवाने की हर संभव कोशिश भी की जाती. समाज के इस दोहरे चरित्र के चलते ही आज इस तरह की घटनाओं के बारे में कोई कठोर कार्यवाही कर पाने में पूरा समाज ही फेल ही जाता है.
                                                            इन अभद्र लड़कों के परिवार वाले अब जिस तरह से लड़की के पिता पर दबाव बना रहे हैं तो क्या उन्हें पहले अपने लड़कों के व्यवहार के लिए खुद को ज़िम्मेदार नहीं मानना चाहिए ? एक सूचना के अनुसार को इन लड़कों का सेना में चयन हो चुका है और जल्दी ही ये वहां पर ज्वाइन भी करने वाले हैं और यदि इन पर यह आरोप लगा तो सेना में इनकी नियुक्ति पर भी ग्रहण लग जायेगा सिर्फ इस बात को लेकर ही अब जिस तरह का दबाव बनाया जा रहा है क्या उससे इन या इस तरह की मानसिकता वाले लड़कों को सुधारा जा सकता है ? आज देश के लिए जीने मरने की कसमें खाने को तैयार होने की कगार पर खड़े इस तरह की मानसिकता वाले लड़के यदि सेना में पहुँच जाते हैं तो इनके द्वारा अपनी पोस्टिंग के दौरान कहीं न कहीं सेना को भी शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है. सेना के लिए जिस अनुशासन की आवश्यकता होती है उसके पहले मानदंड में तो यह लड़के पूरी तरह से असफल ही हो चुके हैं अब लड़की के परिवार वाले भले ही इन्हें माफ़ कर दें पर सेना को इनके चयन को निरस्त किये जाने के बारे में स्पष्ट रूप से घोषणा कर ही देनी चाहिए.        
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शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014

राजस्थान - सरपंच और शिक्षा

                                                                             राजस्थान के पंचायती राज विभाग ने एक प्रस्ताव बनाकर सरकार को भेजा है जिसमें उनकी मंशा इस बार होने वाले पंचायती चुनावों में अशिक्षित लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने की है. यदि प्राथमिक तौर पर देखा जाये तो इस तरह के प्रस्ताव में कोई अनुचित बात नहीं पर वर्षों से गांवों की राजनीति में पूरा दखल रखने वाले अशिक्षित लोगों के लिए इसको स्वीकार कर पाना आसान भी नहीं होने वाला है. राज्य सरकार के लिए भी इस तरह का बड़ा बदलाव करना मुश्किल ही है क्योंकि गांवों में सबसे निचले स्तर पर पार्टी के लिए काम करने वाले इस छोटी लोकतान्त्रिक इकाई के नेता ही किसी भी पार्टी के लिए रीढ़ का काम करते हैं जो उन्हें विधान सभा और लोकसभा चुनावों के लिए समर्थन और सहयोग दिया करते हैं. इस स्थिति में राजस्थान सरकार के पास कड़े कदम उठाए जाने के सीमित विकल्प ही रह जाते हैं जिन पर विचार करके ही कोई कानूनी कदम उठाया जा सकता है.
                                                                    पंचायती राज विभाग का यह प्रस्ताव संविधान की भावना के अनुकूल भी है क्योंकि देश के आज़ाद होने के सातवें दशक में जब गांवों तक विकास की हर किरण पहुँचने लगी है तो आखिर शिक्षा को कैसे पीछे छोड़ा जा सकता है ? बेहतर हो कि इस बार के चुनावों में इसे लागू करने की कोशिश अवश्य की जाये क्योंकि पंचायती राज विभाग के अनुसार पंचायतों में वित्तीय अनियमितता के लगभग तीन हज़ार मामले लंबित हैं और इनमें से अधिकांश वे मामले हैं जिनमें सरपंचों के अशिक्षित होने के कारण उनके अंगूठा लगाने से पैदा हुए लगते हैं. आज विभिन्न परियोजनाओं के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारें करोड़ों रूपये ग्राम पंचायतों को दिया करते हैं तो उस स्थिति में आखिर इस तरह की धोखाधड़ी को रोकने के लिए सरकार के पास क्या विकल्प शेष बचते हैं यही सबसे बड़ी चुनौती है. सरकार इन नेताओं की अनदेखी भी नहीं कर सकती है क्योंकि पार्टी को चुनावों में इन नेताओं की आवश्यकता हर बार ही पड़ने वाली है.
                                                                  वैसे इस मामले में राजस्थान के पंचायती राज विभाग के अधिकारी बधाई के पात्र हैं कि उनकी नज़र गांवों के विकास में भ्रष्टाचार फ़ैलाने वाली सबसे बड़ी कमी की तरफ गयी है. सरकार के लिए यह फैसला मुश्किल भरा अवश्य है पर भले ही इस चुनाव से इसको पूरी तरह से लागू न किया जा सके परन्तु शिक्षा पर ध्यान देने का दबाव बनाये जाने की पहल करने की आवश्यकता तो इस बार महसूस होनी ही चाहिए. एक विकल्प यह हो सकता है कि इस बार चुनावों में अशिक्षितों को इस शर्त के साथ मैदान में आने दिया जाये कि वे अगले छह महीने यह एक वर्ष में साक्षर होने के साथ दो वर्षों में पढ़ना लिखना भी सीखेगें और इसमें विफल होने पर उनसे यह पद ले लिए जायेगा. दूसरा विकल्प यह भी हो सकता है कि इस बार कुछ छूट देकर अगले चुनावों से शैक्षिक योग्यता को भी अर्हता में शामिल कर दिया जाये क्योंकि जब तक शिक्षा पर इस तरह का दबाव नहीं बनाया जायेगा तब तक इस तरह से आगे आने वाले नेता अपने लिए कोई न कोई मार्ग खोजने में सफल ही रहने वाले हैं.        
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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

बिहार - आंकड़ें और विश्वसनीयता

                                                                          कैग की एक रिपोर्ट में बिहार के चार ज़िलों में सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या पर जिस तरह से बड़ी गड़बड़ी सामने आई है उससे यही पता चलता है कि ज़िले में बैठे शिक्षा विभाग के अधिकारी अपने काम को बढ़ाचढ़ा कर पेश करने के लिए कुछ भी करने से नहीं चूकते हैं ? गया, सीतामढी, खगडिया और किशनगंज में जिस तरह से इन विद्यालयों में बच्चों की संख्या दिखाई गयी वह पूरे मामले को उजागर करती हुई दिखती है क्योंकि इन ज़िलों में पढ़ने वाले कुल बच्चों की संख्या ज़िलों में बच्चों की कुल आबादी से भी अधिक पायी गयी है. इस मामले में अभी राज्य सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है पर यदि गौर से देखा जाये तो मिड डे मील और विभिन्न तरह की छात्रवृत्तियों से लाभ उठाने के चक्कर में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते शिक्षा विभाग के अधिकारी इस तरह के हेरफेर ग्राम प्रधानों के साथ मिलकर कमोबेश देश के हर ज़िले में किया करते हैं.
                                                                    आज भी देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों में जिस तरह से पूरी व्यवस्था बिगड़ी हुई दिखाई देती है उसे सुधारने के लिए सभी को मिलकर काम करने की आवश्यकता भी है क्योंकि शिक्षा विभाग अपने हितों को देखते हुए इस तरह की जालसाजी करता ही रहता है और जिन जिलों में भ्रष्ट अधिकारी होते हैं वहां पर इस तरह की घटनाएँ बहुत बड़ी संख्या में होती रहती हैं. आज भी देश में शिक्षा और विकास के उपलब्ध धन के आवंटन और धरातलीय क्रियान्वयन में बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है जिसका मुख्य कारण यही है कि केंद्र सरकार इन क्षेत्रों में बहुत अधिक धन आवंटित किया करती है और उनकी मॉनिटरिंग करने के लिए राज्यों को पूरी छूट दे दिया करती है. यदि केंद्रीय योजनाओं की समुचित निगरानी की व्यवस्था बनायीं जा सके तो इनमें व्याप्त भ्रष्टाचार को काफी हद तक रोका भी जा सकता है जिसके लिए राज्य सरकारों को केंद्र का पूरा सहयोग भी करना होगा.
                                                       अच्छा हो कि इस तरह की किसी भी योजना को बच्चों के स्तर से ही यूआईडी/ आधार से जोड़ दिया जाये जिससे यह आसानी से पता चल सकेगा कि किस स्तर पर कितनी गड़बड़ी की जा रही है और सही जानकारी होने के कारण सरकार को भी योजनाएं बनाने और उन्हें क्रियान्वित करने में बहुत सुविधा हो सकती है. सभी जानते हैं कि आज भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूल में बच्चों के फ़र्ज़ी दाखिले किये जाते हैं और वे बच्चे कभी भी इन विद्यालयों में पढ़ने नहीं जाते हैं और केवल स्थानीय स्तर पर उपलब्ध निजी विद्यालयों में ही पढ़ा करते हैं. इस तरह से जहाँ सरकार की योजनाओं को पलीता लगाने की पूरी संभावनाएं रहती हैं वहीं भ्रष्टाचार भी बढ़ता है क्योंकि केवल संख्या में हेरफेर कर बच्चों की विभिन्न तरह की छात्रवृत्तियों को भी दोहरे रूप में सरकार से ले लिया जाता है. एक ही बच्चे की सही मॉनिटरिंग होने की उचित व्यवस्था न होने के कारण ही आज अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता भी कई गुना बांटनी पड़ती हैं. इस पूरी व्यवस्था को बायोमीट्रिक सिस्टम पर चलाने से भ्रष्टाचार को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.  

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शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014

विकास की किरणें

                                आज़ादी मिलने के बाद से ही देश ने बहुत से क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है और आज देश के आगे बढ़ने की इच्छा शक्ति के साथ विज्ञान और तकनीक में महारत हासिल करने की तरफ बढ़ने से जहाँ हम विकास की आधुनिक ऊंचाइयों को छूने लगे हैं वहीं दूसरी तरफ कहीं न कहीं कुछ ऐसा अवश्य है जो हमारे तंत्र में इस तरह से विद्यमान है कि आज भी देश के दूर दराज़ के क्षेत्र अपने आप में विकास की मुख्य धारा से पूरी तरह कटे हुए हैं. ऐसा नहीं है कि इनके लिए देश के पास आज आवश्यक संसाधन विद्यमान नहीं हैं पर जिस स्तर पर हमारी योजनाओं को बनाने और क्रियान्वयन पर चर्चा होने के बाद काम शुरू होना चाहिए सम्भवतः हम उसमें अभी भी बहुत पिछड़े हुए हैं. बिहार के कैमूर ज़िले के अधौरा पहाड़ी और प्रखंड के बड़वान कलां और बड़वान खुर्द नामक दो गावों की पांच हज़ार की आबादी अपने आप में ही जिस तरह से सड़कों के मामले में पूरी तरह उपेक्षित थी उसका हल ग्रामीणों से अपने दम पर सड़क बनाकर निकाल लिया है क्योंकि अभी तक किसी भी सरकार को यहाँ तक सड़क पहुँचाने के बारे में सोचने का अवसर ही नहीं मिला था ?
                                 आखिर वे कौन से कारण है जो देश के समग्र विकास के ढांचे को तैयार करने में इस तरह से इतना पीछे रह जाते हैं कि लोगों की आवश्यकताओं पर भी विचार नहीं किया ज सकता है ? यह भी सम्भव है कि नेता या दल विशेष के पक्ष में मतदान करने के कारण अभी तक के सत्ताधारी दलों ने वहाँ के विकास से आँखें मूँद रखी हों और किसी भी स्तर पर जहाँ कुछ किया जा सकता था सब कुछ शांत सा ही रखने का प्रयास किया गया हो ? बिहार ही क्या आज भी देश के लगभग सभी राज्यों में दूर दराज़ के क्षेत्रों में आम लोगों को आवागमन के साधन भी उपलब्ध नहीं है और इस पर भी सबसे चिंताजनक बात यह भी है कि सरकार के संज्ञान में लाये जाने के बाद भी इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम उठाये नहीं जाते हैं जो कि देश के विकास में अवरोधक का काम किया करते हैं. इस परिस्थिति से निपटने के लिए लिए आखिर किस स्तर पर योजनाओं को बनाया जाये जिससे आने वाले समय में देश का कोई भी राज्य अपने यहाँ इस तरह के क्षेत्रों के साथ न दिखायी दे और देश के समग्र विकास को धरातल पर उतारा जा सके.
                                    कहने को तो प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को चलते हुए भी दशक से ऊपर हो चुका है पर क्या इस क्षेत्र या इस जैसे अन्य क्षेत्रों पर ज़िला, प्रखंड या ग्राम स्तर के अधिकारियों की नज़रें नहीं पड़ती हैं और वे कौन से कारण हैं जिनके चलते अभी तक इन क्षेत्रों के बारें में कुछ ठोस और सकारात्मक प्रयास नहीं किये जा सके हैं ? अच्छा हो कि पूरे देश में एक अभियान चलाकर प्रखंड और ज़िला स्तरीय अधिकारियों से एक निर्धारित समय सीमा में स्थलीय सत्यापन करने के बाद इस पर विचार किया जाये और यदि किसी भी गाँव तक संपर्क मार्ग भी नहीं हैं तो उस पर एक निश्चित अवधि में धनराशि का आवंटन करने के बाद निगरानी में लेकर काम को पूरा किया जाये. यदि किसी क्षेत्र में विकास की ये किरणे अभी तक नहीं पहुंची हैं तो उस स्थानीय लोगों की राय भी अवश्य ही लेनी चाहिए क्योंकि अपनी समस्याओं के सही तरह से निस्तारण के लिए उनके पास सम्भवतः अच्छे विकल्प भी हो सकते हैं ? विकास की ये किरणें सभी तक पहुंचे इसके लिए अब केवल योजना नहीं वरन योजनाओं के समय सीमा में पूरा नहीं होने पर दंडात्मक कार्यवाही पर विचार करने की बातें भी होनी चाहिए तभी देश सही मायने में विकास कर पायेगा.   
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गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कश्मीर और राजनीति

          जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने जिस तरह से आतंकियों को ललकारते हुए कहा है कि अगर उनमें दम है तो वे उन पर हमला करके दिखाएँ उससे यही लगता है कि राजनेता हमेशा से ही ज़मीनी हकीक़त को समझने में विफल हो जाते हैं या फिर उनमें इतनी इच्छा शक्ति ही नहीं होती है कि वे आम जनता के लिए कुछ ठोस कदम उठा सकें ? पिछले वर्ष हुए ग्राम सभाओं के चुनावों में जिस तरह से आम ग्रामीण कश्मीरी ने हिस्सा लिया और उत्साह पूर्वक चुनावों का सञ्चालन किया गया उसके बाद आतंकियों के लिए वहां पर आसानी से पैर जमाना मुश्किल होने लगा था. ग्रामीण विकास के जो किरण कभी भी कश्मीर के गांवों तक नहीं पहुंची थी उसके पहुँचने से आम लोगों को भी भारतीय नीतियों के बारे में जानकारी होने लगी थी. इस समस्या का समाधान करने के लिए आतंकियों ने दूर दराज़ के इलाक़ों में रहने वाले पंचों पर दबाव बनाकर उनसे इस्तीफ़े दिलवाने शुरू कर दिए जिससे पूरे देश और दुनिया में यह संदेश जाये कि कश्मीर में हालात वैसे नहीं है जैसा लोग सोचते हैं. इस पूरे मसले में कहीं न कहीं राज्य सरकार ही पूरी तरह से दोषी है क्योंकि इन चुनावों को एक वर्ष बीत जाने के बाद भी वह आम लोगों में इस विश्वास की बहाली नहीं कर पायी है कि वे उसकी सत्ता में सुरक्षित हैं. आम लोग चुनावों में भाग लेकर ही अपनी मंशा ज़ाहिर कर सकते थे और उन्होंने ठीक वैसा ही किया पर राज्य सरकार पूरी तरह से इन मसलों पर ध्यान देने के स्थान पर अन्य कामों में ही व्यस्त रही.
               उमर का यह कहना कि आतंकी उन पर हमला करके दिखाएँ एक तरह से बचकाना है क्योंकि एक राज्य सत्ता को इस तरह से कभी भी आतंकियों को ललकारना नहीं चाहिए पर इससे घाटी में उनकी पार्टी के वोट बढ़ते हैं इसलिए नेता कभी भी कुछ भी कह देते हैं. उन्हें भी पता है कि उच्च सुरक्षा में रहने के कारण उन पर हमला करना उतना आसान नहीं है जितना बिना सुरक्षा में रह रहे लोगों पर करना आसान होता है.अब इस मसले पर राज्य सरकार को सुरक्षा की चिंता हुई है और उसे लगने लगा है कि इन स्थानों पर सुरक्षा को बढ़ाये जाने की आवश्यकता है जिसके लिए १ अक्टूबर को एक बैठक भी बुलाई गयी है. पिछले वर्ष हालात के सामान्य होने और सुरक्षा बलों की अधिकता के कारण अपने वोट कटने के डर से यही उमर अब्दुल्लाह कह रहे थे कि घाटी से सुरक्षा बलों को वापस किया जाना चाहिए और कुछ इलाक़ों से सुरक्षा बलों को हटाया भी गया था. नेताओं को कभी भी सही स्थिति का कोई अंदाज़ा नहीं होता है पिछले वर्ष जिस तरह से केंद्र पर दबाव बनाया गया था और उसके बाद इसे प्रतिष्ठा का विषय भी बना लिया गया उसकी कश्मीर के परिप्रेक्ष्य में कोई आवश्यकता नहीं थी. सुरक्षा सम्बन्धी सभी फैसले लेने का अधिकार केवल एकीकृत कमान के पास ही होना चाहिए जो कि समय समय पर सुरक्षा स्थिति की समीक्षा करने के बाद ही कोई निर्णय लेने में सक्षम हो और उसका राज्य सरकार से कोई मतलब नहीं होना चाहिए.
            कश्मीर में आम लोग आतंकियों के तंत्र से ऊब चुके है इसलिए उन्होंने पंचायती चुनावों में इस आशा के साथ वोट डाले थे कि विकास की किरण उनके यहाँ तक भी पहुँच जाएगी पर नेताओं के स्वार्थों के कारण मुश्किल से जुटाई गयी इस शांति और साहस को गँवा देना अब कश्मीर की नियति बन चुकी है. कश्मीर में जिस भी जगह से सुरक्षा बलों को हटाया जाता है वहां पर आतंकी फिर से अपने मोड्यूल तैयार कर लेते हैं और हमारा ख़ुफ़िया तंत्र सोता ही रहता है ऐसी स्थिति में आख़िर कौन और किस तरह से वास्तविक स्थिति का आंकलन कर पायेगा ? अब आने वाले समय में सुरक्षा बलों को हटाने पर वहां पर सामजिक पुलिसिंग को बढ़ावा देना चाहिए और यह भी नागरिकों को बात देना चाहिए कि अगर उस इलाक़े में आतंकियों को दोबारा पनाह मिली तो पूरे क्षेत्र के लोगों को भी इसके लिए आर्थिक और सामजिक दंड दिया जायेगा जिससे आम लोग भी सुरक्षा चिंताओं से रूबरू हो सकते हैं. आम लोग भले ही आतंकियों से इत्तेफ़ाक रखते हों पर लगातार सुरक्षा बलों की पूछताछ और आतंकियों के दबाव में जीने के कारण आज वे भी खुली हवा में सांस लेना चाहते हैं. भारतीय कश्मीर में जिस तरह से सरकार आम लोगों के लिए चिंतित रहती है वैसा पाक के कब्ज़े वाले कश्मीर में नहीं है इसलिए आम लोगों की सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए केवल त्वरित लाभ के लिए अब कश्मीर में सक्रिय सभी राजनैतिक दलों को इस मुद्दे पर सहमत होना ही होगा वर्ना नेता तो सुरक्षित ही रहेंगें और आम जनता आतंकियों के दबाव में काम करती रहेगी.
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सोमवार, 31 जनवरी 2011

न्याय में देरी

                       केंद्र ने जिस तरह से न्याय सुधारों की वकालत की है उससे लगता है कि अगर सब कुछ ठीक रहा और दृढ़ इच्छा शक्ति बनी रही तो हो सकता है कि आने वाले समय में देश में न्याय व्यवस्था को पूरी तरह से पटरी पर लाने में कुछ किया जा सके. अभी तक जिस तरह से भारी भीड़ के चलते न्याय में देरी होना आम बात हो चुकी है उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि अगर पूरी न्याय व्यवस्था में सुधार को तेज़ी से लागू किया जाए तो बात बन सकती है पर केवल कुछ कदम उठाने से कुछ भी नहीं हो सकता है क्योंकि जब तक सही न्याय लोगों को नहीं मिलेगा तब तक लोग आगे की अदालतों के चक्कर काटने के लिए मजबूर होते रहेंगें जिससे बड़ी अदालतों में भी काम का बोझ बहुत बढ़ता रहेगा ?
             आज के समय में सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि तहसील मुख्यालयों पर ही छोटे विवादों का समयबद्ध तरीके से निपटारा करने की प्रक्रिया अपनाई जाए जिससे लोगों को सही और त्वरित न्याय मिल सके. अभी तक जिस तरह से हर जिले में न्यायाधीशों के बहुत सारे पद खाली पड़े रहते हैं और उनको देखते हुए नए मुक़दमों के अम्बार लगते चले जाते हैं ? इन सभी को कोई जादू की छड़ी से नहीं निपटाया जा सकता है जिससे न्याय में और भी देरी होती चली जाती है. ग्राम स्तर पर पुरानी सरपंच की परंपरा को फिर से जीवित करने की आवश्यकता है जिससे छोटे मोटे विवाद वहीं पर निपटाए जा सकें और अदालतों में आने वाले कुछ केस का हो सकें क्योंकि जब तक नए विवादों को पनपने से नहीं रोका जायेगा तब तक कोई भी इस क्षेत्र में अच्छे से सुधारों के बारे में कुछ नहीं कर पायेगा.
               अब समय है कि केवल बातें करने के स्थान पर देश की विधायिका न्यायपालिका के सहयोग से कुछ ऐसा करने की ठोस कोशिशें की जाएँ जिससे वास्तव में लोगों को राहत मिल सके. कहीं पर भी ऐसा कुछ होता अभी तक नहीं दिखाई देता है ? फिर भी केंद्र सरकार जिस तरह से वर्षों पुरानी नीतियों की समीक्षा कर रही है और आज के अनुसार उनको फिर से तर्क संगत बनाने का काम भी किया जा रहा है वह देश के आने वाले समय के लिए बहुत अच्छी साबित हो सकती है पर इस पूरे मामले में जिस तेज़ी के साथ और कठोरता के साथ कदम उठाये जाने चाहिए पर शायद अभी वह कहीं दूर की कौड़ी ही लगती है. फिर भी कहीं से कोई शुरू तो कर रहा है वह देश के लिए इसे ही एक अच्छा संकेत माना जा सकता है.              

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सोमवार, 9 अगस्त 2010

उत्तर प्रदेश में जाति वाद को हवा...

कान्यकुब्ज ब्राह्मणों की उत्पत्ति स्थल कन्नौज आज कल फिर से जाति बिरादरी के चक्कर में एक बार विवादों के घेरे में है. उत्तर प्रदेश की मध्याह्न भोजन योजना के तहत दलित रसोइयों की नियुक्ति के एक आदेश ने बिना बात के ही पूरे समाज में बखेड़ा खड़ा कर दिया है. जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारे देश में जातियां आज भी बहुत महत्वपूर्ण हैं और गाँवों में बहुत सारे विवाद केवल इसी कारण से होते रहते हैं. एक छोटी सी बात जिसके कारण उस सरकार को घुटने टेकते हुए अपने इस विवादित हो गए आदेश को चुप चाप वापस लेना पड़ा जो सर्व जन की बातें करते नहीं थकती है ? अच्छा होता कि इस तरह से बल पूर्वक काम करने के स्थान पर लोगों को छुआ छूत को लेकर समझाने का प्रयास किया जाना चाहिए था. पर वोटों का लालच और सरकारी मशीनरी का दबाव कुछ इस तरह से काम करने लगता है कि किसी के लिए भी सही गलत में फैसला करना कठिन हो जाता है. सरकारें एक तरफ तो खुद ही जाति वाद को बढ़ावा देने में लगी हों हैं और दूसरी तरफ वे जाति गत भावना को ख़त्म भी करना चाहती हैं ? एक तरफ सभी दलों को जाति आधारित जनगणना बहुत बड़ी ज़रुरत महसूस होती है तो दूसरी तरफ वे सामाजिक सद्भाव बढ़ने की बातें भी करने से नहीं चूकते हैं ?
         यह सही है कि जाती विद्वेष की जो जड़ें समाज में बहुत गहरे तक घुसी हुई हैं उनको इतनी आसानी से नहीं बदला जा सकता है फिर भी कहीं न कहीं से कुछ ऐसे प्रयास किये जा सकते हैं जो लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने का काम तो कर ही सकें ? माया सरकार ने यह काम केवल दलितों के वोट इकठ्ठा रखने के लिए किया था पर जब उसे यह लगने लगा कि जितने दलित वोट उनके खाते में जुड़ नहीं रहे हैं उससे अधिक तो कटे जा रहे है तो आनन् फानन में इस अध्यादेश को वापस ले लिया गया. पता नहीं देश के नेताओं के पास आज भी मुद्दों की इतनी कमी क्यों है कि वे बार बार अपने स्तर से इस छुआ छूत के खेल को खेलकर अपने वोट बढ़ाना चाहते हैं ? यह भी सही है कि कहीं न कहीं किसी न किसी स्तर पर सामाजिक भेद की गहरी खाई अब धीरे धीरे अपनी गहराई खोती जा रही है पर इस तरह के किसी भी फैसले से जहाँ ऊंची जातियों को अपने को अच्छा और बड़ा दिखाने का अवसर मिल जाता है वहीं कमज़ोर तबकों को एक बार फिर से उन्हीं ज़ख्मों को सहलाना पड़ता है जिनके कारण वे आज भी समाज में पूरे मन से स्वीकारे नहीं जा सके हैं ?
           पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा का जाति और गोत्र का विवाद अभी भी नहीं रुक पाया है और जब से इस सारे मामले में नेताओं ने अपनी टांग अड़ा दी है तबसे ही अपनी मर्यादा की रक्षा करने के पीछे जैसे लोगों में पागलपन सवार हो गया है और आनर किलिंग के मामलों में अचानक जैसे बाढ़ आ गयी है ? अच्छा होगा कि इस तरह के सामाजिक ढांचे को अपने आप ही ढहने दिया जाये और इस मामले में नेता न ही पड़ें तभी सभी का कल्याण है ? अगर कहीं पर भी किसी तरह की ज़बरदस्ती करके कुछ भी करने का प्रयास किया जायेगा तो उसका उल्टा असर ही पूरे समाज पर देखने को मिलेगा. देश आज अन्तरिक्ष की तरफ देख रहा है तो कुछ नेता लोग आज भी अपने हितों के इए इस तरह के मामलों को हवा देकर पूरी दुनिया में भारत का नाम ख़राब करने में लगे हैं.        


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शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

पंचायत के फरमान..

अपनी सामाजिक समझ और फैसले के लिए हमेशा ही विवादित रहने वाली एक और घटना ने हरियाणा में एक और युवक को मौत की नींद सुला दिया और यह घटना तब हुई जब पुलिस वेदपाल को लेकर उसकी ससुराल से उसकी बीवी सोनिया को विदा कराने गई थी। गोत्र का विवाद कितनी आसानी से किसी की जान सिर्फ़ इसलिए ही ले लेता है क्योंकि उसने किसी मान्यता का उल्लंघन किया। वेदपाल का कसूर सिर्फ़ इतना ही तो था की वह सोनिया के साथ ही रहना चाहता था। अब यह देखना है कि जींद पुलिस जो कि पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के एक आदेश के अनुपालन में वेदपाल को लेकर सिंहवाला गाँव गई थी इस घटना में क्या बहाने बाज़ी करती है क्योंकि पुलिस के पास तो हर मामले का तोड़ मौजूद रहता है ? जब मामला इतना संवेदन शील था तो पुलिस ने इतनी लापरवाही कैसे बरती कि वेदपाल की जान ही चली गई ? आज देश में इस तरह से अपने आप ही कानून को हाथ में लेने की घटनाएँ तेज़ी से बढती जा रही हैं यहाँ तक न्यायालय के आदेशों का अनुपालन किस तरह से कराया जा रहा है यह भी चिंता का विषय है। गोत्र एक स्थापित मानी परम्परा है जिसका सभी को पालन करना चाहिए और खास तौर पर वहां जहाँ इसका बहुत ध्यान रखा जाता है। वैज्ञानिक आधार पर भी समान गोत्र के लोगों के परिवार कहीं न कहीं से आपस में जुड़े होते हैं और एक ही परिवार में शादियाँ होने से आनुवांशिक रोगों के बहुत ज़्यादा बढ़ने की सम्भावना होती है। परन्तु आजकल जिस तरह से पढ़े लिखे युवक युवती इस परम्परा का उल्लंघन कर रहे हैं वह तो यही बताता है कि इस के पीछे छिपे हुए वैज्ञानिक आधार का प्रचार-प्रसार नहीं किया जाता है। पंचायतें बहुत आसानी से किसी को कोई हुक्म सुना देती हैं पर जब बात गोत्र की शादियों की होती है तो वे समाज को जागरूक करने के लिए क्या करती हैं यह हम सभी जानते हैं ? आज समय है कि इन बातों को वैज्ञानिक आधार पर समझाया जाए न कि केवल गोत्र खाप के आधार पर क्योंकि जब बात प्रेमियों के बीच की होती है तो वे बहुत आसानी से बगावत पर उतर आते हैं। और हम सभी जानते हैं कि बगावतें अधिकतर रिसती हुई संवेदनाएं छोड़ जाती हैं। आज बड़ों को भी समझना होगा कि बच्चे इन बातों की बुराइयों को समझें और बच्चों को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि पूरे क्षेत्र में तनाव फैलाने वाले इस तरह के कामों से दूर ही रहें।
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...