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Thursday, 17 July 2014

बिहार - आंकड़ें और विश्वसनीयता

                                                                          कैग की एक रिपोर्ट में बिहार के चार ज़िलों में सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या पर जिस तरह से बड़ी गड़बड़ी सामने आई है उससे यही पता चलता है कि ज़िले में बैठे शिक्षा विभाग के अधिकारी अपने काम को बढ़ाचढ़ा कर पेश करने के लिए कुछ भी करने से नहीं चूकते हैं ? गया, सीतामढी, खगडिया और किशनगंज में जिस तरह से इन विद्यालयों में बच्चों की संख्या दिखाई गयी वह पूरे मामले को उजागर करती हुई दिखती है क्योंकि इन ज़िलों में पढ़ने वाले कुल बच्चों की संख्या ज़िलों में बच्चों की कुल आबादी से भी अधिक पायी गयी है. इस मामले में अभी राज्य सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है पर यदि गौर से देखा जाये तो मिड डे मील और विभिन्न तरह की छात्रवृत्तियों से लाभ उठाने के चक्कर में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते शिक्षा विभाग के अधिकारी इस तरह के हेरफेर ग्राम प्रधानों के साथ मिलकर कमोबेश देश के हर ज़िले में किया करते हैं.
                                                                    आज भी देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों में जिस तरह से पूरी व्यवस्था बिगड़ी हुई दिखाई देती है उसे सुधारने के लिए सभी को मिलकर काम करने की आवश्यकता भी है क्योंकि शिक्षा विभाग अपने हितों को देखते हुए इस तरह की जालसाजी करता ही रहता है और जिन जिलों में भ्रष्ट अधिकारी होते हैं वहां पर इस तरह की घटनाएँ बहुत बड़ी संख्या में होती रहती हैं. आज भी देश में शिक्षा और विकास के उपलब्ध धन के आवंटन और धरातलीय क्रियान्वयन में बहुत बड़ा अंतर दिखाई देता है जिसका मुख्य कारण यही है कि केंद्र सरकार इन क्षेत्रों में बहुत अधिक धन आवंटित किया करती है और उनकी मॉनिटरिंग करने के लिए राज्यों को पूरी छूट दे दिया करती है. यदि केंद्रीय योजनाओं की समुचित निगरानी की व्यवस्था बनायीं जा सके तो इनमें व्याप्त भ्रष्टाचार को काफी हद तक रोका भी जा सकता है जिसके लिए राज्य सरकारों को केंद्र का पूरा सहयोग भी करना होगा.
                                                       अच्छा हो कि इस तरह की किसी भी योजना को बच्चों के स्तर से ही यूआईडी/ आधार से जोड़ दिया जाये जिससे यह आसानी से पता चल सकेगा कि किस स्तर पर कितनी गड़बड़ी की जा रही है और सही जानकारी होने के कारण सरकार को भी योजनाएं बनाने और उन्हें क्रियान्वित करने में बहुत सुविधा हो सकती है. सभी जानते हैं कि आज भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूल में बच्चों के फ़र्ज़ी दाखिले किये जाते हैं और वे बच्चे कभी भी इन विद्यालयों में पढ़ने नहीं जाते हैं और केवल स्थानीय स्तर पर उपलब्ध निजी विद्यालयों में ही पढ़ा करते हैं. इस तरह से जहाँ सरकार की योजनाओं को पलीता लगाने की पूरी संभावनाएं रहती हैं वहीं भ्रष्टाचार भी बढ़ता है क्योंकि केवल संख्या में हेरफेर कर बच्चों की विभिन्न तरह की छात्रवृत्तियों को भी दोहरे रूप में सरकार से ले लिया जाता है. एक ही बच्चे की सही मॉनिटरिंग होने की उचित व्यवस्था न होने के कारण ही आज अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यकों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता भी कई गुना बांटनी पड़ती हैं. इस पूरी व्यवस्था को बायोमीट्रिक सिस्टम पर चलाने से भ्रष्टाचार को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.  

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