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Friday, 18 July 2014

बाल अपराधी और कानून

                                                     निर्भया कांड के बाद से ही देश में बाल अपराध कानून को लेकर छिड़ी हुई बहस अभी भी अपने अंतिम निर्णय तक नहीं पहुँच सकी है जिसके कारण देश में बाल अपराधियों की संख्या और उनके द्वारा किये जाने वाले अपराधों की संख्या में निरंतर बढ़ोत्तरी देखी जा रही है. इस बार सरकार ने बालिग की उम्र का निर्धारण करने के स्थान अपर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को यह अधिकार देने का मन बनाया है जिसमें वह यह तय कर सकेगा कि बाल अपराधी के खिलाफ सामान्य कोर्ट में मुकदमा चलाया जाये या उसे बाल अपराधी वाली तीन साल की कैद तक ही सीमित रखा जाये. इस मामले में महिला एवम बाल कल्याण मंत्रालय पूरे मंथन में लगा हुआ है और यह अच्छा है कि इसमें मेनका गांधी खुद मंत्री की हैसियत से जनता से सुझाव मंगाकर अधिक रूचि दिखा रही हैं जिससे निर्णय लेने में और सम्बंधित कानून में बदलाव के लिए सही ड्राफ्ट तैयार किया जा सकता है.
                                              देश में जिस तरह से बाल अपराधियों द्वारा महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ अपराधों में शामिल होने की घटनाओं में निरंतर वृद्धि होती जा रही है ऐसे में अब इस कानून में उचित संशोधन आवश्यक भी है क्योंकि कोर्ट के स्तर से नाबालिग की आयु को घटाने पर विपरीत निर्णय मिलने के बाद अब सरकार के पास कुछ संशोधन करने के अतिरिक्त कोई चारा भी शेष नहीं बचा है. देश के अंदर होने वाले इस तरह के अपराधों पर नियंत्रण करना तो आसान है पर जिस तरह से इस्लामिक चरमपंथियों द्वारा किशोरों के माध्यम से इस कानून का लाभ उठाते हुए आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा है तो उस स्थिति में अब इस कानून में आतंक से जुडी हुई कोई धारा अवश्य ही शामिल की जानी चाहिए जिससे इस कानून का दुरुपयोग करने से पहले आतंकी और बच्चों के घर वाले भी सोचने को विवश हो जाएँ. अभी तक कानून की छूट का लाभ उठाकर देश विरोधी कामों को अंजाम दने की कोशिशें भी चल रही हैं.
                                              सरकार द्वारा आज के परिदृश्य में जिस तरह से यह प्रावधान किया जा रहा है कि किशोर न्याय बोर्ड ही यह तय करेगा तो उसमें भी कई स्तरों पर विवाद होने की संभावनाएं देखी जा रही हैं क्योंकि जब कानून की तरफ से इस बात की छूट मिल जाएगी तो कोई भी उसका लाभ नहीं उठा पायेगा पर किसी परिस्थिति में नेताओं द्वारा बोर्ड पर दबाव बनाकर दोषियों पर बाल अपराध के तहत कार्यवाही करने का दबाव बनाया भी जा सकता है. वैसे जो कुछ भी हो इस तरह के प्रारंभिक परिवर्तनों की तरफ सरकार को आगे बढ़ने में देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि जब तक पूरे मामले से एक चरणबद्ध तरीके से निपटना शुरू नहीं किया जायेगा तब तक बाल अधिकारों के पैरोकार इसमें कोई बड़ा परिवर्तन एकदम से नहीं करने देने वाले हैं. बाल अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए पर इसके पीछे छिपकर अपराध करने वाले और आतंकियों को कड़े सबक सीखना बहुत आवश्यक भी है अब यह समझना भी ज़रूरी है.      
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