मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 4 August 2015

नगा शांति समझौता

                                           लम्बे समय से चली आ रही नगा विद्रोहियों की समस्या से निपटने के लिए जिस तरह से अजीत डोभाल की पहल पर केंद्र सरकार ने एनएससीएन (आईएम) गुट के साथ एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं उनके चलते आशा की जा सकती है कि आने वाले समय में देश के पूर्वोत्तर भागों में सुरक्षा बलों के लिए चिंताएं कम हो जायेंगीं तथा भटके हुए नगा लोगों को भी राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल किया जा सकेगा. नगा समस्या लम्बे समय से केंद्र और राज्य सरकारों के साथ म्यांमार और बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों पर लगातार प्रभाव डाल रही थी क्योंकि कई बार इसके विद्रोही हमले को अंजाम देने के बाद चुपके से पडोसी देशों में बनाये गए अपने अड्डों पर छिप जाया करते थे या इनके बड़े नेता पडोसी देशों में रहकर ही अपने हितों को साधने के लिए निर्देश दिया करते थे जिससे चाहकर भी भारत सरकार और सुरक्षा बल सही कार्यवाही नहीं कर पाते थे.इस दिशा में नरसिंह राव के समय शुरू किये गए प्रयासों को अटल सरकार के साथ मनमोहन सरकार ने भी जारी रखा आज जिसकी परिणीति के रुप में यह समझौता हो पाया है.
                                      इस समझौते के होने के बाद उन परिस्थितियों पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है जिनके चलते हमारे देश के कुछ लोग देश की व्यवस्था के खिलाफ हथियार उठकर खड़े हो गए थे क्योंकि जब तक समस्या की जड़ पर ध्यान देकर उससे निपटने का विचार नहीं किया जायेगा तब तक इसे किसी एक प्रभावशाली गुट के साथ समझौता करके समाप्त नहीं किया जा सकता है. आज भी नागाओं के अन्य छोटे गुट भी सक्रिय हैं और निश्चित तौर पर सरकार उनको भी इसी दिशा में लाने के प्रयास कर सकती है क्योंकि किसी एक के भी विद्रोही बने रहने से वह विचारधारा समाप्त नहीं हो सकती है जिससे इस स्थानीय उग्रवाद का जन्म हुआ था. अच्छा हो कि इस समझौते के पहलुओं को सार्वजनिक किया जाये और संसद से भी इसकी मंजूरी ली जाये जिससे आने वाले समय में किसी भी सरकार के लिए इसका अनुपालन करना एक दायित्व के रूप में ही लिया जाये. सरकारें बदलने के साथ जिस तरह से देश की प्राथमिकताएं भी बदल जाती हैं इस मामले में उससे गंभीरता से बचने की आावश्यकता भी है क्योंकि वैसी स्थिति में किसी भी मुद्दे पर अचानक से ही कोई फिर विद्रोही तेवर भी अपना सकता है.
                                       दिल्ली में समझौते के होने और धरातल पर उसके क्रियान्वयन में बहुत बड़ा अंतर होता है नगाओं को जिस तरह से अपनी जमीन और जंगलों का अधिकार चाहिए क्या सरकार उसे देने के लिए तैयार हो गयी है क्योंकि मोदी सरकार जिस तरह से उद्योगपतियों को रिझाने के लिए हर काम करने के लिए एक वर्ष से प्रयासरत है क्या वह नगाओं की मंशा के अनुरूप कहा जा सकता है ? आज जिस लैंड बिल को लेकर हंगामा हो रहा है क्या उसका दुष्प्रभाव नगालैंड पर नहीं पड़ेगा या फिर सरकार किस तरह से वहां के लोगों को यह विश्वास दिला पायेगी कि अब उनके साथ भविष्य में कुछ भी गलत नहीं होगा ? देश में पहले भी केंद्र और विद्रोहियों के बीच समझौते हुए हैं पर कई बार अविश्वास ने पूरे माहौल को बिगाड़ कर ही रख दिया है इसलिए उन पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए केवल समझौता होने को ही विजय के रूप में नहीं लेना चाहिए बल्कि नगाओं से जो भी वायदे किये गए हैं उनको देश के सामने लाते हुए पूरा करने की समय सीमा निर्धारित करते हुए आगे बढ़ना चाहिए. इस समझौते को एक अवसर के रूप में लेने की कोशिश करनी चाहिए जिससे पूरे माहौल को सुधारने और इस बेहद सुन्दर क्षेत्र में पर्यटन आदि को बढ़ावा देकर स्थानीय लोगों को भी उससे जोड़ने की कोशिशें शुरू करनी चाहिए.       
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