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Monday, 3 August 2015

पेट्रोलियम पदार्थों का मूल्य निर्धारण

                                                                     जनता के द्वारा चुनी हुई जनता की सरकारें किस तरह से काम किया करती हैं इसका ताज़ा उदाहरण पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को देखकर ही लगाया जा सकता है अगस्त माह के नए मूल्य के बाद कई राज्यों में इनके मूल्य से अधिक विभिन्न तरह के टैक्स लग चुके हैं और कोई भी सरकार इस दिशा में सोचना ही नहीं चाहती है जिससे आम लोगों को इस बड़ी कटौती का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है क्योंकि सरकारें अपने अनाप-शनाप खर्चों को पूरा करने के लिए इन पर भी उसी तरह एक तरफ़ा काम करती जा रही हैं जैसा कि शराब के विषय में भी दिखाई देता है. शराब एक व्यसन है पर पेट्रोलियम पदार्थों का उपयोग एक आवश्यकता पर संभवतः सरकारों को देश की जनता के इन सरोकारों से कोई मतलब ही नहीं है जिससे उसके घरेलू बजट पर कोई दूरगामी और स्थायी प्रभाव पड़ सके. मूल्य निर्धारण पूरी तरह केंद्र सरकार के हाथों में और करों की संरचना का बड़ा हिस्सा राज्यों को मिलने के कारण आज किसी भी दल की कोई भी सरकार जनता से जुड़े हुए इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार ही नहीं करना चाहती हैं क्योंकि सभी को इसके माध्यम से अपने खजाने भरे जाने और बजटीय घाटे को नियंत्रित किये जाने की ही सूझती रहती है.
                                           यदि उदाहरण के तौर पर दिल्ली में वास्तविक मूल्य और करों की संरचना कर गौर किया जाये तो दिल्ली में पेट्रोल की कीमत ६४.४७ रु० है जिसमें सरकारी कंपनी की रिफाइनरी से खरीद मात्र २९.४१ रु० पर की जाती है तथा डीलर से वसूली जाने वाली कीमत ३१.८२ रु० होती है अब यदि इस पर शुल्कों की बात की जाए तो
उत्पाद शुल्क १७.४६ रु०, डीलर कमीशन २.३० रु० और दिल्ली का वैट १२.८९ रु मिलकर लगभग ३२.६५ रु० होते हैं तो क्या जनता को इस स्वरुप में टैक्स चुकाना चाहिए जिस तरह से आज खुलेआम उसकी जेबें काटी जा रही हैं ? आज जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें अपने निचले स्तर पर चल रही हैं तो क्या सरकारों का यह दायित्व नहीं बनता है कि उस मूल्य लाभ को सही स्तर पर जनता तक पहुँचाने की व्यवस्था की जाए जिससे देश में मंहगाई के स्तर को और भी कम करने में मदद मिल सके और अर्थ व्यवस्था पर उसके सकारात्मक परिणाम आने का इतंजार किया जाये ? खुद को देश और जनता की हितैषी कहलाने वाली सरकारें किस तरह से इस तरह के मामलों में केवल अपने बारे में ही सोचती हैं यह उसका ज्वलंत उदाहरण है क्योंकि वास्तविक मूल्य गिरावट को निचले पायदान तक न पहुंचकर वे देश की किस तरह से मदद कर रहे हैं यह वही बता सकते हैं.
                                          क्या कच्चे तेल की कीमतों के अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों से जोड़े जाने के बाद अब सरकारों की यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती है कि वे अपने लालच और वित्तीय अनुशासन में सुधार लाने की गंभीर कोशिशें करने के बारे में सोचना शुरू करें ? क्या जनता को हर स्थिति में इसी तरह से दोहरी चक्की में पीसे जाने को ही सुशासन कहा जा सकता है क्या सरकारें अपने में सुधार करने के किसी एजेंडे पर काम करना भी चाहती हैं या उनके लिए किसी भी तरह से जनता ही बलि का बकरा बनी रहनी चाहिए ? जब अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में मूल्य ज़्यादा हों तो देश हित में जनता सरकार के साथ सहयोग करे पर जब तेल की कीमतें कम हों तब जनता को अनाप-शनाप कर निर्धारण के माध्यम से चूसने की प्रवृत्ति बनाई जाती रहे तो इसे किस तरह से देशहित में कहा जा सकता है यह संभवतः नेताओं के लिए जवाब देने लायक प्रश्न ही नहीं है. जनता तो सदैव ही अपने स्तर से देश के लिए सब कुछ करने की तरफ बढ़ जाती है पर क्या हमारे नेता कभी इस तरह की कोशिश को अंजाम दे पाते हैं ? अभी तक केवल गोवा और दिल्ली में एक बार केंद्र की अपील पर लगभग दो साल पहले करों की कटौती की गयी थी पर किसी भी अन्य राज्य ने इस तरह से केंद्र के आह्वाहन पर अपने लाभ को छोड़ने के बारे में सोचा भी नहीं था तो इसे क्या कहा जा सकता है ?
                                           क्या अब देश को इस बारे में विचार नहीं करना चाहिए कि कच्चे तेल की कीमतों से देश की अर्थव्यवस्था को जो गति दी जा सकती है उस पर काम करना शुरू किया जा सके क्योंकि जब तक इस तरह के मामलों में बेहतर नीतियां नहीं बनायी जाती हैं तब तक किसी भी तरह से देश की आधारभूत आर्थिक संरचना को मज़बूत नहीं किया जा सकता है. देश को पेट्रोलियम पदार्थों की कम होती कीमतों के चलते अपने बजटीय और व्यापार घाटे को कम करने में भी काफी सहायता मिली है क्योंकि आज पहले के मुकाबले हम अपने पेट्रोलियम आयत पर ४०% ही खर्च कर रहे हैं जिसका सीधा असर थोक मूल्य सूचकांक पर पड़ता हुआ दिखाई भी दे रहा है पर निचले स्तर पर अर्थ व्यवस्था में गति न आने के चलते खुदरा मंहगाई पर कोई प्रभाव नहीं दिखाई दिया है तथा रोज़मर्रा की वस्तुएं मंहगी ही हुई हैं जिसका असर सीधे रिज़र्व बैंक की जल्द ही होने वाली मौद्रिक समीक्षा में भी दिखाई देने की संभावनाएं व्यक्त की जा रही है और उसमें किसी परिवर्तन की आस आर्थिक विशेषज्ञों को नहीं दिखाई दे रही है. यदि सरकार इस तरह से अपने करों के निर्धारण में और भी सुधार करते हुए यह लाभ जनता तक पहुँचाने की कोशिश करे तो इस बात की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कुल खुदरा मंहगाई की दरों पर और भी अंकुश लगाया जा सकेगा तथा परिवहन से लेकर अन्य सभी क्षेत्रों में इसका सीधा असर पड़ सकता है. मंहगाई का स्तर कम होने से जहाँ लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी वहीं आम उपभोक्ता वस्तुओं से जुड़े हुए व्यवसाय में भी तेज़ी दिखाई देने की पूरी संभावनाएं भी सामने आ सकती हैं. केंद्र सरकार को राजनैतिक स्तर पर तेल क्षेत्र के एक मजबूत कर निर्धारण नीति के बारे में गंभीर विचार पर संसद के अंदर और बाहर करने के बारे में सोचना शुरू कर देना चाहिए क्योंकि इस समय परिस्थितियां अनुकूल होने के चलते इसे कर पाना आसान है.      
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