मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 6 जून 2020

बढ़ता संक्रमण और नागरिकों के कर्तव्य

                                                       देश विश्व स्वाथ्य संगठन के निर्देशों के अनुरूप ७८ दिनों का लॉक डाउन ८ जून के बाद से चरणबद्ध तरीके से अनलॉक होना शुरू होने वाला है इसके पहले ही १ जून से बहुत सारे राज्यों ने आने यहाँ विभिन्न तरह की गतिविधियों को शुरू कर दिया है. यह सही है कि लॉक डाउन के साथ जीने की एक नई विधा आम नागरिकों के सामने आई है और आने वाले समय में जब तक देश को इस वायरस से निपटने का कारगर उपाय नहीं मिल जाता है हम सभी को कुछ प्रतिबंधों और अपने आचरण से इस बीमारी के संक्रमण को रोकने की दिशा में काम करना होगा. लॉक डाउन को लेकर राजनैतिक बहस चाहे जिस भी स्तर पर हो पर इससे होने वाले लाभ और हानियों के बारे में आम जनता को सोचना ही होगा क्योंकि अस्पतालों में बढ़ती भीड़ में राजनेताओं को कोई परेशानी नहीं होने वाली है सिर्फ आम जनता के लिए ही वहां पहुंचना और सुविधाएँ ले पाना हमेशा की तरह बड़ी चुनौती बनने वाला है.
                          सरकार ने लॉक डाउन के माध्यम से देश को एक हद तक कोरोना के संक्रमण के पीक पर पहुँचने पर उससे लड़ने के लिए तैयार करने का काम ही किया है. अब जब हम लोग इससे जुडी सावधानियों के साथ जीना सीख चुके हैं तो इस बात पर एक बार फिर से विचार करने की आवश्यकता है कि हमें अब यह अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा क्योंकि जब तक बीमारी है तब तक इससे बचने के लिए सभी को आवश्यक सावधानियों पर ध्यान देना ही होगा। अब अपने को इस बीमारी से बचाने की ज़िम्मेदारी एक तरह से हम नागरिकों की ही है. सरकार हर जगह ध्यान नहीं दे सकती है इसलिए खुद एवं अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए अब समय समय पर जारी होने वाले निर्देशों को मानना हम लोगों पर ही है. इन उपायों पर ध्यान रखकर ही हम अपने को सुरक्षित रखते हुए पूरे समाज को बीमारी से मुक्त रख सकते हैं.
                         सबसे पहले तो यही ध्यान रखना होगा कि १० वर्ष से कम के बच्चे और ६५ से ऊपर के बुजुर्ग के साथ गर्भवती महिलाओं के बाहर निकलने पर हम लोग स्वतः ही प्रतिबन्ध लगाएं जिससे हमारे परिवार का यह हिस्सा सुरक्षित रह सके. जो लोग स्वस्थ हैं वे भी बहुत आवश्यक कार्यों से ही बाहर निकले और काम करने वाले महिला पुरुष अपने कार्यस्थल पर पूरी तरह से सरकार की सूची के अनुरूप ही अपने बचाव को सुनिश्चित करें। ऐसी किसी भी परिस्थिति में जब हमारा बाहर निकलना आवश्यक हो तो अपने काम को समाप्त कर जल्दी से वापस अपने घरों में आ जाना चाहिए क्योंकि अभी जिस तरह से समुदाय में संक्रमण फैलना शुरू हुआ है तो कोई भी संक्रमित व्यक्ति हमारे संपर्क में आ सकता है जिसमें बीमारी के कोई लक्षण तो न हों पर वह संक्रमण का कैरियर हो और इस संक्रमित व्यक्ति से यह बीमारी हमारे घर तक भी आ सकती है. ऐसी परिस्थिति में हम सभी को एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का परिचय देना होगा और बीमारी से खुद को बचाते हुए इसके प्रसार को रोकने में अपना योगदान देना ही होगा।
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रविवार, 31 मई 2020

निगरानी में लापरवाही

                                                           देश में कोरोना से लड़ने के लिए जिस स्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं उनमें कहीं न कहीं किसी स्तर पर शामिल लोगों द्वारा कई बार की जा रही लापरवाहियां देश के लिए चिंता एवं हंसी का विषय बन रही हैं, यह सही है कि सरकार की मंशा को पूरा करने का ज़िम्मा निचले स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों का ही होता है पर महत्वपूर्ण स्थल पर तैनात लोगों द्वारा की गयी लापरवाही से आज नई तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं. बिना पूर्व सूचना के इतनी गर्मी के मौसम में पहले तो निर्धारित मार्ग से नए मार्ग पर श्रमिक स्पेशल गाड़ियों को चलाया गया जिसके बारे में नए मार्ग पर पड़ने वाले स्टेशनों पर इन श्रमिकों के लिए कोई व्यवस्था करने के स्पष्ट आदेश नहीं थे जिससे अनावश्यक रूप से इन लोगों को अपनी यात्रा पूरी करने में अधिक समय लगा और इनको अधिक कष्टों का सामना भी करना पड़ा. यदि इस मामले में थोड़ी से सावधानी बरती जाती तो श्रमिकों की समस्याओं पर पहले से ध्यान दिया जा सकता था.
                                     कल एक खबर ऐसी भी आई जिससे पूरी दुनिया में देश की छवि को धक्का लगा है जिसमें मास्को जा रहे एयर इंडिया के विमान के पायलट के कोरोना पॉजिटिव होने का पता दोबारा की जाने वाली चेकिंग में हुआ तब तक वह दिल्ली से दो घंटे की उड़ान पूरी कर चुका था. यह लापरवाही उस स्तर पर हुई जहाँ छोटी सी चूक भी बहुत बड़ी समस्या का कारण बन सकती है. कहा जा रहा है कि पहले इस पायलट की पॉजिटिव रिपोर्ट को नेगेटिव पढ़ लिया गया जिसके चलते उसे उड़ान पर जाने की अनुमति दे दी गयी पर जब उसकी जाँच दोबारा की गई तो उसके पॉजिटिव होने की खबर भी सामने आयी. इस मामले में निश्चित तौर पर किसी कर्मचारी की लापरवाही ही है पर इससे पूरी दुनिया में देश की साख को बट्टा भी लगता है. इस तरह के मामलों में पूरी सतर्कता बरतने की आवश्यकता है जिससे भविष्य में किसी भी समस्या से बचा जा सके.
                                      इसी तरह कोरोना के सैंपल ले जाने वाले के पास से एक बन्दर सैंपल उठाकर ले गया जो की निश्चित रूप से लापरवाही की श्रेणी में ही आता है पर इससे हमारे द्वारा इकट्ठे किये जा सैम्पल्स को कुछ जगहों पर कितनी लापरवाही से लाया ले जाया जा रहा है यह भी सामने आ गया है. ऐसा नहीं कि ऐसी बहुत सारी घटनाएं हैं पर सैंपल के मामले में बन्दर उसे कहीं भी फ़ेंक सकता है और उसके बाद उस स्थान पर सैंपल के खुलने से संक्रमण फैलने का खतरा भी हो सकता है. देश में निश्चित तौर पर लाखों लोग कोरोना से निपटने में विभिन्न स्तरों पर मज़बूती से जूझ रहे हैं फिर भी इनमें से कुछ कर्मचारियों की लापरवाही से पूरे तंत्र का मज़ाक उड़ाने वालों को मौका मिल जाता है. ऐसी विषम परिस्थिति में ड्यूटी लगाते समय इन कर्मचारियों के पिछले रिकॉर्ड पर भी चाहिए और जो घोषित लापरवाह हैं उनको ७५% वेतन पर घर भेज देना चाहिए जिससे उनको इस बात का एहसास भी हो कि उनकी लापरवाही की कीमत खुद उन्हें चुकानी होगी क्योंकि देश अब उनके झेलने के लिए तैयार नहीं है.
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गुरुवार, 28 मई 2020

आपदा संकट में भ्रष्टाचार

                                                                      देश में बाढ़ सूखा जैसी नियमित और भूकंप जैसी आपदाओं के समय सदैव ही प्रशासन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं जिससे संकट ग्रस्त जनता के मन में देश के सरकारी तंत्र के लिए घृणा का भाव ही उभरता है. ऐसा नहीं है कि पूरे देश में सदैव से ही भ्रष्टाचार का इतना बोलबाला रहा हो पर इसने जिस तरह से देश के राजनितिक तंत्र और नौकरशाही को अपने में जकड़ रखा है उसको देखते हुए किसी भी तरह के अप्रत्याशित सुधार की आशा नहीं की जा सकती है. इस तरह की आपदा में जिस बड़े स्तर पर लोग प्रभावित होते हैं और उसी स्तर पर केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न तरह की योजनाएं लाई जाती हैं इस भ्रष्ट तंत्र के लोग उनका हर परिस्थिति में लाभ उठाने से नहीं चूकते हैं. यह सही है कि आधार के बैंक खातों से जुड़ने के बाद जिस तरह से सहायता को सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाने की व्यवस्था को सुनिश्चित करने में सफलता मिल रही है वहीं आज भी भ्रष्टाचारियों के पास इसी व्यवस्था से अपने हिस्से को निकालने की नई नई तरकीबें सामने आ रही हैं.
                          देश के अधिकांश राज्यों में जिस तरह से सहायता में गड़बड़ी की जा रही है वह किसी से भी छिपी नहीं है. दूसरे राज्यों से आये हुए मजदूरों को आश्रय स्थल /क़्वारण्टीन सेंटर्स से घर भेजने के समय एक किट देने की व्यवस्था की गई है परन्तु उसकी लम्बी प्रक्रिया बनाकर उबाऊ कर दिया गया है जिससे अधिकांश लोग जिनमें कोई लक्षण नहीं होते सरकारी कागज़ों पर हस्ताक्षर करके अपने घरों को प्रस्थान कर जाते हैं और उनके लिए नियत किये गए किट आसानी से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं. इस तरफ किसी भी सरकार या अधिकारी का ध्यान नहीं जाता है जिससे अब यह खेल अधिकांश जगहों पर बड़े पैमाने पर खेला जाने लगा है और लाचार मजदूरों को उनके घर पहुँचने पर कुछ आवश्यक सामान के साथ भेजने की सरकारी मंशा की धज्जियाँ उड़ायी जा रही हैं।
                           गुजरात से बिना मानकों को पूरा किये वेंटिलेटर्स की सप्लाई की बात भी सामने आयी पर उसमें कुछ भी कड़े कदम नहीं उठाये गए हैं इस समय यह समझने की आवश्यकता है कि इस तरह का संस्थागत भ्रष्टाचार अंत में किसी भी सरकार के लिए बड़ी समस्या ही बन सकता है तो उस पर नियंत्रण किया जाना चाहिए और जो भी लोग इसमें किसी भी स्तर पर शामिल मिलें उनके खिलाफ विशेष परिस्थितियों में रासुका लगाने की संस्तुति की जानी चाहिए जिससे आने वाले समय में ऐसी विषम परिस्थिति में लोग भ्रष्टाचार करने से पहले सौ बार सोचने को विवश किये जा सकें। जब देश के सामने इस स्तर संकट हो तो भ्रष्टाचारी को देशद्रोही से कम नहीं माना जा सकता है. हिमाचल प्रदेश में जिस तरह से पीपीई किट घोटाला सामने आया है उससे यही लगता है कि आज भी देश में ऐसे लोग मौजूद हैं जो हर परिस्थिति में भ्रष्टाचारी हो सकते हैं और उन्हें किसी के जीने मरने से कोई अंतर नहीं पड़ता है.  
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सोमवार, 25 मई 2020

कोरोना - केंद्र राज्य समन्वय

                                               मार्च से शुरू हुए लॉक डाउन के साथ ही देश में एक अलग तरह की उठापटक दिखाई दे रही है आज जब पूरे देश को मिलकर इस महामारी के सामने खड़े होने की आवश्यकता है तो देश के राजनैतिक दल और उनके शीर्ष नेता एक दुसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं. ऐसा नहीं है कि केंद्र ने इस बारे में नीतियां नहीं बनायी और राज्यों ने उन पर अमल नहीं किया पर केंद्र और राज्यों में सत्ता तथा विपक्ष से जनता ऐसे कठिन समय में जिस गंभीरता की आशा कर रही थी उसमें देश के सभी राजनैतिक दल और नेता पूरी तरह से फेल दिखायी दे रहे हैं. देश की जनता अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा इन नेताओं के साथ अधिकारियों पर खर्च करती है उसके बाद भी कठिन समय में सबसे अधिक जनता को ही सहना पड़ता है.
                               पहले जोन निर्धारण को लेकर अव्यवहारिक तरीके से केंद्र का दखल रहा जिससे कई ऐसे जिले भी केवल एक मरीज होने के बाद भी ऐसे माना गया जैसे पूरे ज़िले में ही कोरोना फ़ैल गया हो इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह हुआ कि हमारे मेडिकल, पुलिस और अन्य आवश्यक सेवाओं से जुड़े विभागों पर अनावश्यक रूप से दबाव बना जबकि उनको केवल कुछ स्थानों पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर अपने स्टाफ को लम्बे समय तक काम करने के लिए तैयार करने की आवश्यकता थी. आज इस क्षेत्र के सभी लोग कोरोना की लड़ाई में थके से लगते हैं जबकि देश में संक्रमण बढ़ने के साथ अब अधिक सतर्कता की आवश्यकता है. केंद्र राज्य में वार्तालाप शून्य होने के कारण आज देश के आर्थिक प्रगति में सबसे बड़ा योगदान देने वाला मजदूर सड़कों पर है और अभी भी उनको मिलने वाली सहायता उनकी संख्या के हिसाब से बहुत कम ही है.
                               लॉक डाउन जिस तरह से राज्यों को विश्वास में लिए बिना किया गया आज उसका खामियाज़ा पूरा देश भुगत रहा है. यदि मार्च में संक्रमण के स्तर के कम रहते ही मजदूरों और अन्य कामों से अपने घरों से बाहर निकले लोगों को वापस जाने के लिए कुछ समय दिया जाता तो आज राज्यों क्या जनपदों और तहसीलों तक संक्रमण रोकने की जो लड़ाई लड़ी जा रही है उससे लॉक डाउन में ही निपट लिया गया होता और संक्रमण को अच्छी तरह से रोकने में मजबूती से रोका भी जा सकता था. आज रेलवे की जो हालत है वह भी ख़राब समन्वय का ही नतीजा है और आज से शुरू होने वाली हवाई यात्रा को भी जिस तरह से एक नियम में नहीं बांधा जा सका है उससे इन यात्रियों के लिए समस्याएं और बढ़ने ही वाली हैं. आज के युग में भी समन्वय की इतनी कमी आखिर क्यों है क्या राज्य अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं या केंद्र सरकार खुद ही सब कुछ करने में विश्वास रखती है ? राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों के साथ सीधी बैठक कर क्या पीएम मोदी राज्यों की सत्ता को किनारे करने की कोशिशें नहीं कर रहे हैं ?अब समय है कि केंद्र को अपने स्तर से विश्वास बहाली के लिए काम शुरू करना चाहिए जिससे आपस में लड़ने के स्थान पर कोरोना से प्रभावी लड़ाई लड़ी जा सके.  
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बुधवार, 20 मई 2020

बसों पर राजनीति

                                                          लॉक डाउन के चलते दिन में कई कई बार बदलते नियमों के कारण एक राज्य से दूसरे राज्य में अपने घर जाने वाले मजदूरों की स्थिति पर भी किस तरह की राजनीति की जा सकती है यह यूपी सरकार और कांग्रेस के बीच छिड़ी चिट्ठी वाली जंग से आसानी से समझा जा सकता है. बड़ी संख्या में मजदूरों के यूपी वापस आने और उनको लाने में तालमेल की कमी के साथ सीमित संसाधनों के चलते ये सभी प्रदेश की विभिन्न सीमाओं पर फंसे हुए हैं और लखनऊ से सरकार के स्पष्ट आदेश न होने के चलते यूपी पुलिस इन्हें बॉर्डर पर रोकने का काम कर रही है. इस परिस्थिति में कांग्रेस की तरफ से एक हज़ार बसें इन लोगों को उनके घरों तक पहुँचाने के लिए उपलब्ध कराने की बात कही गयी जिस पर यूपी सरकार ने दो दिनों में निर्णय लिया। कायदे से इस समय एक दूसरे पर आरोप लगाने के स्थान पर यूपी सरकार को कांग्रेस की तरफ से दी गयी इस पेशकश को स्वीकार कर श्रमिकों को राहत देनी चाहिए थी पर सरकार के शीर्ष स्तर से मिले निर्देशों के चलते इस मामले को सुर्खियां बना दिया गया है.
                                एक राजनैतिक दल होने के कारण यदि कांग्रेस सरकार की इस कमज़ोर स्थिति को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश में लगी दिख रही है तो उसे ऐसा करने का अधिकार भी है पर मज़बूत बहुमत वाली योगी सरकार ने कांग्रेस को लाभ मिलने की संभावनाओं को देखते हुए इसको अनावश्यक रूप से मीडिया में कवरेज देने के लिए खोल दिया। डिजिटल इंडिया के इस कथित युग में अगर इस आपदा के समय भी योगी सरकार एक आवश्यक पत्र पर दो दिनों तक निर्णय नहीं कर पाती है तो इसे क्या कहा जाये ? कांग्रेस केवल सरकार को ऐसे प्रस्ताव ही दे सकती है जिस पर श्रमिकों के हितों को देखते हुए निर्णय सरकार को ही लेना है. जिन बसों के कागज़ ठीक हैं उनको अनुमति देकर सरकार अपने काम को आसान कर सकती थी और साथ ही जिन बसों के नंबर आदि गलत और संदिग्ध होते उस पर जवाब माँगा जा सकता था पर सरकार ने खुद ही ऐसा काम शुरू कर दिया जिसकी सफाई देने में अब मुश्किल हो रही है.
                               लॉक डाउन को को देखते हुए केंद्र की तरफ से पहले ही सभी वाहनों की फिटनेस ३० जून तक बढ़ा दिया गया है हाँ बीमे पर किसी भी तरह की छूट नहीं दी जा रही है तो यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री द्वारा बसों की फिटनेस पर सवाल उठाना कितना तर्क संगत है ? यूपी सरकार के पास लगभग दस हज़ार बसों का बेड़ा है और ऐसे निर्देश जिलाधिकारियों को भी दिए जा चुके थे कि लोकसभा चुनावों के समय की दरों पर भुगतान कर निजी क्षेत्र की बसों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है। संकट की इस घडी में यदि कोई राजनैतिक दल किसी भी स्तर पर मदद करने के लिए सामने आ रहा है तो किसी भी दल की सरकार को अविलम्ब उसे स्वीकार कर लेना चाहिए जिससे लोगों की समस्याओं को कुछ कम किया जा सके. एक राष्ट्र की खोखली बातें करने वाला दल क्या दूसरे राज्यों से अपने गृह जनपद आने वाले लोगों की घर वापसी में भी इतना संवेदनहीन हो सकता है ? एक योगी के राज्य के मुखिया होने के बाद भी आमलोगों को इस तरह से मजबूर होना पड़ रहा है तो यह राज्य की विडंबना ही है. गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है "संत हृदय नवनीत समाना" पर यहाँ वैसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है जिससे आम मजदूरों की समस्याओं को कम करने की कोशिशें पूरी नहीं हो पा रही हैं.    
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सोमवार, 18 मई 2020

लॉक डाउन के नियम

                                                कोरोना संक्रमण को नियंत्रित के लिए केंद्र सरकार द्वारा लॉक डाउन के चौथे चरण की घोषणा के साथ यह स्पष्ट हो गया है कि अब नागरिकों को खुद को और अधिक अनुशासित करते हुए सामाजिक जीवन में अपने कार्यों को सम्पादित करने के लिए तैयार होना होगा. अभी तक देश के अधिकांश भागों में जिस तरह से अधिसंख्य जनसंख्या ने इसको अच्छे से माना है तो अब इस चरण में हम सभी की यह ज़िम्मेदारी बनती कि अपने समाज और देश हित में सरकार के निर्देशों को समझते हुए अपने आवश्यक कार्यों को करें जिससे इस बीमारी की रोकथाम को प्रभावी ढंग से सुनिश्चित किया जा सके. सरकार के पास दिशा निर्देश जारी करने के आलावा और कुछ ख़ास नहीं है अब यह हम नागरिकों पर ही निर्भर करता है कि हम इन निर्देशों पर कितना अमल करके खुद को आगे बढ़ाने का काम सही ढंग से कर पाते हैं.
                           लॉक डाउन के सभी चरणों में अभी तक यह देखा गया है कि सरकार की मंशा के अनुरूप अधिकारियों को काम करने में अत्यधिक कठिनाई हो रही है क्योंकि अभी तक कोरोना से निपटने के लिए विभिन्न तरह के प्रयोग पूरी दुनिया में किये जा रहे हैं जिससे कई बार कहीं पर कुछ ऐसे निर्देश भी जारी हो जाते हैं जिनसे उनका अनुपालन कराया जाना मुश्किल हो जाता है. साथ ही केंद्र और राज्य मुख्यालय द्वारा सीधे नज़र रखने से इन अधिकारियों के लिए भी समस्या हो जाती है क्योंकि टीवी पर घोषणा करने के बाद जब तक लिखित आदेश जारी होता है तब तक जनता उसको सरकार का आदेश मानकर अपनी मनमानी करने लगती है. अधिकारियों के पास किसी आदेश को लागू करने का अधिकार तभी होता है जब सरकार से स्पष्ट शासनादेश मिल जाए. बेशक देश में डिजिटल प्रणाली का उपयोग बढ़ा है पर अभी भी इन आदेशों पर तेज़ी से अमल करने के  मामले में अधिकारियों को उतने अधिकार नहीं मिले हैं जिससे आज भी वे पुरानी पद्धति से काम करने को बाध्य हैं.
                            केंद्र और राज्य सरकारों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसके आदेश का अनुपालन कराने के लिए जनता के सामने खड़े अधिकारियों को भी आदेश पर अमल करने के लिए अपने तंत्र को सक्रिय करना होता है इसलिए शासन के स्तर से भले ही कुछ देरी के साथ आदेश जारी किये जाएं पर जिन आदेशों को पारित किया जाये वे पूरी तरह से विचार विमर्श के बाद ही अनुपालन में लाएं जाएँ। अभी तक यह देखा जा रहा है कि सुबह और शाम तक आदेशों में कई बार बदलाव होने से जनता में भ्रम की स्थिति होती है और अधिकारी भी शासन की मंशा को सही ढंग से लागू नहीं करवा पाते हैं जिससे कई जगहों पर जनता और प्रशासन में टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. सरकार अपने स्तर से इस बिंदु पर अधिक ध्यान दे जिससे अधिकारियों का काम आसान हो सके और जनता भी उसको समझ कर उन पर अमल कर सके. इस समय मीडिया का रोल भी और गंभीर होना चाहिए क्योंकि ब्रेकिंग न्यूज़ के चक्कर में कई बार टीवी पर ऐसा कुछ प्रसारित हो जाता है जो आदेशों में कहीं से भी सामने नहीं आता है. जनता को भी सरकारी आदेशों की प्रति देखने के बाद अधिकारियों से तुरंत परिवर्तन की आशा नहीं करनी चाहिए क्योंकि दिल्ली या राज्य मुख्यालयों से जारी आदेशों को निचले स्तर तक पहुंचाने हेतु समय भी चाहिए होता है.
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शनिवार, 16 मई 2020

गांवों की सतर्कता

                                                 देश भर के बड़े शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों से अपने घरों की तरफ जाने वाले मजदूरों के लिए अब एक नई तरह की समस्या सामने आ रही है जब वे किसी भी तरह से लम्बी परेशानियाँ झेलकर अपने खुद के गाँव में पहुँच रहे हैं तो वहां इन लौटते मजदूरों से कोरोना फैलने के भ्रम और अफवाह के चलते बहुत जगहों पर उन्हें अपने घरों तक जाने नहीं दिया जा रहा है. यह एक ऐसी समस्या है जिससे केवल सही जानकारी के द्वारा ही निपटा जा सकता है. अभी तक जो कुछ भी जानकारियां देश में थीं उनका भी दुरूपयोग ही किया जा रहा है. देश की बड़ी आबादी ने पहले तो इस संकट को समझा ही नहीं फिर जब समझने की कोशिश की तो अब ज़्यादा सख्ती करने के चक्कर में अधिकांश लोग अपने लोगों को ही गाँव में आसानी से स्वीकार नहीं कर रहे हैं जिससे पुलिस का काम अनावश्यक रूप से बढ़ता जा रहा है.
                                       एक तरफ जहाँ ग्रामीण भारत का बड़ा हिस्से जिस तरह से इस बीमारी के प्रति सचेत दिखाई दे रहा है वहीं अभी भी कुछ जगहों से ऐसी ख़बरें भी सामने आ रही हैं कि लोग खुद ही भीड़ के रूप में इधर उधर घूम रहे हैं और खुद के साथ अन्य लोगों को भी संक्रमण के खतरे में डाल रहे हैं. आज की परिस्थिति में सभी को आवश्यक कार्यों के लिए ही आवश्यक दिशा निर्देशों का पालन करते हुए घरों से निकलना चाहिए जिससे समाज में संक्रमण को फैलने से रोका जा सके. ग्रामीण भारत में आज आवश्यकता है कि सभी लोग इस बात के लिए जागरूक किये जाएँ जिससे उनको खतरों का आभास तो हो ही साथ ही वे अपने लोगों को भी सही तरीके से घरों तक जाने में बाधा भी न बनें. यह सही है कि शहरों के मुक़ाबले अधिक स्थान में कम लोगों के रहने के चलते भी गाँवों में संक्रमण का फैलाव थोड़ा कम स्तर पर होता है पर संक्रमण फैलने पर समस्याएं गांवों में भी उसी तरह से सामने आती हैं.
                   इस परिस्थिति से निपटने एक लिए अब समाज को सरकार के कोरोना से बचाव के नियमों का कड़ाई से अनुपालन सीखना होगा जिसमें खुद को संक्रमण से बचाने के उपायों के साथ ही क़्वारण्टीन किये गए लोगों के साथ किये जाने वाले व्यवहार पर भी ध्यान देना होगा। प्रधान, ग्राम पंचायत सदस्यों, ग्रामीण स्वास्थ कार्यकर्ताओं, चौकीदार और ग्राम विकास विभाग के कर्मचारियों को मिलकर गांवों में नज़र रखने के लिए स्थानीय स्तर पर समितियों का गठन किया जाना चाहिए जिससे वहां आने वाले मजदूरों को सही ढंग से १४ दिनों तक निगरानी में रखा जा सके और आम लोगों के दिलों में उठने वाले सवालों के भी सही तरह से जवाब दिए जा सकें. घर के किसी एक सदस्य को ही आवश्यक कार्यों से बाहर निकलने की सीमित अनुमति होनी चाहिए और उसको भी आम लोगों से दूर रहने की सही जानकारी दी जानी चाहिए। इस तरह से कुछ मौलिक सवालों के बारे में लोगों को सही उत्तर देकर इस समस्या से सही ढंग से निपटा जा सकता है और पूरे ग्रामीण परिवेश में करोनके संभावित संक्रमण को रोकने हेतु  प्रभावी कदम भी उठाये जा सकते है.  
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