मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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बुधवार, 15 मार्च 2017

ईवीएम - आरोप और तथ्य

                                                  पांच राज्यों में हुए चुनावों के रुझान और नतीजे आने के साथ ही जिस तरह से बसपा अध्यक्ष मायावती ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के माध्यम से चुनावों में हेर-फेर करने के आरोप लगाने शुरू कर दिए उसके बाद उनके वोटर्स और कुछ अन्य आम लोगों के मन में यह सवाल भी उठने शुरू हुए कि क्या ईवीएम के साथ कोई दल चुनाव परिणामों को अपने पक्ष में करवा सकता है ? इसके लिए सबसे पहले हमें इन मशीनों की संरचना को समझना होगा क्योंकि वोट डालने वाले सभी लोगों ने वोटिंग मशीन और उससे जुडी हुई कण्ट्रोल यूनिट को मतदान के समय अवश्य देखा होगा. जिस मशीन में हम अपनी पसंद के उम्मीदवार का चयन करने के लिए उपयोग में लाते हैं वह वोटिंग यूनिट और जो पीठासीन अधिकारी के पास होती है उसे कण्ट्रोल यूनिट कहा जाता है. हर वोटिंग मशीन में अधिकतम १६ प्रत्याशियों के लिए स्थान होता है और वोटिंग मशीन की इस व्यवस्था से अधिकतम ४ यूनिट समानांतर लगाकर ६४ प्रत्याशियों के लिए व्यवस्था की जा सकती है इससे अधिक प्रत्याशी होने पर मतपर्तों द्वारा चुनाव कराना अपरिहार्य हो जायेगा. हर निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवारों के अनुरूप इन मशीनों की प्रोग्रामिंग की जाती है तथा आज उपयोग में लायी जाने वाली इन मशीनों की वोट रिकॉर्ड करने की अधिकतम सीमा ३८४० मतों की है परंतु अधिकांश बूथों पर केवल १५०० वोटर ही होते हैं जिससे क्षमता संबंधी समस्या कभी भी सामने नहीं आ सकती है. एक समय होने वाली बूथ कैप्चरिंग की घटनाओं को ईवीएम ने पूरी तरह से समाप्त ही कर दिया है क्योंकि इनकी व्यवस्था और कार्यप्रणाली कुछ इस तरह की है कि बहुत कोशिश करने के बाद भी एक मिनट में ५ से अधिक वोट नहीं डाले जा सकते हैं यह भी तब संभव है जब पीठासीन अधिकारी भी मिला हुआ है वर्ना अधिकारी के कंट्रोल यूनिट में क्लोज बटन दबाते ही नए वोटों को डालने की प्रक्रिया स्वतः ही बंद हो जाएगी.
                                         मतदान की यह पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है इसके बारे में भी समझना आवश्यक है क्योंकि सुबह मतदान शुरू करने से पहले आयोग की तरफ से न्यूनतम ५० वोट का मॉक पोल कराने का निर्देश भी दिया जाता है जिसमें सभी प्रत्याशियों के एजेंट शामिल किये जाते हैं और उनके सामने ही कण्ट्रोल यूनिट पर कुल पड़े वोट और उनकी गणना की जाती है तथा मशीन द्वारा सही तरह से काम करने की स्थिति को जांच जाता है जिसके बाद मशीन को फिर से न्यूट्रल करके सील किया जाता है और मतदान प्रारम्भ कराया जाता है. इस पूरी प्रकिया के बीच सेक्टर प्रभारी और अन्य तरह के प्रशासनिक और चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारी निरंतर दौरा करते रहते हैं जिससे कहीं भी किसी भी अनियमितता की स्थिति में उसे त्वरित रूप से रोका जा सके. जब हर मतदान केंद्र पर हर प्रत्याशी के एजेंट मौजूद रहते हैं और साथ ही प्रत्याशी खुद भी अपने स्तर से बूथ के बाहर पूरी चौकसी रखते हैं तो किसी भी गड़बड़ी को आखिर किस तरह से किया जा सकता है ? इस सबके बाद भी पूरे चुनाव में किसी भी एजेंट की तरफ से मशीन की कार्यप्रणाली पर कोई संदेह व्यक्त नहीं किया गया और वोटर्स ने भी किसी भी स्तर पर कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई तो इस तरह के आरोपों को हताशा की उपज ही माना जा सकता है.
                                       वोटिंग मशीन में मतदान के बाद जब एजेंट्स की उपस्थिति में पीठासीन अधिकारी क्लोज बटन दबा देता है तो उसके बाद रिकॉर्डिंग यूनिट में लगी चिप से बिना किसी छेड़छाड़ के ब्यौरे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है और यह चिप आयात करने के समय से ही सील होती है इसके साथ किसी भी तरह की छेड़खानी करने से इसमें रिकॉर्ड डाटा खुद ही नष्ट हो जाता है जिससे बाद में काउंटिंग के समय इसमें कुछ भी नहीं मिलेगा तो किसी के द्वारा ऐसे प्रयास ही कैसे किये जा सकते हैं. जिन स्ट्रांग रूम्स में ये मशीनें रखी जाती हैं वहां पर कई स्तरीय सुरक्षा की जाती है और सील कमरों के बाहर प्रत्याशी भी अपने ताले वहां पर लगा सकते हैं जिसके लिए आयोग ने उन्हें अधिकार दे रखे हैं पर अधिकांश मामलों में प्रत्याशी सुरक्षा से संतुष्ट होते हैं. इन मशीनों में रिकॉर्ड किये गए ब्यौरे को १० वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है हालाँकि ऐसी आवश्यकता नहीं पड़ती है. मतदान के पश्चात् मशीनों को ऑफ करके बैटरी निकाल ली जाती है जिसे काउंटिंग के दिन फिर से लगाया जाता है जिससे लंबी चुनावी प्रक्रिया के दौरान बैटरी सम्बंधित किसी भी समस्या से मशीन और रेकॉर्ड्स को नुकसान न पहुँच सके. फिर भी किसी संदिग्ध परिस्थिति में कोई समस्या आने पर उस मशीन या क्षेत्र से जुड़े मतदान को दोबारा कराने जाने का विकल्प आयोग के पास सदैव ही सुरक्षित रहता है.
                                   अब इस परिस्थिति में ईवीएम से हुए मतदान पर संदेह करने वालों की मानसिक स्थिति को समझना आवश्यक भी है क्योंकि २००९ के आम चुनावों में हार के बाद भाजपा के नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी और सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी मायावती की तरह ही इस तरह के आरोप लगाए थे और मतदान को मतपत्रों के माध्यम से मतदान कराये जाने की मांग भी की थी. इसका सीधा सा मतलब यही है कि ७० साल के लोकतंत्र में अभी भी देश के कुछ नेता इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि वे जनता के अपने विरोध में जाने को आसानी से स्वीकार कर सकें ? उन सभी नेताओं को अपनी नीतियों और उन कारणों पर विचार करना चाहिए जिनके चलते जनता ने उन्हें इन वोटिंग मशीनों के माध्यम से नकार दिया है और अगर वे अब भी नहीं सुधरे तो उनके लिए भविष्य में बचे रह पाना भी संभव नहीं हो पायेगा. अपनी कमज़ोरियों का ठीकरा इन मशीनों पर फोड़ने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है क्योंकि इन्हीं मशीनों ने कभी लाल कृष्ण आडवाणी को उप प्रधानमंत्री तथा खुद मायावती को यूपी का मुख्यमंत्री भी बनवाया था. यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि सत्ता परिवर्तन इतनी शांति के साथ हो जाया करते हैं इसलिए लोकतंत्र की मूल भावना को समझना आवश्यक है और अपनी हताशा को व्यक्त करने के स्थान पर अपने अंदर कमियों को खोजने के बारे में सोचना चाहिए जिससे लोकतंत्र को और भी मज़बूत किया जा सके.          
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शनिवार, 12 दिसंबर 2015

मोदी की प्राथमिकता और विज्ञान

                                                एक तरफ जहाँ संघ और भाजपा स्वदेसी का राग गाने में कोई कसर नहीं रखते हैं वहीं दूसरी तरफ आज के वैज्ञानिक युग के अनुरूप भारतीय मेधा को आगे विकसित करने के लिए उनके द्वारा किये जा रहे कामों के चलते अब ऐसा लगने लगा है कि मोदी पूरे देश को असेम्बली करने वाले एक बड़े कारखाने में बदलना चाहते हैं जहाँ केवल "मेक इन इंडिया" के नाम पर विदेशी कंपनियां आयेंगीं और उन भारतीयों को केवल फिटर बनाकर ही अपना काम करने में लगी रहेंगीं जिनको अपने देश की बेहतर शिक्षा के दम पर बहुत आगे तक भी ले जाया जा सकता है. आज जब मोदी को देश की सत्ता संभाले डेढ़ साल हो चुका है तो इतने लम्बे अंतराल के बाद भी अभी तक पीएम की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद का गठन नहीं किया जा सका है जो मोदी और सरकार की विज्ञान के प्रति वास्तविक सोच को ही दर्शाता है क्योंकि देश में वैसे ही अनुसन्धान के स्तर पर अभी भी उतना काम नहीं हुआ है जितने की आवश्यकता थी तो विज्ञान के प्रति मोदी सरकार की यह उपेक्षा भरी सोच आखिर देश के वैज्ञानिकों को किस तरह से देश के विकास के लिए काम करने के लिए प्रेरित कर पायेगी ?
                                इस बात को केवल मोदी की आलोचना के सन्दर्भ में देखा जाना कहीं से भी इससे न्याय नहीं कर पायेगा क्योंकि यूजीसी समेत कई बड़े संस्थानों के बजट में मोदी के सत्ता सँभालने के बाद लगभग ५०% की कटौती कर दी गयी है और इससे भी अधिक चिंतनीय यह है कि आईसीएमआर ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा कर रखी है कि उनके पास नए शोधों पर काम करने के लिए बजट ही नहीं है. देश के विकास और वैज्ञानिक सोच को विकसित करने के लिए जिस तरह से आईआईटी की स्थापना और उनका विस्तार किया गया था आज बजट की कमी से उनके भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है क्या सरकार को यह सब बताने की आवश्यकता नहीं है ? इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक चिंतनीय बात तो यह भी है कि देश के विकास और स्वदेशी तकनीक को विकसित करने के लिए अभी तक चल रही धीमी प्रक्रिया भी इससे पूरी तरह से बाधित हो सकती है आखिर जिन वैज्ञानिक उपब्धियों को आज भारत सरकार देश की उपलब्धि बताते हुए आगे बढ़ने में लगी हुई है क्या आगे के लिए उनको और विकसित करने की तरफ सोचने की आवश्यकता नहीं है ?
                             अच्छा होता कि मेक इन इंडिया की जगह मेक बाय इंडिया मोदी सरकार का नारा होता क्योंकि आज जिस तरह से केवल अन्य देशों की उन्नत तकनीक को हासिल करके देश के उत्पादन सेक्टर पर मोदी सरकार का पूरा ध्यान लगा हुआ है वह निश्चित तौर पर वैश्विक मंदी के इस युग में बहुत घातक साबित हो सकता है. आज जब मंदी ने चीन तक को परेशान कर रखा है पर भारत परेशान नहीं है तो उसके पीछे का मुख्य कारण भारत के उत्पादन का अधिकांश हिस्सा देश में ही उपयोग में लाया जाना भी है पर आज विकास की अंधी दौड़ में जब हम हज़ारों करोड़ के विदेशी निवेश और वैश्विक बाज़ार के बूते अपनी प्रगति की आधारशिला फिर से रखने की तरफ बढ़ रहे हैं तो क्या हमें एक बार फिर से विचार करने की आवश्यकता नहीं है ? देश में वैज्ञानिक सोच आगे बढे और उसका समुचित लाभ देश की तकनीक के माध्यम से हो सके तो सही रूप में भारत की प्रगति हो सकती है. अपने निर्णयों के लिए संघ और भाजपा के निशाने पर रहने वाले पूर्व पीएम राजीव गांधी ने यदि अस्सी के दशक में ही देश को इक्कीसवीं सदी के अनुरूप विज्ञान के साथ कदमताल करने लायक न बनाया होता तो क्या आज टीसीएस, विप्रो जैसी कंपनियां दुनिया भर में भारतीय मेधा और परिश्रम की कहानी कह रही होतीं और क्या मोदी डिजिटल इंडिया के सपने के बारे में सोच भी सकते थे ? राजनैतिक, सामाजिक रूप से मोदी सरकार के पास करने के लिए बहुत कुछ है तो उसे कम से कम विज्ञानक जगत में अपनी सोच का विस्तार बजट में कटौती के माध्यम से नहीं करना चाहिए. 
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शनिवार, 11 जुलाई 2015

इसरो की छलांग

                                                  दुनिया भर के देशों के अंतरिक्ष संगठनों के बीच भारतीय इसरो ने जिस तरह से पिछले कुछ समय से लगातार अपनी सफलता के मानकों को ऊंचा करने के लिए काम करना शुरू किया है वह निश्चित तौर पर देश के वैज्ञानिकों के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है और उन लोगों के अनर्गल सवालों का सर्वोत्तम जवाब भी है जिनको आज भी यही लगता है कि जिस देश में गरीबी हो उसे इस तरह के अनावश्यक अंतरिक्ष कार्यक्रमों में निवेश नहीं करना चाहिए. देश के वैज्ञानिक विपरीत परिस्थितियों में भी जितनी दृढ़ता के साथ सर्वोत्तम परिणाम देने के लिए जाने जाते हैं पीएसएलवी( पोलर सैटेलाइट लांच वेहिकल) की सफल २८ वीं उड़ान ने उसे नए मानक प्रदान कर दिए हैं. इसरो ने अपनी स्थापना के समय से ही जिस तरह से भारतीय मेधा की क्षमताओं को दुनिया के सामने स्थापित करना शुरू किया था आज वह अपने गंतव्य की तरफ निरन्तरं ही सही प्रगति करती हुई दिखाई दे रही है. इसरो के पास करने के लिए बहुत कुछ है पर अभी इस क्षेत्र में देश में विज्ञान की गुणवत्ता वाली पढ़ाई की आवश्यकता है जिसकी अभी बहुत कमी महसूस हो रही है तथा आने वाले समय में इस क्षेत्र की दिशा भी बदलने ही वाली है जिस पर अभी से ध्यान दिए जाने की आवश्यकता भी है.
                                         बहुत से लोगों को यह लगता है कि गरीब देशों की श्रेणी और कमज़ोर नागरिक सुविधाओं वाले देश भारत में अंतरिक्ष विज्ञान पर धनराशि खर्च करना कहीं से भी सही नहीं है संभवतः इस तरह की मानसिकता वाले लोग हर जगह पाये जाते हैं तभी जिस इंग्लैंड ने भारत पर दो सदियों तक राज किया था आज हम उसके उपग्रहों को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेजने में सक्षम हो चुके हैं. निश्चित तौर पर इंग्लैंड ने अपने निवेश को अंतरिक्ष विज्ञान की दिशा में मोड़ने में रूचि नहीं दिखाई तभी आज उसे भारत की सफलता की कहानी से लाभ उठाने के बारे में सोचना पड़ रहा है. कोई भी देश अपने शासकों की दूरदर्शिता पर ही अधिक तरक्की कर सकता है और भारत सरकार ने सदैव ही इसरो के विकास के लिये पूरा सहयोग दिया भले ही किसी भी दल की सरकार केंद्र में क्यों न रही हो. इस सबमें इसरो बधाई का पात्र है क्योंकि उसने सरकार की तरफ से दिए गए अवसरों का भरपूर लाभ उठाया और अपने को आगे बढ़ाने की हर संभव कोशिश भी की जिसका परिणाम आज सबके सामने है.
                                          अब इसरो को और भी तेज़ी से आगे बढ़ने के लिए जिस तरह की आज़ादी चाहिए अब देश और सरकार को उस बारे में भी सोचना चाहिए जिससे आने वाले समय में इसरो इस क्षेत्र का बड़ा खिलाडी बन सके और किसी भी तरह से उसके किसी भी काम में सरकार की तरफ से कोई अड़चन भी न आने पाये. अभी तक केवल देश के सम्मान और विज्ञान को बचाये रखने के लिए काम करने वाला इसरो आज पूरी दुनिया के देशों के लिए अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने का सबसे सस्ता और भरोसेमंद विकल्प बन चुका है जिसका लाभ उठाने का समय भी आ गया है. अब भौतिक विज्ञान के छात्रों की नयी पौध को तैयार करने का सही समय भी आ गया है जिससे इसरो की प्रगति की यह कहानी लगातार भारत के लिए बनी ही रहे किसी भी क्षेत्र में समग्र और लम्बे समय तक विकास की परंपरा को बनाये रखने के लिए जिस तरह से युवाओं को उससे जोड़ने की आवश्यकता होती है अब इसरो को खुद ही उस पर काम करना होगा और भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में रुझान रखने वाले छात्रों के लिए अधिक अवसर उपलब्ध करने के बारे में भी सोचना ही होगा तभी देश इस क्षेत्र में आने वाले दशकों में सिरमौर बन सकेगा. 
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गुरुवार, 15 जनवरी 2015

डीआरडीओ चीफ और सरकार

                                                           अग्नि मिसाइल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले डॉ अविनाश चन्द्र को मोदी सरकार ने जिस तरह से उनके बढ़ाये गए कार्यकाल के बाद भी ३१ जनवरी को पद मुक्त किये जाने का निर्णय लिया है उससे कहीं न कहीं इन मामलों में भी राजनीति शुरू हो सकती है. यह इतना महत्वपूर्ण निर्णय था कि इसे केवल मंत्रालय के स्तर से नहीं लिया जा सकता था अतः यह माना जा सकता है कि पीएम की भी इसमें पूरी सहमति रही है. हमारे देश में आयु के आधार पर वैज्ञानिकों को महत्वपूर्र्ण कामों में लगे होने के बाद भी रिटायर करने का चलन वैसे तो देश में कम ही दिखाई देता है क्योंकि इतने महत्वपूर्ण कामों में जिस तरह से इन वैज्ञानिकों का पूरा जीवन लगा होता है उस परिस्थिति में उनके अनुभव को देखते हुए आम तौर पर सरकार की तरफ से उन्हें सेवा विस्तार भी मिल जाया करता है जिससे महत्वपूर्ण अनुसंधानों पर कोई असर नहीं पड़ता है और ये संस्थान अपनी गति से काम करने रहते हैं पर सरकार द्वारा बिना कोई व्यापक रिटायरमेंट की नीति को सामने लाये जिस तरह से डॉ अविनाश को हटाया वह उसकी हड़बड़ी और छिपी हुई मंशा को ही अधिक दिखाता है.
                     रक्षा मंत्री पर्रिकर की तरफ से इस पूरे मामले को छिपाने के लिए जो युवा शब्द का उपयोग किया गया वह नीतिगत कम और हास्यास्पद अधिक लगता है क्योंकि अब जिस वैज्ञानिक को इस पद पर लाने की बात चल रही है उनकी आयु ६२ वर्ष की है और वे डॉ अविनाश केवल दो वर्ष ही छोटे हैं. देश की जनता ने मोदी और भाजपा को पूर्ण बहुमत दिया है और उसके बाद उन्हें काम करने की पूरी छूट भी मिलनी चाहिए पर महत्वपूर्ण संस्थाओं में इस तरह से अचानक से ही परिवर्तन करने और संभावित वरिष्ठता को नज़रअंदाज़ करने के बाद क्या काम करने का माहौल उतना अच्छा रह सकता है जितने की आशा सरकार कर रही है ? यह सही है कि सरकारें अपनी पसंद के लोगों को पदों पर बिठाने का काम करती ही रहती हैं पर अभी तक यह काम केवल प्रशासनिक काम करने वाले क्षेत्रों में ही दिखाई देता था पर आज जब इसकी घुसपैठ महत्वपूर्ण संस्थानों तक होती दिखाई दे रही है तो क्या सरकार को इससे बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. इसी तरह मार्च १४ में सेनाध्यक्ष की नियुक्ति वरिष्ठता के आधार पर करने के पिछली सरकार के फैसले पर भाजपा ने बहुत हल्ला मचाया था जिसके बाद इस पर भी जमकर राजनीति हुई थी जिसकी कोई आवश्यकता ही नहीं थी.
                     अब जब इस मामले को सरकार ने आगे बढ़ा ही दिया है तो उसे अब यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि यह एक नीतिगत परिवर्तन है और आने वाले समय में नीतियों में वरिष्ठता और सेवानिवृत्ति के बारे में सब कुछ स्पष्ट हो जाने वाला है. मोदी की कार्यशैली को देखते हुए यह कोई नई बात नहीं है वे सदैव ही संस्थाओं के वर्तमान स्वरुप से इसी तरह से छेड़छाड़ करने के आदी रहे हैं और चिंताजनक बात यह है कि वे यह सब बिना किसी जवाबदेही के करते हैं. देश को तेज़ी से निर्णय चाहिए पर इस तरह से संस्थाओं में अनावश्यक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलने वाला है. वैसे देश में अनुसन्धान के स्तर को देखते हुए एक नियत आयु पर वैज्ञानिकों को रिटायर करते हुए उन्हें अपने प्रोजेक्ट से जुड़े हुए अधूरे काम में टीम तैयार करने के लिए सलाहकार के तौर पर भी कुछ वर्षों तक काम करने का अवसर दिया जाना चाहिए इससे जहाँ आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए ये वरिष्ठ वैज्ञानिक उपलब्ध भी होंगें वहीं उनकी कमी भी नयी टीम को नहीं खलेगी. अनुसन्धान और अपने दम पर विकास करने के लिए पीढ़ियां लगती हैं केवल महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए लोगों को परिवर्तन और युवा सोच के साथ कुछ करने के संकल्प को लेकर पूरी तरह उपेक्षित किया जाना कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता है.    
   
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बुधवार, 14 जनवरी 2015

नदियों को जोड़ने के लाभ-हानि

                                                      देश में एक तरफ जहाँ केंद्र सरकार गंगा नदी को एक उदाहरण मानकर सभी नदियों की सफाई को लेकर चिंतित नज़र आती है वहीं उसके द्वारा नदियों को जोड़े जाने की नीति पर पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा आपत्ति जताए जाने के बाद भी आगे बढ़ना किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है. सरकार का मानना है कि देश में बाढ़ और सूखे के दोहरे संकट से निपटने के लिए नदियों को जोड़ा जाना आवश्यक है जिससे एक जगह के अतिरिक्त पानी को दूसरी जगह कम पानी वाले क्षेत्र में उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जा सके. भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस योजना को लेकर आशंकाएं इसलिए भी अधिक व्यक्त की जा रही हैं क्योंकि लगभग एक जैसे क्षेत्र से निकलने के बाद भी नदियों के जल और जैविक विविधता में कोई समानता नहीं है जिसके चलते जब इस तरह की किन्हीं दो नदियों को आपस में जोड़ा जायेगा तो उसके पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा इसकी अभी कोई जानकारी या अध्ययन सरकार के पास नहीं है. विकास के लिए आवश्यक क़दमों को उठाया जाना ज़रूरी है पर जब तक इस विकास को पर्यावरण के अनुकूल नहीं रखा जायेगा तब तक इस विकास की कीमत तो देश को चुकानी ही पड़ेगी.
                                                     सिंचाई परियोजनाओं और जल संकट को ध्यान में रखते हुए बड़ी नदी परियोजनाओं पर काम करने के स्थान पर यदि स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन को अधिक महत्त्व दिया जाये तो इससे वास्तव में अधिक लाभ हो सकता है क्योंकि बड़ी नहर परियोजनाओं के लिए जितनी बड़ी संख्या में पलायन और भूमि के जलमग्न होने की सम्भावना रहती है छोटी परियोजनाओं द्वारा उससे भी बचा जा सकता है. आज भी देश के उत्तरी भाग में लगभग हर शहर के साथ कभी वर्ष भर जीवित रहे वाली बरसाती नदियों की उपस्थिति भी है क्योंकि पुराने समय में जलसंकट से निपटने के लिए लोग नदियों के किनारे ही बसने को प्राथमिकता दिया करते थे आज यदि नदियों को जोड़ने से पहले सरकार केवल इन नदियों को फिर से पुनर्जीवित करने के बारे में सोचना शुरू करे और इससे स्थानीय लोगों के जुड़ाव और कर्तव्य को एक साथ ला सके तो देश भर में किसी समय सदानीरा रहने वाली पर अब नाले में बदल चुकी बहुत सारी नदियां पुनर्जीवित हो सकती हैं. यह काम ऐसा होगा जिसमें जनता का जुड़ाव भी होगा साथ ही नदियों के प्रति उसके कर्तव्य की पूर्ति भी हो सकेगी और आम लोगों से जुड़ने के बाद यह अपने आप ही नदियों को साफ़ रखने के कार्य से भी जुड़ ही जाना वाला है.
                                                 देश में जल संकट से निपटने के लिए बेशक सरकार के प्रयास सही है पर पर्यावरण विशेषज्ञों की बातों को पूरी तरह से अनदेखा किया जाना क्या सरकार के उस मन्त्र के साथ सटीक बैठता है जिसमें वह "सबका साथ सबका विकास" जैसी बातें करने से पीछे नहीं रहती है ? बेशक आज सरकार के समर्थकों में ऐसे बहुत सारे वैज्ञानिक भी हो सकते हैं जिनको इस परियोजना पर कोई आपत्ति न हो पर जब मामला पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दे से जुड़ा है तो क्या सरकार केवल किसी बड़ी परियोजना को शुरू करने के लिए अन्य लोगों की अनदेखी कर सकती है. देश, समाज और विकास के लिए पर्यावरण की अनदेखी क्या आने वाले दशकों में हमें भारी नहीं पड़ने वाली है क्योंकि एक बार जिस प्राकृतिक तंत्र को हम अपने स्वार्थ के हिसाब से बदल देंगें तो क्या वह हमारे चाहने पर फिर से उसी तरह का हो पायेगा और इस प्रयास में जैविक विविधता का जो भी नुकसान हमें होने वाला है उसको क्या हम दोबारा से प्राप्त कर सकेंगें ? मोदी सरकार ने जिस तरह से विकास के लिए पर्यावरण की अनदेखी करनी शुरू कर दी है वह देश के लिए बहुत घातक ही साबित होने वाली है क्योंकि अब विकास के आगे किसी भी अन्य प्राथमिकता के बारे में सोचना सरकार बंद कर चुकी है.        
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गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

नेविगेशन आकाश में भारतीय पहुँच

                                                                 अप्रैल २०१० में भारत द्वारा इस बात की घोषणा के बाद कि शीघ्र ही देश के पास भी अपना नेविगेशन सिस्टम होगा इसरो द्वारा इस दिशा में पूरी तरह से काम करना शुरू कर दिया गया था और कल जिस तरह से इस श्रेणी के तीसरे महत्वपूर्ण उपग्रह को उसकी कक्षा में स्थापित करने में देश को सफलता मिली है उससे यही लगता है कि आने वाले वर्ष में ही देश के पास अपना प्रभावी और देश की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले एक बेहतर तंत्र विकसित ही जायेगा. अभी तक अमेरिका, रूस, यूरोप चीन के पास अपना नेविगेशन सिस्टम है जिसमें चीन और यूरोप अपने सिस्टम को क्षेत्र विशेष से निकाल कर पूरी दुनिया के लिए बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं जबकि जापान द्वारा भी इसी तरह के प्रयास किये जा रहे हैं. भारत में एक वर्ग ऐसा भी है जो हर बड़ी वैज्ञानिक पहल को भुखमरी और गरीबी के साथ विकास से जोड़ने से बाज़ नहीं आता है जबकि आने वाले समय में वैज्ञानिक आधार पर देशों की मज़बूती उनकी वैश्विक स्थिति को प्रदर्शित करने वाली है.
                                         तकनीकी आधार पर यदि देखा जाये तो भारत में अमेरिकी जीपीएस सिस्टम का उपयोग लगभग सभी स्मार्ट फ़ोन धारक निशुल्क कर अपनी भौगोलिक स्थिति का सही अंदाज़ा लगाने के लिए कर सकते हैं और इसका उपयोग करने के लिए आज के समय में किसी भी तरह का भुगतान भी नहीं करना पड़ता है. शांति के समय जब विकास और दुनिया को साथ लेकर चलने की लम्बी चौड़ी बातें की जाती हैं तो इस अमेरिकी तंत्र के उपयोग से किसी को कोई समस्या नहीं आने वाली है पर आने वाले समय में किसी ऐसी परिस्थिति का सामना करने पर जब देश के हित अमेरिका या इस तरह के परिवहन तंत्र को संचालित करने वाले किसी भी देश के साथ टकराने की स्थिति में हुए तो उन देशों की प्रतिक्रिया को आसानी से समझा जा सकता है क्योंकि तब वे मानवीय मूल्यों के स्थान पर अपने देश के हितों की बात ही करते नज़र आयेंगें. भारत में इस तरह की किसी भी असामान्य परिस्थिति का सामना करने के लिए ही भारतीय नेविगेशन प्रणाली गगन की शुरुवात की गयी है.
                                          आज हमारे पीएसलवी उपग्रह यानों की कामयाबी पूरे विश्व के लिए किसी बड़े आश्चर्य से कम नहीं है तो उस स्थिति में देश को रणनीतिक रूप से मज़बूत करने के लिए अंतरिक्ष में जो कुछ भी किया जाना आवश्यक है उसे अविलम्ब शुरू करने की आवश्यकता है. अच्छी बात यह है कि देश की सरकारों ने इसरो के हर महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए धन की कोई कमी नहीं होने दी है जिसे चलते ही हमारे वैज्ञानिक इतनी आसानी से देश को भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने में लगे हुए हैं. देश के लिए जो कुछ भी आवश्यक है उस पर देश पहले से ही एकमत है और संसाधनों के विकास के लिए जो कुछ भी किया जाना आवश्यक है उस पर भी ध्यान देने की प्रक्रिया सतत रूप से चल ही रही है. देश की वैज्ञानिक सोच और उपलब्धियों को इसी तरह से गति देने का काम लगातार होना चाहिए जिससे हमारा यह नया सिस्टम किसी भी विपरीत परिस्थिति में भी हमारी सेना, संचार तथा नागरिक प्रशासन को किसी भी तरह की तकनीकी कमी न महसूस होने दे.                           
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मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

आईआईटी के छात्र डीआरडीओ की तरफ

                                                                   रक्षा अनुसन्धान एवम विकास संगठन (डीआरडीओ ) के प्रति पिछले तीन वर्षों से आईआईटी के छात्रों के बढ़ते रुझान के चलते आने वाले समय में भारत के रक्षा क्षेत्र में अनुसन्धान को बेहतर गति मिलने की सम्भावना अब बलवती दिखाई देने लगी है. अभी तक जो ट्रेंड चल रहा था उसके अनुसार देश के शीर्ष संस्थान आईआईटी के छात्र अपनी पढाई पूरी करने के बाद अच्छी आय के चक्कर में बड़ी विदेशी आईटी कम्पनियों में  नौकरी करना पसंद किया करते थे पर तीन वर्ष पहले जब डीआरडीओ ने पहली बार आईआईटी खड़गपुर में प्लेसमेंट के लिए जाने की शुरुवात की तबसे उसके बहुत अच्छे परिणाम सामने आये हैं और यहाँ से निकलने वाले युवा छात्र अब इस संगठन की तरफ आकर्षित होने भी लगे हैं. २०१२ से शुरू हुई इस प्रक्रिया में अब तक १३६ युवा वैज्ञानिक आईआईटी से संगठन को मिल चुके हैं तथा उनकी बढ़ती हुई रूचि से इसमें और प्रतियोगिता होने की सम्भावना बढ़ भी गयी है.
                                                                  पिछले तीन वर्षों में जिस तरह प्रति वर्ष से संगठन में औसतन ७० युवा वैज्ञानिकों की भर्ती हुई है और उसमें से भी लगभग ६०% वैज्ञानिक आईआईटी से आने लगे हैं तो यह देश के लिए बहुत अच्छा ही है और इस तरह के अनूठे प्रयास के लिए डीआरडीओ की जितनी भी तारीफ की जाये कम ही है क्योंकि इस संगठन ने भारतीय युवा वैज्ञानिकों के सामने एक विकल्प के रूप में अपने को पेश कर अन्य संगठनों की राह भी आसान कर दी है. इस भर्ती में जो सबसे बड़ी कमी सामने आ रही है वह यही है कि सरकारी संगठन होने के कारण डीआरडीओ में जब भर्तियां शुरू होती हैं तो आईआईटी कैंपस में प्लेसमेंट पूरा हो चुका होता है अब इस संगठन को अपनी आवश्यकता के अनुसार आईआईटी के इस प्लेसमेंट के समय को ध्यान में रखते हुए भर्तियों के अपने समय को भी संस्थाओं के समय के अनुसार करना होगा जिससे अच्छी प्रतिभा उसके हाथों से बाहर न जाने पाये.
                                                            देश की अब तक की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है कि हमारे विश्व स्तरीय संस्थानों के निकले छात्रों से देश को केवल विदेशी मुद्रा की आमदनी ही होती रही है जबकि इस मेधा का उपयोग भारतीय विज्ञानं और समाज के लिए होना चाहिए था पर हमारी ये प्रतिभा देश में अवसरों की कमी के चलते विदेशों में अपने लिए काम तलाशने का काम करने में ही लगी रहती है. अब जब देश के महत्वपूर्ण सरकारी संगठन डीआरडीओ ने इस तरह के प्रयास शुरू किये हैं तो आशा की जा सकती है कि आने वाले समय में इसरो, आरडीएसओ समेत अन्य संगठन भी इसी राह पर चलते हुए देश के लिए बेहतर मानव संशाधन के साथ बेहतर प्रतिभा को अपने काम में लगा पाने में सफल हो सकेंगें जिससे देश विज्ञान के क्षेत्र में और भी तरक्की करने की तरफ बढ़ सकेगा. सबसे अच्छा संकेत यह है कि जिस तरह से इन युवाओं ने भले ही वैश्विक स्तर पर मांग में कमी के चलते ही इस तरह का चुनाव किया हो पर उनके यहाँ आने से अन्य युवाओं के लिए यह एक विकल्प के रूप में सामने तो आ ही गया है.     
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शनिवार, 11 अक्टूबर 2014

"हुद-हुद" का सामना

                                             देश के दक्षिण-पूर्वी समुद्र तट की तरफ तेज़ी से बढ़ते हुए समुद्री चक्रवात "हुद-हुद" की तीव्रता के बारे में जिस तरह की ख़बरें सामने आ रही हैं उन्हें देखते हुए इनके प्रभाव में आने वाले आंध्र प्रदेश, ओडिसा और झारखंड के लोगों को सचेत किये जाने का काम शुरू किया जा चुका है. चक्रवात के बारे में आरम्भिक अनुमान पता चलते ही तटीय क्षेत्रों में इससे निपटने के सभी प्रयास शुरू कर दिए गए थे. यह ठीक उसी तरह का चक्रवात लग रहा है जैसे पिछले वर्ष पैलिन था पर उससे प्रभावित ओडिशा ने जिस तरह से मौसम विभाग और आपदा प्रबंधन के बेहतर तालमेल से जानमाल के नुकसान को बहुत हद तक काम करने में सफलता पायी थी वह देश में एक मिसाल ही है. कहने को ओडिसा कम संसाधनों वाला पिछड़ा राज्य है पर उसने जिस तरह से प्रशासनिक दक्षता के साथ अपने काम को किया था वह देश के अन्य राज्यों के लिए प्राकृतिक आपदाओं के समय एक प्रेरणा बन सकता है.
                                              पिछले कुछ वर्षों में मौसम विभाग के सटीक अनुमानों के साथ इस तरह की आपदाओं से निपटने में हम काफी हद तक सक्षम होते जा रहे हैं वह देश के लिए अच्छा संकेत ही है पर आज भी समुद्री तटों से दूर रहने वाले राज्यों में आपद प्रबंधन के नाम पर काफी कुछ किया जाना शेष है क्योंकि पिछले वर्ष ही उत्तराखंड की विभीषिका में मौसम विभाग के अनुमानों पर सही अमल न कर पाने से होने वाली भयावहता को सभी लोग देख ही चुके हैं और इस वर्ष भी जम्मू और कश्मीर में आई बाढ़ से कुछ ऐसा ही सीखने को मिलता है. प्राकृतिक अपदाओं का कोई स्थान नहीं होता है क्योंकि २०१० में लेह भी बाढ़ की चपेट में आ चुका है जबकि उसे पर्वतीय मरुस्थल कहा जाता है. देश में पिछले कुछ वर्षों में मौसम विभाग ने जो काम किया है अब उसको आपदा प्रबन्ध के साथ जोड़ने की आवश्यकता भी है क्योंकि मौसम जनित आपदाओं से बेहतर तालमेल के साथ ही निपटा जा सकता है.
                                             आशा की जानी चाहिए कि ओडिसा को अपने पिछले बार के अनुभव को और भी अच्छी तरह से लागू करने में सफलता मिलेगी तथा साथ ही आंध्र प्रदेश भी इससे काफी हद तक निपट पायेगा परन्तु इस पूरे प्रकरण में जिस तरह से झारखण्ड तक भी इसका असर दिखाई देने वाला है तो यदि वहां तक इसकी तीव्रता कम नहीं हुई तो इस क्षेत्र में व्यापक नुकसान हो सकता है. वैसे भी चक्रवात समुद्री क्षेत्र से ज़मीन पर आने के बाद धीर धीरे अपनी तीव्रता को खोने लगते हैं और शांत हो जाते हैं पर उनके रास्ते में जो क्षेत्र पहले आते हैं वहां पर नुकसान होना अवश्यम्भावी होता है. जन हानि को बचाने के लिए सबसे पहले उसी पर ध्यान दिया जाता है फिर मवेशियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है. ओडिसा ने यह पिछले वर्ष यह दिखा ही दिया है कि यदि जनता सरकार के प्रयासों में साथ रहे तो किसी भी परिस्थिति का सामना आसानी से किया जा सकता है समुद्री तटों के पास रहने वाले लोगों के लिए संचार के अन्य संसाधनों को भी बढ़ावा देने हैम और सामुदायिक रेडियो पर को बढ़ावा देकर इस तरह की चुनौतियों से निपटा जा सकता है.           
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शनिवार, 30 अगस्त 2014

ऑनलाइन उपस्थिति

                                                               केंद्र सरकार ने जिस तरह से झारखण्ड की ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज़ करने वाली वेबसाइट की तरह केंद्रीय स्तर पर एक कोशिश शुरू की है वह अपने आप में आने वाले समय में सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की वास्तविक उपस्थिति के बारे में सही जानकारी देने के बारे में सक्षम हो सकती है. झारखण्ड सरकार इस तरह के प्रयास को पहले ही आज़मा चुकी है और उसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आये हैं जिससे प्रभावित होकर ही संभवतः केंद्रीय स्तर पर यह व्यवस्था आज़माने की बात शुरू की जा चुकी है. आज सरकारी विभागों में अधिकारियों और कर्मचारियों से मिलकर कोई भी काम करवा पाना निरंतर ही कठिन होता जा रहा है क्योंकि किसी को यह पता ही नहीं होता है कि वह जिस अधिकारी या कर्मचारी से मिलने जा रहा है वह कार्यालय में उपस्थित है भी या नहीं जिससे कई कई चक्कर लगाने के बाद भी लोगों के छोटे से छोटे काम भी नहीं हो पाते हैं.
                                                                 आज केंद्र सरकार ने जिस तरह से एक केन्द्रीयकृत व्यवस्था के बारे में सोचना शुरू किया है उसके लिए जिस आधारभूत संरचना की आवश्यकता थी वह पिछली सरकार ने बनानी शुरू कर दी थी. देश की व्यापकता को देखते हुए जिस तरह से सरकार ने "आधार" के रूप में हर नागरिक की एक पहचान सुनिश्चित करने की तरफ कदम बढ़ाये और उस पर काफी हद तक काम करने में सफलता भी पायी थी आज वह देश की हर योजना में एक सहायक के रूप में काम करने की दिशा में बहुत ही प्रभावी कदम साबित हो रहा है. आधार के मामले में यह अच्छा ही हुआ कि वर्तमान सरकार ने अपने पूर्वाग्रहों को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ने की दिशा चुनी है जिससे इस महत्वपूर्ण पहचान कार्यक्रम को पूरे देश में लगभग हर योजना में लागू करने की दिशा में बढ़ना आसान हो गया है. जनधन योजना में जिस तरह से सरकार ने आधार को भी पहचान पत्र के रूप में मान्यता दी है वह उसकी योजना के प्रति रूचि को ही दिखाता है.
                                                               ऑनलाइन उपस्थिति के लिए सरकार ने जिस तरह से इसे आधार पर ही आधारित करने की योजना बनायीं है वह अपने आप में बहुत कारगर रहने वाली है क्योंकि इस तरह से जब हर कर्मचारी की आधार पहचान होगी तो वह जब भी बायो मीट्रिक मशीन में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करायेगा तो आधार की वेबसाइट से ही उसकी पहचान साबित होगी और पता चल जायेगा कि वह कार्यालय में आ चुका है. इससे जहाँ सरकारी कार्यालयों के साथ निजी क्षेत्र में भी इसी तरह से उपस्थिति को दर्ज़ किया जा सकता है और आधार के उपयोग के लिए पहले या बाद में ही कोई शुल्क भी सरकार द्वारा लगाया जा सकता है जिससे इस वेबसाइट के परिचालन का भी कुछ खर्च इसके इस तरह से व्यावसायिक उपयोग करने से निकलना शुरू हो सकता है. सरकारी योजनाओं को आज इस तरह से आर्थिक रूप से भी मज़बूत किये जाने की आवश्यकता है जिससे वे सरकार के लिए एक बोझ न बनी रहें और आने वाले समय में अपनी उपयोगिता को साबित करने के साथ ही सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकें.
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सोमवार, 23 जून 2014

परमाणु ऊर्जा और विश्व

                                               १९४५ में अमेरिका द्वारा नागासाकी और हिरोशिमा पर किये गए परमाणु हमले के बाद जिस तरह से पूरी दुनिया के सामने परमाणु विज्ञान का सबसे खतरनाक स्वरुप सामने आया था उसे देखते हुए तत्कालीन सोवियत संघ ने १९५० में इसके शांतिपूर्ण उपयोग पर काम करने के बारे में सोचना शुरू किया और २६ जून १९५४ को उसने अपने पहले परमाणु ऊर्जा संयंत्र को शुरू कर पूरी दुनिया को दिखा दिया कि हर ऊर्जा के दो पहलू होते हैं और यह उसे उपयोग करने करने वाले पर है कि वह उससे बम बनाता है या अँधेरे घरों में उजाला फ़ैलाने का काम किया करता है ? जब रूस ने इस तरह की परमाणु ऊर्जा के बारे में सोचना शुरू किया तो केवल पांच साल पहले ही इसकी विभीषिका देख चुकी पूरी पीढ़ी दुनिया भर में मौजूद थी और उसे लगा कि यह भी कहीं शहरों के अंदर या कुछ दूर पर स्थापित परमाणु बम जैसे ही न साबित हो जाएँ पर रूस के वैज्ञानिकों ने इस सपने को धरातल पर उतार कर अपनी इच्छाशक्ति पर परिचय दे ही दिया था.
                                             मॉस्को से केवल १५० किमी की दूरी पर प्यातकिनो में स्थापित ओबिनिंस्क संयंत्र ने जिस तरह से पूरी दुनिया के सामने एक बेहतरीन और कामयाब ऊर्जा के विकल्प खोल दिए थे वहीं सोवियत संघ को इस मामले में बढ़त भी दे दी थी. सोवियत परमाणु कार्यक्रम के जनक आइगोर कूर्चतोव भी परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के बड़े पक्षधर थे तभी उनकी इस कामना के साथ ही परमाणु ऊर्जा से विद्युत उत्पादन की तरफ जाने के बारे में सोचा गया वर्ना उससे पहले परमाणु ऊर्जा का विध्वंसक स्वरुप ही दुनिया ने देखा था. भारत ने इस संयंत्र को कितना महत्त्व दिया था इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने भी अपनी सोवियत यात्रा के दौरान इसका दौरा किया था. भारत के परमाणु ऊर्जा कार्य्रक्रम में भी सोवियत संघ ने सदैव ही भरपूर सहयोग और योगदान देकर उसे आगे बढ़ाने का काम ही किया है जो दोनों देशों के उस दौर के मज़बूत रिश्तों को भी प्रदर्शित करता है.
                                              भारतीय परिप्रेक्ष्य में आज भी अमेरिका और पश्चिमी देशों के रुख के कारण परमाणु ऊर्जा का वह व्यापक स्वरुप सामने नहीं आ पाया है जिसके माध्यम से देश की ऊर्जा आवश्यकतों को पूरा किया जा सकता है और आने वाले समय में देश के विकास की गति को भी आगे बढ़ाने में सफलता मिल सकती है. भारतीय परिस्थिति के बारे में पूरी दुनिया यह जानती है कि अभी तक जो भी नीति भारत द्वारा बनायीं गयी है उसका अनुपालन भी बहुत कठोरता के साथ किया गया है और अब देश इस स्थिति में पहुँच चुका है कि वह संवर्धित यूरेनियम के माध्यम से अपनी ऊर्जा आवश्यकतों को पूरा कर सके. देश में जिस तरह से परमाणु ऊर्जा के विकासात्मक स्वरुप की चर्चा शुरू होकर काम होना चाहिए वह अभी भी नहीं आ पाया है. सोवियत संघ के इस पहले परमाणु संयंत्र से यह बात साबित भी कर दी है कि यदि सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाये तो परमाणु ऊर्जा से अधिक प्रभावी और सस्ती ऊर्जा कहीं और से नहीं मिल सकती है. फिलहाल इस स्वच्छ ऊर्जा के २६ जून को साठ वर्ष पूरे होने पर दुनिया के सामने यह अपने बेहतरीन स्वरुप को तो दिखा ही चुका है.     
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मंगलवार, 20 मई 2014

मानसून और भारतीय कृषि

                                             अभी तक अल नीनो प्रभाव के कारण मानसून के कमज़ोर या अलग तरीके से व्यवहार करने के अनुमानों को गलत साबित करते हुए जिस तरह से बंगाल की खाड़ी से मानसून ने अपनी सामान्य गतिविधियाँ शुरू कर दी हैं और मौसम वैज्ञानिक उसकी प्रगति पूरी तरह सही बता रहे हैं वह देश के कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़ी उत्साहजनक खबर है. आज भी भारतीय कृषि का अधिकतर हिस्सा मानसून पर ही आधारित है तथा उसके किसी भी तरह से कमज़ोर या अलग व्यवहार करने भारतीय अर्थ व्यवस्था पर उसका कुप्रभाव आसानी से ही पड़ जाया करता है. आज भारतीय मौसम वैज्ञानिकों के पास पहले के मुकाबले मौसम की अधिक सटीक पूर्वानुमान लगाने की क्षमता आ चुकी है तो उस परिस्थिति में अब कृषि से जुडी योजनाएं बनाने और किसी भी विपरीत परिस्थिति से निपटने के मामलों में देश पहले के मुकाबले अधिक आत्म निर्भर हो चुका है. इस परिदृश्य को अभी और भी सुधारने की आवश्यकता है क्योंकि कृषि भारतीय अर्थ व्यवस्था की रीढ़ सदैव ही बनी रहने वाली है.
                                            भारत ने मौसम के क्षेत्र में जिस तरह से पूर्वानुमान लगाने की तकनीक में धीरे धीरे महारत हासिल करने की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं उसका ही असर है कि आज देश में लोगों को मौसम विभाग पर भरोसा होने लगा है फिर भी रोज़ ही इस सम्बन्ध में आने वाली तकनीकी पर देश को विचार करने और उनकी स्थापना के बारे में सोचने की आवश्यकता भी है. केंद्रीय स्तर पर जो सफलता मौसम विभाग को मिल रही है अब विकसित देशों की तरह उन सूचनाओं को सही तरह से उपयोग में लाने की कला का विकास भी देश को सीखना ही होगा क्योंकि केंद्र सरकार या केन्दीय मौसम विभाग के पास केवल इस तरह के अनुमानों को लगाने की क्षमता ही है और उसका धरातल पर क्रियान्वयन राज्यों को ही करना होता है. राज्य सरकारों को भी अब अपने यहाँ के कृषि वैज्ञानिकों के साथ केंद्रीय स्तर से मिलने वाली सूचनाओं को ध्यान में रखते हुए सरकारी योजनाओं पर अमल करने की आवश्यकता है. देश के विकास में अब केंद्र और राज्यों के समवेत प्रयासों की आवश्यकता है पर दुर्भाग्य से इन दोनों सत्ता केन्द्रों के बीच अभी तलवारें ही खिंची रहा करती हैं.
                                            आज जब मानसून पूरी भारतीय अर्थ व्यवस्था के साथ दक्षिण एशिया की आर्थिक गतिविधियों का सञ्चालन भी करता है तो उसके लिए सरकारी प्रयासों के साथ नागरिकों को भी बेहतर सूचनाएँ देने की व्यवस्था की जानी चाहिए. इस पूरी कवायद में आज तेज़ी से आगे बढ़ते हुए टेलीकॉम उद्योग को भी अपनी निशुल्क सेवाएं देनी चाहिए और मौसम से जुड़े विभिन्न अलर्ट नि:शुल्क सभी मोबाइल उपभोक्ताओं को हफ्ते में एक बार तो जारी ही करने चाहिए. इसके अतिरिक्त यदि मौसम में किसी बड़े परिवर्तन का पूर्वानुमान लगाया जा रहा हो तो उसको सभी मोबाइल कम्पनियों के लिए उपभोक्ताओं को भेजा जाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए जिससे जहाँ सरकार को नागरिकों तक सूचनाएं भेजने का एक और विकल्प मिल जायेगा वहीं नागरिकों को भी इससे काफी अधिक सुविधा होगी. केंद्रीय मौसम विभाग के पूर्वानुमानों को मानने के लिए राज्यों के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश भी होने चाहिए क्योंकि जनता से जुड़े किसी भी मुद्दे पर केंद्र और राज्य की घटिया राजनीति को बीच में लाने की कोई आवश्यकता नहीं है. साथ ही जिला स्तर पर जिला कृषि अधिकारी को इसका नोडल अधिकारी बनाया जाना चाहिए जो मौसम की गतिविधियों के साथ किसानों के साथ समन्वय बनाये रख सकें.
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शनिवार, 5 अप्रैल 2014

स्वदेशी नौवहन की आवश्यकता

                                       इसरो ने एक बार फिर जिस तरह से भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (ईआरएनएसएस) के दूसरे उपग्रह को सफलता पूर्वक कक्षा में स्थापित किया उससे भारत के अंतरिक्ष विज्ञान में आगे बढ़ते हुए क़दमों के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है. देश की भौगोलिक परिस्थितियों के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए विशेष रूप से तैयार किये गए इस पूरे तंत्र को स्थापित करने के लिए २०१५ की समय सीमा निर्धारित कि गयी है और जिस तरह से सारा कार्यक्रम अपनी सही गति से चल भी रहा है तो उससे यही लगता है कि देश जल्दी ही यह पूरी सुविधा अपने वैज्ञानिकों के दम पर पा लेगा. देश में आज प्राकृतिक आपदा या अन्य आवश्यक कामों के लिए जिस तरह से एक सम्पूर्ण प्रणाली की आवश्यकता है उसे यह क्षेत्रीय नौवहन तंत्र पूरा करने में सफल होगा. उत्तराखंड में पिछले वर्ष आयी जल प्रलय के समय जिस तरह से परिस्थितियों का सही आंकलन लगाने में प्रारंभिक स्तर पर हमारी नाकामी सामने आयी उस तरह की परिस्थितियों में ऐसा तंत्र हमारी कुशलता को बढ़ाने का काम कर सकता है.
                                     इस तरह से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के साथ ही पीएसएलवी श्रेणी के प्रक्षेपकों की श्रंखला में भी भारत द्वारा महारत हासिल की जा रही है पीएसएलवी २४सी नामक प्रक्षेपक से इस उपग्रह को केवल १९ मिनट बाद ही सटीक कक्षा में स्थापित कर उसका नियंत्रण हासिल कर सौर पैनेल को खोल दिया गया वह भारतीय वैज्ञानिकों की कुशलता को भी दर्शाता है. इसरो के वैज्ञानिक जिस तेज़ी के साथ देश की हर तरह की आवश्यकता को पूरा करने के लिए संकल्पित दिखायी देते हैं उस स्थिति में अब देश के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं लगता है. तकनीक के बेहतर प्रबंधन से जहाँ भारतीय उपग्रहों की लागत भी कम होती है वहीं उनकी कुशलता पर अब कोई संदेह भी करने की स्थिति में नहीं रह गया है. इस सफलता से भारत ने अमेरिका, रूस, यूरोप, चीन और जापान के बाद यह स्थान हासिल किया है जिसके पास पूरा स्वदेशी नौवहन तंत्र होगा जिससे आने वाले समय में विदेशी उपग्रहों पर देश के महत्वपूर्ण कामों की निर्भरता भी कम हो जायेगी.
                                    देश के अंदर और समुद्री सीमा के १५०० किमी तक काम करने वाली इस पूरी प्रणाली के २०१५ तक स्थापित हो जाने से जहाँ सेनाओं के लिए निगरानी का काम आसान हो जाने वाला है वहीं नागरिक प्रशासन को भी इससे सही स्थलीय जानकारी हासिल करने और उसके अनुसार काम करने में सरलता होने वाली है. हमारे वैज्ञानिक अपने काम में पूरी तरह से मुस्तैद हैं और आज तक उन्हें जो भी काम सौंपे गए हैं उन्होंने उनको पूरा कर देश का मान सदैव ही बढ़ाया है. ऐसी स्थिति में अब सरकार को देश में बेहतर वैज्ञानिक अनुसन्धान और परीक्षणों के लिए माहौल तैयार करने की कोशिशें करनी चाहिए जिससे आने वाले समय में पूरे देश की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए देश को विदेशों की तरफ न ताकना पड़े और हमारी विलक्षण प्रतिभा जो आज भी पलायन कर दूसरे देशों में काम कर रही है वह अपने देश में ही रुक सके. देश में हर तरह की दीर्घकालिक नीतियों में अब यह भी शामिल क्या जाना चाहिए कि आगामी वर्षों में हमारी आवश्यकताएं कहाँ तक बढ़ने वाली हैं और उनको पाने के लिए एक रोडमैप भी देश के पास होना ही चाहिए.         
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सोमवार, 18 नवंबर 2013

विज्ञान, वैज्ञानिक, संसाधन और मूर्ख नेता

                                  देश के प्रतिष्ठिति वैज्ञानिक और भारत रत्न के लिए चुने जाने के एक दिन बाद ही जिस तरह से सी.एन.आर राव ने देश में वैज्ञानिक सुविधाओं में कमी की बात पर इशारा करते हुए देश के नेताओं को मूर्ख तक कहा उससे देश में विज्ञान की सही स्थिति का ही पता चलता है. यह सही है कि आज देश से बाहर विदेशों में भारतीय मेधा और प्रतिभा अपने दम पर वैज्ञानिक खोजों और अन्य प्रयासों में बहुत बड़े स्तर पर लगी हुई है और आने वाले समय में सम्भवतः इसके और भी तेज़ी पलायन होने की सम्भावना भी नज़र आ रही है क्योंकि आज भी देश में वैज्ञानिकों को वह सम्मान और सुविधाएँ नहीं मिल पाती हैं जो उनकी मूलभूत आवश्यकता में सम्मिलित हैं. जब हमारे देश में विज्ञान के साथ भी इस तरह से दोहरे मानदंड अपनाये जायेंगें और युवा वैज्ञानिकों को किसी भी तरह से प्रोत्साहन ही नहीं दिया जायेगा तो आने वाले समय में देश में विज्ञान की उपलब्धियां शून्य ही हो जाने वाली हैं जबकि तेज़ी से आगे बढ़ते इस वैज्ञानिक युग में अब देश को इस दिशा में अधिक खर्च करने की बहुत आवश्यकता है.
                                  यह बात सदैव ही नेताओं की तरफ से कही जाती है कि हमारे देश के वैज्ञानिकों में बहुत प्रतिभा है पर जब इस प्रतिभा को निखारने का अवसर आता है तो अन्य फालतू के कामों में धन खर्च करने में कभी भी कोताही न बरतने वाले नेता अचानक से ही कंजूस से दिखायी देने लगते हैं. देश के मंगल अभियान को जिस तेज़ी के साथ वैज्ञानिकों ने कम समय में अंजाम तक पहुँचाया है और उसके बाद से ही जितने बड़े स्तर पर उनकी तारीफ हुई वहीं कुछ लोग देश की गरीबी का रोना लेकर भी बैठ गए और यह भी कहने लगे कि इससे गरीबो को क्या लाभ होगा ? जिन गरीबी मिटाने की उल्टी पुल्टी राजनैतिक योजनाओं के चलते खरबों रूपये बर्बाद हो जाते हैं यदि उनका दसवां हिस्सा भी वैज्ञानिक अनुसंधानों में खर्च कर दिया जाये तो सम्भवतः वैज्ञानिक देश के लिए और भी बहुत कुछ करके दिखा सकते हैं पर राजनेताओं को केवल अपने काम से मतलब होता है और देश के वैज्ञानिक उनको किसी भी सीट पर हरा पाने में कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं. इसलिए सम्भवतः उनकी कुर्सी इन वैज्ञानिकों की तरफ से पूर्ण रूप से सुरक्षित हो जाती है और उनकी उपेक्षा का नया दौर भी शुरू हो जाता है.
                                     अब देश की आवश्यकता है क्योंकि वैज्ञानिक अनुसंधानों में रूचि बढ़ाने और बेहतर विकल्प के रूप में उसे युवा विद्यार्थियों के सामने लाने से ही आने वाले समय में बड़ी वैज्ञानिक सोच के साथ पूरे वैज्ञानिक माहौल को बदलने में सहायता मिल सकती है पर जिस तरह से इन केन्द्रों को केवल वार्षिक खर्चे चलाने के लिए ही बजट का आवंटन किया जाता है उस परिस्थिति में आखिर देश में वैज्ञानिकों का भविष्य कैसे उज्जवल दिखायी दे सकता है. प्रोफेसर राव ने एक और महत्वपूर्ण बात यह भी कही कि देश में उतना राष्ट्रवाद भी नहीं है जितना चीन में है क्योंकि हमारे वैज्ञानिक भी थोड़े से धन के लालच में देश छोड़कर बाहर जाने के लिए राज़ी हो जाते हैं और देश के लिए उनके द्वारा जो कुछ भी किया जा सकता था उसका लाभ देश को नहीं मिल पाता है. अब इस परिस्थिति से निपटने के लिए किसी में राष्ट्रवाद को ज़बरदस्ती तो ठूंसा नहीं जा सकता है और केवल  क्रिकेट, आतंकी हमले और युद्ध के समय दिखायी देने वाले खोखले राष्ट्रवाद से निपटने के लिए अब हर क्षेत्र के व्यक्ति को देश के लिए सोचने की तरफ बढ़ने की बहुत आवश्यकता है.
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बुधवार, 6 नवंबर 2013

"मंगलयान" और भारत

                               मंगलवार के दिन भारत द्वारा भेजे गए मंगलयान ने जिस सफलता से पृथ्वी की कक्षा में स्थापित होकर अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया उसके बाद लगता है कि देश और दुनिया में इसको लेकर बहुत उत्सुकता होने लगी है. सबसे पहले भारत के पड़ोसियों की बात होनी चाहिए पाकिस्तान तो इस समय ड्रोन हमले में मारे गए तालिबान नेता के बाद की परिस्थितियों में ही उलझा हुआ है इसलिए अभी तक उसकी तरफ से कुछ नहीं कहा गया है पर चीन सरकार ने अपनी सधी हुई भाषा में प्रतिक्रिया दी है. चीनी अख़बारों ने तो भारत के इस कदम को भारत की गरीबी से जोड़कर इसे कमकर दिखाने के प्रयास किये हैं. कई प्रयासों के बाद भी चीन आधिकारिक रूप से यह घोषणा नहीं कर पाया है कि उसका भी कोई मंगल मिशन चल रहा है क्योंकि अभी तक केवल अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ ही अपने इस तरह के प्रयासों में सफल हो पाये हैं और चीन भी लगातार इसी कोशिश में लगा हुआ है कि इस दिशा में वह भी कुछ कर सके पर भारत के इस तरफ पहले क़दम बढ़ाने से उसे अच्छा तो नहीं लगा है.
                                          यह सही है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी देश में लोग गरीब हैं पर उससे क्या देश में गरीबी का बहाना बनाकर देश की समग्र प्रगति को रोका जाना चाहिए यह भी सोचने का विषय है ? आज यदि भारत और इसरो अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को इतनी सफलता पूर्वक संचालित करने में लगे हुए हैं तो उसके लिए किसी को दोषी क्यों ठहराया जाता है सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के पूर्व सदस्य हर्ष मंदर और इसरो के पूर्व अध्यक्ष माधवन नायर ने जिस तरह से इसे फ़िज़ूल खर्ची कहा है तो यह उनकी अपनी समस्या है पर जिस तरह से देश की अंतरिक्ष से जुडी आवश्यकताएं भविष्य में बढ़ सकती है तो उस स्थति में यदि देश के पास इस तरह की तैयारियां नहीं होगीं तो कोई भी अन्य देश हमारी किसी भी स्तर पर सहायता करने के लिए आगे नहीं आएगा इसरो की सफलता गाथा किसी कहानी से कम नहीं लगती है क्योंकि भारतीय मेधा की पूरे विश्व में जितनी सराहना होती है और नासा में काम करने वाले अधिकतर भारतीय ही हैं तो उस स्थिति में यदि देशी इसरो आगे बढ़ता है तो क्या उसको गरीबी से जोड़ा जाना उचित है ?
                                       इस मौके कम से कम हर मामले में एक दूसरे की टांग खींचने वाले नेता एकमत रहते हैं जो देश के लिए अच्छा संकेत है क्योंकि इसरो के लिए धन की उपलब्धता ही किसी भी मिशन के लिए सफलता का पैमाना है और वहीं इसरो उस आर्थिक स्थिति में नहीं पहुँच पाया है जब वह अपने खर्चे खुद ही निकालने में सफल होने लगे. शायद नेता इस मामले में इसलिए भी कुछ रोक नहीं लगाते क्योंकि इस उपलब्धि के दम पर उनका कोई नुकसान नहीं होता है और वे केवल वैज्ञानिकों को केवल बधाई देकर ही अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं ? देश को इसरो को हर तरह से आगे बढ़ने के प्रयासों में पूरी मदद करनी ही चाहिए क्योंकि जब तक देश की यह शाखा मज़बूत नहीं होगी तब तक अंतरिक्ष में भारत की पहचान के साथ रक्षा क्षेत्र के लिए आवश्यक मिसाइलों से जुड़े अनुसंधान में लगे वैज्ञानिकों के लिए अवसर कम होते जायेंगें. आज भारत को अपने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों पर गर्व है क्योंकि उन्होंने सीमित संसाधनों में यह दिखा दिया है कि पैसे का सही इस्तेमाल कैसे किया जाता है.             
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रविवार, 4 अगस्त 2013

रक्षा अनुसंधान और भारत

                                पुणे स्थिति रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान की हाई एनर्जी मटिरिअल रिसर्च लेबोरेटरी द्वारा विकसित पूर्णतः स्वदेशी विस्फोटक जांच किट की विश्वसनीयता पर अमेरिका ने भी पूरा भरोसा किया है और अब इसके व्यावसायिक उत्पादन के लिए उसने भारत के इस संगठन से एक समझैता भी किया है जिसके तहत आने वाले समय में अब वह इस किट का निर्माण और विपणन भी करेगा. पूरी दुनिया में ऐसा किट पहली बार बनाया गया है जिसके माध्यम से किसी भी तरह के रासायनिक विस्फोटक पदार्थों के मिश्रण में केवल दो तीन मिनट में ही यह पता लगाया जा सकता है कि उसमें कौन कौन से रासायनिक विस्फोटकों को मिलाया गया है जिससे सुरक्षा बलों के लिए उनसे निपटने के तरीक़े पर तेज़ी से काम कर लोगों की जाने और संपत्ति को बचाया जा सकेगा. इस किट की एक और महतवपूर्ण बात यह भी है कि इसे विस्फोट से पहले और बाद दोनों परिस्थितियों में पूरी दक्षता के साथ इस्तेमाल में लाया जा सकता है क्योंकि कई बार विस्फोटकों के बारे में सही पता न चल पाने से भी संभावित नुकसान को रोका नहीं जा सकता है.
                                     यह सही है कि भारतीय मेधा में बहुत शक्ति है और आज पूरी दुनिया में जिस तरह से हमारे देश के वैज्ञानिक और अन्य क्षेत्रों की प्रतिभा पूरे विश्व में अपना लोहा मनवा रही है उसके बाद हमें स्वयं ही इस बारे में विचार करना चाहिए कि आख़िर वे कौन से कारण हैं जिनके कारण हमारे देश में उच्च श्रेणी के रक्षा उत्पादों को बनाए जाने की  कोई पहल होती नहीं दिखाई देती है जबकि मिसाइल के क्षेत्र में आज बहरत रूस सहयोग से निर्मित ब्रह्मोस की तुलना में हर परिस्थिति में काम करने वाली कोई मिसाइल पूरी दुनिया में उपलब्ध ही नहीं है तो भी हम रक्षा अनुसंधान में इतने पिछड़े हुए क्यों हैं ? आज देश के सामने जिस तरह की पड़ोसी देशों के साथ आतंकियों की चुनौतियाँ बढ़ती ही जा रही हैं उस परिस्थिति में अब देश को रक्षा उत्पादन के मामले में आत्म निर्भरता की तरफ क़दम उठाना ही होगा क्योंकि इतनी विशाल आबादी के साथ भी यदि हम हर तरह के उत्पादों के निर्माण में आगे निकल सकते हैं तो उसका उपयोग रक्षा क्षेत्र में क्यों नहीं किया जा सकता है ?
                                   यह सही है कि भारत अपनी तरफ़ से कभी भी किसी युद्ध को शुरू करने का दोषी प्राचीन काल से आज तक नहीं पाया गया है तो अब उस सिद्धांत पर चलते हुए अपनी रक्षा आवश्यकताओं और प्रतिरोधक क्षमता को उच्च स्तर तक ले जाने वाले सभी प्रयासों पर गंभीरता से विचार किया जाना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि जब तक हम अपनी आवश्यकताओं के लिए दूसरे देशों पर पूरी तरह से निर्भर रहेंगें तब तक वे हमें अपनी दूसरे दर्ज़े की प्रौद्योगिकी ही बेचते रहेगें ? अब देश में सही समय है कि रक्षा विश्व-विद्यालयों की स्थापना करने कि तरफ़ सोचा जाए और माध्यमिक स्तर की शिक्षा से ही उन विषयों को लागू कर दिया जाए जिनमें रक्षा अनुसंधान की प्रचुर संभावनाएं हैं जिससे हमारी मेधा का सही दिशा में उपयोग किया जा सके और आने वाले कुछ दशकों में दुनिया के बेतरीन रक्षा अनुसंधान देश से ही निकल कर सामने आने लगें. हमारे रक्षा उपकरणों की खरीद के कुल बजट के कुछ प्रतिशत के बराबर धन अब आने वाले समय में रक्षा अनुसंधान के लिए अलग से आवंटित किया जाना चाहिए और इसका उपयोग पहले संरचनात्मक ढांचा बनाने में किया जाना चाहिए फिर आने वाले समय में निजी क्षेत्र का इसमें सहयोग लेकर देश की ज़रूरतों के अनुसार उत्पादन करके आत्मनिर्भरता की तरफ़ बढ़ा जा सकता है.    
  
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मंगलवार, 2 जुलाई 2013

नेविगेशन में आत्म निर्भरता

                                   इसरो ने सोमवार रात में पीएसएलवी की २३ वीं सफल उड़ान के माध्यम से प्रक्षेपित किये गए भारतीय नौवहन उपग्रह आईआरएनएसएस -१ ए को उसकी कक्षा में स्थापित करने में सफलता पाई है वह देश के लिए के बेहद ही महत्वपूर्ण क़दम है वैसे तो अभी भी देश में जीपीएस सिस्टम का उपयोग किया जा रहा था पर उसके लिए हम दूसरे देशों की तकनीक और उपग्रहों पर ही निर्भर थे पर अब हमारे पास अपनी पूरी नेविगशन प्रणाली विकसित होने में अब कोई देर नहीं है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रोज़ ही बदलते समीकरणों के बीच कभी भी ऐसी सेवा देने वाले किसी भी देश से सम्बन्ध खराब होने पर भारत के लिए यह सेवा बंद भी की जा सकती थी तो इस उपग्रह के प्रक्षेपण से हमारी इस क्षेत्र में भी आत्म निर्भरता बढ़ गई है. देश को जिस तरह से विकास के आयामों में आगे बढ़ना सीखना है और उसके लिए जिन भी चुनौतियों का सामान करने का साहस हमारे अन्दर होना चाहिए उसके विकास की दिशा में यह महत्वपूर्ण भी है. इस तरह की वैज्ञानिक उपलब्धियों से देश को और आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है और नए छात्रों को इस क्षेत्र में आने की उत्सुकता भी जगती है.
                             अभी तक इसरो ने जिस कुशलता के साथ अपने अधिकांश उपग्रहों को प्रक्षेपित करने में सफलता के आंकड़े को छूना शुरू कर दिया है वह पूरे देश के लिए गर्व का विषय है और अब आने वाले समय में देश को किस तरह की आवश्यकताएं हैं इन पर विचार करने के बाद इसरो को समुचित मात्रा में धन का आवंटन भी किया जाना चाहिए क्योंकि हमारे अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों ने जिस तरह से विपरीत परिस्थितियों में भी अपने काम को पूरी लगन के साथ जारी रखा है उसके लिए वे बधाई के पात्र हैं. सरकार को इसरो के लिए वैज्ञानिकों की एक समिति बनानी चाहिए जो आने वाले समय में भारत की मूलभूत आवश्यकतों के साथ रक्षा और मौसम सम्बन्धी ज़रूरतों को भी पूरा करने के लिए सरकार को दीर्घ कालीन नीतियों के लिए सुझाव दे और इन सुझावों को सरकार अविलम्ब मानकर इसके लिए उचित एवं आवश्यक धन का आवंटन करने की व्यवस्था भी करे. देश के लिए जिस तरह की रक्षा या अन्य प्रणालियों की भविष्य में आवश्यकता पड़ने वाली है यदि उसके लिए हम भी से प्रयासरत रहना शुरू कर देंगें तो आने वाले समय में हम इस मामले में किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहेंगें.
                          इसरो ने देश को गर्व करने लायक बहुत सारे अवसर दिए हैं और आने वाले समय में यह संस्था देश की रक्षा ज़रूरतों और भविष्य में तकनीकी रूप से लड़े जाने वाले वाले युद्धों के लिए तैयार करने के लिए पूरी तरह से सक्षम है हमारे पास जिस तरह के वैज्ञानिकों की आवश्यकता है आज भी उनकी बहुत कमी महसूस की जा रही है और इसे पूरा करने के लिए अब भौतिक विज्ञान की अन्तरिक्ष शाखा का और भी अधिक विकसित करने की ज़रुरत है क्योंकि आज हमारे पास जो भी वैज्ञानिक हैं वे अच्छा काम कर रहे हैं पर उनके इस काम को अनवरत आगे बढाने के लिए जिस स्तर पर हमें प्रयास रत रहना चाहिए अभी वह भावना हमारे अन्दर नहीं आ पायी है जिससे भी इस प्रतिष्ठित संस्था के पास उतने और कुशल वैज्ञानिक हमेशा उपलब्ध नहीं रहते हैं जिनकी हमें आवश्यकता है. इसरो राष्ट्र निर्माण में पूरा सहयोग दे रहा है इसलिए इसके लिए भी रक्षा मंत्रालय की तरह भरपूर धन उपलब्ध होना ही चाहिए जिससे यह अपने लिए भविष्य के वैज्ञानिक तैयार करने में भी पीछे न रह जाए और देश की ज़रूरतों को पूरा करने में उसका सहयोग और तेज़ी से मिलता रहे.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

अन्तरिक्ष में बढ़ता भारत

                               श्री हरिकोटा के सतीश धवन अन्तरिक्ष केंद्र से सोमवार को भारत ने अपने २३ वें सफल प्रक्षेपण के साथ ही इसरो और भारत ने अन्तरिक्ष विज्ञान में अपनी मज़बूत पकड़ को और भी आगे बढ़ाने का काम किया है. पीएसएलवी यान द्वारा इस तरह से अन्तरिक्ष विज्ञान में भारत ने लगातार सुधार कर जिस तरह से आगे बढ़ने में सफलता पाई है वह अपने आप में भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि १९९८ के परमाणु परीक्षणों के बाद जिस तरह से देश को अन्य देशों से मिलने वाली नई तकनीक पर रोक लग गयी थी उस विपरीत परिस्थिति में भी इसरो ने अपने संसाधनों के बल पर ही लगातार आगे बढ़ना जारी रखा है. इस प्रक्षेपण का देश के लिए क्या महत्व था यह इसी बात से पता चलता है कि उस समय राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी वहां पर वैज्ञानिकों का उत्साहवर्धन करने के लिए उपस्थित थे. भारतीय वैज्ञानिकों ने जिस तरह से अपने दम पर देश में अन्तरिक्ष विज्ञान को निरन्तर आगे बढ़ाने का काम किया है वैसी मिसाल पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलती है क्योंकि आज यह क्षेत्र तेज़ी से विकसित होता जा रहा है और इससे भारतीय मेधा की कीर्ति पूरी दुनिया में बढ़ती है.
            इस प्रक्षेपण में समुद्र विज्ञान के अध्ययन से जुड़े महत्वपूर्ण उपग्रह 'सरल' के साथ ही अन्य ६ सूक्ष्म उपग्रहों को भी प्रक्षेपित किया गया है जो इस क्षेत्र में भारतीय तकनीक की आधुनिकता को प्रदर्शित करता है क्योंकि आज जब दुनिया के हर देश को अपनी विभिन्न तरह की सामान्य प्रक्रिया को चलाने के लिए भी अन्तरिक्ष में स्थापित उपग्रहों पर निर्भर रहना पड़ता है तो उस परिस्थिति में कोई भी देश कम खर्च पर ही अपने उपग्रह को प्रक्षेपित कराना चाहेगा. इस क्षेत्र में अब जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत ने अपनी विश्वसनीयता बना ली है कि उसके उपग्रहों द्वारा छोड़े जाने वाले उपग्रह कम क़ीमत में ही प्रक्षेपित किए जा सकते हैं तो उसके बाद से ही अन्य देशों की निगाहें भी अब भारत की इस उपलब्धि पर टिक गयी हैं. अब इस स्थिति का लाभ उठाने के बारे में भारत सरकार और इसरो को एक समय बद्ध प्रक्रिया अपनानी ही होगी क्योंकि यदि आने वाले समय में इसरो इसी तरह से अपने उपग्रहों के साथ अन्य देशों के उपग्रहों को भी प्रक्षेपित करने में सफल हो सकेगा तो उसका खर्च भी निकलता रहेगा और आने वाले समय में वह विश्व के लिए एक सस्ता, विश्वसनीय और वैकल्पिक स्वरुप भी दे सकेगा.
                                   भारतीय वैज्ञानिकों ने जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया को करने में अब लगभग महारत ही हासिल कर ली है वह आने वाले समय में अन्तरिक्ष विज्ञान के साथ रक्षा के क्षेत्र में भी देश के लिए बहुत कुछ कर सकने में सक्षम होने वाला है क्योंकि जब हमारे पास इस तरह के आधुनिक श्रेणी के राकेट उपलब्ध होंगें तो उनमें रक्षा आवश्यकतों के अनुसार परिवर्तन करने के बारे में भी सोचा जा सकता है. आज जब पूरे विश्व में आधुनिक रक्षा उपकरणों की मांग भी बढ़ रही है तो उसमें इसरो के साथ मिलकर रक्षा संगठन भी देश के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं. अब इसरो को जिस भी तरह की सहायता की आवश्यकता हो उसे पूरा करना सरकार की ज़िम्मेदारी है क्योंकि देश में अपने दम पर आगे बढ़ते हुए इस संगठन से आने वाले समय में देश को बहुत प्रसिद्धि मिल सकती है और विकास शील देशों के लिए एक कम खर्च में उपग्रह प्रक्षेपित करने वाला पूरा तंत्र भी भारत में विकसित हो सकता है. इससे जहाँ भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञान को बहुत आगे जाने में मदद मिलेगी वहीं दूसरी तरफ़ इसके बढ़ते हुए क़दमों से नई पीढ़ी के लोगों में अन्तरिक्ष विज्ञान की तरफ़ सोचने के अवसर भी बनते जाएंगें.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 23 सितंबर 2012

रडार और भारतीय आकाश

                    देश के आकाश की निगरानी और सुरक्षा के अनुसार सुरक्षित करने के उद्देश्य से लगाये जा रहे 'गगन' तंत्र के बाद भारतीय आकाश पूरी तरह से नज़र में आ जाने वाला है. जिस तरह से भारत की सुरक्षा चिंताएं बढ़ती जा रही हैं और आने वाले समय में आकाश मार्ग से होने वाले किसी भी संभावित हवाई हमले के लिए देश को तैयार करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी. इस बात को ध्यान में रखते हुए २००७ में केंद्र सरकार ने एक महत्वकांक्षी परियोजना गगन शुरू की जिसके तहत ३० हज़ार फीट की ऊंचाई तक आकाश में होने वाली गतिविधियों पर भी निगरानी रखी जा सकेगी जिससे भारतीय आकाश और समुद्री सीमा में अधिक ऊंचाई पर देश का मज़बूत नियंत्रण हो जायेगा जो एक तरफ़ नागरिक हवाई यातायात को नियंत्रित करने में सहायक होगा वहीं दूसरी तरफ़ इससे वायु सेना और थल सेना के लिए देश के आकाश में किसी भी मिसाइल को देखना आसान हो जायेगा. इस तरह की परियोजनाओं की देश को आवश्यकता है जिससे पूरे देश में सुरक्षा सम्बन्धी ख़तरों से समय रहते निपटने में हम सक्षम हो सकें.
           देश ने इस परियोजना के लिए ३० हज़ार फीट की ऊंचाई पर ९ मोनो पल्स सेकेंडरी सर्विलांस रडार लगाने का काम शुरू किया है जिसके चालू हो जाने के बाद देश के ३८ प्रमुख हवाई अड्डे भी इस रडार के साथ स्वचालित प्रक्रिया से जोड़ दिए जायेंगें जिससे देश के आकाश में किसी भी विमान की स्थिति के बारे में कहीं से भी जानकारी ली जा सकेगी इससे जहाँ देश में हवाई यातायात सुगम हो जायेगा और हवाई अड्डों पर अधिक ट्रैफिक होने की दशा में हवा में विमानों को अधिक समय तक रखने की बाध्यता भी समाप्त हो जाएगी और कोहरे के साथ मौसम की किसी समस्या के समय भी हवाई यातायात को सुचारू ढंग से चलाने में मदद मिलेगी वहीं दूसरी तरफ़ सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी देश के आकाश में होने वाली किसी भी गतिविधि पर नज़र रखने में भी आसानी हो जाएगी. देश में हवाई यातायात जिस तेज़ी से बढ़ रहा है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आने वाले समय में इस तरह के अत्याधुनिक तंत्र के बिना आकाश में काम करना बहुत मुश्किल होने वाला है.
          इस परियोजना के प्रथम चरण में चेन्नई स्थित केंद्र को इस तंत्र से जोड़ दिया गया है और आने वाले समय में बाकी बचे मुंबई, दिल्ली और कोलकाता को भी इससे जोड़ दिया जायेगा जिसके बाद काफी हद तक हवाई यातायात को सुगम और सुरक्षित बनाया जा सकेगा. इस पूरी परियोजना के लिए जिस तरह से दक्ष लोगों की आवश्यकता होगी उसके लिए भी सरकार ने २०१६ तक व्यवस्था करने की योजना बनाई है. देश के लिए भविष्य में आवश्यक इस तरह की परियोजनाओं को स्वीकृति देने में सरकार को किसी भी तरह का विलम्ब नहीं करना चाहिए क्योंकि जब भी इस तरह के किसी भी काम को कम महत्व दिया जाता है उसका असर देश के अन्य क्षेत्रों पर दूसरी तरह से पड़ता है. देश की ज़रूरतों और भविष्य में आवश्यक संसाधनों को जुटाने के बारे में अब सरकारों को सोचना ही पड़ेगा क्योंकि जिस तरह से हमारे पास विश्व की सबसे युवा शक्ति आने वाले समय में होने वाली है उसका कोई मुकाबला नहीं कर पायेगा बस आवश्यकता केवल इस बात की है कि उस युवा शक्ति के सही इस्तेमाल करने के लिए हमारे पास कोई सटीक परियोजनाएं भी हों.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 14 जुलाई 2012

कन्या भ्रूण हत्या और बीबीपुर

          हरियाणा के जींद जिले की ५००० से अधिक आबादी वाला ग्राम बीबीपुर हो सकता है कि हरियाणा के माथे से कन्या भ्रूण हत्या में आगे रहने की शर्मनाक स्थिति को पलटने का काम कर दिखाए. दो वर्ष पूर्व इस गाँव की जागरूक महिलाओं ने आगे बढ़कर परम्परावादी जाट समुदाय के बीच कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए अपने स्तर पर काम करना शुरू किया था और आज वह काम समाज में इतना बड़ा रूप ले चुका है कि हरियाणा, दिल्ली, यूपी, राजस्थान की ३६० खापों को इस मसले पर विचार करने के लिए बीबीपुर में आमंत्रित किया गया है. आयोजकों का कहना है कि अगर हर खाप से १० लोग भी इस मुहिम में शामिल हुए तो हजारों मेहमानों के आने की सम्भावना है जिनके रहने और अन्य सुविधाओं के लिए ग्राम स्तर पर ही प्रबंध किये गए हैं. जिस स्तर पर निमंत्रण भेजे गए हैं और खापें और पचायतें अपने समाज के लिए कुछ भी अच्छा करने के लिए जुटती रही हैं उसे देखकर यही लगता है कि हो सकता है कि बीबीपुर का नाम इतिहास में इसलिए ही दर्ज़ हो जाये कि उसने इस भ्रूण हत्या के कलंक को धोने के लिए इतने बड़े स्तर पर प्रयास किये थे.
       ८० के दशक में जिस तरह से आई अल्ट्रा साउंड मशीनों का दुरूपयोग कन्या भ्रूण की गर्भ में ही पहचान और उनकी हत्या करने का जो सिलसिला चला आज तक वह पूरी तरह से जारी है जिसका खामियाज़ा आज पूरा समाज भुगत रहा है क्योंकि विवाह योग्य लड़कों के लिए लड़कियों की भारी कमी हो गयी है जिससे यहाँ के निवासियों को बिहार, बंगाल और केरल तक के विकल्पों पर विचार करना पड़ रहा है. स्त्री-पुरुष अनुपात में जिस तरह से तेज़ी से गिरावट आई आज वह समाज के लिए एक समस्या बनकर खड़ी हो गयी है. इस स्थिति से निपटने के लिए पूरे समाज के स्तर पर ठोस प्रयास की आवश्यकता है और इस बार बीबीपुर ने जिस तरह से खापों के चौधरियों को इस समस्या के निपटारे के लिए बुला लिया है उससे यही लगता है कि समाज के बेहतरी के लिए इस बार कुछ ऐसा सामने निकल कर आएगा जो वास्तव में पूरे समाज की दिशा बदल देगा.
      लड़की को बोझ मानने वाले भारतीय समाज के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करके अपनी समस्या का समाधान करने का जो रास्ता अपनाया गया था आज वह किस तरह से पूरे समाज पर भारी पड़ रहा है यह सभी देख रहे हैं. जब यह समस्या सामजिक रूप से ख़तरनाक रूप लेने लगी तो सभी ने मिल बैठकर इससे निपटने के इस रास्ते को खोजा है. अच्छा ही हो अगर महापंचायत इस भ्रूण लिंग परीक्षण को ही खारिज़ कर दे जिससे इस तकनीक का उपयोग केवल बीमारियों का पता लगाने के लिए ही किया जाने लगे और इन पंचायतों से जुड़े हुए लोग किसी भी स्थिति में अपने यहाँ कन्या भ्रूण हत्या को पूरी तरह से रोकने का काम करने लगें. इस पूरे काम का असर भी आने में पूरे दो दशक तो लग ही जाने वाले हैं पर जिस तरह से आधुनिक सुविधाओं के दुरूपयोग से हमने प्राकृतिक संतुलन से छेड़छाड़ की है आज उसका खामियाज़ा वो बच्चे झेल रहे हैं हैं जिसमें उनका कोई दोष नहीं है केवल उनके अभिभावकों के कारण ही आज उनके लिए लडकियों की कमी हो रही है. देश आज बीबीपुर से आने वाले संदेश का इंतज़ार करेगा पर क्या इस तरह के चुपचाप होने वाले परिवर्तनों पर देश के मीडिया की नज़रें उतनी हैं जितनी बोरवेल में गिरे बच्चे पर होती हैं ? हमारी अपनी लापरवाही से अँधेरी सुरंगों में मरने वाले एक दो बच्चों पर तो इतना ध्यान पर रोज़ ही सुनियोजित तरह से कन्याओं को मारने की इस पूरी साज़िश पर ख़ामोशी क्या यह नहीं दिखाती कि हमारा मीडिया भी कहीं न कहीं से पुरुष की प्रधानता को अपने आधुनिक होने के ढिंढोरे पीटने के साथ ढोता रहता है ?             
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 28 मई 2012

संस्कृत राष्ट्रीय आदर्श

         केंद्र सरकार ने जिस तरह से संस्कृत को भारत के राष्ट्रीय आदर्श की तरह संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तुत करने का फैसला किया है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में इस प्राचीन भारतीय भाषा को विश्व स्तर पर नयी ऊँचाइयाँ मिल सकती हैं. संयुक्त राष्ट्र में इस बात का प्रावधान है कि विभिन्न देश अपने यहाँ की इस तरह की खूबियों को राष्ट्रीय आदर्श के रूप में दुनिया के सामने रख सकते हैं. इस कार्यक्रम के तहत सरकार संस्कृत के बारे में विश्व में जागरूकता बढ़ाने का काम भी करने वाली है क्योंकि अधिकांश आधुनिक भारतीय भाषाएँ भी इसी मुख्य भाषा से निकल कर सामने आई हैं इस स्थिति में अगर संस्कृत के बारे में दुनिया भर में जागरूकता और जानकारी बढ़ेगी तो उसका असर पूरी दुनिया में दिखाई देगा. जिस तरह से नासा अपने विशेष प्रयोगों में यह सिद्ध कर चुका है कि संस्कृत ही एक मात्र ऐसी वैश्विक भाषा है जिसमें कंप्यूटर पर काम करना बहुत आसान है और जिस तरह से कंप्यूटर और संस्कृत को लेकर नासा आज भी प्रयोग करने में लगा हुआ है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में इस भाषा को सरकार से समर्थन मिलने पर यह पूरी दुनिया में अपने को सबसे आगे ला सकती है.
         जिस तरह से आज हर काम में कंप्यूटर का उपयोग बढ़ता ही जा रहा है और इतने सारे कामों को एक साथ करने के लिए संस्कृत के माध्यम से जिस तरह से काम करने की स्पीड को बढ़ाया जा सकता है और कंप्यूटर की कार्यकुशलता को बढ़ाने में मदद मिल रही है उसे देखते हुए अमेरिका ने अपने यहाँ कंप्यूटर के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए इस भाषा को साथ में सीखने के बारे में कह रखा है उसका असर अगले २० वर्षों में दिखाई देने लगेगा. भारतीय मेधा पूरी दुनिया में अपना काम करती जा रही है पर आज भी हमारी दूर दराज़ के इलाकों में रहने वाली आबादी के लिए अंग्रेजी सीख कर आगे बढ़ना आसान नहीं है इस स्थिति में अगर भारतीय भाषाओं में इस तरह के शोध यहाँ पर भी शुरू कर दिए जाएँ तो स्थानीय मेधा के लिए काम करना आसान हो जायेगा और वे पूरी दुनिया को अपने काम से बहुत कुछ दे पाने में सफल हो सकेंगें. इस सबके साथ हम सभी को भी यह समझना ही होगा कि भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है पर अपनी भाषाओं को भूलकर हम दुनिया के सामने नए आदर्श नहीं प्रस्तुत कर सकते हैं.
    अच्छा ही है कि सरकार ने इस बारे में सोचना तो शुरू कर दिया है अब आवश्यकता इस बात की है कि इस मसले पर केवल दुनिया को संस्कृत की अच्छाइयां बताने एक स्थान पर सरकार देश में भी इसके विकास के लिए एक सुनिश्चित समयबद्ध योजना बनाये जिससे जो काम अमेरिका लोग पहले संस्कृत सीखकर करने की सोच रहे हैं उसे हम अपनी भाषा के दम पर पहले ही कर पाने में सफल हो सकें ? सरकार को देश के विश्विद्यालयों में संस्कृत की पढ़ाई करवाने पर गुणवत्तापरक सुधार करने की दिशा में अब सोचना ही होगा क्योंकि जब अमेरिका यह कहे कि संस्कृत में तो  बड़ा दम है और वह इसके माध्यम से विज्ञान में नयी ऊँचाइयाँ छू ले तब हम चेतेंगें तो इससे देश का बड़ा नुक्सान हो जायेगा. देश में सरकार को आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कृत विश्व विद्यालय खोलने चाहिए जिससे एक स्थान पर ही विज्ञान के विषयों की पढ़ाई करने का अवसर छात्रों को मिल सके और आने वाले समय में हमें किसी संस्कृत के बारे में अमेरिकी शोध के लिए इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा जिससे देश की मेधा अपनी भाषा में आगे बढ़कर पूरी दुनिया के लिए और अच्छी मिसालें कायम करने में सफल हो सकेंगी.      

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...