मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 6 November 2013

"मंगलयान" और भारत

                               मंगलवार के दिन भारत द्वारा भेजे गए मंगलयान ने जिस सफलता से पृथ्वी की कक्षा में स्थापित होकर अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया उसके बाद लगता है कि देश और दुनिया में इसको लेकर बहुत उत्सुकता होने लगी है. सबसे पहले भारत के पड़ोसियों की बात होनी चाहिए पाकिस्तान तो इस समय ड्रोन हमले में मारे गए तालिबान नेता के बाद की परिस्थितियों में ही उलझा हुआ है इसलिए अभी तक उसकी तरफ से कुछ नहीं कहा गया है पर चीन सरकार ने अपनी सधी हुई भाषा में प्रतिक्रिया दी है. चीनी अख़बारों ने तो भारत के इस कदम को भारत की गरीबी से जोड़कर इसे कमकर दिखाने के प्रयास किये हैं. कई प्रयासों के बाद भी चीन आधिकारिक रूप से यह घोषणा नहीं कर पाया है कि उसका भी कोई मंगल मिशन चल रहा है क्योंकि अभी तक केवल अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ ही अपने इस तरह के प्रयासों में सफल हो पाये हैं और चीन भी लगातार इसी कोशिश में लगा हुआ है कि इस दिशा में वह भी कुछ कर सके पर भारत के इस तरफ पहले क़दम बढ़ाने से उसे अच्छा तो नहीं लगा है.
                                          यह सही है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी देश में लोग गरीब हैं पर उससे क्या देश में गरीबी का बहाना बनाकर देश की समग्र प्रगति को रोका जाना चाहिए यह भी सोचने का विषय है ? आज यदि भारत और इसरो अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को इतनी सफलता पूर्वक संचालित करने में लगे हुए हैं तो उसके लिए किसी को दोषी क्यों ठहराया जाता है सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के पूर्व सदस्य हर्ष मंदर और इसरो के पूर्व अध्यक्ष माधवन नायर ने जिस तरह से इसे फ़िज़ूल खर्ची कहा है तो यह उनकी अपनी समस्या है पर जिस तरह से देश की अंतरिक्ष से जुडी आवश्यकताएं भविष्य में बढ़ सकती है तो उस स्थति में यदि देश के पास इस तरह की तैयारियां नहीं होगीं तो कोई भी अन्य देश हमारी किसी भी स्तर पर सहायता करने के लिए आगे नहीं आएगा इसरो की सफलता गाथा किसी कहानी से कम नहीं लगती है क्योंकि भारतीय मेधा की पूरे विश्व में जितनी सराहना होती है और नासा में काम करने वाले अधिकतर भारतीय ही हैं तो उस स्थिति में यदि देशी इसरो आगे बढ़ता है तो क्या उसको गरीबी से जोड़ा जाना उचित है ?
                                       इस मौके कम से कम हर मामले में एक दूसरे की टांग खींचने वाले नेता एकमत रहते हैं जो देश के लिए अच्छा संकेत है क्योंकि इसरो के लिए धन की उपलब्धता ही किसी भी मिशन के लिए सफलता का पैमाना है और वहीं इसरो उस आर्थिक स्थिति में नहीं पहुँच पाया है जब वह अपने खर्चे खुद ही निकालने में सफल होने लगे. शायद नेता इस मामले में इसलिए भी कुछ रोक नहीं लगाते क्योंकि इस उपलब्धि के दम पर उनका कोई नुकसान नहीं होता है और वे केवल वैज्ञानिकों को केवल बधाई देकर ही अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं ? देश को इसरो को हर तरह से आगे बढ़ने के प्रयासों में पूरी मदद करनी ही चाहिए क्योंकि जब तक देश की यह शाखा मज़बूत नहीं होगी तब तक अंतरिक्ष में भारत की पहचान के साथ रक्षा क्षेत्र के लिए आवश्यक मिसाइलों से जुड़े अनुसंधान में लगे वैज्ञानिकों के लिए अवसर कम होते जायेंगें. आज भारत को अपने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों पर गर्व है क्योंकि उन्होंने सीमित संसाधनों में यह दिखा दिया है कि पैसे का सही इस्तेमाल कैसे किया जाता है.             
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