मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 14 October 2014

आईआईटी के छात्र डीआरडीओ की तरफ

                                                                   रक्षा अनुसन्धान एवम विकास संगठन (डीआरडीओ ) के प्रति पिछले तीन वर्षों से आईआईटी के छात्रों के बढ़ते रुझान के चलते आने वाले समय में भारत के रक्षा क्षेत्र में अनुसन्धान को बेहतर गति मिलने की सम्भावना अब बलवती दिखाई देने लगी है. अभी तक जो ट्रेंड चल रहा था उसके अनुसार देश के शीर्ष संस्थान आईआईटी के छात्र अपनी पढाई पूरी करने के बाद अच्छी आय के चक्कर में बड़ी विदेशी आईटी कम्पनियों में  नौकरी करना पसंद किया करते थे पर तीन वर्ष पहले जब डीआरडीओ ने पहली बार आईआईटी खड़गपुर में प्लेसमेंट के लिए जाने की शुरुवात की तबसे उसके बहुत अच्छे परिणाम सामने आये हैं और यहाँ से निकलने वाले युवा छात्र अब इस संगठन की तरफ आकर्षित होने भी लगे हैं. २०१२ से शुरू हुई इस प्रक्रिया में अब तक १३६ युवा वैज्ञानिक आईआईटी से संगठन को मिल चुके हैं तथा उनकी बढ़ती हुई रूचि से इसमें और प्रतियोगिता होने की सम्भावना बढ़ भी गयी है.
                                                                  पिछले तीन वर्षों में जिस तरह प्रति वर्ष से संगठन में औसतन ७० युवा वैज्ञानिकों की भर्ती हुई है और उसमें से भी लगभग ६०% वैज्ञानिक आईआईटी से आने लगे हैं तो यह देश के लिए बहुत अच्छा ही है और इस तरह के अनूठे प्रयास के लिए डीआरडीओ की जितनी भी तारीफ की जाये कम ही है क्योंकि इस संगठन ने भारतीय युवा वैज्ञानिकों के सामने एक विकल्प के रूप में अपने को पेश कर अन्य संगठनों की राह भी आसान कर दी है. इस भर्ती में जो सबसे बड़ी कमी सामने आ रही है वह यही है कि सरकारी संगठन होने के कारण डीआरडीओ में जब भर्तियां शुरू होती हैं तो आईआईटी कैंपस में प्लेसमेंट पूरा हो चुका होता है अब इस संगठन को अपनी आवश्यकता के अनुसार आईआईटी के इस प्लेसमेंट के समय को ध्यान में रखते हुए भर्तियों के अपने समय को भी संस्थाओं के समय के अनुसार करना होगा जिससे अच्छी प्रतिभा उसके हाथों से बाहर न जाने पाये.
                                                            देश की अब तक की सबसे बड़ी विडंबना यही रही है कि हमारे विश्व स्तरीय संस्थानों के निकले छात्रों से देश को केवल विदेशी मुद्रा की आमदनी ही होती रही है जबकि इस मेधा का उपयोग भारतीय विज्ञानं और समाज के लिए होना चाहिए था पर हमारी ये प्रतिभा देश में अवसरों की कमी के चलते विदेशों में अपने लिए काम तलाशने का काम करने में ही लगी रहती है. अब जब देश के महत्वपूर्ण सरकारी संगठन डीआरडीओ ने इस तरह के प्रयास शुरू किये हैं तो आशा की जा सकती है कि आने वाले समय में इसरो, आरडीएसओ समेत अन्य संगठन भी इसी राह पर चलते हुए देश के लिए बेहतर मानव संशाधन के साथ बेहतर प्रतिभा को अपने काम में लगा पाने में सफल हो सकेंगें जिससे देश विज्ञान के क्षेत्र में और भी तरक्की करने की तरफ बढ़ सकेगा. सबसे अच्छा संकेत यह है कि जिस तरह से इन युवाओं ने भले ही वैश्विक स्तर पर मांग में कमी के चलते ही इस तरह का चुनाव किया हो पर उनके यहाँ आने से अन्य युवाओं के लिए यह एक विकल्प के रूप में सामने तो आ ही गया है.     
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