मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

ईवीएम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ईवीएम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

एक साथ चुनाव

                               देश में इस समय लोकसभा और विधानसभा चुनावों के एक साथ कराये जाने की संभावनाओं पर गंभीर विचार शुरू भी नहीं हुआ है पर जिस तरह से इस पर बातें की जा रही हैं वे कहीं न कहीं से इस बात को रेखांकित अवश्य करती हैं कि सरकर चुनाव आयोग इस दिशा में सोच अवश्य रहे हैं. यह बात कहने में जितनी आसान लगती है क्या उसे धरातल पर उतार पाना भी संभव है अब इस बात पर विचार की आवश्यकता भी है. लोकतंत्र में राजनैतिक अस्थिरता के आने के साथ ही १९६७ में लोकसभा और विधान सभा चुनावों का साथ छूट सा गया और उसके पहले होने वाले चुनावों की गति टूटती सी नज़र आयी क्योंकि केंद्र और राज्यों में स्पष्ट बहुमत या गठबंधन की सरकारों के न चल पाने से चुनावों की तिथियां एक दूसरे से अलग होती चली गयी जिसका आज का स्वरुप हम सबके सामने है. आज जो परिस्थिति है उसमें भाजपा या एनडीए शासित राज्य तो पीएम की इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए राज़ी हो सकते हैं पर विपक्षी दलों की तरफ से जहाँ उसकी सरकारें अभी दो वर्ष पुरानी भी नहीं है क्यों इस प्रयोग का साथ दिया जायेगा ? आज पीएम मोदी की जो छवि है उसके साथ दोनों चुनाव एक साथ होने की दशा में भाजपा का काम आसान हो जायेगा वहीं विपक्षी दलों के लिए लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों को संभाल पाना कठिन ही होने वाला है इसलिए राजनैतिक स्तर पर इस विचार को बहुत अधिक समर्थन नहीं मिलने वाला है क्योंकि यह सब बिना संविधान संशोधन के संभव नहीं हो सकता है जिसके लिए केंद्र को दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी.
                         यह सही है कि इस तरह से एक साथ होने वाले चुनावों में समय और धन की बर्बादी को रोका जा सकता है पर क्या सभी चुनाव एक साथ कराने के लिए सरकार चुनाव आयोग को इतना धन दे पाने में समर्थ हो सकती है ? एक अनुमान के अनुसार यदि पूरे देश के लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाते हैं तो आयोग को वीवीपैट मशीनों के लिए लगभग २००० करोड़ रुपयों की आवश्यकता पड़ेगी साथ ही जब ये चुनाव एक साथ होंगें तो इन मशीनों का १५ वर्ष की आयु होने के कारण केवल तीन बार ही उपयोग किया जा सकेगा तो क्या केंद्र सरकार इस तरह के खर्चे को वहन करने के लिए तैयार है जिसमें सरकार को हर वर्ष आज की कीमत के अनुसार १०० करोड़ रूपये प्रतिवर्ष से भी अधिक खर्च करने पड़ेंगें ? सरकार की सोच सही हो सकती है पर इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए लम्बा समय लगने वाला है जिसके लिए अभी हमारे देश में संसाधन ही उपलब्ध नहीं हैं. यदि यह मान लिया जाये कि आगामी २०१९ में ही यह दोनों चुनाव साथ में किये जाएँ तो उसके लिए आवश्यक धन की व्यवस्था तो हो सकती है पर इतने कम समय में वीवीपैट मशीनों की उपलब्धता के बारे में पहले से ही विचार करने की ज़रुरत होगी क्योंकि उनके बिना इस तरह के चुनाव करा पाना संभव ही नहीं होगा.
                            सरकार का यह कहना कुछ हद तक सही है कि लगातार कहीं न कहीं होते रहने वाले चुनावों से विकास की गति आचार संहिता के कारण धीमी पड़ती रहती है जिसको कुछ हद तक सही माना जा सकता है पर समस्या यहाँ विकास के धीमे होने की नहीं बल्कि अपनी अपनी दलीय राजनीति को चमकाने को लेकर ही है क्योंकि सदनों में राज्यों और केंद्र की योजनाएं केवल अपने हितों को साधकर बनाये जाने की जो परंपरा चल पड़ी है जब तक इस पर राजनैतिक दल खुद ही अंकुश नहीं लगायेंगें तब तक विकास अपनी गति को नहीं पा सकता है. क्या सरकारें बदल जाने से जनता के विकास से जुड़े सरोकार बदल जाते हैं ? क्या राजनैतिक दलों को भी इसके लिए संविधान में उत्तरदायी नहीं बनाया जाना चाहिए कि वे सदनों में बैठकर कुछ मुद्दों पर कम से कम बीस वर्षों के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनायें और उस पर हर दल चलने को बाध्य हो साथ ही समय समय पर उसकी समीक्षा के साथ आवश्यक संशोधनों को भी करने की व्यवस्था भी की जाये जिससे सब कुछ सही दिशा में सही तरह से चल सके. कोई भी दल केवल अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए इस तरह के विचारों को सामने लाता है तो उसको स्वीकार कर पाने में सभी को कठिनता होने वाली है.
                          इस दिशा में शुरुवात इस तरह से की जा सकती है कि देश भर में जहाँ भी विधान सभा चुनाव होने हैं उसका समय वर्ष भर में एक महीने में ही कर दिया जाये जिससे हर वर्ष आयोग और सरकार चुनावों के लिए तैयार रह सकें. जैसे किसी राज्य में जनवरी किसी में अप्रैल और किसी में अक्टूबर नवम्बर में चुनाव होने हैं तो उनको वर्ष के एक महीने में ही कराने की दिशा में कदम बढ़ाये जाएँ जिससे पूरे वर्ष होने वाले इस चुनावी उत्सव को कुछ महीनों में ही निपटाया जा सके. यदि यह प्रक्रिया सही तरह से पटरी पर आ जाती है तो आने वाले समय में लोकसभा और विधान सभा चुनावों को भी एक साथ कराने की दिशा में सोचा जा सकता है. पर्वतीय राज्यों में चुनाव गर्मियों के मौसम में कराये जाने के बारे में सोचा जाना चाहिए जिससे प्रशासन को कम चुनौतियों का सामना करना पड़े और जनता की भागीदारी को भी बढ़ाया जा सके. केंद्र सरकार को इस दिशा में केवल बयान देने के स्थान पर सर्वदलीय बैठक से शुरुवात करनी चाहिए फिर जिन राज्यों के चुनाव लोकसभा के १ साल के आगे पीछे होने हैं वहां की सरकारों और विधानसभा अध्यक्षों की एक बैठक बुलानी चाहिए जिससे इस पर सही दिशा में आगे बढ़ने पर सफलता मिलने की सम्भावना बढ़ सके.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 15 मार्च 2017

ईवीएम - आरोप और तथ्य

                                                  पांच राज्यों में हुए चुनावों के रुझान और नतीजे आने के साथ ही जिस तरह से बसपा अध्यक्ष मायावती ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के माध्यम से चुनावों में हेर-फेर करने के आरोप लगाने शुरू कर दिए उसके बाद उनके वोटर्स और कुछ अन्य आम लोगों के मन में यह सवाल भी उठने शुरू हुए कि क्या ईवीएम के साथ कोई दल चुनाव परिणामों को अपने पक्ष में करवा सकता है ? इसके लिए सबसे पहले हमें इन मशीनों की संरचना को समझना होगा क्योंकि वोट डालने वाले सभी लोगों ने वोटिंग मशीन और उससे जुडी हुई कण्ट्रोल यूनिट को मतदान के समय अवश्य देखा होगा. जिस मशीन में हम अपनी पसंद के उम्मीदवार का चयन करने के लिए उपयोग में लाते हैं वह वोटिंग यूनिट और जो पीठासीन अधिकारी के पास होती है उसे कण्ट्रोल यूनिट कहा जाता है. हर वोटिंग मशीन में अधिकतम १६ प्रत्याशियों के लिए स्थान होता है और वोटिंग मशीन की इस व्यवस्था से अधिकतम ४ यूनिट समानांतर लगाकर ६४ प्रत्याशियों के लिए व्यवस्था की जा सकती है इससे अधिक प्रत्याशी होने पर मतपर्तों द्वारा चुनाव कराना अपरिहार्य हो जायेगा. हर निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवारों के अनुरूप इन मशीनों की प्रोग्रामिंग की जाती है तथा आज उपयोग में लायी जाने वाली इन मशीनों की वोट रिकॉर्ड करने की अधिकतम सीमा ३८४० मतों की है परंतु अधिकांश बूथों पर केवल १५०० वोटर ही होते हैं जिससे क्षमता संबंधी समस्या कभी भी सामने नहीं आ सकती है. एक समय होने वाली बूथ कैप्चरिंग की घटनाओं को ईवीएम ने पूरी तरह से समाप्त ही कर दिया है क्योंकि इनकी व्यवस्था और कार्यप्रणाली कुछ इस तरह की है कि बहुत कोशिश करने के बाद भी एक मिनट में ५ से अधिक वोट नहीं डाले जा सकते हैं यह भी तब संभव है जब पीठासीन अधिकारी भी मिला हुआ है वर्ना अधिकारी के कंट्रोल यूनिट में क्लोज बटन दबाते ही नए वोटों को डालने की प्रक्रिया स्वतः ही बंद हो जाएगी.
                                         मतदान की यह पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है इसके बारे में भी समझना आवश्यक है क्योंकि सुबह मतदान शुरू करने से पहले आयोग की तरफ से न्यूनतम ५० वोट का मॉक पोल कराने का निर्देश भी दिया जाता है जिसमें सभी प्रत्याशियों के एजेंट शामिल किये जाते हैं और उनके सामने ही कण्ट्रोल यूनिट पर कुल पड़े वोट और उनकी गणना की जाती है तथा मशीन द्वारा सही तरह से काम करने की स्थिति को जांच जाता है जिसके बाद मशीन को फिर से न्यूट्रल करके सील किया जाता है और मतदान प्रारम्भ कराया जाता है. इस पूरी प्रकिया के बीच सेक्टर प्रभारी और अन्य तरह के प्रशासनिक और चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारी निरंतर दौरा करते रहते हैं जिससे कहीं भी किसी भी अनियमितता की स्थिति में उसे त्वरित रूप से रोका जा सके. जब हर मतदान केंद्र पर हर प्रत्याशी के एजेंट मौजूद रहते हैं और साथ ही प्रत्याशी खुद भी अपने स्तर से बूथ के बाहर पूरी चौकसी रखते हैं तो किसी भी गड़बड़ी को आखिर किस तरह से किया जा सकता है ? इस सबके बाद भी पूरे चुनाव में किसी भी एजेंट की तरफ से मशीन की कार्यप्रणाली पर कोई संदेह व्यक्त नहीं किया गया और वोटर्स ने भी किसी भी स्तर पर कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई तो इस तरह के आरोपों को हताशा की उपज ही माना जा सकता है.
                                       वोटिंग मशीन में मतदान के बाद जब एजेंट्स की उपस्थिति में पीठासीन अधिकारी क्लोज बटन दबा देता है तो उसके बाद रिकॉर्डिंग यूनिट में लगी चिप से बिना किसी छेड़छाड़ के ब्यौरे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है और यह चिप आयात करने के समय से ही सील होती है इसके साथ किसी भी तरह की छेड़खानी करने से इसमें रिकॉर्ड डाटा खुद ही नष्ट हो जाता है जिससे बाद में काउंटिंग के समय इसमें कुछ भी नहीं मिलेगा तो किसी के द्वारा ऐसे प्रयास ही कैसे किये जा सकते हैं. जिन स्ट्रांग रूम्स में ये मशीनें रखी जाती हैं वहां पर कई स्तरीय सुरक्षा की जाती है और सील कमरों के बाहर प्रत्याशी भी अपने ताले वहां पर लगा सकते हैं जिसके लिए आयोग ने उन्हें अधिकार दे रखे हैं पर अधिकांश मामलों में प्रत्याशी सुरक्षा से संतुष्ट होते हैं. इन मशीनों में रिकॉर्ड किये गए ब्यौरे को १० वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है हालाँकि ऐसी आवश्यकता नहीं पड़ती है. मतदान के पश्चात् मशीनों को ऑफ करके बैटरी निकाल ली जाती है जिसे काउंटिंग के दिन फिर से लगाया जाता है जिससे लंबी चुनावी प्रक्रिया के दौरान बैटरी सम्बंधित किसी भी समस्या से मशीन और रेकॉर्ड्स को नुकसान न पहुँच सके. फिर भी किसी संदिग्ध परिस्थिति में कोई समस्या आने पर उस मशीन या क्षेत्र से जुड़े मतदान को दोबारा कराने जाने का विकल्प आयोग के पास सदैव ही सुरक्षित रहता है.
                                   अब इस परिस्थिति में ईवीएम से हुए मतदान पर संदेह करने वालों की मानसिक स्थिति को समझना आवश्यक भी है क्योंकि २००९ के आम चुनावों में हार के बाद भाजपा के नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी और सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी मायावती की तरह ही इस तरह के आरोप लगाए थे और मतदान को मतपत्रों के माध्यम से मतदान कराये जाने की मांग भी की थी. इसका सीधा सा मतलब यही है कि ७० साल के लोकतंत्र में अभी भी देश के कुछ नेता इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि वे जनता के अपने विरोध में जाने को आसानी से स्वीकार कर सकें ? उन सभी नेताओं को अपनी नीतियों और उन कारणों पर विचार करना चाहिए जिनके चलते जनता ने उन्हें इन वोटिंग मशीनों के माध्यम से नकार दिया है और अगर वे अब भी नहीं सुधरे तो उनके लिए भविष्य में बचे रह पाना भी संभव नहीं हो पायेगा. अपनी कमज़ोरियों का ठीकरा इन मशीनों पर फोड़ने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है क्योंकि इन्हीं मशीनों ने कभी लाल कृष्ण आडवाणी को उप प्रधानमंत्री तथा खुद मायावती को यूपी का मुख्यमंत्री भी बनवाया था. यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि सत्ता परिवर्तन इतनी शांति के साथ हो जाया करते हैं इसलिए लोकतंत्र की मूल भावना को समझना आवश्यक है और अपनी हताशा को व्यक्त करने के स्थान पर अपने अंदर कमियों को खोजने के बारे में सोचना चाहिए जिससे लोकतंत्र को और भी मज़बूत किया जा सके.          
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...