मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

२०१९ की राजनीति का घमासान

                                        चुनावी वर्ष होने के कारण इस बार लम्बे समय बाद पूर्ण बहुमत की सरकार का नेतृत्व कर रहे पीएम मोदी के सामने सबसे गंभीर संकट यह है कि अपनी घोषित लोकप्रियता को वे किस हद तक आगामी चुनावों में भुनाने में सफल हो पाएंगे? जिस तरह से राफेल मामले को लेकर वे खुद निशाने पर हैं और उन्होंने जो भी सोचकर शीर्ष स्तर पर निर्णय लिया हो पर भारत के हिसाब से उसमें कई कमियां दिखाई दे रही हैं जिनको लेकर खुद वे और उनकी सरकार सहज नहीं हो पा रही है. इस बीच में पुलवामा हमले और उसके बाद बालाकोट प्रतिक्रिया से स्थिति अवश्य ही कुछ उनकी तरफ झुकती हुई दिखाई दे रही है फिर भी मामले को उतना आसान नहीं समझा जा सकता है जितना वह लग रहा है? संभवतः इसी कारण से आज पीएम मोदी समेत भाजपा का हर छोटा बड़ा नेता केवल बालाकोट निर्णय की बात करना चाह रहा है और वे जानबूझकर पूरे विमर्श को उस दिशा में ले जाने का काम करने में लगे हुए हैं जिससे विपक्षी दलों को को उनके सवालों में उलझने देने की नीति अपनायी जा रही है.
                     नि:संदेह पीएम मोदी सामने बैठे लोगों से बेहतर संवाद बनाने में माहिर हैं पर सिर्फ उनके स्तर से किया जा रहे प्रयासों को पूरा नहीं माना जा सकता है इसलिए कांग्रेस के किसी भी नेता के पुलवामा या बालाकोट से जुड़े हर बयान को जनता के सामने इस तरह से पेश किया जा रहा है जैसे खुद राहुल गांधी के निर्देश पर यह सब चल रहा है. भाजपा और पीएम मोदी कुछ भी कहें पर पुलवामा पर राजनीति न करने के विपक्षी दलों के बयान और सरकार को पूर्ण समर्थन देने के बाद भी जिस तरह से खुद पीएम मोदी और अमित शाह की तरफ से इस मसले को लेकर राजनीति की जाती रही है उसके बाद विपक्षियों कोई तरफ से सवाल उठने ही थे?  असल में मोदी सरकार अपने काम के दम पर दोबारा सत्ता के नज़दीक पहुँच नहीं पा रही है इसलिए उसे देशभक्ति और उग्र राष्ट्रवाद दो ऐसे मसले महत्वपूर्ण लग रहे हैं जिन पर सवार होकर वह अपनी चुनावी संभावनाओं को सरल बनाकर अपने पक्ष में मोड़ने का काम आसानी से कर सकती है.
                        पीएम मोदी कितने भी अच्छे वक्त क्यों न हों पर इस मामले में वे अपने बनाये जाल में खुद ही उलझे नज़र आ रहे हैं क्योंकि उनके उकसाने की भरपूर कोशिशों के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और अन्य विपक्षी दलों की तरफ से सधी हुई गंभीर प्रतिक्रियाएं ही सामने आ रही हैं जिससे भाजपा को उन पर हमला करने का उतना अच्छा अवसर नहीं मिल रहा है. भले ही शुरुवाती हमलों में कांग्रेस ने अपने को सीमित किया है पर भाजपा की तरफ से अपने समर्थक टीवी चॅनेल्स में बैठे एंकर्स के माध्यम से जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है वह खुद उसके खिलाफ भी काम कर सकता है क्योंकि जनता के लिए कुछ मुद्दे अधिक संवेदनशील होते हैं और उनसे निपटने में कोई भी चूक किसी भी दल के लिए आत्मघाती हो सकती है. बालाकोट पर जिस तरह से सरकार को गंभीरता दिखानी चाहिए थी वह उसमें पूरी तरह से चुकी हुई और केवल अपने वोट बढ़ाने की राजनीति में ही व्यस्त दिखाई दी है इस पूरी परिस्थिति में अभी तक विपक्षी दलों की तरफ से जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं उससे लगता तो यही है कि वे मोदी और भाजपा के इस जाल से दूर रहने की प्रक्रिया को समझ चुके हैं और अपने अनुसार आगे बढ़ रहे हैं.

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शनिवार, 5 जनवरी 2019

बेरोजगारी भत्ता या श्रम सृजन

                                               देश में भले ही आगामी लोकसभा की चुनावी महाभारत से पहले कांग्रेस के तीन राज्यों में किसानों की कर्जमाफी की घोषणा से स्थितियां कुछ हद तक उसके पक्ष में हुई हो पर उससे किसानों की दशा पूरी तरह सुधारी नहीं जा सकती है ठीक उसी तरह से आज देश के युवाओं के सामने जिस तरह से रोजगार का संकट आ गया है उससे निपटने के लिए भी कांग्रेस ने अस्थायी रूप से युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही है. किसी भी परिस्थिति में युवाओं के ऊर्जावान हाथों में काम हो इससे किसी भी राजनैतिक दल को इंकार नहीं है पर चिंता की बात यह है कि यह सब केवल चुनावों में ही सामने आता है और जब सरकारें बन जाती हैं तो इन समस्याओं को ठन्डे बस्ते में डालने का काम शुरू कर दिया जाता है. आज भारत के पास युवाओं की बड़ी संख्या मौजूद है जिसमें कुशल कामगारों और वर्तमान तथा भविष्य की आवश्यकता के अनुसार रोजगार होने पर उनके लिए उचित मानव संसाधन के रूप में विकसित करने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं किये जा रहे हैं. इस नीतिगत उपेक्षा के चलते आज युवाओं में आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है जिसका दुष्प्रभाव किसी भी सत्ताधारी दल के लिए घातक हो सकता है.
                     आखिर क्या कारण है कि सरकारें और राजनैतिक दल इस दिशा में सार्थक पहल करने में कहीं बहुत पीछे दिखाई देते हैं और युवाओं की समस्या वहीं पर रह जाती है ? यदि युवाओं को उनके अनुसार बेरोजगारी भत्ता देने की कोई मंशा कांग्रेस की है तो उसे इसके लिए ठोस प्रारूप तैयार करना चाहिए जिसमें युवाओं की रूचि के अनुरूप और विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए आवश्यक मानव संसाधन के स्थानीय विकास की नीति बनानी चाहिए. यह सही है कि कोई भी सरकार सभी को रोजगार नहीं दे सकती है पर यह भी उतना ही सही है कि सरकार युवाओं को समर्थन तो दे ही सकती है जिससे वे अपने खर्चों के लिए परिवार पर कम आश्रित रहे. ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आवश्यकता के अनुरूप कौशल विकास योजना जैसे कार्यक्रम से सीमित संख्या में युवाओं को विभिन्न कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए जिससे वे अपने आसपास ही कुछ दिनों के लिए रोजगार पाने में सफल हो सकें। इसके लिए मनरेगा का उदाहरण लिया जा सकता है जिसके माध्यम से ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को उस समय भी गतिमान रखने में सफलता मिली थी जब पूरी दुनिया आर्थिक संकट में उलझी हुई थी.
                      इस नीति में डाक, बैंक, रोडवेज, यातायात, नगर विकास, स्वच्छता आदि क्षेत्रों में काम करने के लिए युवाओं को कुशल बनाया जा सकता है. मान लीजिये कि सरकार किसी स्थान के ५० युवाओं का चयन बेरोजगारी भत्ते के लिए करती है तो उनको ३००० रूपये प्रति मास देने के एवज में उनसे विभिन्न विभागों के सहयोगियों के रूप में कम से कम १० दिन काम भी लिया जाना चाहिए जिससे वे उस क्षेत्र की बारीकियों को समझ सकेंगे और सरकार के विभिन्न विभागों को भी स्थानीय स्तर पर काम करने वाले युवा उपलब्ध हो जायेंगें. इससे जहाँ समाज में कार्यकुशलता बढ़ेगी वहीं स्थानीय प्रशासन के पास अधिक सख्या में सहयोगी भी उपलब्ध हो जायेंगें। इस योजना के अंतर्गत काम करने वाले युवाओं के सामने सम्मान से जीने के रास्ते भी खुल सकेंगें और वे भी भत्ते के एवज में देश के लिए अपने कुछ दिन लगाकर ख़ुशी महसूस करेंगें। पहले प्रशिक्षण और फिर काम करने की बाध्यता होने से जहाँ इसमें भ्रष्टाचार की संभावनाएं खुद ही कम हो जाएँगी वहीं युवाओं को भी सही दिशा में आगे बढ़ाने में सफलता मिल सकेगी। पर देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश सरकारें केवल तात्कालिक चुनावी लाभों को देखते हुए ही निर्णय लेती हैं जिससे समाज को उसका वह लाभ नहीं मिल पाता जो एक सुनियोजित नीति के माध्यम से मिल सकता है.         
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सोमवार, 24 दिसंबर 2018

बेरोजगारी भत्ता और युवा शक्ति

                                   देश में बढ़ती बेरोजगारी और घटते रोजगार के अवसरों के बीच युवाओं के लिए उनकी प्रगति के साथ उम्मीदों को पूरा करना आज हर राजनैतिक दल के लिए एक समस्या बनता जा रहा है. आज जिस तरह से देश की अधिकांश आबादी युवा होती दिख रही है उसके बीच इस बड़े वोट समूह की अनदेखी करना किसी भी दल के लिए आसान नहीं रह गया है. इस तरह की परिस्थिति के बीच ही राजनैतिक दलों की तरफ से युवाओं को बेरोजगारी भत्ता दिए जाने की विभिन्न तरह की घोषणाएं की जाती रहती हैं पर उससे धरातल पर युवाओं की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता है वरन सभी राजनैतिक दलों पर इस तरह की घोषणाएं अपने चुनाव घोषणा पत्रों में किये जाने की मजबूरी सामने आती है. इस परिस्थिति से निपटने के लिए क्या केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ मिलकर एक नए तरह की सोच के साथ सामने नहीं आना चाहिए ?
                  युवा बेकार न रहे उसे अपने घर के आस पास ही काम करने के अवसर मिलें इससे सभी का भला हो सकता है यूपी में आदित्यनाथ सरकार ने जिस तरह से एक जिला एक उत्पाद की अवधारणा को मज़बूती के साथ आगे बढ़ाया है यदि उसे नौकरशाही से बचाया जा सका तो निश्चित तौर पर उसके सार्थक परिणाम सामने आयेंगें जिससे युवा खुद का काम शुरू करने के साथ कुछ लोगों के लिए रोजगार का सृजन करने की स्थिति में भी आ सकते हैं. यूपी जैसे राज्य में जिस तरह से हर स्तर पर आज भी भ्रष्टाचार पूरी तरह से व्याप्त है उस पर कडा प्रहार किए बिना स्थिति को सुधारा नहीं जा सकता है और यह योजना भी एक भ्रष्टाचार करने के अड्डे के रूप में विकसित हो सकती है जिससे किसी का लाभ नहीं होने वाला और बैंकों का क़र्ज़ एक बार फिर से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने की तरफ बढ़ सकता है. 
                  क्या केंद्र सरकार अपने सफ़ेद हाथी बन चुके कौशल विकास कार्यक्रम की समीक्षा करने को तैयार है जिसके माध्यम से जितने कुशल श्रमिकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की तरफ कदम बढ़ाये जाने थे आज वे कहीं ठिठके हुए ही अधिक नज़र आते हैं ? अच्छा हो कि युवाओं को सीमित संख्या में चिकित्सा, यातायात, सामान्य प्रशासन, कृषि, शिक्षा, समाज कल्याण, बाल एवं महिला कल्याण के कार्यक्रमों में कार्य करने के लिए प्रशिक्षित किया जाये जिससे समय आने पर आवश्यकतानुसार विभिन्न विभागों के कामों में कर्मचारियों के सहयोग के लिए उनका सीमित दिनों के लिए उपयोग किया जा सके। मनरेगा की तरह ही शिक्षित और प्रशिक्षित युवाओं  के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसा कार्यक्रम शुरू किया जा सकता है जिससे इनको घर बैठे बेरोजगारी भत्ता देने के स्थान पर माह में  १० दिन या आवश्यकता पड़ने पर उससे अधिक दिन भी काम कराया जा सके. इस तरह से प्रशिक्षण और विभागों के साथ काम कर चुके युवाओं को समय पड़ने पर सम्बंधित विभागों में नौकरियों निकलने पर उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप प्राथमिकता के आधार पर चयनित करने के बारे में भी सोचा जा सकता है। अच्छा हो कि इन सभी प्रयासों को केवल तात्कालिक उपायों के स्थान पर दीर्घकालिक योजना के अनुरूप देखा जाये जिससे समय आने पर युवाओं के साथ न्याय किया जा सके।
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