मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 8 February 2015

चुनाव के बाद की चुनौतियां

                                                इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि सत्ता में आने के लगभग ९ महीनों बाद भी केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर समग्र रूप से काम सिर्फ इसलिए ही शुरू नहीं हो पाता है क्योंकि हर दो महीनों के अन्तराल के बाद किसी न किसी राज्य में चुनाव होते ही रहे हैं. इसके लिए केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार नहीं माना जा सकता है पर देश के राजनैतिक ढांचे में यह एक कमी की तरफ ही अवश्य संकेत करता है जिसमें राजनैतिक दलों द्वारा विभिन्न समयों पर जन साधारण से जुडी हुई योजनाओं का चुनावी लाभ उठाने के कारण ही चुनाव आयोग विकास कार्यों को भी चुनाव आचार संहिता में बाँधने के लिए विवश हुआ है. दिल्ली चुनावों के बीच ही जिस तरह से बजटीय माहौल में केंद्र सरकार देश के विभिन्न सेक्टरों के विशेषज्ञों के साथ विचार विमर्श शुरू करने की तरफ बढ़ चुकी है तो उससे अब उसका उन वास्तविकताओं से सामना होना ही है जो आर्थिक मोर्चे पर देश के लिए एक चुनौती बने हुए हैं. यह मोदी सरकार का पहला बजट होगा क्योंकि पिछली बार तो महत्वपूर्ण हिस्सा यूपीए द्वारा ही तैयार किया गया था. इन चुनौतियों से निपटने के लिए राज्यों से जिस तरह से सहयोग की आवश्यकता है संभवतः उनके विरोधियों पर अधिक हमलावर रहने के कारण वह भी स्वतः नहीं मिलने वाला है.
                                     नीति आयोग की पूर्ण बैठक में राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ विचार विमर्श के लिए जिस तरह से एक दिन निर्धारित किया गया है उसमें क्या किया जा सकता है यह भी सोचने का विषय है क्योंकि राज्यों के स्तर पर केंद्र से जिस माहौल में संवाद होना चाहिए क्या वह कुछ घंटों की बैठक में सभी मुख्यमंत्रियों के साथ एक साथ संभव है ? इससे पहले योजना आयोग राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ अलग से बैठक कर उनकी योजनाओं के बारे में विचार विमर्श किया करता था और उनकी सहमति के साथ एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिशें भी किया करता था हालाँकि वह प्रक्रिया कभी भी पूरी तरह से निरापद नहीं कही गयी क्योंकि राज्यों द्वारा जितने धन का आवंटन माँगा जाता था उतना आम तौर पर उन्हें मिल नहीं पाता था. देश के महत्वपूर्ण अर्थशास्त्रियों के साथ पीएम की बैठक के बाद जो कुछ सामने आया है वह देश के लिए चिंताजनक ही कहा जा सकता है क्योंकि एक तरफ सरकार केवल बजटीय घाटे को नियंत्रित करने की कवायद करने में लगी हुई है और इसी क्रम में वह मनरेगा जैसी बड़ी और देश के ग्रामीण इलाके को आर्थिक रूप से सबल करने वाली परियोजनाओं के स्वरुप को बदलने में लगी है जबकि अर्थशास्त्री देश के आंतरिक आर्थिक परिदृश्य के जीवंत बने रहने के लिए इसके इसी रूप में चलाये जाने के पक्ष में हैं.
                                   देश के ग्रामीण इलाकों के आर्थिक स्वरुप को सँभालने और उसे ग्राम आधारित छोटी ही सही पर एक स्वनिर्भर अर्थ व्यवस्था बनाने में मनरेगा का जो योगदान रहा है वह पूरे विश्व में अपना लोहा मनवा चुका है इसे केवल इस आधार पर बंद करना या इनके बजट को सीमित करना कि इसमें भ्रष्टाचार बहुत अधिक होता है कहीं से भी सही नहीं है. आवश्यकता है कि सरकार देश के आंतरिक आर्थिक परिदृश्य को बदलने के लिए तेज़ी से काम करने वाली इस परियोजना को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की सभी कोशिशें करे और जिन राज्यों में इस तरह के भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाया जा पा रहा है केवल उनके बजट में इस तरह की कटौती करने के बारे में सोचा जाना चाहिए. किसी भी एक तरह की अर्थ व्यवस्था पर सभी अर्थशास्त्रियों की राय एक जैसी कभी भी नहीं हो सकती है पर किसी योजना के अधिकतर अच्छे प्रभाव को किन परिस्थितियों में कम किया जाना चाहिए यह भी कोई स्पष्ट रूप से बता नहीं सकता है. देश के ग्रामीण क्षेत्रों की क्रय शक्ति काम होने से क्या पूरे देश की आर्थिक प्रगति पर बुरा असर नहीं पड़ेगा यह तो अब पीएम, एफएम और उनके साथ  काम करने वाले अर्थशास्त्रियों को सोचना ही पड़ेगा.         
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