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गुरुवार, 30 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-5

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-4 से आगे........
                                               देश की सबसे पुरानी पार्टी जिसने देश की आज़ादी के लिए लम्बा संघर्ष किया और जिसने आज़ादी के बाद सबसे अधिक समय तक देश की सत्ता संभाली आज उसकी यह स्थिति आ गयी है कि दो लोकसभाओं में उसके पास नेता विरोधी दल का आधिकारिक पद भी नहीं बच रहा है तो उसको अपने पूरे संगठन से लगाकर शीर्ष स्तर पर नीतियां बनाने वाली हर समिति और उसमें शामिल रहने वाले नेताओं पर ध्यान देना ही होगा। यह सही है कि आम कांग्रेस कार्यकर्त्ता नेहरू-गाँधी परिवार को पार्टी में सबसे बड़ा मानता है पर क्या पार्टी में राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय नेता इस बात पर कभी ध्यान देते हैं कि आखिर उनकी जनता पर कितनी पकड़ है? क्या पार्टी में बड़े पदों को संभाल रहे यह लोग जो लम्बे समय तक केंद्र और राज्यों में मंत्री भी रह चुके हैं आज भी अपने को पार्टी के हित में ज़मीन पर उतारने का साहस रखते हैं जिससे उन्हें बदलते भारत और जनता की समस्याओं का सही तरह से आंकलन करने में सहायता मिल सके? क्या सत्ता के आदी हो चुकें नेताओं के लिए पार्टी कोई बड़ी चुनौती देकर उन्हें क्षेत्र में भेजना भी चाहती है या ये सिर्फ दिल्ली में  पार्टी मुख्यालय में सजावटी चेहरे बनकर पार्टी के लिए संघर्ष करने से दूर भागने वालों की एक जमात खडी करना चाहती है ?
                                      इस बार पार्टी की हार को लेकर राहुल गांधी की तरफ से जो कड़ा कदम उठाया जा रहा है उससे कांग्रेस खुद ही सकते में है क्योंकि पार्टी के राहुल से इस्तीफ़ा मांगने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी और इस अप्रत्याशित कदम से पार्टी की समझ में नहीं आ रहा है कि वह क्या करे ? राहुल की दूसरी शर्त जो मात्र सूत्रों के माध्यम सामने सामने आ रही है कि उनके परिवार से इतर अध्यक्ष खोजने का काम पार्टी को करना है उससे भी पार्टी को इस अँधेरी सुरंग से बाहर निकलने का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है. संभवतः राहुल पद से दूर रहकर राजनीति में सक्रिय रहने को प्रयासरत हों या हो सकता है कि आने वाले समय में पार्टी की कमान दूसरों के हाथों सौंप वे खुद केवल अपने क्षेत्र की राजनीति पर ही ध्यान देना शुरू करें। अमेठी में उनकी हार से उनका संगठन पर गुस्सा जायज़ भी है क्योंकि पूरे देश में प्रचार करने के लिए व्यस्त होने के चलते उनके पास अपने क्षेत्र के लिए समय कम था पर पार्टी के संगठन द्वारा भी उनको जिस तरह से अँधेरे में रखा गया वह भी अपने आप में बड़ी बात है और पूरे देश में संगठन का यही हाल हुआ पड़ा है यहाँ तक कि जिन तीन राज्यों में नवम्बर १८ के बाद सत्ता मिली है वहां भी संगठन का काम सुस्त या रुका पड़ा है.
                                       कांग्रेस को अपने को फिर से खड़ा करने की कोशिशों कोशिशों में  सबसे पहले उन राज्यों पर नज़र डालनी होगी जहाँ शीर्ष नेतृत्व को गलत सलाह देने के कारण राज्य के मज़बूत नेतृत्व वाले नेताओं ने अपने क्षेत्रीय संगठन बना लिए और आज वे वहां पर कांग्रेस के मुक़ाबले अधिक स्वीकार्य हैं. वाईएसआर कांग्रेस, एनसीपी और तृणमूल कांग्रेस के साथ पार्टी को सम्मानजनक तरह से उनकी राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए बात करनी चाहिए और उनके साथ किसी ऐसे समझौते पर पहुंचना चाहिए जिससे आने वाले समय में कांग्रेस की विचारधारा के पैरोकार ये दल भी कांग्रेस के सहयोगी बने न कि उसके प्रतिद्वंदी। यह भी निश्चित है कि आने वाले समय में कांग्रेस की विचारधारा से निकले ये दल यदि साथ आते हैं तो पार्टी के लिए मज़बूती का काम किया जा सकेगा।  कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व को अपने उन सलाहकारों से भी पीछा छुड़ाना होगा जिनके चलते ज़मीनी आधार वाले ये नेता अपनी उपेक्षा के चलते पार्टी से अलग हो गए . राहुल अध्यक्ष पद छोड़ते हैं या फिलहाल कार्यकारी अध्यक्ष बने रहते हैं यह सब तो भविष्य के गर्भ में है पर आज भी यदि राष्ट्रीय स्तर पर किसी ने नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले अपनी स्वीकार्यता साबित की है वह भी राहुल गाँधी ही हैं. यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला है कि वह किसे किस पद पर देखना चाहती है परन्तु यदि राहुल या आने वाले किसी अन्य अध्यक्ष को पार्टी में परिवर्तन करने से रोका जाता है तो अगली बार केरल में भी पार्टी अपनी स्थिति को खोने ही वाली है क्योंकि मोदी-शाह और संघ की प्राथमिकता पर पहले से ही केरल चल रहा है.                    
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बुधवार, 29 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-4

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-3 से आगे........

                                                                     आज जिस तरह से युवा पीढ़ी की ज़िंदगी में सोशल मीडिया का दखल हो गया है उसको देखते हुए अब कांग्रेस को अपने ज़मीनी संगठन को मज़बूत करने के प्रयासों के साथ ही अगले एक साल में हल ज़िले में सोशल मीडिया टीम का गठन करना चाहिए और उसके अगले साल में यह ब्लॉक और तहसील स्तर तक के कार्यकर्ताओं के लिए अपने बात कहने का मंच बनना चाहिए जिससे राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, प्रादेशिक और स्थानीय मुद्दों के साथ पार्टी अपने कार्यकर्ताओं से सीधे संपर्क बनाये रख सके. आवश्यकता पड़ने पर सोशल मीडिया के माध्यम से उपयोगी जानकारी भी निचले स्तर तक पहुंचाई जा सकती है. इस बार के चुनाव में कांग्रेस के तीन राज्यों में किसानों की कर्जमाफी के बाद ही मोदी सरकार ने किसान सम्मान निधि आम चुनाव से पहले देने का निर्णय किया जिसका लाभ भी उसे मिला पर कांग्रेस अपनी इस उपलब्धि को घोषणापत्र से आगे बढ़ाकर जनता तक नहीं पहुंचा पायी जिसे उसे नुकसान हुआ यदि पार्टी के पास सोशल मीडिया की संगठित टीम हो तो इस तरह की जानकारी को कार्यकर्ताओं के माध्यम से आम जनता तक आसानी से पहुँचाया जा सकता है.
                                    सभी जानते हैं कि भाजपा की सोशल मीडिया टीम निरंतर कांग्रेस से जुड़े आज़ादी के प्रतीकों पर सुनियोजित हमले किया करती है ऐसी परिस्थिति में जब तक कांग्रेस के पास भी उन बातों के बारे में फैलाये जा रहे भ्रम को दूर करने का काम नहीं किया जायेगा तब तक भाजपा जनता में कांग्रेस की और भी नकारात्मक छवि गढ़ने में सफल होती रहेगी। प्रतिकार करने के लिए जब सभी तैयारियां पूरी हो जाएँ तो भी सोशल मीडिया टीम को भाजपा की तरह अनाप-शनाप बातें करने के स्थान पर ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बात करनी होगी और भाषाई मर्यादा का सदैव ध्यान रखना होगा क्योंकि आज भाजपा के पास बहुत बड़ी टीम है जो तथ्यों की बात करने वालों पर अपने कुतर्कों से हमले करने के लिए सदैव तैयार रहती है इसलिए इस केंद्रीय टीम में कांग्रेस के इतिहास को जानने वाले लोग रखे जाएँ या जिन लोगों को यहाँ बैठाया जाये उनको पार्टी की तरफ से पार्टी और देश के इतिहास के साथ तथ्यात्मक जानकारी दी जाये जिससे वे परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठा सकें।
                                     आज संभवतः कुछ प्रदेशों में ही सोशल मीडिया टीम कुछ हद तक काम कर पा रही है क्योंकि यहाँ भी तथ्यों के बिना बात करने वाले लोग अपने आकाओं के आशीर्वाद से जमे बैठे हैं जिनसे पार्टी को किसी भी स्तर पर कोई लाभ नहीं मिलता है और सोशल मीडिया टीम केवल दिखावा बनकर ही रह जाती है. कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ी समस्या भाजपा से मुक़ाबला करना नहीं है बल्कि अपनी कमज़ोरियों से पार पाने की है क्योंकि आज पार्टी में जो शीर्ष नीति नियंता बने बैठे हैं उनका चुनावी राजनीति से कोई सीधा सरोकार नहीं है जिसके चलते उनको चुनाव लड़ने वाले नेताओं की उन समस्याओं का कोई अंदाज़ा भी नहीं है जिसका सामना उन्हें रोज़ ही करना पड़ता है. सबसे पहले कांग्रेस को उन राज्यों में अपने सगठन और सोशल मीडिया टीम को सुधारना चाहिए जहाँ अगले एक वर्ष में चुनाव होने वाले हैं. जनता केंद्रीय स्तर पर तो मोदी के साथ दिखाई देती है पर यदि सही राजनीति के साथ आगे बढ़ा जाए तो विधानसभाओं में वह कांग्रेस या अन्य दलों को भी समर्थन देती दिखाई देती है. कांग्रेस को तुरंत काम शुरू करते हुए इन राज्यों पर अधिक ध्यान देना ही होगा तभी वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का २०२४ में धरातल पर मुक़ाबला कर पाने की स्थिति में होगी.      
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मंगलवार, 28 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-3

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-2 से आगे
                                             शीर्ष स्तर पर कांग्रेस कार्यसमिति में जिस तरह से राहुल गांधी ने पार्टी की शर्मनाक पराजय के लिए खुद को ज़िम्मेदार मानते हुए इस्तीफ़ा दिया और उसे नामंज़ूर कर दिया गया उसके बारे में भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. देश के महत्वपूर्ण राज्यों में दशकों से सत्ता से बाहर होने के बाद भी आज जिस तरह से सीमित संख्या में बचे हुए कांग्रेसियों में केवल पद पर बने रहने की लालसा है यदि इस पर पूरी तरह से विराम नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में पार्टी की और भी दुर्दशा होने वाली है. आज देश के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है तो उसकी तरफ से उन राज्यों में आमूल-चूल परिवर्तन करते हुए अब पुराने जमे हुए घाघ नेताओं को पदों से हटाकर नए नेतृत्व को समाने लाने की कोशिश की जानी चाहिए। वर्षों से पदों पर बैठे इन चंद बड़े नामों के कारण ही पार्टी आगे नहीं बढ़ पा रही है जिससे ज़मीनी स्तर पर उसका जुड़ाव आम लोगों से भी नहीं हो पा रहा है. आज भाजपा जहाँ मज़बूत है वह वहां भी अपने संगठन पर संघ के सहयोग से बराबर स्थितियों को और भी मज़बूत बनाने का काम करने में निरंतर लगी रहती है जबकि पिछले वर्ष तीन राज्यों में चुनाव जीतने के बाद भी कांग्रेस की राज्य इकाइयों की तरफ से ऐसे कदम नहीं उठाये जा रहे हैं जिससे उन राज्यों में ही कांग्रेस और मज़बूती के साथ नए लोगों तक अपनी पहुच बना सके.
                                               आज जब भाजपा मोदी और शाह की जोड़ी के निर्देशन और नेतृत्व में निरंतर सफलता के नए आयाम छूती जा रही है तो उस परिस्थिति में नए लोगों को कांग्रेस से जोड़ना और भी बड़ी चुनौती होने वाला है. यदि कांग्रेस को सम्पूर्ण देश की राजनीति में एक बार फिर से प्रासंगिक होना है तो उसे अपने सेवा दल, महिला कांग्रेस, युवा कांग्रेस, छात्र कांग्रेस को पूरी तरह से सक्रिय करना ही होगा जिससे समाज के हर वर्ग के लोगों की समस्याओं के साथ संघर्ष करने की उसकी पुरानी भावना को ज़िंदा किया जा सके. राजनैतिक रूप से निर्णय लेने और उनके परिणामों के अनुरूप नेताओं की ज़िम्मेदारी तय करने के लिए अब कांग्रेस को खुद को तैयार करना ही होगा वर्ना आने वाले चुनावों में उसकी पराजय एक स्थायी भाव भी बन सकती है जिससे आज जो भी समर्पित कार्यकर्त्ता पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं वे भी पार्टी से किनारा करते नज़र आने लगेंगे। पार्टी को अंदरूनी समस्याओं से निपटने के लिए एक व्यवस्था बनानी होगी क्योंकि जो धरातल पर मज़बूत नेता हैं उसकी बातों को सुना जाना बहुत आवश्यक है. २०१३ के बाद से ऐसे बहुत से नेता सामने आये जिन्होंने नेतृत्व की तरफ से उपेक्षा के चलते पार्टी से किनारा कर लिया और आज वे भाजपा में जाकर महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए हैं. पार्टी को इस संकट को भी देखना होगा वर्ना गलत सलाहों पर लिए गए फैसलों से पार्टी का निरंतर नुकसान होता रहेगा।
                                             पार्टी में राहुल गांधी की लाख कोशिशों के बाद भी वह परिवर्तन नहीं आ पाया है जिसमें एक सामान्य कार्यकर्ता अपनी बात को पार्टी के मंच पर रखने के लिए कोई उपयुक्त मंच पा सकता हो जब तक ज़मीन से जुड़े नेताओं की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में पार्टी के बूथ मज़बूत नहीं हो सकते हैं. अगले कुछ वर्षों तक परिणामों की चिंता न करते हुए पार्टी को महत्वपूर्ण राज्यों में बदलाव को शुरू करना ही होगा यूपी जैसे राज्य में जहाँ से केंद्र की सत्ता के समीकरण बनते बिगड़ते हैं वहां राज्य का नेतृत्व किस तरह से काम करता है यह किसी से भी छिपा नहीं है. यदि  इसी तरह के सुविधाभोगी नेताओं के हाथों में पार्टी की कमान रहती है तो यूपी में पार्टी का अभी तक बचा हुआ ६% वोट भी छिटकने में देर नहीं लगने वाली है. जब देश की लगभग १५० सीटों यूपी-बिहार-बंगाल में पार्टी के पास कुछ बचा ही नहीं है तो उससे केंद्र में सत्ता पाने की आशा भी मृग मरीचिका से अधिक कुछ नहीं कही जा सकती है. राजनैतिक परिणामों में आज कांग्रेस निम्नतम स्तर पर पहुंची हुई है और यदि इस स्थिति में जल्दी ही बड़े बदलाव न किये गए तो आने वाले समय में पार्टी के कमज़ोर संगठन को पूरी तरह ध्वस्त होने में समय नहीं लगने वाला है.
क्रमशः .........                    
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रविवार, 26 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-2

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-1 से आगे ........        
                                      सबसे पहले कांग्रेस को अपने संगठन के बारे में सोचना होगा क्योंकि आज अधिकांश जगहों पर संगठन की जो स्थिति बनी हुई है उसके दम पर भाजपा के मज़बूत संगठन और संघ के जमीनी समर्थन का सामना नहीं किया जा सकता है. विचार करने योग्य यह भी है कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के चुनावी क्षेत्रों में संगठन की हालत इतनी कमज़ोर क्यों है जबकि उनके नाम पर पार्टी पूरे देश में जनादेश मांगती है?  कांग्रेस और देश में राजनीति का एक दौर वह भी था जब नीचे से आगे बढ़ने वाले कार्यकर्ताओं के लिए चुनावी राजनीति में हिस्सा लेने के लिए एक प्रक्रिया हुआ करती थी पर पिछले कुछ दशकों से इन बातों पर ध्यान देना बिलकुल ही बंद कर दिया गया है जिससे पार्टी का निचले स्तर का संगठन भी विपक्षियों के कमज़ोर होने और अपने नेता के प्रभाव के दम पर ही चुनाव लड़ने की प्राथमिकता में लगा था जिससे उसका जनता के सरोकारों से कोई मतलब ही नहीं रह गया और युवा पीढ़ी ने अपने को इस पूरी चुनावी प्रक्रिया में भाजपा के निकट पाया कर उसके लिए वोट भी किया। 
                                           इस मामले में यदि अमेठी को एक उदाहरण के तौर पर देखें तो वहां के संगठन को सदैव यही लगता रहता था कि यह पार्टी और गाँधी परिवार की सीट है इसलिए यहाँ उसे कोई खतरा नहीं है जिससे संगठन ने आम जनता से संवाद बनाये रखने को इतनी प्राथमिकता नहीं दी जितनी उसे मिलनी चाहिए थी. इसका परिणाम आज सबके सामने है क्योंकि कांग्रेस का संगठन वहां केवल राहुल के भरोसे ही रहा जबकि पिछली बार  १ लाख वोटों से हारने के बाद भी भाजपा ने स्मृति ईरानी के लिए खुलकर पूरे क्षेत्र में काम किया और इस बात का प्रचार भी किया कि गाँधी परिवार ने वहां के नागरिकों के लिए कुछ भी नहीं किया। आज की युवा पीढ़ी के लिए विकास की वही छवि बन रही है जो भाजपा बनाना चाह रही है क्योंकि कांग्रेस कहीं से भी इस बात का प्रतिकार करती हुई नहीं दिखाई दी कि राज्य में उसकी सरकार न होने के कारण केंद्र में सरकार होने पर भी वह क्षेत्र के लिए उतना काम नहीं कर पायी जितना राज्य में सरकार होने से संभव था. अमेठी में कांग्रेस की इस कमज़ोरी का भाजपा ने पूरा लाभ लिया और युवाओं की सोशल मीडिया में पैठ को देखते हुए राहुल गाँधी की नकारात्मक छवि बनाने में कोई कस्र भी नहीं छोड़ी। इस मामले कांग्रेस की हिचकिचाहट ने उसके लिए और भी अधिक समस्या खडी कर दी क्योंकि उसने पूर्व सांसद राम्या को सोशल मीडिया में सीमित काम करने को कहा जबकि उनके आने के बाद कांग्रेस की सोशल मीडिया टीम कई जगहों पर भाजपा की टीम पर बढ़त बनाने में सफल होती दिखाई दे रही थी.
                                       आज यह सवाल भी प्रासंगिक है कि अमेठी ने इतने वर्षों तक कांग्रेस को जितना सम्मान दिया क्या संगठन के रूप में पार्टी ने वहां के लोगों से पूरा संपर्क बनाये रखा?  निश्चित तौर पर राहुल गांधी के पास मूर्छा में पड़ी हुई कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम था और है पर क्या अमेठी की कांग्रेस कमेटी उनसे यह आशा करती है कि वे स्वयं पूरे देश के मुक़ाबले अमेठी में अधिक समय देने का काम करें?  अगर कांग्रेस के पास बूथ लेवल के माध्यम से संगठन को खड़ा करने का कोई प्लान है तो उसकी परीक्षा अमेठी में ही करनी होगी।  कांग्रेस के बड़े नेताओं को इस बार भाजपा ने जिस तरह से घेरने में सफलता पायी थी अगली बार वह इस कड़ी में और भी अधिक मुखर होने वाली है क्योंकि रायबरेली से २०२४ में सोनिया गाँधी चुनाव लड़ेंगीं या  नहीं अभी तय नहीं है पर पिछले चुनावों से इस बार के चुनावों तक उनकी जीत का अंतर तीन लाख से घटकर एक लाख साठ हज़ार पर आ गया है और मेरा यह मानना है कि भाजपा का पूरा ध्यान अब रायबरेली पर ही होने वाला है और यदि कांग्रेस संगठन ने अमेठी की तरह लापरवाही की तो निश्चित तौर पर अगली बार रायबरेली में भी अमेठी की कहानी दोहराई जाने वाली है. क्रमशः ......          
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शनिवार, 25 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-1

                                          देश में हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों में जिस तरह से पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के संयुक्त नेतृत्व में भाजपा ने अपनी सफलता के नए आयाम स्थापित किये हैं उनको देखते हुए आने वाले समय में भाजपा की रणनीति का ही पता चलता है जिसमें उसने आखिल भारतीय स्तर पर उसका मुक़ाबला करने की स्थिति में आ सकने वाली पार्टी कांग्रेस को परिणामों के अनुसार बहुत कमज़ोर स्थिति में पहुंचा दिया है. इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए कांग्रेस को गंभीर आत्ममंथन करने और कमियों को वास्तव में खोजने पर ध्यान देना ही होगा वर्ना पहले से कमज़ोर हुई कांग्रेस के लिए भाजपा के नेता-द्वय और भी बड़े संकट उत्पन्न करने से नहीं चूकने वाले हैं. यह बात सभी जानते हैं कि आखिर भारतीय स्तर पर केवल कांग्रेस के पास ही किसी न किसी स्तर पर संगठन और कार्यकर्त्ता मौजूद हैं जो एक सुसंगठित भाजपा के सामने कहीं ठहरते तो नहीं हैं फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वे एक विकल्प भी साबित हो सकते हैं. परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से कांग्रेस ने अपने संघर्ष करने की इच्छा को ही समाप्त कर रखा है उसमें उसकी और भी दुर्दशा होने से वह नहीं बच सकती है. 
                                मोदी-शाह की जोड़ी इस बात को अच्छी तरह समझती है कि आने वाले समय में यदि भाजपा के लिए कोई चुनौती बन सकता है तो उसमें केवल कांग्रेस का ही नाम है इसलिए वे प्रतीकात्मक तौर पर सधी हुई रणनीति के चलते कांग्रेस का मनोबल तोड़ने का काम करने में लगे हुए हैं जिसका लाभ उन्हें मिलने भी लगा है. इस चुनाव में गंभीरता से देखा जाये तो भाजपा ने अपना पूरा ध्यान कांग्रेस के उन बड़े नेताओं की सीटों पर लगाया जो भविष्य में उनके लिए चुनौती बन सकते हैं इस कड़ी में राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, दीपेंदर हुडा, सुष्मिता देव जैसे उन नामों पर अधिक ध्यान दिया जिनको हराने से कांग्रेस के मनोबल को तोडा जा सकता था और जो युवा होने के साथ संसद और सड़क पर अपनी बातों का प्रभाव दूसरों पर डालने में सक्षम भी दिखाई देते हैं. इस चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी ने कांग्रेस की इस मज़बूती पर सुनियोजित तरीके से प्रहार किया जिसका परिणाम सामने दिखाई दे रहा है. जातीय समीकरणों को साधते हुए जिस तरह से इन स्थानों पर ज़मीनी कार्यकर्ताओं को मज़बूती दी गयी उसके जवाब में उन्होंने अपने वोटों को परिणाम में बदलने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी।
           यदि कांग्रेस को आने वाले समय में अपनी बची हुई राजनैतिक ज़मीन को बचाये रखना है तो उसे पूरे देश में आगामी विधानसभाओं के कार्यकालों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न राज्यों में अपने संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन करना ही होगा क्योंकि जनता के मुद्दों पर बिना संघर्ष किये राजनीति करने वाले नेताओं के दिन अब समाप्त होने को हैं. इस संकट से बचने के लिए कांग्रेस को एक बार फिर से सदैव हमलावर रहने के स्थान पर मुद्दों पर आधारित राजनीति के अनुसार काम करने की नीति अपनाने होगी। कांग्रेस नेतृत्व को विभिन्न राज्यों में अपने दिखावे के लिए बनाये गए पार्टी अध्यक्षों से अगले एक महीने में ही पीछा छुड़ाना होगा जिससे नए नेतृत्व के लिए रास्ते खोले जा सकें।  जनता के मुद्दों से जुड़ने और विभिन्न स्थानों पर सड़कों पर संघर्ष करने के बाद ही अब कांग्रेस की स्वीकार्यता जनता में बन सकती है. पार्टी को सबसे पहले यूपी बिहार और बंगाल पर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि इन तीन महतवपूर्ण राज्यों में उसके पास कोई संगठन और मज़बूत नेता नहीं बचा है जो हर बात में बिना केंद्रीय नेतृत्व की तरफ देखे अपने स्तर से विभिन्न मुद्दों पर संघर्ष कर सके. लगभग १/३ लोकसभा सीटों पर अप्रासंगिक होकर कांग्रेस कभी भी भाजपा का सामना नहीं कर पायेगी क्योंकि इन राज्यों से ही भाजपा अपने को सत्ता के निकट पहुँचाने का काम करती हुई दिखाई देती है. क्रमशः ......                      
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