मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 25 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-1

                                          देश में हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों में जिस तरह से पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के संयुक्त नेतृत्व में भाजपा ने अपनी सफलता के नए आयाम स्थापित किये हैं उनको देखते हुए आने वाले समय में भाजपा की रणनीति का ही पता चलता है जिसमें उसने आखिल भारतीय स्तर पर उसका मुक़ाबला करने की स्थिति में आ सकने वाली पार्टी कांग्रेस को परिणामों के अनुसार बहुत कमज़ोर स्थिति में पहुंचा दिया है. इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए कांग्रेस को गंभीर आत्ममंथन करने और कमियों को वास्तव में खोजने पर ध्यान देना ही होगा वर्ना पहले से कमज़ोर हुई कांग्रेस के लिए भाजपा के नेता-द्वय और भी बड़े संकट उत्पन्न करने से नहीं चूकने वाले हैं. यह बात सभी जानते हैं कि आखिर भारतीय स्तर पर केवल कांग्रेस के पास ही किसी न किसी स्तर पर संगठन और कार्यकर्त्ता मौजूद हैं जो एक सुसंगठित भाजपा के सामने कहीं ठहरते तो नहीं हैं फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वे एक विकल्प भी साबित हो सकते हैं. परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से कांग्रेस ने अपने संघर्ष करने की इच्छा को ही समाप्त कर रखा है उसमें उसकी और भी दुर्दशा होने से वह नहीं बच सकती है. 
                                मोदी-शाह की जोड़ी इस बात को अच्छी तरह समझती है कि आने वाले समय में यदि भाजपा के लिए कोई चुनौती बन सकता है तो उसमें केवल कांग्रेस का ही नाम है इसलिए वे प्रतीकात्मक तौर पर सधी हुई रणनीति के चलते कांग्रेस का मनोबल तोड़ने का काम करने में लगे हुए हैं जिसका लाभ उन्हें मिलने भी लगा है. इस चुनाव में गंभीरता से देखा जाये तो भाजपा ने अपना पूरा ध्यान कांग्रेस के उन बड़े नेताओं की सीटों पर लगाया जो भविष्य में उनके लिए चुनौती बन सकते हैं इस कड़ी में राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, दीपेंदर हुडा, सुष्मिता देव जैसे उन नामों पर अधिक ध्यान दिया जिनको हराने से कांग्रेस के मनोबल को तोडा जा सकता था और जो युवा होने के साथ संसद और सड़क पर अपनी बातों का प्रभाव दूसरों पर डालने में सक्षम भी दिखाई देते हैं. इस चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी ने कांग्रेस की इस मज़बूती पर सुनियोजित तरीके से प्रहार किया जिसका परिणाम सामने दिखाई दे रहा है. जातीय समीकरणों को साधते हुए जिस तरह से इन स्थानों पर ज़मीनी कार्यकर्ताओं को मज़बूती दी गयी उसके जवाब में उन्होंने अपने वोटों को परिणाम में बदलने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी।
           यदि कांग्रेस को आने वाले समय में अपनी बची हुई राजनैतिक ज़मीन को बचाये रखना है तो उसे पूरे देश में आगामी विधानसभाओं के कार्यकालों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न राज्यों में अपने संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन करना ही होगा क्योंकि जनता के मुद्दों पर बिना संघर्ष किये राजनीति करने वाले नेताओं के दिन अब समाप्त होने को हैं. इस संकट से बचने के लिए कांग्रेस को एक बार फिर से सदैव हमलावर रहने के स्थान पर मुद्दों पर आधारित राजनीति के अनुसार काम करने की नीति अपनाने होगी। कांग्रेस नेतृत्व को विभिन्न राज्यों में अपने दिखावे के लिए बनाये गए पार्टी अध्यक्षों से अगले एक महीने में ही पीछा छुड़ाना होगा जिससे नए नेतृत्व के लिए रास्ते खोले जा सकें।  जनता के मुद्दों से जुड़ने और विभिन्न स्थानों पर सड़कों पर संघर्ष करने के बाद ही अब कांग्रेस की स्वीकार्यता जनता में बन सकती है. पार्टी को सबसे पहले यूपी बिहार और बंगाल पर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि इन तीन महतवपूर्ण राज्यों में उसके पास कोई संगठन और मज़बूत नेता नहीं बचा है जो हर बात में बिना केंद्रीय नेतृत्व की तरफ देखे अपने स्तर से विभिन्न मुद्दों पर संघर्ष कर सके. लगभग १/३ लोकसभा सीटों पर अप्रासंगिक होकर कांग्रेस कभी भी भाजपा का सामना नहीं कर पायेगी क्योंकि इन राज्यों से ही भाजपा अपने को सत्ता के निकट पहुँचाने का काम करती हुई दिखाई देती है. क्रमशः ......                      
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सोमवार, 5 जनवरी 2015

राष्ट्रीय मतदाता सूची और सुधार

                                             केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने एक नए आदेश के माध्यम से मुख्य निर्वाचन कार्यालय आने वाले समय में एक राष्ट्रीय मतदाता सूची बनाने की दिशा में काम करना शुरू करने जा रहा है जिससे किसी भी मतदाता को अपने नाम से सम्बंधित किसी भी सूचना के लिए एकल खिड़की उपलब्ध हो जाएगी और वह वहीं से अपनी मतदाता सूची से जुडी हुई किसी भी जानकारी के बारे में सब कुछ जान सकेगा तथा इस केंद्र के माध्यम से वह किसी भी तरह की गलती का संशोधन भी करवा सकने में समर्थ हो सकेगा. इस पूरी कवायद में सभी तरह की जानकारी को राष्ट्रीय डेटा बैंक के रूप में संरक्षित भी किया जायेगा जिससे केंद्रीय स्तर की इस सूची का पूरा लाभ देश के मतदाताओं को मिल सके और वे अपने किसी भी तरह के संशोधन के लिए चुनावों के आने का इंतज़ार न करते रहें. देश में अब इस तरह की सूची की बहुत आवश्यकता है पर चुनाव सम्बन्धी सुधारों के लिए राजनैतिक दलों की कमज़ोर इच्छाशक्ति इसमें सदैव ही बाधा बनती रहती है.
                             आम तौर पर देश में लागू त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में जिस तरह से तीन तरह की मतदाता सूचियाँ बनायीं जाती हैं अब उनको भी एकीकृत करने का समय आ गया है क्योंकि इन सूचियों में जिस स्तर पर घालमेल और अनियमितताएं की जाती हैं वह किसी से भी छिपी नहीं हैं. खुद पीएम के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में जिस तरह से तीन लाख से भी अधिक फ़र्ज़ी वोटर्स पाये गए और उसके बाद ढाई लाख वोटर्स लखनऊ में भी मिले तो इससे आयोग की निष्पक्ष चुनाव कराने की मंशा पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है. इन सूचियों का नियमितीकरण राज्य स्तर के कर्मचारी ही किया करते हैं जिससे सत्तारूढ़ दलों पर ही यह आरोप लगा करते हैं कि सभी फ़र्ज़ी वोटर उनके द्वारा ही बनवाए गए हैं जबकि सभी राजनैतिक दल इस तरह की फ़र्ज़ी कवायद में अपने कार्यकर्ताओं के साथ जुड़े रहते हैं. यह तो एक चुनाव में ही फ़र्ज़ी वोटर्स की संख्या है और किस तरह से अन्य चुनावों में एक व्यक्ति शहरी निकाय और ग्रामीण पंचायतों में भी दोहरा वोटर हैं इस बात पर कुछ भी नहीं किया जा रहा है.
                             देश का कानून किसी भी व्यक्ति को कहीं से भी वोटर बनने की अनुमति देता है पर साथ ही उसके दो स्थानों से किसी के वोट पाये जाने को दंडनीय अपराध भी माना गया है पर आज के समय में शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के पैतृक ग्राम सभाओं में भी वोट बने रहते हैं तथा कोई भी इन वोटों को हटवाने के बारे में कभी भी नहीं सोचता है और इस तरह से वह दंडनीय अपराध भी कर देता है. इस बारे में सभी को उपयुक्त मंचों से व्यापक रूप से जागरूक करने की कोशिश करनी चाहिए तथा हर संशोधन से पहले और बाद में भी किसी सरल तरीके से अपनी स्थिति जांचने की सुविधा भी देनी चाहिए. जानबूझकर या विद्वेषवश दोहरे वोट बनवाने की स्थिति में वोटर फॉर्म जमा करने वाले कर्मचारी के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करने के निर्देश भी दिए जाने चाहिए जिससे वे इस महत्वपूर्ण काम में किसी भी तरह की लापरवाही न बरतने पाएं. आज देश के लिए हर स्तर पर सुधार करने की आवश्यकता है और केवल चुनाव आयोग ही इसे नहीं कर सकता है जब तक इसे जनआंदोलन बनाकर जनता को इससे नहीं जोड़ा जायेगा तब तक किसी भी स्तर पर सूचियों को पूरी तरह से सही करने में सफलता नहीं मिलने वाली है.    
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गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

ज़िम्मेदार पद और बयानबाज़ी

                                                    एक बार फिर से बड़बोले भाजपा नेताओं के बयानों के चलते सरकार को लोकसभा में असहज स्थिति का सामना करना पड़ा जबकि निरंजन ज्योति के मामले में अभी तक जारी गतिरोध को पूरी तरह से समाप्त करने में सरकार को कामयाबी नहीं मिल पायी थी. रविवार को कोलकाता की बहु चर्चित रैली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जिस तरह से स्पष्ट रूप से टीएमसी पर यह आरोप लगाया था कि शारदा घोटाले में काले धन का उपयोग देश विरोधी तत्वों के द्वारा किया गया और इससे बांग्लादेश के माध्यम से भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियाँ चलाने वाले संगठनों को मदद की जा रही थी. देश की सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष और पीएम के सबसे विश्वासपात्र व्यक्ति द्वारा यह बयान देना अपने आप में एक बहुत बड़ी खबर थी क्योंकि अब भाजपा केवल एक राजनैतिक दल नहीं है वह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सत्ताधारी पार्टी भी है और उनकी तरफ से अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर आने वाले इस तरह के किसी ही बयान का बांग्लादेश के साथ संबंधों पर विपरीत असर पड़ सकता है.
                                       आज जब पीएम की कुर्सी पर बैठने के बाद खुद नरेंद्र मोदी को इस बात का रोज़ ही एहसास हो रहा है कि देश की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मज़बूत छवि बनाने के लिए जितनी लगन से मनमोहन सिंह से काम किये थे यदि भाजपा केवल राजनैतिक विरोध को छोड़कर उस दिशा में सिर्फ आगे बढ़ने के बारे में ही सोच ले तो देश को बहुत आगे ले जाता जा सकता है. आज भी पिछले डेढ़ वर्षों में जिन मुद्दों पर भाजपा ने केवल राजनीति की थी आज वह वास्तविकता का सामना कर रही है क्योंकि विपक्ष में बैठकर कुछ भी कह देना आसान होता है पर जब देश को चलाने की ज़िम्मेदारी आती है तो उस अराजकता के साथ काम नहीं किया जा सकता है. बंगाल में स्थानीय निकाय चुनावों में केवल अपनी पार्टी को मज़बूत करने के लिए अमित शाह ने जिस तरह से बयान दिए उससे भाजपा और पीएम की छवि को ही धक्का लगा है और अमित शाह की विश्वसनीयता पर बड़े प्रश्नचिन्ह लगे हैं. राजनीति करने के लिए देश में मुद्दों की कमी नहीं है पर भाजपा के इस तरह के आचरण के चलते ही पिछली सरकार को काम करने में काफी दिक्कतें हुई थीं.
                                     अब समय है कि शीर्ष पदों पर बैठे हुए या अन्य स्थानों पर राजनीति में शामिल लोग अपने बयानों को केवल तालियां बज़वाने तक सीमित न रखें और मुद्दों को गंभीरता को भी समझने का प्रयास करें. स्थिति यहाँ तक है कि किसी भी स्तर पर सरकार के लोकसभा में अमित शाह के बयान विपरीत बयान दिए जाने के कारण सरकार के मुखर मंत्री वेंकैया नायडू भी झल्ला गए और यहाँ तक कह दिया कि क्या वे अपने अध्यक्ष के खिलाफ टिप्पणी करें ? ऐसा नहीं है कि मोदी और शाह को यह सब पता नहीं है पर वे आम वोटरों की मानसिकता के अनुसार वही बातें करते हैं जिनसे वोटर खुश होते हैं रैलियों में माहौल बनाना ज़रूरी होता है पर इस तरह से समाज और राजनीति में गहरा विभाजन कर अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर भी अनावश्यक बयानबाज़ी करने की भाजपाइयों की आदत कभी न कभी सरकार के लिए बड़ी परेशानी का कारण भी बन सकती है. अच्छा हो कि इस बारे में पीएम खुद ही एक स्पष्ट दिशा निर्देश जारी कर दें और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की समझ न रखने वाले नेताओं को इन पर बयान देने से रोकने का पूरा प्रबंध उसी तरह से करें जैसे निरंजन ज्योति के मामले में उन्होंने किया है.                     
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बुधवार, 26 जनवरी 2011

राष्ट्रीय मतदाता दिवस....

                     देश में राजनीति के प्रति लोगों की उदासीनता को देखते हुए २५ जनवरी को देश में मतदाताओं को जागरूक करने के लिए राष्ट्रीय मतदाता दिवस मनाये जाने का संकल्प लिया गया है पर क्या मात्र इस कदम से देश में मतदाताओं में कोई जागरूकता आने वाली है ? शायद नहीं क्योंकि हम भारत के लोग कभी भी किसी बात को संजीदगी से तब तक नहीं लेते हैं जब तक पानी सर से ऊपर नहीं हो जाता है ? देश में गाँवों आदि में तो फिर भी लोग वोट देने के लिए चले जाते हैं पर हमारे तथाकथित पढ़े लिखे सभी समाज की चुनावों में क्या भूमिका होती है उसको हम सभी जानते हैं ? आज के समय में हर व्यक्ति सरकारों को कोसते हुए मिल जायेगा पर जब सरकार चुनने का समय आता है तो हम घरों में क़ैद होकर किसी फिल्म का लुत्फ़ उठा रहे होते हैं ? क्यों आख़िर देश को चलाने का ज़िम्मा केवल कुछ लोगों के हाथ में जाने देना हमें अच्छा लगता है ? जब भी समय आता है अच्छों को चुनने का तब हम किस दड़बे में घुस जाते हैं ?
           देश में चुनाव आयोग और कोई भी सरकार केवल चुनाव के आयोजन तक ही अपनी भूमिका अदा कर सकते हैं पर उसका सदुपयोग करना हमारा दायित्व है. आज अगर कहीं पर कोई अनियमितता है तो वह केवल इसलिए है कि हम उसके प्रति उदासीन हैं. अगर हम अपने वोट का प्रयोग करना सीख जाएँ तो समाज से ख़राब लोगों का चुन कर आना काफी हद तक कम हो सकता है ? आख़िर क्या कारण है कि बिहार में भी लोग उठ खड़े हुए ? सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वे रसातल तक पहुँच चुके थे और उन्होंने अपने मताधिकार का प्रयोग करके अपनी स्थिति को सुधारने का काम खुद ही किया. आज देश में मताधिकार को भी आवश्यक कर दिया जाना चाहिए और जो भी वोट डालना चाहे उसको कई दिन मिलने चाहिए. तकनीकी के क्षेत्र में देश की मेधा का उपयोग करके हम चुनावों को और अधिक सुरक्षित और आसान बना सकते हैं. वोट न डालने वालों के सभी नागरिक अधिकार अगले ५ साल तक वापस ले लिए जाने चाहिए जिससे लोगों को यह समझ में आ सके कि वोट देना कितना आवश्यक है. बिना किसी उचित कारण के वोट न देने वालों पर जुर्माना भी लगाया जाना चाहिए केवल आधी आबादी के वोटों से चुनी गयी अधकचरी सरकारें आख़िर कैसे पूरे देश के बारे में सोच सकती हैं ?
               इस देश में बिना दंड दिए कुछ भी नहीं ओ सकता है इसलिए वोट न देने वालों पर भी कुछ सख्ती की जानी चाहिए और साथ ही वोट देने का काम केवल एक दिन की जगह कई दिनों में करना चाहिए और अगर हो सके तो प्रयोग के तौर पर कुछ जगहों पर वैकल्पिक ऑनलाइन वोट देने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए जब यह प्रयोग कुछ हद तक सफल लगे तो जो लोग लाइन में लगकर वोट देने नहीं जाते हैं उनको इस तरह से वोट देने का अवसर देने का प्रयास भी किया जाना चाहिए. देश में बहुत सारे मतदाता केंद्र बनाए के स्थान पर जहाँ पर संभव हो सचल मतदाता केंद्र बनाये जाए और राष्ट्रीय पहचान संख्या आने के बाद किसी भी वोटर को ऑनलाइन वोट देने के लिए वहां पर बुलाया जाए. उससे एक तो फर्जी वोट नहीं पड़ सकेंगें और कोई भी वोट देने से किसे को रोक भी नहीं पायेगा. जो मशीन चुनाव करने के लिए लायी जाती है उसको ही नेट से जोड़कर मतदाता को मत देने का अधिकार दिया जाए. शुरू में यह काम अधिक कठिन लगेगा पर जब देश के सभी नागरिकों का डाटा बन जायेगा तो कोई भी किसी भी तरह से फर्जी वोट नहीं डाल पायेगा. आज देश के ७० % भाग में नेट की पहुँच हो चुकी है तो इतने बड़े हिस्से में यह प्रयोग करने में कोई कठिनाई नहीं होने वाली है. इससे सबसे बड़ी बात जो यह होगी कि देश का कोई भी मतदाता अपने चुनाव क्षेत्र का कोड बताकर कहीं पर अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकेगा और अनावश्यक रूप से जो पैसा सुरक्षा आदि में खर्च होता है वह भी बच जायेगा. फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि जागो मतदाता जागो ...   


     
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