मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 7 July 2012

अनाज भण्डारण और शौचालय

             केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने पीने योग्य पानी और स्वच्छता पर एक समीक्षा बैठक में यह कहकर आये हुए प्रतिनिधियों को चौंका दिया कि केन्द्रीय सहायता से बनाये गए शौचालयों का उपयोग गाँवों में अनाज के भण्डारण में अधिक किया जा रहा है और इसका शौचालय के रूप में उपयोग बहुत कम जगहों पर ही हो रहा है. यहाँ पर सवाल यह नहीं है कि जब गाँवों में लोगों ने सरकारी सहायता का उपयोग करके इन्हें बनवा लिया है तो इनका दूसरे कामों में उपयोग क्यों किया जा रहा है बल्कि यह है कि आख़िर गांवों में लोगों में इस बात के लिए जागरूकता कब आएगी कि उन्हें खुले में शौच जाने के स्थान पर इन नए बनाये गए शौचालयों का उपयोग करना चाहिए ? सरकारें इस तरह के कामों के लिए धनराशि या सहायता ही उपलब्ध कर सकती हैं पर जब तक लोगों में जागरूकता ही नहीं होगी तब तक किस तरह से इस तरह की योजनाओं का सही लाभ सही जगह तक कैसे पहुँच पायेगा ?
         अभी तक देश के ग्रामीण अंचलों में खुले में शौचालय जाने की आदत लोगों में रही है और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि देश की लगभग ६० % जनता खुले में ही शौच जा रही है और इसका सामजिक प्रभाव ऐसा है कि जिन जगहों पर शौचालय बन भी गए हैं वहां भी अभी तक इनका उपयोग लोगों ने करना नहीं शुरू किया है. आंकड़ों के अनुसार आबादी के अनुसार बड़े राज्यों में पूर्ण रूप से खुले में शौच जाने से रोकने के लिए संसाधनों को उपलब्ध करवाने में अभी १५ वर्ष और लगने वाले हैं और इस बार की कोई गारंटी नहीं है कि जब ये शौचालय उपलब्ध हो जायेंगें तब गाँव में रहने वाले इनका उपयोग भी शुरू कर देंगें ? इस बारे में सामाजिक जागरूकता के साथ शिक्षा के प्रसार की बहुत आवश्यकता है क्योंकि जब तक इन ग्रामीण लोगों को खुले में शौच जाने के नुकसान नहीं समझ आयेंगें तब तक किसी भी परिस्थिति में इस समस्या को ख़त्म नहीं किया जा सकेगा.
          ऐसा नहीं है कि इस दिशा में केंद्र और राज्यों की सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं फिर भी इस जागरूकता को जिस स्तर पर फैलना चाहिए थे वह उस स्तर पर नहीं फ़ैल पा रही है जिससे देश आंकड़ों में आज भी उतना ही पिछड़ा माना जाता है जितना कि वास्तव में वह है नहीं. ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा नहीं है कि लोग केवल गरीबी के कारण ही खुले में शौच जाते हैं बल्कि अधिकतर स्थानों में आर्थिक रूप से संपन्न लोग भी खुले में ही शौच जाने को एक परंपरा मानते हैं. अब इस तरह के सामाजिक बन्धनों और परम्पराओं को ख़त्म करने का समय आ गया है क्योंकि महिलाओं के खुले में शौच जाने से उनके ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों की सम्भावना हमेशा ही बनी रहती है. ऐसी स्थिति में जब गाँव के लोगों को यह ख़ुद ही समझ में आ जायेगा कि खुले में शौच जाने से सामजिक और स्वस्थ्य सम्बन्धी समस्याएं फ़ैल सकती हैं तो वे स्वयं ही इस बारे में विचार कर इस पर अमल करने का प्रयास करेंगें और तभी इस अभियान को पूरी सफलता भी मिल पायेगी.
 
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