मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 31 December 2015

महाराष्ट्र और किसान

                                                            पूरे वर्ष में लगभग तीन हज़ार किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने की ख़बरों के बीच जिस तरह से केंद्र सरकार की तरफ से ३१०० करोड़ रुपयों की मदद की गयी है वह राज्य में राजनीति का नया मुद्दा भी बन गया है क्योंकि सरकार में भागीदार शिवसेना ने भी राज्य के लिए ५०००० करोड़ के पैकेज की मांग की थी. यह सही है कि सूखे और मौसम के विपरीत प्रभाव के चलते देश के कई राज्यों में किसानों के लिए संकट लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं जबकि सरकारी स्तर पर जो कुछ भी किया जा रहा है वह समस्या के समाधान के स्थान पर केवल तत्कालिक आवश्यकता की पूर्ति की तरफ जाता हुआ ही दिखाई दे रहा है. इस तरह की विपरीत परिस्थिति में यदि केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से किसानों को खेती की आधुनिकतम तकनीक के साथ परंपरागत खेती की तरफ बढ़ाया जाए तो क्या उससे इनकी स्थिति में कुछ परिवर्तन समभाव है ? आज भी किसानों के नाम पर जिस तरह से केवल दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में बैठे हुए कुछ अधिकारी और नेता पूरी नीति बना डालते हैं क्या वे देश की ज़मीनी स्थिति से मेल भी खाते हैं इस सवाल का जवाब आज किसी भी सरकार के पास नहीं है और दुर्भाग्य से कोई भी नेता या अधिकारी इस बात के लिए जागरूक तथा प्रयासरत भी नहीं दिखाई देता है.
                                    देश में सरकारें बदलने का किसानों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और सत्ता के गलियारों में बैठे हुए नेता अपनी सीमित सोच के साथ अधिकारियों पर हावी रहा करते हैं जिससे सही नीतियां बनाये जाने के स्थान पर केवल मंत्रियों और राजनैतिक प्रतिष्ठान को खुश करने की नीतियां ही अधिक बनायीं जाती हैं. लम्बे समय से महाराष्ट्र के किसानों का मुद्दा राज्य की विधान सभा से लगाकर लोकसभा तक गूंजता रहा है और इस बीच केंद्र और राज्य में सत्ता परिवर्तन भी हो गया है पर किसानों की अनदेखी किये जाने का सवाल अभी भी उसी तरह से अनुत्तरित है. अब इस बारे में गंभीरता से सरकारी नीतियों पर विचार करने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक सरकार की तरफ से समस्या के सही मूल को खोजने के बारे में नहीं सोचा जायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में पूरी व्यवस्था को सुधारा नहीं जा सकता है और किसानों के परिवारों को इस तरह के संकट का सामना करने के लिए विवश होना ही पड़ेगा. खेती में जिस स्तर पर परिवर्तन किये जाने की आवश्यकता और सरकारी सहयोग की अपेक्षा है भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान उसमें पूरी तरह से चूकते हुए ही नज़र आ रहे हैं.
                            यदि कांग्रेस की नीतियों में कोई कमी थी तो पिछले डेढ़ साल में भाजपा की सरकारों ने वहां पर क्या उपलब्धि हासिल की है यह केवल वाद विवाद और राजनीति का विषय ही हो सकता है क्योंकि यदि मामला किसी एक राजनैतिक दल से जुड़ा हुआ होता तो परिवर्तन की शुरुवात हो चुकी होती पर यह पूरा मसला ही अव्यवस्था से जुड़ा हुआ है और इसे सुधारने के लिए अब सरकार को नए सिरे से सोचने की आवश्यकता भी है. पुरानी लीक पर चलने के स्थान पर अब सरकार को इस बारे में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सूखे से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों के लिए स्थानीय स्तर पर उपयोगी वस्तुओं की खेती करने के बारे में प्रोत्साहित करने के बारे में सोचना चाहिए और उसके परिणामों पर विचार करते हुए ही अन्य सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए नीतियां बनानी चाहिए पर सरकारें इस मामले में केवल आर्थिक सहायता और ऋण माफ़ी तक ही अपनी भूमिका को सीमित करने में खुश हो जाती है जिससे भी समस्या का सही समाधान नहीं दिखाई देता है. देश के किसानों को इस तरह तात्कालिक सहायता के स्थान पर पूरी तरह से नयी कारगर नीति के बारे में सरकार को नए सिरे से सोचने से ही सही समाधान को खोजा जा सकता है वर्ना इस मुद्दे पर आत्महत्या करते किसानों को लोकतंत्र के मंदिरों में नेता श्रद्धांजलि देकर अपने कर्तव्य में तो लगे ही हैं.     
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