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Friday, 1 January 2016

दिल्ली प्रदूषण पर राजनीति

                                    दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा कड़ी फटकार मिलने के बाद केजरीवाल सरकार ने जिस तरह से १५ दिनों के लिये सम-विषम के फॉर्मूले से वाहन चलाने और प्रदूषण से निपटने की कोशिश शुरू की है उसकी सफलता पूरी तरह से आने वाले समय में जनता के सहयोग और दिल्ली पुलिस के साथ दिल्ली सरकार के तालमेल पर ही निर्भर करने वाली है. आज जिस तरह से इस योजना को प्रायोगिक तौर पर कुछ सख्ती और कुछ सीख के साथ लागू करवाने के लिए दिल्ली सरकार प्रयासरत दिखाई दे रही है वह आने वाले समय में दिल्ली की दूषित हवा को सुधारने का काम भी करने वाली है. पूरे विश्व में प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जिससे निपटना सभी के लिए चुनौती बना हुआ है इस परिस्थिति में यदि दिल्ली सरकार अपने स्तर से इस तरह के प्रयास करने में लगी है तो केंद्र सरकार और अन्य सभी सम्बंधित एजेंसियों को भी इसकी सफलता के लिए काम करने और सहयोग करने की आवश्यकता भी है. दिल्ली सरकार के इस प्रयास पर केंद्र सरकार की चुप्पी संदेह पैदा करती है क्योंकि दिल्ली को प्रदूषण मुक्त रखना केवल दिल्ली सरकार की ही ज़िम्मेदारी नहीं है और इससे निपटने के लिए सभी लोगों के बीच सामंजस्य होना भी आवश्यक है.
                                ऐसी स्थिति में जब केजरीवाल के पास करने के लिए कुछ ख़ास नहीं है तो दिल्ली की जनता पर ही यह निर्भर करने वाला है कि वह अपनी भावी पीढ़ी को इसी गैस चैम्बर में घुटने के लिए छोड़कर जाना चाहती है या फिर अपने प्रयासों से आने वाले समय में इसकी हवा में घुलें ज़हर को कम करने के लिए कुछ प्रयास भी करना चाहती है ? जन सामान्य से जुड़े हुए कानूनों की देश भर में जिस तरह से धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं उसके चलते यदि सरकार का यह प्रयास भी पूरी तरह से विफल हो जाये तो इसमें केजरीवाल को दोष देना सही नहीं होगा क्योंकि दिल्ली में भाजपा और कांग्रेस पर भी यह ज़िम्मेदारी आती है कि वे भी अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से इस मुहिम को सफल बनाने के लिए प्रयास करें. आज यदि केजरीवाल सरकार में हैं तो कल कोई दूसरा भी हो सकता है पर सभी दलों को यह याद रखना चाहिए कि जनता को साफ़ हवा उपलब्ध कराने का बड़ा काम केवल एक दिन में नहीं किया जा सकता है. इस मामले पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से जुड़े हुए मंत्री भी बहुत ठंडा उत्साह दिखाते हैं उससे यही लगता है कि यह ईमादार प्रयास कहीं नेताओं की घटिया राजनीति की भेंट न चढ़ जाये.
                               केजरीवाल की तरफ से हर संभव प्रयास किये जा रहे हैं और इस प्रयोग को सफल बनाकर आने वाले समय में इसे पूरी तरह से लागू करवाने की पूरी ज़िम्मेदारी अब दिल्ली पर ही है. यह सही है कि दिल्ली में आज भी सार्वजनिक परिवहन की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है पर संकल्प के साथ बढ़ाये गए क़दमों से इस समस्या से निपटा भी जा सकता है. दिल्ली मेट्रो के आने के बाद दिल्ली के सड़क परिवहन पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था संभवतः उतना नहीं दिया जा सका और पूरे देश से लोगों को काम के सिलसिले में लालायित करने वाली दिल्ली की तरफ तेज़ पलायन ने भी सरकारी प्रयासों को कम साबित कर दिया है. इस समस्या से निपटने के लिए अब दिल्ली में डीटीसी के ढांचे को मज़बूत करने के साथ महत्वपूर्ण स्थानों से दिल्ली के अन्य भागों तक उसकी सुविधा को और भी बेहतर करने की आवश्यकता भी है क्योंकि जिस योजना के दम पर प्रदूषण से निपटने की कोशिशें की जाती हैं बढ़ते पलायन और औद्योगिकीकरण के चलते वह और भी बढ़ता ही जाता है. इस मामले में प्रदूषण से निपटने के लिए एक दीर्घकालिक नीति बनाकर उस पर चरणबद्ध तरीके से अमल करने की आवश्यकता भी है क्योंकि केवल सरकार के कानून बनाने और आर्थिक दंड के चलते किसी समस्या से निपटना कभी भी कारगर साबित नहीं हो सकता है इसके लिए अब दिल्ली को सब कुछ भूलकर केवल प्रदूषण से मिलकर लड़ाई लड़ने के लिए तैयार होना पड़ेगा.     
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