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Wednesday, 30 December 2015

छत्तीसगढ़ के प्रेमनगर की समस्या

                                                        आम तौर पर जहाँ देश भर में ग्राम सभाएं खुद को नगर पंचायत में बदलवाने के लिए लालायित रहा करती हैं वहीं छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले की प्रेमनगर नगर पंचायत में अलग तरह की समस्या सामने आने के बाद वहां के नागरिक इस फिर से ग्राम सभा के रूप में अनुसूचित किये जाने की मांग कर रहे हैं. इस पूरे विवाद के पीछे आज के आधुनिक विकास और आदिवासियों तथा जनजातियों के बीच के पुराने अधिकारों को लेकर लम्बी खींचतान मची हुई है क्योंकि अभी एक इस पूरी कवायद के पीछे रमन सिंह सरकार की जो मंशा सामने आ रही है वह पूरे देश के लिए चिंता का विषय भी है. अभी तक के कानून के अनुसार जनजातीय इलाकों में किसी भी तरह से बड़ी परियोजना लगाये जाने के लिए स्थानीय ग्राम पंचायतों की सहमति आवश्यक होती है जबकि इस मामले में सरकार की तरफ से जो कुछ भी किया जा रहा है वह कहीं से भी लोकतंत्र के लिए हितकर नहीं कहा जा सकता है. शहरों के विकास के लिए ग्रामीण और अनुसूचित क्षेत्रों के उपयोग में इस तरह से कानूनी चालबाजियां करके रमन सरकार स्थानीय आदिवासियों को क्या सन्देश देना चाहती हैं यह अभी भी स्पष्ट नहीं है.
                                इस मामले की शुरुवात २००५ में छत्तीसगढ़ सरकार ने इफको के सहयोग से इस क्षेत्र में १३२० मेगावॉट की एक बड़ी विद्युत परियोजना को लगाने की घोषणा के साथ हुई थी पर आज के कानून के अनुसार प्रेमनगर ग्राम सभा में एक दर्ज़न बार इस योजना के लिये प्रस्ताव लाये जाने के बाद भी जिस तरह से ग्राम सभा ने स्थानीय आदिवासियों के हितों में इसका अनुमोदन करने से साफ़ मना कर दिया तो उसके बाद २००९ में छत्तीसगढ़ सरकार ने दूसरा अभूतपूर्व रास्ता अपनाते हुए इस ग्राम सभा को ही नगर पंचायत के रूप में अधिसूचित कर दिया जिसके बाद यह क्षेत्र आदिवासी कानून से बाहर हो गया साथ ही ग्रामीणों की वे सुविधाएँ भी छीन ली गईं जो उन्हें एक ग्रामवासी के रूप में मिला करती थीं साथ ही इस क्षेत्र में भूमि उपयोग के लिए अब राज्य सरकार के पास पूरे अधिकार भी आ गए जो अभी तक ग्राम पंचायत के पास सुरक्षित हुआ करते थे. क्या एक चुनी हुई राज्य सरकार को ग्राम सरकार की मंशा के विपरीत इतने बड़े कदम को उठाने का अधिकार होना चाहिए आज यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हो गया है.
                            रमन सरकार का यह काम निश्चित रूप से किसी भी स्तर पर सही नहीं कहा जा सकता है क्योंकि पहले से ही माओवादियों और नक्सलियों के प्रभाव वाले इस राज्य में आदिवासियों की भूमि इस तरह से छीन कर क्या सरकार सही रास्ते का निर्माण कर सही परंपरा का पोषण कर सकती है ? आदिवासियों के लिए वन कानून से मिलने वाले अधिकार आज भी बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनके पास आज भी करने के लिए कुछ खास काम नहीं होते हैं और इस ग्राम सभा में जिस तरह से उनको कहने के लिए नगरीय क्षेत्र में शामिल कर लिया गया है पर उनको कोई सुविधा नहीं मिल पायी है साथ ही उनके वे अधिकार भी जाते रहे हैं जो उन्हें और जंगलों को आपस में प्राचीन काल से ही जोड़ते आ रहे थे. इस मामले पर अब छत्तीसगढ़ सरकार को अपने कानूनी विकल्पों के उपयोग के स्थान पर आम लोगों की सामान्य समस्याओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए क्योंकि जिस तरह से यह मसला वहां के नगर पंचायत चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बना है और कई उम्मीदवारों ने यहाँ तक कह दिया है कि जीतने पर वे इसे फिर से प्रस्ताव के माध्यम से ग्रामसभा ही बनाने के लिए पूरे प्रयास करेंगें तो अब रमन सरकार के लिए यह मुद्दा भी सोचने लायक हो चुका है. लाखों पेड़ काटकर एक पॉवर प्लांट लगाने की नीति को किसी भी स्तर पर सही नहीं ठहराया जा सकता है इसलिए अब इफ्को तथा रमन सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करके कोई सर्वमान्य हल निकालने के बारे में सोचना चाहिए.  
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