मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 16 February 2015

अक्षय ऊर्जा और राजनीति

                                                पीएम मोदी ने विज्ञान भवन में आयोजित अक्षय ऊर्जा वैश्विक निवेश सम्मलेन में बोलते हुए राजनैतिक दलों और सरकारों पर निशुल्क बिजली दिए जाने के लुभावने मुद्दे पर जिस तरह से हमला बोला वह कहीं न कहीं से सीधे दिल्ली में हाल में बनी आप सरकार के उन दावों पर प्रश्नचिन्ह की तरह ही है जिसमें आप ने दिल्ली में बिजली और पानी के बिलों में बड़ी कटौती किये जाने के लिए हर संभव प्रयास किये जाने की बात कही है. पीएम को इस तरह के किसी भी मुद्दे पर बोलने से पहले यह देखना चाहिए कि देश की ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए केंद्र और राज्यों में किस तरह से बेहतर समन्वय के साथ आगे बढ़ा जा सकता है और जहाँ तक फ्री या कम दरों पर बिजली देने कई बात है तो पीएम के इस तरह के बयान का कोई सार्थक मतलब इसलिए भी नहीं निकल सकता है क्योंकि खुद पंजाब में अकाली-भाजपा सरकार किसानों को फ्री में पहले से ही बिजली देने में लगी हुई है और जब तक इस तरह की प्रवृत्तियों पर पूरी तरह से कानूनी अंकुश नहीं लगाया जाता है तब तक केवल सम्मेलनों में बयान देने से स्थितियां तो नहीं सुधरने वाली हैं.
                                                    अपने गुजरात में सरकार चलाने के समय जिस तरह से मोदी ने वहां पर उपलब्ध पवन ऊर्जा के सटीक दोहन के बारे में नीतियां बनायीं और उसके बाद सौर ऊर्जा को भी बढ़ावा दिया तो ठीक उसी तरह से देश कि विभिन्न राज्यों के भौगोलिक स्वरुप के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों से बिना छेड़छाड़ किये यदि हम बिजली के उत्पादन की तरफ बढ़ सकते हैं तो वह अपने आप में सही मार्ग हो सकता है. पीएम द्वारा सांकेतिक रुप से आप की सरकार के दावों पर प्रश्नचिन्ह लगाने से उनकी खुद की गरिमा ही कम होती है क्योंकि अब आप का कोई भी छुटभैय्या नेता उनके इस बयान पर अपनी बात कह सकता है. देश के संसाधनों के बेहतर उपयोग के द्वारा ही देश के हर राज्य को आगे बढ़ाया जा सकता है पर ऐसा भी नहीं है कि हर राज्य की परिस्थितियां उतनी आसान हों जितनी गुजरात की रही थीं ? उस दशा में अक्षय ऊर्जा के लिए एक राष्ट्रीय नीति को बनाये जाने की आज बहुत आवश्यकता है जिसे उस पर चलने वाले राज्यों के संस्थानों और नागरिकों को अक्षय ऊर्जा के संयन्त्रों की बेहतर आपूर्ति के बारे में आगे बढ़कर काम किया जा सके. इस बारे में कोई पायलट प्रोजेक्ट बनाकर एक जैसे भौगोलिक वातावरण में देश के विभिन्न स्थानों पर उसे प्रायोगिक तौर पर लागू किये जाने के बारे में सोचा जा सकता है.
                                 आज देश के उत्तरी राज्यों में आबादी अधिक होने के कारण ऊर्जा का संकट अधिक दिखाई देता है तो इसके लिए इन राज्यों में उपभोक्ताओं को सीधे ही अपने उपयोग के लिए बिजली उत्पादन के बारे में जागरूक कर विभिन्न तरह की योजनाएं सामने लानी चाहिए. यदि एक सामान्य स्थिति में किसी क्षेत्र विशेष में सौर ऊर्जा से सम्बंधित घरेलू संयंत्रों को लगाने के लिए सरकार बैंकों के माध्यम से सस्ती दरों पर लोन की व्यवस्था कर सके तो आने वाले दिनों में आम लोग भी इन संयंत्रों को अपने घरों पर आवश्यकता के अनुसार लगाने के बारे में सोचना शुरू कर सकते हैं. देश को धरातल पर कारगर नीतियों की आवश्यकता है और अब जब गैस सब्सिडी के चलते सरकार के पास नागरिकों के विभिन्न तरह के खातों की जानकारी भी है तो इस स्थिति में इन संयंत्रों पर दी जाने वाली किसी भी सहायता में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को सीधे उपभोक्ता को हस्तांतरित किया जा सकता है. देश के आर्थिक पुनर्निर्माण के साथ मेक इन इंडिया की अवधारणा को सार्थक करने में इस तरह की नीतियां बहुत कारगर साबित हो सकती है क्योंकि इससे जहाँ ऊर्जा के संकट को दूर किये जाने में मदद मिलेगी वहीं एक स्थायी मांग बने रहने के चलते यह उद्योग लम्बे समय तक टिके रहने में सफल होने वाला साबित हो जायेगा. संयंत्रों के देश में निर्माण पर छूट देकर स्थानीय कामगारों के लिए रोज़गार के अवसरों को बढ़ाया जा सकता है और इसके साथ ही बैंकों के कारोबार में निचले स्तर तक गतिशीलता भी लायी जा सकती है.  
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