मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 16 March 2016

कृषि, कर और चोरी

                                                देश के बारे में कोई भी जानकारी देते समय अक्सर ही यह कहकर बात की शुरुवात की जाती है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहाँ के ग्रामीण क्षेत्र की अधिकांश जनता आज भी कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था पर ही अपनी जीविका के लिए निर्भर है. देश के किसानों के पास आज भी पूरी तरह से आधुनिक खेती करने की सभी संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाये हैं इसलिए ही संविधान में कृषि से होने वाली आय को आयकर और किसी भी तरह के अन्य कर से मुक्त रखा गया है. इस तरह की छूट देने के पीछे सरकार की यह मंशा स्पष्ट थी कि खेती में सब कुछ सदैव निर्धारित तरीके से ही होता रहे इस बात की निश्चितता नहीं होती है इसलिए ही किसानों को अपने उत्पाद के आधार पर हर तरह के अनावश्यक करों से मुक्ति दे दी जाये और आयकर के किसी भी मानक में उन्हें कहीं से भी न रखा जाये जिससे उनकी अनिश्चित आमदनी होने के चलते उन पर कोई अनावश्यक बोझ भी न पड़ जाये पर सरकार की इस मंशा का दुरूपयोग अमीरों ने किस तरह से किया इसका उदाहरण इस बात से ही समझा जा सकता है कि इस नियम के माध्यम से कर चोरी करने को एक बड़ा उपाय मान लिया गया है.
                 मात्र कुछ लोगों की कृषि से होने वाली आय कुछ अरब रुपयों से बढ़कर किस तरह से लाखों करोड़ों तक पहुंच गयी इस बात का जवाब किसी के पास भी नहीं है क्योंकि आयकर के सलाहकारों और इस नियम का लाभ उठाने वालों ने इस बात पर कभी गौर ही नहीं किया कि जिस सोच के साथ वे एक जिले में काम कर रहे हैं कहीं न कहीं यही सोच पूरे देश में काम कर रही है इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि एक पूर्व आयकर अधिकारी द्वारा मांगी गयी सूचना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया जिसमें यह पता चला कि वर्ष २०११/१२ में आयकर चुकाने वाले लोगों की कृषि आधारित आय २००० लाख करोड़ रुपयों से भी अधिक हो गयी ? बेशक इस धनराशि पर सरकार की कोई नज़र नहीं होती है और इसको केवल कागज़ों पर दिखाकर कालेधन को सफ़ेद करने का काम ही आसानी से किया जाता है तो यह भी मान जाना चाहिए कि देश में एक वित्तीय वर्ष में इतना कालाधन इस योजना का माध्यम से सफ़ेद किया गया ? किसी भी सरकार के पास क्या यही होना चाहिए कि जिस मद से उसे टैक्स नहीं मिल रहा है उस मद में आम लोगों द्वारा किया कहा जा रहा है इस बात की जांच भी न की जाये और इन लोगों को सुविधा के नाम पर बनाये गए नियमों की कमी का खुला लाभ उठाने के लिए छोड़ दिया जाये ?
                  संसद में यह मामला उठाये जाने के बाद जिस तरह से वित्त मंत्री का बयान आया कि इस सूची में कुछ बड़े नाम भी हो सकते हैं तो विपक्ष उन पर राजनीति करने के आरोप लगाने से बचे इस पर विपक्षी बेंचों से इस सूची को जारी करने की माँग भी की गयी पर इस मांग को वित्त मंत्री ने पूरी तरह से अनसुना ही कर दिया. किसानों के लाभ के लिए बनाये गए इस नियम का जिन भी लोगों ने दुरूपयोग किया है देश को उनके नाम जानने का पूरा अधिकार है और विभिन्न नियमों के पीछे छिपकर कर चोरी करने में जो भी लोग आगे हैं वे भले ही किसी भी श्रेणी के क्यों न हों उनके बारे में सरकार को संसद में पूरी जानकारी देनी चाहिए. देश को यह जानना है कि किसानों के लिए बनाये गए इस नियम के पीछे किन लोगों ने अपने काले धन को सफ़ेद करने के लिए पूरा लाभ उठाया है और उनकी कृषि कितनी बड़ी है कि देश में इतनी बड़ी संपत्ति कृषि से बनायीं जा सकती है जबकि आम किसान लगातार आत्महत्या करने पर मजबूर होता जा रहा है ? इस मामले में किसी को भी छोड़ा नहीं जाना चाहिए भले ही वह कितना भी प्रभावशाली ही क्यों न हो क्योंकि यह तो एक बानगी है यदि पूरे कानूनों का आंकलन किया जाये तो संभवतः पूरे देश में कालेधन की एक समानांतर अर्थव्यवस्था के भी चलने से इंकार नहीं किया जा सकता है.   
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