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Wednesday, 6 March 2013

खेती और मनरेगा

                    लोकसभा में कृषि राज्य मंत्री तारिक़ अनवर ने एक सर्वेक्षण का ज़िक्र करते हुए अपने उत्तर में बताया कि मनरेगा के चलते कृषि क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की संख्या में कमी आई है जिससे मंहगी होती मजदूरी के कारण कृषि की उत्पादन लागत बढ़ गयी है. यहाँ पर इस सवाल और सर्वेक्षण के निहितार्थ भी तलाशे जाने की ज़रुरत है क्योंकि मनरेगा एक ऐसी योजना है जिसके माध्यम से पूरे देश के ग्रामीण स्वरुप को बदलने में देश के राजनैतिक और प्रशासनिक तंत्र को बहुत आसानी हो सकती है पर आज तक जिस तरह से इस महत्वपूर्ण परियोजना में भी भ्रष्टाचार ने अपने पैर जमा रखे हैं यदि उससे किसी भी तरह कम किया जा सके या पूरी तरह से छुटकारा पाया जा सके तो आने वाले समय में देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में बहुत बड़ा परिवर्तन देखा जा सकता है. इस योजना की शुरुआत जिस तरह से की गयी थी और अभी तक इसके लिए जितने बड़े पैमाने पर धन का आवंटन किया जाता रहा है उसके बाद इसे बनाने वालों की नियति पर शक़ नहीं किया जा सकता है पर भ्रष्टाचार के कारण इसके क्रियान्वयन पर राज्य सरकारों द्वारा वो अंकुश नहीं लगाया जा सका जो इसकी सफलता की और अच्छी कहानी बन सकता था ?
                         यह सही है कि सर्वेक्षण में इसके इस दुष्प्रभाव के कारण ही जो कुछ अच्छा हुआ है उसका भी ज़िक्र किया गया है पर साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल के संवर्धन और अन्य सामाजिक कार्यों में इसके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि इसी मनरेगा ने देश के उन दूर दराज़ के क्षेत्रों में लोगों को पहली बार मजदूरी देने और काम देने के बारे में सोचा था. इसके सामाजिक परिवर्तन से जहाँ पूरे देश में आर्थिक प्रगति का चक्का और तेज़ी से घूम सकता है वहीं सामान्य उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कम्पनियों के लिए भी बाज़ार के नए अवसर खुल सकते हैं. कृषि क्षेत्र में सुधार के साथ ही बढ़ते बाज़ार को आज की आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार ढाला जा सकता है जो आने वाले समय में देश के किसानों को अधिक लाभ वाली फ़सलों की तरफ़ भी ले जा सकता है. पूरे देश के विभिन्न विभागों में योजनाओं को लेकर जिस तरह के तालमेल की आवश्यकता है आज वह कहीं से भी दिखाई नहीं देती है जिसके दुष्प्रभाव स्वरुप भी आज इस मनरेगा के कृषि क्षेत्र पर दुष्प्रभाव पर इस तरह के सर्वेक्षण की आवश्यकता पड़ी है.
                       मनरेगा का मुख्य उद्देश्य गांवों में ही रोज़गार का सृजन करना था और इसमें यह पूरी तरह से सफल भी हुई है बिहार जैसे राज्यों ने जहाँ इस पर अधिक ध्यान देकर अपने यहाँ अन्य बातों को सुधार कर श्रम शक्ति के पालयन पर रोक लगाने में बड़ी सफलता पायी है वहीं श्रम शक्ति के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहने वाले राज्यों में कृषि और औद्योगिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है. मनरेगा का कृषि पर कोई असर न पड़े इसके लिए इसके मूल में जाना ज़रूरी है क्योंकि इसके द्वारा केवल सौ दिनों के रोज़गार की व्यवस्था की गयी थी और बाकी दिनों को केवल इसीलिए छोड़ा गया था कि मजदूर अपने गाँव या आस-पास के इलाकों में ही इस तरह का रोज़गार तलाश कर लें. इस उद्देश्य को पाने के लिए जब कृषि क्षेत्र में मजदूरों की अधिक आवश्यकता होती है तो मनरेगा के काम बंद करा दिए जाने चाहिए जिससे उन्हें इस दौरान अन्य उपायों से जीविका चलाने के लिए धन मिलता रहे और जब खेतों में काम कम हो तब मनरेगा के काम कराये जाएँ पर आज ग्राम प्रधान अपने खेतों में काम करने के लिए फ्री में मजदूरों की कमी इस योजना से पूरी करते देखे जा सकते हैं जिसके कारण भी आम किसानों के लिए बुवाई-कटाई के समय मजदूरों की किल्लत हो जाती है. अब आवश्यकता है कि इस योजना को और सही ढंग से लागू कर किसानों के साथ मजदूरों की आर्थिक स्थिति को भी सुधारने के लिए काम किया जाए.       
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