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Thursday, 13 October 2016

पराली और प्रदूषण

                                                                            हमारे देश में महत्वपूर्ण मुद्दों की तरफ ध्यान न देना अपने आप में एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है क्योंकि इस वर्ष मानसून के अन्तिम चरण में पहुँच जाने और उत्तर भारत के खेतों में धान की कटाई के बाद उसकी पराली को सही तरह से उपयोग करने के लिए जो भी कोशिशें पिछले वर्ष की गयी थीं उनके कोई सकारात्मक परिणाम सामने आते नहीं दिखाई दे रहे हैं. आज एक बार फिर से उत्तर भारत की हवाओं में इस पराली के खेतों में जलाये जाने के चलते प्रदूषण का स्तर बढ़ना शुरू हो चुका है और जिस तरह से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फसल को काटने के बाद आवश्यकता से अधिक बची हुई पराली को खेतों में ही जलाने का काम शुरू हो चुका है वह अपने आप में चिंतनीय भी है. इस मामले में पिछले वर्ष जिस तरह से सक्रियता दिखाई गयी थी इस वर्ष सभी पक्ष चुप और लापरवाह ही दिखाई दे रहे हैं जिससे दिल्ली जैसे महानगरों के साथ उत्तर भारत के अन्य बड़े शहरों के साथ गांवों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा तो बनना शुरू ही हो चुका है. देश की समस्या यह है कि हमारी नीतियों में समय से काम करने और विभिन्न सरकारी विभागों और सरकारों के समन्वय की जो रूपरेखा है वह केवल कागज़ी खानापूरी तक ही सीमित रह गयी है पर भारत ने जिस तरह से जलवायु परिवर्तन के समझौते पर सहमति दिखाई है तो आने वाले समय में पराली भी हमारे लिए एक बड़ी समस्या का कारण बन सकती है.
                      सबसे पहले हमें इस बात पर विचार करना होगा कि पहले के मुक़ाबले अब पराली की समस्या इतनी विकराल क्यों होती जा रही है क्योंकि देश में खेती हमेशा से ही होती रही है पर यह समस्या के रूप में अब हमारे सामने आनी शुरू हुई है. पिछले कुछ दशकों में जिस तरह से खेती का आधुनिकीकरण हुआ है उसके चलते गांवों में पशुओं की संख्या में कमी आनी शुरू हुई है और पहले जो किसान खेती के साथ पशुधन को भी एक समानांतर अर्थ व्यवस्था के रूप में चलाते थे आज वे अन्य कामों की तरफ मुड़े हुए दिखाई देते हैं जिससे खेती में अनाज के अतिरिक्त होने वाले अन्य पदार्थों का उपयोग पशुओं के लिए कम होने लगा है. खेती के आधुनिकीकरण से जहाँ पैदावार में बढ़ोत्तरी हुई वहीं अनाज के अतिरिक्त उसके अन्य पदार्थों के उपयोग के सही तरह से निस्तारण के बारे में कोई स्पष्ट नीति नहीं बनायीं गयी जिसके चलते अपनी आवश्यकता से अधिक पराली को किसानों द्वारा खेतों में ही जलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी. एक संसय जब यह सीमित मात्रा में थी तो इस पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता था पर आज जब अधिकांश किसानों की तरफ से अनावश्यक पराली ने निपटने के लिए यह तरीका अपनाया जाने लगा है तो इसका पूरे वायु मंडल में हवा की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा है.
              इस बारे में सबसे पहले यह विचार किया जाना चाहिए कि खेती के इस तरह के पदार्थों का किस तरह से निस्तारण करना उचित है और यदि इसके बारे में कोई कारगर प्रक्रिया बनाई जा सके तो आने वाले समय में इसका दोहरा लाभ भी किसानों को मिल सकता है. अपनी आवश्यकता से अधिक पराली को किसानों को जलाने से रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर सरकार और पंचायतों को इसके माध्यम से खाद बनाने और अन्य कामों में उपयोग करने के बार में स्पष्ट और कारगर नीति की आवश्यकता है. एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग ५० टन पराली होती है जिसमें से केवल आधी ही उपयोग में लायी जाती है शेष को खेतों में ही जला दिया जाता है ऐसी स्थिति में जब किसानों को पराली से निपटने का कोई कारगर रास्ता नहीं मिलता है तो वे इसे जलाकर अपने खेतों को खाली करने का काम किया करते हैं. सरकार को अब इस समस्या से निपटने के लिए कुछ ठोस प्रारूप बनान ही होगा जिससे आने वाले समय में इसका सही उपयोग किया जा सके और किसानों को कुछ लाभ के अलावा देश के पर्यावरण को सही रखने में मदद भी मिल सके.
               चीन में इस समय से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर बायो एनर्जी के साथ जैविक खाद बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है जिससे पर्यावरण को नुकसान भी नहीं होता और किसानों को कुछ अतिरिक्त लाभ भी मिल जाता है. हमारे देश में इस प्रक्रिया को यदि पूरी तरह से सरकारी योजना के रूप में लागू किया गया तो इसके चल पाने की संभावनाएं कम ही दिखाई देती हैं क्योंकि हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से योजना के लिए आवंटित धन की बंदरबांट तो आसानी से हो जाएगी पर जिस उद्देश्य से इसे शुरू किया जायेगा वह पूरा नहीं हो पायेगा. प्रायोगिक तौर पर अगले वर्ष से इसे प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार को आधारभूत ढांचा अभी से बनाने के बारे में अभी दे सोचना होगा इसका जैविक खाद के रूप में उपयोग करना सबसे आसान विकल्प होगा क्योंकि इसे ब्लॉक स्तर पर भी कम लागत से छोटे कारखाने लगाकर तैयार करने की कोशिशें की जा सकती हैं. हर जिले में एक केंद्रीय स्थान को खोजकर वहां पर जैविक खाद और बायो एनर्जी के बड़े प्लांट लगाकर भी इसका उपयोग किया जा सकता है. यदि अभी से इसके बारे में सीधे किसानों को दोषी बनाने के स्थान पर उनको जागरूक कर इसके बारे में सही तरह से निस्तारण की जानकारियां दी जाएँ तो पंजाब और हरियाणा के किसान इससे भरपूर लाभ भी उठा सकते हैं. अच्छा हो कि आने वाले समय में इस पराली से स्वच्छ ऊर्जा और जैविक खाद बनाने की दिशा में देश और आगे बढ़ जाये जिससे किसानों की खुशहाली के साथ पर्यावरण की रक्षा भी अच्छी तरह से हो सके.
                   
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