मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 21 June 2015

जयदेव पेयंग के उगाये जंगल

                                                                             निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर आगे बढ़ते हुए किसी बड़े काम को अपने हाथों में ले लेने की कोशिशें भी किस तरह से रंग लाती हैं यह देखने के लिए असोम की राजधानी गुवाहाटी से केवल ३५० किमी की दूरी पर बसे हुए १३०० एकड़ के मोलाई जंगल को देखकर जानी जा सकती है. १९७९ में ब्रह्मपुत्र नदी के घेरे में आई लगभग १४०० एकड़ जमीन से मिटटी उखड़ने की समस्या से परेशान होकर एक सामान्य ग्रामीण नागरिक जयदेव पेयंग ने खुद अपने दम पर ही आगे बढ़ने का जो संकल्प लिया था आज वह उनकी कीर्ति को बढ़ाने के साथ ही उनके गाँव और आसपास के क्षेत्रों को स्वच्छ हवा उपलब्ध कराने का काम करने में लगा हुआ है. बेशक उनकी यह कोशिश किसी तरह से अपने नाम को आगे बढ़ाने या किसी पुरुस्कार के लालच में शुरू नहीं की गयी थी पर आज जब उनके प्रयासों को पूरे भारत के साथ दुनिया में सम्मान मिल रहा है तो यह देश और उनके खुद के लिए बहुत ही गर्व की बात तो है साथ ही हमारे देश के केंद्रीय और राज्यों के पर्यावरण तथा वन मंत्रालय के लिए एक उदाहरण भी है कि ईमानदार कोशिशें की जाएँ तो देश में हरित क्षेत्र को आसानी से बढ़ाया जा सकता है.
                                  एक व्यक्ति के इस तरह से किये गए प्रयासों से आखिर किस तरह से इस क्षेत्र में पूरे पर्यावरण को सही दिशा में लाने की कोशिश सफल हुई हैं यह इस बात से ही जाना जा सकता है कि इस क्षेत्र में बेस हुए इस जंगल में अब बड़े पैमाने पर स्थानीय जीव जंतुओं की प्रजातियां भी पनप चुकी हैं जो जंगल के स्वरुप को और भी सुन्दर बनती हैं तथा पारिस्थितिकी संतुलन को भी पूरी तरह से बनाये रखने में सफल हो रही हैं. बिना किसी सरकारी सहायता के इतने बड़े पैमाने पर सफल प्रयोग करने वाले जयदेव को भारत सरकार ने इस वर्ष पद्म पुरुस्कार से भी सम्मानित किया है तथा उनके इस काम के चर्चे अब पूरे विश्व में हो रहे हैं सीधी सी बात है कि उनका यह काम यह सोचकर नहीं शुरू किया गया था पर अब जब उनके काम को सरकार ने भी बहुत बड़ा मानकर उन्हें सम्मनित किया है तो यह उनके गांव और असोम के लिए भी सम्मान की बात है. बड़े पैमाने पर बाढ़ और विद्रोही गतिविधियों से जूझ रहे असोम से इस तरह की ख़बरें निश्चित तौर पर राहत पहुँचाने का काम ही किया करती हैं क्योंकि जब तक आम लोगों का अपनी जमीन से जुड़ाव और भी मज़बूत नहीं होगा उनका प्रकृति से सही सम्बन्ध नहीं हो पायेगा.
                                  इस तरह के प्रयासों के लिए क्या अब देश को स्थानीय स्तर पर वन समितियों की आवश्यकता नहीं है जो देश के हर गाँव तक में इस तरह के कुछ प्रयास कर पाने की दिशा में काम करना शुरू कर सकें ? क्या पंचायती राज कानून के साथ ग्राम सभाओं के लिए अपनी भूमि पर इस तरह के उपलब्धता के अनुसार जंगल विकसित करने को आवश्यक नहीं किया जाना चाहिए ? क्या पर्यावरण दिवस को केवल सरकारी कार्यक्रमों से बाहर निकाल कर अब जनता के अभियान के रूप में नहीं शुरू किया जाना चाहिए ? यदि देश के गांवों में इस तरह के छोटे ही सही पर कुछ हरित क्षेत्र विकसित किये जा सकें तो क्या पूरे देश के पर्यावरण को सुधारने का बड़ा काम छोटे स्तर पर ही नहीं किया जा सकता है ? अब यह कुछ ऐसे मसले हैं जिन पर राज्यों को गंभीरता के साथ सोचने की आवश्यकता है क्योंकि भूमि राज्यों के पास होने के कारण केंद्रीय मंत्रालय केवल सहायक की भूमिका ही निभा सकता है. राज्यों में जिस तरह से वन माफिया सक्रिय हैं अब उन पर भी कड़ा अंकुश लगाकर पर्यावरण को सुधारने का काम सभी को मिलकर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए जिससे आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ पर्यावरण देने की दिशा में हम सही काम कर सकें.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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