मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 10 July 2015

नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान

                               यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल और देश की दूसरी ऊंची छोटी के साथ बसे उत्तराखंड स्थित नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर लौटे हुए विशेषज्ञों की रिपोर्टों के आधार पर पर्यावरण और पारिस्थितिकी के बारे में सुखद समाचार मिलना एक अच्छी बात है. एक समय इस क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों के बहुत अधिक हो जाने के कारण यहाँ पर पाये जाने वाले जीव जंतुओं की संख्या में तेज़ी से गिरावट होने लगी थी और एक बार तो ऐसा लगने लगा था कि विश्व के सामने अब इस सुन्दर स्थान को दोबारा उस स्थिति में नहीं लाया जा सकेगा. इन्हीं चिंताओं के बीच १९८३ में केंद्र सरकार ने नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान में हर तरह की मानवीय गतिविधि पर रोक लगा दी थी और उस रोक का क्या परिणाम सामने आ रहा है उसको जांचने के लिए १९९३ में पहली बार और फिर उसके बाद २००३ की संक्षिप्त यात्रा के बाद इस वर्ष जून जुलाई में ३१ सदस्यीय टीम की रिपोर्ट अपने आप में बहुत ही अच्छी मानी जा सकती है क्योंकि सरकार की तरफ से रोक लगाये जाने के सकारात्मक परिणाम सामने आने शुरू हो चुके हैं.
                           वर्ष १९९३ में पार्क में गई टीम की रिपोर्ट से तुलना करें तो इस बार हिम तेंदुआ, काला भालू, कस्तूरी मृग, भरल, हिमालयन थार, सेराव, रेड फॉक्स, बीजे के अलावा पक्षियों की करीब १३० प्रजातियां, जिसमें मोनाल, कोकलास, स्नो कोक आदि भी देखे गए तथा वनस्पतियों की करीब ४०० प्रजातियां देखी गयी. इस रिपोर्ट के बाद अब केंद्र और राज्य सरकारों के पास अपनी धरोहरों को भविष्य के लिए बचाये रखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने के बारे में भी अब आसानी होने वाली है. ऐसा नहीं है कि देश में इस तरह के प्राकृतिक स्थान नहीं हैं पर जनता में जागरूकता और भ्रष्टाचार के चलते इससे जुड़े हुए लोगों द्वारा ही इन स्थानों को अधिक नुकसान पहुँचाया जाता रहता है. इस उत्साहवर्धक रिपोर्ट के बाद क्या सरकार इस तरह से अन्य स्थानों को सुरक्षित रखने के लिए इस तरह के कदम उठाने के बारे में सोचना शुरू करेगी या मानवीय गतिविधियों को कुछ कड़ी शर्तों के साथ चलने देने की अनुमति प्रदान करना चाहेगी यह तो आने वाले समय में ही पता चल पायेगा.
                        आज भी इसी तरह की स्थिति में पहुंचे देश के बहुत सारे अन्य प्राकृतिक स्थानों के बारे में अब केंद्र और राज्य सरकारों को मिल-जुल कर कुछ सोचना होगा जिससे मानवीय हस्तक्षेप को नियंत्रित किया जा सके और साथ ही प्रकृति प्रेमियों को भी इन स्थानों पर आने जाने की छूट भी हो. आम तौर पर अभी भारत में प्रकृति के प्रति लोगों में वह जागरूकता नहीं आ पायी है जिससे उन स्थानों को सुरक्षित और संरक्षित रखने के बारे में सोचा जा सके पर कुछ हद तक सरकारी प्रयासों और स्वयं सेवी संगठनों के कामों के चलते अच्छे परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं. सरकार को इस तरह के रोमांचक पर्यटन पर पूरी रोक लगाने के स्थान पर उसको नियंत्रित करने के बारे में सोचना चाहिए जिससे प्रकृति प्रेमी इन स्थानों को देखने से वंचित भी न रहें और इनके मूल स्वरुप को बचाये भी रखा जा सके. आज भी हम आम भारतीय अपने लापरवाह कामों से अपने आस पास के पर्यावरण और प्रकृति को बहुत जाने अनजाने नुकसान पहुँचाने में लगे ही रहते हैं जिससे देश की बहुमूल्य प्राकृतिक धरोहर सिमटती ही जा रही है. स्थानीय पर्यावरण और प्रकृति को बचाये रखने के लिए केवल उसके लिए जागरूक होने की आवश्यकता ही है और यही हम सभी नागरिकों का देश को सबस बड़ा उपहार भी होगा जिसमें हम देश को वैसा ही बनाये रखने में सफलता पायेंगें जैसा कि वह हमें अपनी पुरानी पीढ़ियों से कभी मिला था.        
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