मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 26 June 2015

राजनीति में नैतिकता के मानदंड

                          ललित मोदी से जुड़े हुए खुलासों के बाद कदाचार के मामलों को लेकर जिस तरह से भाजपा एकदम से दबाव में आती दिखी उसी बीच महाराष्ट्र से पंकजा मुड़े को लेकर किये गए भ्रष्टाचार के खुलासे से भाजपा के शीर्ष स्तर के लिए अपने को बचाने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ सकती है. संख्या बल पर कमज़ोर विपक्ष लोकसभा में तो पूरी तरह से सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलता हुआ दिखाई देने वाला है और राज्य सभा में सरकार की मुसीबतें पहले से ही कम नहीं हैं क्योंकि सरकार के पास वहां पहले ही बहुमत की समस्या आई हुई है. ऐसे में देश के विकास के लिए लिए जाने वाले महत्वपूर्ण निर्णयों को लेकर संसद किस तरह से चल पायेगी और कितना काम हो पायेगा यह सब अभी कोई नहीं बता सकता है क्योंकि अाने वाले समय में इन खुलासों से जुडी हुई कितनी बातें सामने आने वाली हैं यह कोई नहीं जनता है पर कमज़ोर पड़ी कांग्रेस ने इस मुद्दे को अपने स्तर पर उछालना शुरू कर दिया है और सरकार तथा भाजपा जिस तरह से इन नेताओं का अनमने ढंग से बचाव करने में लगी हुई है वह भी जनता की नज़रों से छिपा नहीं हुआ है.
                          सार्वजनिक जीवन में रहने के कारण कई बार नेताओं द्वारा कई ऐसे काम भी हो जाया करते हैं जो समय बीतने पर उनके लिए बहुत समस्या खडी कर देते हैं और ऐसा नहीं है कि यह केवल भाजपा के साथ ही हो रहा है क्योंकि पूरे देश में सत्ता का अपना एक स्थायी भाव है और कोई भी पार्टी या नेता सत्ता में हों सरकार चलाने की प्रक्रिया कमोबेश के जैसी ही रहा करती है अब इसे नेताओं की बाबुओं पर निर्भरता माना जाये या बाबुओं का नेताओं से अधिक प्रभावशाली होना पर सरकार के नौकरशाह हमेशा ही अपने कद को एक स्तर पर बनाये रखने में सफल रहा करते हैं. इस तरह के संदिग्ध मामलों में आखिर देश का संविधान और नैतिकता क्या कहती है इस पर सभी को विचार करने की बहुत आवश्यकता भी है क्योंकि सरकारें बदलने से देश नहीं बदला करता है और किसी भी निर्वाचित सरकार के लिए आखिर वो कौन सा पैमाना निर्धारित किया जाये जिस पर चलकर वो अपन को भ्रष्टाचार और कदाचार से पूरी तरह से मुक्त रखने में सफल हो सके. क्या देश में नेताओं को खुद ही ऐसे उच्च मानदंडों पर काम नहीं करना चाहिए जिसमें ऐसे आरोपों की गुंजाईश ही न रहे और आरोप लगने पर क्या स्वेच्छा से सभी को अपने पद छोड़ने के बारे में या सक्रिय राजनीति से अस्थायी रूप से अलग होने के बारे में नहीं सोचना चाहिए ?
                        सत्ताधारी दल पर पिछली लोकसभा में हर तरह के आरोप लगाने वाली भाजपा आज पूर्ण बहुमत से सत्ता में है पर उसका बर्ताव भी कांग्रेस से अलग दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि तब भी विपक्ष आरोपों लगाने के साथ नेताओं के इस्तीफे की मांग किया करता था और आज भी वही स्थिति है और मोदी सरकार भी ठीक मनमोहन सरकार की तरह अपने मंत्रियों/ नेताओं को बचाने में ही लगी हुई है. दोनों मामलों में एक बड़ा अंतर यह भी है कि उस समय अधिकांश मामले सहयोगी दलों के नेताओं के खिलाफ थे पर इस बार यह सारे मामले भाजपा नेताओं के खिलाफ ही हैं फिर भी सत्ता के वे उच्च मानदंड कहीं से दिखाई नहीं दे रहे हैं जिनकी बातें भाजपा विपक्ष में रहकर किया करती थी ? अब जब भाजपा खुद सत्ता में है तो उसे इस तरह के मामलों से निपटने के लिए स्वेच्छा के स्थान पर इसे कानूनी रूप देने के बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि समग्र रूप से न तो कोई दल पूरा बेईमान है और न ही कोई पूरा ईमानदार. समय-समय पर दलों के नेता इस तरह कि हरकतों में शामिल रहा करते हैं जिनसे हर दल की शीर्ष सत्ता को समस्या होती है. राजनैतिक लोगों के खिलाफ लगने वाले आरोपों की खुली सुनवाई होनी चाहिए और जब तक वे निर्दोष या दोषी साबित न हो जाएँ उनके मामलों की दैनिक आधार पर सुनवाई की व्यवस्था की जानी चाहिए तथा इस तरह के किसी भी भ्रष्टाचार से निपटने के लिए राज्यों के अधिकारियों का एक पूल बनाया जाना चाहिए जिसके पास इस तरह के मामलों की जाँच करने के अधिकार हों.      
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