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Sunday, 27 September 2015

चुनाव, भ्रष्टाचार और भाजपा

                         देश में किसी भी तरह के चुनावों के समय जिस तरह से आरोपों प्रत्यारोपों की बौछार शुरू हो जाती है आज भी हमारे राजनेता इस मसले को हल कर पाने में पूरी तरह से सक्षम नहीं दिखाई देते हैं भले ही नैतिक आधार पर उनके मानदंड कितने भी ऊंचे क्यों न हों पर समय आने पर उनकी तरफ से भी भ्रष्टाचारियों को समर्थन किया जाना हमारे लोकतंत्र की व्यवस्था गत खामी को ही दर्शाता है जिसमें किसी भी व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर रोक तब तक नहीं है जब तक वह कोर्ट द्वारा सजा पाया हुआ न हो. इस तरह की गलतियां करने या जानबूझकर ऐसे लोगों पर पार्टियों द्वारा भरोसा जताया जाने कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता है जो पूरी तरह से समाज विरोधी कार्यों में लगे हुए हैं फिर भी लगभग सभी दल इस तरह की हरकतें करने से बाज़ नहीं आते हैं. देश में कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद जैसे दल तो इस तरह की बातों के लिए लगातार भाजपा द्वारा बदनाम ही किये जाते हैं कि इन दलों की तरफ से लोकतंत्र की पवित्रता को बनाये रखने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किये जाते हैं जिससे समाज के अच्छे वर्गों के लोग आज राजनीति में आने ही नहीं चाहते हैं.
                      इस बात की तह तक जाने की बात पर यदि गौर किया जाये तो हमें पिछली सदी एक सातवें दशक में लौटना होगा जब आज़ादी के लिए लड़ने वाली पीढ़ी के लोग धीरे धीरे राजनैतिक परिदृश्य से ओझल होने लगे थे और सत्ता उन लोगों की तरफ बढ़ने लगी थी जो आज़ादी के समय कम उम्र के थे या उनके लिए पुराने मुद्दों पर चुनाव जीतना भारी पड़ना लगा था क्योंकि कहीं न कहीं से देश की जनता को यह महसूस होने लगा था कि उसके हाथों में लोकतंत्र की जो शक्ति है उसका सही उपयोग भी किया जा सकता है. ऐसी परिस्थिति में जब स्थापित लोगों को चुनाव जीतने में समस्याओं का सामना करना पड़ा तो उन्होंने अपने लाभ के लिए समाज में सक्रिय असामाजिक तत्वों का दुरूपयोग चुनावी मशीनरी के रूप में करना शुरू कर दिया जिससे आम लोगों में भय व्याप्त होने लगा और चुनाव के समय समाज का बड़ा वर्ग इससे दूर रहने की सोचने लगा. इस परिस्थिति का सीधा लाभ उन नेताओं को मिला क्योंकि इन समाज विरोधी लोगों द्वारा जिस तरह से चुनावी अराजकता फैलाई गयी थी उसका कोई अन्य तोड़ भी नहीं था. इससे समाज के इन अराजक तत्वों के माध्यम से एक डेढ़ दशक तक नेताओं की चुनावी नैय्या पार होती रही पर जब इन लोगों को इस बात का एहसास हुआ कि जो चुनाव हम दूसरों को जिता सकते हैं वह खुद भी जीत सकते हैं तो पूरे राजनैतिक परिदृश्य में पूरा बदलाव आ गया और चुनाव के माध्यम से देश के लोकतंत्र में अपराधियों के माननीय बनने का चलन शुरू हो गया.
                      आज यदि एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट के दबाव के कारण राजनीति में स्थापित अपराधियों का आना कम होने है तो वहीं उनके माध्यम से राजनीति करने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी देखने को मिलने लगी है. अब जो राजनेता चुनाव नहीं लड़ सकते हैं वे अपने स्तर से अपने विश्वास पात्रों को चुनाव में उतार कर खुद ही नियंत्रण अपने हाथों में रखा करते हैं जिससे परोक्ष रूप से परिस्थिति में भले ही वे तत्व सामने न हों पर उनका दबदबा तो राजनैतिक गलियारों में बना ही रहता है. देश के पूर्व गृह सचिव और अब भाजपा संसद आरके सिंह ने जिस तरह से बिहार चुनावों में भाजपा के टिकट वितरण में भ्रष्टाचार के आरोप लगाये हैं वे अपने आप में परिस्थिति के बहुत ही गंभीर होने की दिशा में इशारा करते हैं. उन्होंने खुले शब्दों में टिकट वितरण को लेकर जिस तरह से धन लेने के आरोप अपनी ही पार्टी पर लगाये उससे पूरे परिदृश्य की भयावहता का अंदाज़ा होता है. आरके सिंह अपनी बात को स्पष्ट रूप से कहने के लिए जाने जाते हैं और उनकी तरफ से बातें खुले तौर पर कही जाती हैं वे कोई राजनैतिक व्यक्तित्व नहीं हैं जिनको अपने भविष्य की चुनता करने की आवश्यकता हो और उनका यही गुण उन्हें सही बात को खुले तौर पर कहने का हौसला भी देता है. ईमानदार व्यक्ति का दुरुयोग करना भी कितना भारी पड़ सकता है यह बात अब भाजपा की समझ में आने लगी होगी क्योंकि उनके एमपी होने के कारण शायद पार्टी यह सोचती हो कि वे पार्टी लाइन से हटकर बात नहीं करने वाले हैं तो यह बात अब पूरी तरह से सामने आ चुकी है.
                     सिंह ने जिस तरह से भाजपा के इस तरह के टिकट वितरण पर घोर असंतोष जताया और साथ ही सवाल भी किया कि इस तरह अपराधियों के साथ खड़े होने से भाजपा और लालू में क्या अंतर दिखाई देगा तो भाजपा को इस स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ और उनकी तरफ से अमित शाह और राजनाथ सिंह ने आरके सिंह से खुद बात की. पूर्व अधिकारी होने के चलते आरके सिंह इस तरह का हौसला दिखा सकते हैं क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है जबकि अन्य नेताओं के राजनैतिक भविष्य पर ऐसी किसी भी घटना का ऐसा असर हो जाता है कि उसके लिए राजनीति में टिके रहना भी कठिन हो जाता है. आरके सिंह द्वारा उठाया गया मुद्दा बेशक राजनैतिक ही है पर इसकी कानूनी तौर पर और भी मज़बूती के साथ समीक्षा करने की आवश्यकता है अब जब देश के स्थापित राजनैतिक दल खुद ही इस कीचड में घुसने को तैयार बैठे हैं तो इसका क्या विकल्प सामने बचता है ? सिंह जैसी आवाज़ें भारतीय लोकतंत्र में कम ही सुनाई देती हैं और वे शीघ्र ही ख़त्म भी हो जाती हैं क्योंकि हमारे राजनैतिक दल किसी भी परिस्थिति में राजनैतिक और चुनावी शुचिता की बातें चाहे जितनी करें पर उनकी तरफ से इसे वास्तव में करने की इच्छा शक्ति की कमी के बारे में आसानी से समझा जा सकता है.       
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