मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 21 May 2015

दिल्ली की राह

                                                         किस तरह से केवल किसी चुनावी वायदे को पूरा करने के लिए ही आधे अधूरे राज्य को बनाना किसी राजनैतिक दल को कितना भारी पड़ सकता है यह बात अब केजरीवाल सरकार और मोदी सरकार दोनों को ही समझ में आने लगी है क्योंकि संभवतः यह पहली बार हुआ है कि दिल्ली की सरकार किसी विपरीत ध्रुव की राजनीति करने वाले केजरीवाल जैसे नेता के हाथों में है. ऐसा नहीं है कि इससे पहले दुसरे दल की केंद्रीय सरकार के साथ दिल्ली सरकार का सामंजस्य और मतभेद न रहा हो पर इस बार यह पूरे देश में चिंता के साथ हास-परिहास का मसला भी बनता जा रहा है जो किसी भी तरह से देश के लोकतंत्र के लिए सही नहीं कहा जा सकता है. केंद्र में जहाँ पूरे देश से स्पष्ट बहुमत प्राप्त मोदी सरकार है वहीं दिल्ली में एक तरफ़ा बहुमत वाली केजरीवाल सरकार सत्ता में बैठी है दोनों ही परिस्थितियों में फैसला देश की जनता का ही है जहाँ उसे जो सही लगा उसने वही किया है पर अधिकारों के अस्पष्ट होने और महत्वाकांक्षाओं के चलते जिस तरह से केजरीवाल और नजीब जंग के बीच तलवारें खिंची हुई हैं उससे दिल्ली के अधिकारी पूरी तरह से भ्रमित हो गए हैं.
                                आज की स्थिति में चाहे आप या भाजपा किसी को भी अपनी बातों के लिए संविधान विशेषज्ञों का समर्थन मिल जाये और किसी एक को गलत तथा दूसरे को सही साबित कर दिया जाये पर इससे दिल्ली की किस्मत नहीं बदल सकती है. जिस तरह से केजरीवाल ने भी मोदी की तरह बहुत बड़े बड़े वायदे किये हुए हैं ऐसी परिस्थिति में उनके लिए उन पर अमल करना बहुत मुश्किल होने वाला है. दिल्ली जैसे संवैधानिक रूप से अध-कचरे राज्य को बनाने का श्रेय भाजपा को ही जाता है क्योंकि दिल्ली को राज्य बनाया जाना उसके चुनावी एजेंडे में ही था यह अलग बात है कि उसे आज तक इस राज्य को बनाये जाने का समुचित राजनैतिक लाभ नहीं मिल पाया है. पहले दिल्ली की कमान उस पीढ़ी के नेताओं के हाथों में रही है जिन्होंने अपनि ज़िंदगी में राजनीति के उतार चढाव बहुत बार देखे थे पर केजरीवाल के हाथों में यह सब अचानक से ही आया है तो उनके पास करने के लिए क्या बचा हुआ है यह किसी को नहीं दिखाई दे रहा है. अनावश्यक उलझाव से पूरा प्रशासनिक तंत्र ही ठहर जाने वाला है और उसका किसी को लाभ तो नहीं मिलेगा पर जनता के सामान्य कामकाज पर विपरीत असर दिखाई देने लगेगा.
                               देश में सरकार चाहे जिस भी दल  की ही पर प्रशासन नौकरशाही के हाथों में ही रहा करता है जब उनके वरिष्ठ अधिकारियों को राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और अधिकारों की लड़ाई में मोहरा बनाया जाने लगेगा तो आखिर सरकार किस तरह से काम कर पायेगी ? आज हर बात में दूसरे को गलत साबित करने लगे हुए केजरीवाल के लिए भी यह संक्रमण का काल ही है क्योंकि जब तक उनको सरकार चलानी है उन्हें आज की इसी व्यवस्था के साथ अपने को ढालना पड़ेगा पर किसी भी तरह से केवल दूसरे दल को सदैव ही घटिया और भ्रष्ट साबित करने की कोशिश आखिर किस तरह से सफल हो पायेगी इस बात का खुद आप के पास कोई जवाब नहीं है. इस तरह के अनावश्यक संघर्ष जिससे सरकार की गति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है उससे केजरीवाल को पूरी तरह से बचना ही होगा क्योंकि यदि उनको देश में राजनैतिक बदलाव के लिए खुद की कोशिश के साथ अन्य दलों को भी उसके लिए दबाव में लेना है तो उन्हें फिलहाल आज की व्यवस्था से ही काम चलाना होगा. तेज़ी से बदलाव के चक्कर में केजरीवाल की पूर्ण बहुमत की सरकार यदि केंद्र से इस तरह के मसलों में उलझती रहती है तो वह दिल्ली की जनता के लिए किसी भी तरह से अच्छा साबित नहीं होने वाला है.     
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